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पाकदर्पण (राजा नल प्रणीत - इन्द्रदेव त्रिपाठी माधुरी हिन्दी व्याख्या सहित)

Pakadarpana of Raja Nala with Madhuri Hindi Commentary

राजा नल (टीकाकार: पं. इन्द्रदेव त्रिपाठी) द्वारा

DevanagariHindipublished69 पृष्ठ

६६ पाकदर्पणम्
इसके बाद टुकड़ा-टुकड़ा बनाकर कर्पूर से सुगन्धित बना ले और पूगपट से बाँध
कर खाने के लिये प्रदान करे। यह रसायन, रुचिकारक, बलदायक तथा धातुओं
को बढ़ाने वाला है ॥ ४५७-४६१ ॥
अमृतापत्रशाकनिर्माणविधिर्गुणाश्च
ततोऽमृतालतोत्पन्नं पर्णमानीय शोभनम् ।
तत्तिक्तोमोचनं कुर्यान्निशाचूर्णेन यत्नतः ॥ ४६२ ॥
शंखचूर्णेन वा कुर्यात् क्रमुकस्य फलेन वा ।
तरुदुग्धेन वा कुर्यात्तद्दलैस्तण्डुलेन वा ॥ ४६३ ॥
अनेनैव प्रकारेण त्यक्ततिक्तञ्च तद्दलम् ।
प्रक्षिपन् तद्दलेर्माषं मरीचाजाजिसैन्धवम् ॥ ४६४ ॥
घृतेन भर्जयेत्तस्मात् तेन त्वमृतभर्जितम् ।
रुच्यं बल्यं त्रिदोषघ्नं दीपनं धातुवर्धनम् ॥ ४६५ ॥
गुडूची के पत्तों का शाक बनाने की विधि तथा गुण—अमृता (गुडूची)
लता के सुन्दर पत्तों को लेकर हल्दी के चूर्ण के साथ इसकी तिक्तता को दूर करे
या शङ्ख के चूर्ण क्रमुक (सुपारी) का फल, बरगद का दूध या बरगद का
पत्ता अथवा चावल के साथ उसकी तिक्तता को दूर करे। इसी प्रकार तिक्तता
रहित उन पत्तों को बटलोही में छोड़कर उनके साथ उड़द, मरिच, जीरा तथा
सेन्धा नमक के चूर्ण को मिला दे और घी के साथ भून ले। यह घी के साथ
भूनने पर अमृत के साथ भूनने की तरह हो जाता है। यह रुचिकारक, बल-
दायक, त्रिदोषनाशक, जाठराग्निदीपक तथा धातुवर्द्धक होता है ॥ ४६२-४६५ ॥
निम्बपत्रशाकनिर्माणविधिर्गुणाश्च
पत्रं निम्बस्य तरुणं समादेयमनामयम् ।
पचेत्पौननँवैः पत्रैर्मत्स्याक्ष्याश्च फलैस्तथा ॥ ४६६ ॥
तद्गतं मोचयेत्तिक्तं कार्पासस्य दलेन वा ।
ततः सम्भारसंयुक्तं तस्मिन् मधुरता भवेत् ॥ ४६७ ॥
वासयेद् घनशारेण पूगनेत्रेण वेष्टयेत् ।
त्रिदोषशमनं पथ्यं सर्वव्याधिहरं शुभम् ॥ ४६८ ॥
नीम के पत्तों का शाक बनाने की विधि तथा गुण—निरोग स्वच्छ एवं
तरुण नीम के पत्तों को लेकर पुनर्नवा के पत्तों के साथ या मत्स्याक्षि (मकोय)
के फलों के साथ पकावे अथवा कपास के पत्तों के साथ पकाकर उसकी तिताई
को दूर करे । इसके बाद उसमें सम्भार नमक मसाला आदि मिला दे । इससे


नलविरचितम् ६७
उसमें मिठास आ जाती है। तदनन्तर कर्पूर से सुगन्धित बना दे तथा पूगपट्ट नेत्र
से आवेष्टित कर दे । यह खाने से त्रिदोष को शान्त करता है, पथ्य है तथा अच्छी
तरह सभी रोगों को दूर करता है ॥ ४६६-४६८ ॥
अर्कपत्रस्य शाकनिर्माणविधिर्गुणाश्च
अर्कस्य तरुणमानीय दलमात्रन्तु सूदराट् ।
आर्द्रतालगदलैस्तिक्तं तद्गतं परिमोचयेत् ॥ ४६९ ॥
कलिकन्या तद्दलं सूक्ष्मं च्छित्त्वा तत्प्रवणीं नयेत् ।
लवणादीन् विनिक्षिप्य सर्पिषा भर्जयेच्च तत् ॥ ४७० ॥
वासयेत् घनशारेण वेष्टयेत् क्रमुकस्य च ।
तप्ते सर्पिषि निक्षिप्य दापयेत्तद्दलं बुधः ॥ ४७१ ॥
विपाकसमये तत्तु समीरणहरं भवेत् ॥ ४७२ ॥
अर्क (मदार विशेष) के पत्तों का शाक बनाने की विधि तथा गुण—उत्तम
पाचक मदार के तरुण पत्तों को लेकर गीले ताड़ के पत्तों के साथ पकावे और
उसके अन्दर की तिक्तता को दूर करे। इसके बाद उसके पत्तों को चाकू से
छोटे-छोटे टुकड़े बना ले। बटलोही में छोड़ के पुनः उसमें नमक मसाला छोड़कर
घी में भून ले और कर्पूर से सुगन्धित करे तथा पूगपट्ट नेत्र से आवेष्टित कर ले ।
तदनन्तर गरम घी में छोड़कर खाने के लिये दे। यह विपाक के समय में वात
नाशक होता है ॥ ४६९-४७२ ॥
पाटलीपर्णशाकनिर्माणविधिर्गुणाश्च
पाटलीपर्णमादाय तरुणं व्रणवर्जितम् ।
संच्छित्त्वा सूक्ष्मकलिकन्या प्रविण्यां प्रक्षिपेत्ततः ॥ ४७३ ॥
चिञ्चालवणिकापत्रं निक्षिप्य विपचेच्च तत् ।
तत्र विद्वान् प्रकुर्वीत सर्वसम्भारमेलनम् ॥ ४७४ ॥
स्नेहश्रेष्ठं च तत्कुर्यात् वासनादींश्च पूर्ववत् ।
समीरहरणं पथ्यं कफपित्तहरं भवेत् ॥ ४७५ ॥
पाटली (पाढ़ल) पत्र का शाक बनाने की विधि तथा गुण—क्रिमिदंश
आदि से रहित; निरोग तथा तरुण पाटली (पाढ़ल) के पत्तों को लेकर तथा छोटी
चाकू से काटकर बटलोही में रक्खे। इसके बाद इमली तथा लवणिका (लोना)
का पत्र छोड़कर उसको पकावे। तदन्तर विद्वान् पाचक सम्भार (नमक मसाला
आदि) को मिला दे और घी में भून ले। इसके बाद कर्पूर से सुगन्धित कर तथा
७ पा. द.

द्वितीय खण्ड: पायस, मिष्ठान्न, सुगन्धित पेय एवं पाकदर्पण उपसंहार

६८ पाकदर्पणम्
पूगपट्ट नेत्र से आवेष्टित कर खाने के लिये दे । यह वात को दूर करनेवाला पथ्य
तथा कफ-पित्त को दूर करता है ॥ ४७३-४७५ ॥
वटपत्रपाकनिर्माणविधिर्गुणाश्च
वटच्छदान् पचेदाम्ले दलैश्चिञ्चासमुद्भवैः ।
पूर्वं वै भेदनं पाकं सम्भारस्य च मेलनम् ॥ ४७६ ॥
कृत्वा च पूर्ववत् तत्र वासनादींस्तदाचरेत् ।
एतद् वटच्छदं पथ्यं व्रणजित् सर्वदोषजित् ॥ ४७७ ॥
कफपित्तहरं पथ्यं दीपनं पाचनं भवेत् ॥ ४७८ ॥
वटपत्र का शाक बनाने की विधि तथा गुण—वट के पत्तों को इमली के
पत्तों के अम्ल रस में पकावे । पहले काट ले तथा पका ले और सम्भार (नमक-
मसाला आदि) मिला दे। इसके बाद पूर्ववत् घी में भूनकर तथा कर्पूर आदि से
सुगन्धित कर पूगपट्ट नेत्र से आवेष्टित कर खाने को दे । यह वटपत्र का शाक
पथ्य है तथा व्रण एवं सभी दोषों को जीतने वाला है। इसके अतिरिक्त कफ-
पित्त को दूर करनेवाला, पथ्य जाठराग्नि दीपक तथा पाचक होता है ॥ ४७६-
४७८ ॥
सुकुण्डलीपत्रशाकनिर्माणविधिर्गुणाश्च
एवं सुकुण्डलीपत्रं मेघनाददलैः पचेत् ।
वृश्चिकस्य विषं हन्यात् कफदोषहरं भवेत् ॥ ४७९ ॥
सुकुण्डली पत्र का शाक बनाने की विधि तथा गुण—सुकुण्डली पत्र को
लेकर मेघनाद पत्र (चौराई पत्र) के साथ पकावे और पूर्ववत् घी में भूनकर कर्पूर
आदि से सुगन्धित तथा पूगपट्ट नेत्र से आवेष्टित कर खाने को दे । यह वृश्चिक
(बिच्छू) के विष को नाश करता है तथा कफविकार को दूर करता है ॥ ४६९॥
शाल्मलीकुसुमपर्णयोःपाकनिर्माणविधिर्गुणाश्च
शाल्मलीकुसुमं पर्णं समादाय च पाकवित् ।
जम्बूकल्केन सम्मिश्रं पचेत्तत्स्वादु जायते ॥ ४८० ॥
सम्भारादिप्रयोगं तु सर्वं पूर्ववदाचरेत् ।
सेमर के फूल तथा पत्तों का शाक बनाने की विधि तथ गुण—पाकज्ञ-
पाचक सेमर के पुष्प तथा पत्र को लेकर जामुन के कल्क में मिलाकर पकावे इससे
वह स्वादिष्ट हो जाता है । सम्भार ( नमक-मसाला ) आदि सभी प्रयोग पूर्ववत्
करे । अर्थात् पाक, घी में भूनना, सुवासित करना तथा पूगपट्ट नेत्र से आवेष्टित
करे ॥ ४८० ॥


नलविरचितम् ६९
इक्ष्वालिकाप्रशाकनिर्माणविधिर्गुणाश्च
इक्ष्वालिकाग्रमानीय तण्डुलीयशिखैः पचेत् ॥ ४८१ ॥
एवं पाके कृते तस्य मृदुत्वं स्वादु जायते ।
स्वादु वृष्यं हिमकरं श्रमजित् पित्तजिद्भवेत् ॥ ४८२ ॥
इक्ष्वालिकाग्र (कास का अग्रभाग) का शाक बनाने की विधि तथा गुण—
कास का अग्र भाग लेकर चौलाई की जड़ के साथ पकावे । इस प्रकार पाक करने
से वह मुलायम तथा स्वादिष्ट हो जाता है। यह स्वादिष्ट, वीर्यवर्द्धक, शीत-
कारक, थकावट एवं पित्त को जीतने वाला है ॥ ४८१-४८२ ॥
अक्षीवपल्लवशाकनिर्माणविधिर्गुणाश्च
अक्षीवपल्लवं शाकं पचेत्केतकिमस्तकैः ।
अथवा वंशमूलेन मधुरत्वं च मार्दवम् ।
इदं रुचिकरं पथ्यं श्लेष्मवातविनाशनम् ॥ ४८३ ॥
अक्षीव (महानिम्ब) पत्र का शाक बनाने की विधि तथा गुण—महा-
निम्ब (बकायन) के पत्तों को केतकी के मस्तक के साथ पकावे अथवा बाँस की
जड के साथ पकावे । इससे वह मधुर तथा मुलायम हो जाता है। यह रुचि-
कारक पथ्य तथा कफ एवं वात को नाश करता है ॥ ४८३ ॥
शिलाशाकनिर्माणविधिर्गुणाश्च
विषघ्नीं चूर्णिकालेपा शेफाली मदपीतका ।
एतासां मूलपत्राद्यैः पक्वा मृद्वीभवेच्छिला ॥ ४८४ ॥
शिला (नील दूर्वा) का शाक बानने की विधि तथा गुण—शिला (नील
दूर्वा) विषघ्नी (कटुकी) चूर्णिका, आलोपा, शेफाली (मेउड़ी) तथा मद-
पीतिका के मूल एवं पत्र के साथ पकाने पर मुलायम हो जाती है। इसका शाक
पूर्ववत् विधि के अनुसार बना कर प्रयोग करे ॥ ४८४ ॥
आकलीदलपाकनिर्माणविधिर्गुणाश्च
मुण्डिकापत्रपक्वञ्चेत् स्वादु स्यादाकलीदलम् ।
अत्रापि पाकवित् श्रेष्ठं सर्वं पूर्ववदाचरेत् ।
इदं लघु क्रिमिहरं मलस्रावि त्रिदोषजित् ॥ ४८५ ॥
आकली पत्र का शाक बनाने की विधि तथा गुण—आकली पत्र को लेकर
मुण्डी के पत्तों के साथ पकावे । इससे वह स्वादिष्ट हो जाता है। यहाँ पर भी
पाकवेत्ता पूर्वपाकविधि के अनुसार सब कुछ अच्छी तरह सम्भार आदि मिला

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कर शाक बना ले । यह हल्का, कृमिनाशक, मलस्त्रावक ( दस्तावर) तथा त्रिदोष
को जीतने वाला होता है ।। ४८५ ।।
धत्तूरपत्रशाकनिर्माणविधिर्गुणाश्च
धत्तूरपत्रं विपचेत् पद्मपत्रेण कोमलम् ।
गोक्षुरस्य च मूलेन बिल्वपत्रेण पाकवित् ॥ ४८६ ॥
सम्भारमेलनं कुर्यात् पूर्ववत्साधुसिद्धये ।
एतत्कफहरं पथ्यं शीतव्याधिहरं परम् ॥ ४८७ ॥
**धत्तूर पत्र का शाक बनाने की विधि तथा गुण—**मुलायम धत्तूर के पत्तों
को लेकर कमल के पत्तों के साथ पकावे । पाकवेत्ता पाचक गोक्षुर ( गोखरू )
तथा बिल्वपत्र के साथ पकावे और अच्छीतरह सिद्ध होने के लिये सम्भार (नमक
मसाला आदि ) मिला दे । इसके बाद सुगन्धित एवं आवेष्टित कर खाने को दे ।
यह कफ को दूर करने वाला, पथ्य तथा अच्छी तरह शीतजन्य रोगों को नाश
करने वाला है ।। ४८६-४८७ ।।
पद्मपत्रशाकनिर्माणविधिर्गुणाश्च
पद्मपत्रं श्वदंष्ट्राणां मूलेनैव पचेद् यदि ।
स्वादु पथ्यं लघुहितं वृष्यं पित्तहरं भवेत् ॥ ४८८ ॥
**पद्म (कमल) पत्र का शाक बनाने की विधि तथा गुण—**कमल के मुला-
यम पत्तों को लेकर श्वदंष्ट्रा (गोखरू) की जड़ के साथ ही यदि पकाया जाय तो
वह स्वादिष्ट, पथ्य, हल्का, हितकर, वीर्यवर्द्धक तथा पित्तहर होता है ।। ४८८ ।।
किंशुकपत्रशाकनिर्माणविधिर्गुणाश्च
किंशुकस्य दलस्पाकं कुर्यात्तित्तिमोचनम् ।
तण्डुलीयकमूलैर्वा तद्दलैर्वा विधानतः ।
श्लेष्मवातहरं पथ्यं व्रणनुत् क्रिमिदोषनुत् ॥ ४८९ ॥
**किंशुक (ढाक) के पत्तों का शाक बनाने की विधि तथा गुण—**पलाश के
पत्तों को लेकर चौराई की जड़ या पत्तों के साथ तिक्तता को दूर करने के लिए
विधिपूर्वक पाक करे । शेष सम्भार आदि का मेलन, आवासन एवं आवेष्टन आदि
पूर्ववत् करे और खाने में प्रयोग करे । यह पलाशपत्र शाक कफ एवं वात को दूर
करनेवाला, पथ्य, व्रण तथा क्रिमिविकार को दूर करनेवाला है ।। ४८९ ।।
वनशिग्रुपत्रशाकनिर्माणविधिर्गुणाश्च
वनशिग्रुदलं चैव पचेत् श्रीहस्तिनोदलैः ।
यद्वा पुनर्नवदलैः शङ्खचूर्णेन वा पुनः ॥ ४९० ॥


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कन्दवत्सा प्रयोक्तव्या सर्पिषा भर्जयेत्पुनः ।
इदं स्वादुतरा लघ्वो वातपित्तविनाशिनी ॥ ४९१ ॥
**वन सहिजन के पत्तों का शाक बनाने की विधि तथा गुण—**वन सहिजन
के पत्तों को लेकर गजशुण्डी के पत्तों ( या इन्द्र वारुणी के पत्तों ) के साथ पकावे
अथवा पुनर्नवा के पत्ते या शंख के चूर्ण के साथ पकावे । इसका प्रयोग कन्दशाक
की तरह करना चाहिए और पुनः घी के साथ भून ले । यह गजशुण्डी अत्यन्त
स्वादिष्ट, हल्की तथा वात-पित्त को नाश करनेवाली है ।। ४९०-४९१ ।।
कुरण्टदलशाकनिर्माणविधिर्गुणाश्च
शिग्रुमूलेन संयुक्तं कुरण्टकदलं पचेत् ।
स्वादु श्लेष्महरं पथ्यं बृंहणं बलवर्द्धनम् ॥ ४९१ ॥
कुरण्ट (कट सरैया) के पत्तों का शाक बनाने की विधि तथा गुण—
कटसरैया के पत्तों को सहिजन की जड़ के साथ पकावे और पूर्ववत् मसाला आदि
मिला कर शाक तैयार करे तथा खाने के लिये प्रयोग करे। यह स्वादिष्ट, कफ-
हर, पथ्य, मांसवर्द्धक तथा वातवर्द्धक है ।। ४९२ ।।
पलाण्डुशाकनिर्माणविधिर्गुणाश्च
भवेत्पलाण्डुः सुरभिस्तण्डुलीयनलैः पचेत् ।
वातश्लेष्मही रुच्यः पथ्यः कायाग्निदीपकः ॥ ४९३ ॥
**प्याज का शाक बनाने की विधि तथा गुण—**प्याज को चौराई के क्वाथ के
साथ पकावे वह सुगन्धित हो जाता है । प्याज का शाक वात-कफ को दूर करने
वाला, रुचिकारक, पथ्य तथा जाठराग्नि को प्रदीप्त करने वाला है ।। ४९३ ।।
सैकसशाकनिर्माणविधिर्गुणाश्च
सैकसं विपचेद्विद्वान् क्षुद्रदन्तिदलैः सह ।
मृदुत्वं स्वादुतां याति गोधूमकणवच्च तत् ॥ ४९४ ॥
**सैकस का शाक बनाने की विधि तथा गुण—**विद्वान् पाचक सैकस को
क्षुद्रदन्ति के पत्तों के साथ पकावे । यह गेहूं के चूर्ण सदृश मुलायम तथा स्वादिष्ट
हो जाता है ।। ४९४ ।।
वासापत्रशाकनिर्माणविधिर्गुणाश्च
वासापत्रं तु तरुणमानीय क्रिमिवर्जितम् ।
चूर्णतोयेन विपचेत्तिक्तविनिवृत्तये ॥ ४९५ ॥
गते तिक्ते पुनस्तच्च मन्थानेन विलोडयेत् ।
तत्र निक्षिप्य संभारान् पूर्ववद्विपचेच्च तत् ॥ ४९६ ॥

७२ पाकदर्पणम्
पुनश्च वासनादौ च कृते तन्मधुरायते ।
विपाकसमये चेदं कासश्वासहरं भवेत् ॥ ४९७ ॥
वासा (अडूसा) के पत्र का शाक बनाने की विधि तथा गुण—क्रिमिक्षं
रहित मुलायम अडूसा के पत्तों को लेकर उसकी तित्ताई दूर करने के लिये चूने
के पानी के साथ पकावे । पुनः तित्ताई निकल जाने के बाद उसको मथनी से मथ
दे । इसके बाद उसमें सम्भार (नमक-मसाला आदि) पहिले की तरह छोड़कर
पकावे । पुनः कर्पूर आदि सुगन्धित द्रव्यों से सुगन्धित करने पर मधुर हो जाता
है । यह शाक विपाक के समय में श्वास-कास को दूर करने वाला होता
है ॥ ४९५-४९७ ॥
सूपराजपदप्राप्तिनिरूपणम्
सूपवेदमखिलं सुसूक्ष्मया संविदा समवलोक्य सर्वतः ।
पाकरूपमभिधेयमादराद्यो बिभर्ति हृदयेन सूपराट् ॥ ४९८ ॥
सूपराज पद की प्राप्ति - यो उत्तम पाचक सूक्ष्म विचार से चारो तरफ देख-
कर पाक रूप अभिधेय सम्पूर्ण सूपवेद (पाकशास्त्र) को हृदय से आदरपूर्वक
ग्रहण करता है वह सूपराज (पाचकों का राजा) होता है ॥ ४९८ ॥
पाकोपसंहारः
इति नलकृतं पाकं यो बिभर्त्यात्मबुद्धौ
स खलु परहितार्थं पूज्यते राजसङ्घैः ।
अपि च रिपुसमाजे संस्थिता कीर्तिनारी-
निजपतिमनुयामीत्यब्रुवन् प्रत्यगात्तम् ॥ ४९९ ॥
इति नलकृत पाकदर्पणे प्रथमप्रकरणं समाप्तम्
पाक प्रकरण का उपसंहार - यो पाचक इस नल कृत पाक शास्त्र को अपनी
बुद्धि से दूसरों के हित के लिये धारण करता है वह राजाओं से पूजित होता है
और भी शत्रुओं के समाज में स्थित कीर्तिरुपी स्त्री अपने पति के साथ जाऊँगी
यह कहती हुई उसके पीछे चली जाती है ।
इति नलकृत पाकदर्पण का डा० इन्द्रदेव त्रिपाठीकृत माधुरी हिन्दी व्याख्या
सहित पाकनिरूपण नामक प्रथम प्रकरण समाप्त ॥ १ ॥
अथ ऋतुधर्मनिरूपणम्
राजोवाच
पाकक्रियाविदां श्रेष्ठ ! सूद ! सर्वज्ञ ! सुव्रत ! ।
अनेकविद्याकुशल ! पाकवित् करिकेसरिन् ॥ १ ॥
वसन्तादि-ऋतोर्धर्माः पृथग्वस्तुनिषेविताः ।
एकस्तेन हितानेव परिकल्प्य प्रदर्शय ॥ २ ॥
राजा ऋतुपर्ण का प्रश्न - हे पाक क्रियाओं को जानने वालों में श्रेष्ठ ! सभी
पाक विधि को जानने वाले ! शुद्ध व्रत को धारण करने वाले ! अनेक विद्या के
विशेषज्ञ करिरूप पाक विद्या जानने वालों में सिंहरूप आप अलग-अलग वस्तुओं
को सेवन किये जानेवाले वसन्त आदि ऋतुओं के धर्मों को एक-एक करके जिनसे
हित होता है उनकी कल्पना कर प्रदर्शित करें ॥ १-२ ॥
राजाऋतुपर्णस्योत्तरम्
तस्योत्तरं वक्तुकामो राजानमिदमब्रवीत् ।
दण्डचण्डादिदोर्दण्ड ! खण्डितारातिमण्डल ! ॥ ३ ॥
चण्डांशुमण्डलारेख ! कुण्डलद्वयमण्डित ! ।
श्रूयतां राजशार्दूल ! ऋतुपर्ण ! महामते ! ॥ ४ ॥
सन्ति प्रतिदिनं चित्रं ऋतवः स्वस्वधर्मकाः ।
प्रमाणं चेत्प्रवक्ष्यामि तेषां लक्षणमुत्तमम् ॥ ५ ॥
मासद्वयेन शीतो हि ऋतुरेकदिनेऽप्ययम् ॥ ६ ॥
राजा ऋतुपर्ण के प्रश्न का उत्तर - पाकसर्वज्ञ नल राजा ऋतुपर्ण के प्रश्न
का उत्तर देने की इच्छा से उनसे बोले - हे दण्ड देने में प्रचण्ड (मजबूत) हाथों
से शत्रु समूह को परास्त करनेवाले तथा प्रचण्ड सूर्यमण्डल के किरण के रेख से
चमकते हुए दोनों कुण्डल वाले, राजाओं में सिंह, महान्, बुद्धिमान्, महाराज
ऋतुपर्ण ! आप सुनें । प्रतिदिन चित्र-विचित्र, अपने-अपने धर्मवाले ऋतु ये हैं
जिनके लक्षणों को प्रमाणसहित कहूँगा । दो माह शीत ऋतु होता है । यह नियम
एक दिन में भी है ॥ ३-६ ॥
ऋतुभेदविवेचनम्
ऋतुभेदं प्रवक्ष्यामि शृणु वेदप्रमाणतः ।
किमर्थमृतुभेदोऽयमुच्यते लोकमानतः ॥ ७ ॥

७४ पाकदर्पणम्
अयमेव भवत्यस्मिन् न कालनियमो ऋतुः ।
मासद्वयेन कथितः क्रमोऽयं नोपपद्यते ॥ ८ ॥
तत्सृष्टिसमये सत्यं विचारविमुखो विधिः ॥ ९ ॥
ऋतुओं के प्रकार का विचार— हे राजन् ! ऋतुओं के भेदों को वेद-प्रमाण
के अनुसार कहता हूँ, सुनें । लोकप्रमाण के अनुसार यह ऋतुभेद किसलिये कहा
गया है। इस सम्बन्ध में लोकप्रमाण से ही ऋतुओं का विभाग है । समय का कोई
नियम नहीं है। दो माह का ऋतु होता है यह क्रम उपयुक्त नहीं है। यह सत्य है
कि सृष्टि के समय में ब्रह्मा विचारविमुख हो गये थे ॥ ७-९ ॥
मूलप्रमाणरहितो लोके श्रौतप्रवाहतः ।
ऋतूनामयमेवेति नियमो नोपपद्यते ॥ १० ॥
तस्माद्दिने दिने युक्त्या ऋतुभेदस्तु युज्यते ।
दिनप्रथमभागेन ऋतुधर्मा भवन्त्यमी ॥ ११ ॥
भागेऽप्यस्मिन् भवन्त्येव ऋतवोऽन्ये तु कौशलात् ।
ऋतुव्यतिकरे मानं देहभागधियो यतः ॥ १२ ॥
न च कालक्रमो बुद्धिः परं मानं मनीषिणः ।
अर्थोऽयं कविभिस्सम्यक् कथितोऽयं विचार्यताम् ॥ १३ ॥
लोक में मूल प्रमाण के विना शास्त्र के कथनानुसार ऋतुओं का यही नियम
है ऐसा कहना उपयुक्त नहीं है। अतः युक्ति से प्रतिदिन ऋतुभेद होता है दिन
के पहले भाग में ये ऋतुधर्म होते हैं। दूसरे भाग में कुशलतापूर्वक विभाग के
अनुसार अन्य ऋतुओं के धर्म होते ही हैं क्योंकि ऋतुओं के व्यतिक्रम (विभाजन)
देहविभाग में बुद्धि ही प्रमाणित है अर्थात् जैसे देह के विभाग हैं वैसे ही ऋतुओं
के विभाग हैं। विद्वानों की बुद्धि कालक्रम के अनुसार ऋतुपरक नहीं है। इस
तात्पर्य को विद्वानों ने अच्छी तरह बताया है इसका विचार करें ॥ १०-१३ ॥
श्रुतिरप्याह तद्भेदानिच्छया तद्विकल्पतः ।
मूलशास्त्रप्रमाणेण भोक्त्रे भोगप्रमाणतः ॥ १४ ॥
राज्ञः शक्तिबलादैव सेवकानां च कौशलात् ।
क्रीडातिशक्ता राजानः प्रवक्ष्ये तान्यतः स्वयम् ॥ १५ ॥
षड्गुणा भिन्नधर्मांश्च यथा राजानमाश्रिताः ।
भिन्नधर्मांश्च कतमा दिनमेकं तथा श्रिताः ॥ १६ ॥
श्रुति ने भी ऋतुओं के भेदों को वैकल्पिक इच्छा के अनुसार, मूल-शास्त्र के
प्रमाण के अनुसार, खानेवाले के भोग के अनुसार, राजाओं की शक्ति से, सेवकों की


नलविरचितम् ७५
कुशलता से तथा क्रीडासक्त राजाओं का जो धर्म है उनको मैं कहूँगा। उन ऋतु-
धर्मों को मैं कहता हूँ। छः गुण वाले ऋतुओं के भिन्नधर्म जिस प्रकार राजा में
रहते हैं उसी प्रकार आश्रित कितने ऋतुधर्म एक दिन में रहते हैं उसको कहता
हूँ ॥ १४-१६ ॥
प्रतिदिनमृतूनां विभागक्रमनिरूपणम्
अहोरात्रं तु षड्भागं कुर्यात्सूर्योदयात् सुधीः ।
न्यूनाधिकं विना कुर्यात् यथा कालक्रमाद्दिनम् ॥ १७ ॥
दिनस्य प्रथमे भागे वसन्ताख्यो ऋतुर्भवेत् ।
अन्ये द्वितीये घस्रस्य वदेद् ग्रीष्माभिधो ऋतुः ॥ १८ ॥
दिवसस्त्रिगुणे भागे भवेद्वर्षाभिधो ऋतुः ।
अह्रश्चतुर्थभागे च शरदाख्यो ऋतुर्भवेत् ॥ १९ ॥
दिनस्य पञ्चमे भागे हेमन्ताख्यो भवेद्ऋतुः ।
षड्भागे तु घस्रस्य शिशिराख्यो ऋतुर्भवेत् ॥ २० ॥
तद्धर्मास्तत्र तेनैव भवन्ति कुशलैः क्रमात् ॥ २१ ॥
प्रतिदिन के ऋतुओं के विभागक्रम का निरूपण— बुद्धिमान् व्यक्ति दिन
तथा रात्रि को सूर्योदय से लेकर सूर्यास्त होने तक यथा काल क्रम के अनुसार
छः भाग करे। दिन के पहले भाग में वसन्त नामक ऋतु होता है। दिन के दूसरे
भाग में ग्रीष्म नामक ऋतु होता है। दिन के तीसरे भाग में वर्षा नामक ऋतु
होता है। दिन के चौथे भाग में शरद् ऋतु होता है। दिन के पाँचवें भाग में
हेमन्त नामक ऋतु होता है तथा दिन के छठवें भाग में शिशिर नामक ऋतु
होता है। दिन के उन-उन भागों में क्रमशः पूर्वोक्त ऋतुओं के गुण होते हैं ऐसा
बुद्धिमान जन समझें ॥ १७-२१ ॥
वसन्तादिऋतुषु पथ्यं तद्गुणाश्च
वसन्तेऽह्नि ऋतौ पथ्यः कटुस्वादुरसः पटुः ।
कुर्वन्ति बलकायाग्निं रुचीनर्थान् यथाक्रमम् ॥ २२ ॥
मध्वम्ललवणा भोग्या ऋतौ ग्रीष्मदिनस्य च ।
शमयन्ति च पित्तादीन् शान्तिं कायस्य नित्यशः ॥ २३ ॥
वर्षाऋतौ दिने पथ्याः कटुतित्करसास्तथा ।
शमयन्ति च वातादीन् कायाग्निं वर्द्धयन्ति च ॥ २४ ॥
शारदेऽह्नि ऋतौ भक्ष्याः स्वादुतिक्तरसान्विताः ।
हेमन्तेऽह्नि ऋतौ स्वादु कटुतिक्तकषायकाः ॥ २५ ॥

७६ पाकदर्पणम्
शिशिरेऽह्नि ऋतौ तावत् तिक्तस्वादुरसास्समाः ।
अनेकान् कायसम्भूतान् दोषान्नाशु हरन्ति च ॥ २६ ॥
देशकालवयोऽवस्था — धातुदोषबलाबलम् ।
विद्वान् विचार्य तान्येव प्रयत्नेन प्रयोजयेत् ॥ २७ ॥
वसन्तादि ऋतुओं में पथ्य तथा उनके गुण — वसन्त ऋतु के दिनों में कटु,
मधुर तथा लवण रस वाले पदार्थ पथ्य होते हैं। ये यथा क्रम बल की वृद्धि,
जाठराग्नि की वृद्धि तथा रुचि को बढाने वाले होते हैं। ग्रीष्म ऋतु के दिन में
मधुर, अम्ल तथा लवण रस वाले पदार्थ खाने के योग्य हैं। ये वात-विकार को
शान्त करते हैं तथा शरीर को शान्त रखते हैं। वर्षा ऋतु के दिन में कटु, मधुर
तथा लवण रस वाले पदार्थ पथ्य हैं और ये वात आदि विकार को शान्त करते हैं
तथा जाठराग्नि को बढ़ाते हैं। शरद् ऋतु के दिन में मधुर तथा तिक्त रस वाले
पदार्थ खाने योग्य हैं। हेमन्त ऋतु के दिन में मधुर कटु तिक्त तथा कषाय रस
वाले पदार्थ पथ्य हैं। शिशिर ऋतु में तिक्त तथा मधुर रस वाले पदार्थ सामा-
न्यतः सेवन करने योग्य हैं। ये अनेक प्रकार के शरीर में होने वाले दोषों को
शीघ्र ही नाश करते हैं। विद्वान् मनुष्य देश, काल, वय, अवस्था, धातु तथा
दोषों के सबल एवं निर्बल का विचार कर उसी के अनुसार प्रयत्न पूर्वक प्रयोग
करें ॥ २२-२७ ॥
ऋतुसन्धिधर्मनिरूपणम्
ऋतुसन्धिषु सर्वेषु जन्तूनाञ्जायते कफः ।
अन्नारेकव्यतिकराद् अग्निमेदसमुद्भवात् ॥ २८ ॥
वसन्तग्रीष्मवर्षेषु अग्निर्ज्वलति देहिनाम् ।
शरद्धेमन्तशिशिर — ऋतुष्वनिलसम्भवः ॥ २९ ॥
सच्चिदानन्दरूपोऽयं पक्वापक्वरसात्मकः ।
अस्ति योऽसौ प्रकाशात्मा सर्वं पायात्सदाशिवः ॥ ३० ॥
ऋतुओं के सन्धिधर्म का निरूपण — सभी ऋतुओं की सन्धियों में अन्न तथा
जल के व्यतिक्रम होने से तथा अग्नि एवं मेद के उत्पन्न होने से प्राणियों का कफ
बढ़ जाता है। वसन्त; ग्रीष्म तथा वर्षा ऋतु में प्राणियों की अग्नि प्रज्वलित रहती
है। शरद् हेमन्त तथा शिशिर ऋतुओं में वायु की उत्पत्ति होती है। पक्वापक्व
रसात्मक, सच्चिदानन्द रूप यह जो प्रकाशात्मक अग्नि स्वरूप शिव है वे सभी
पापियों की रक्षा करें ॥ २८-३० ॥
नलविरचितम् ७७
ऋतुक्रमानुसारण मांससेवनजन्तवः
हरिणादिर्वसन्ते च ग्रीष्मे मेषादि सम्भवम् ।
वर्षत्तौ कुक्कुटादीनां मत्स्यादीनां शरत्समे ॥ ३१ ॥
हेमन्ते शूक्रादीनाञ्चटकादेश्च शैशिरे ।
आमिषं क्रमशस्तेषामृतुष्वेतेषु योजयेत् ॥ ३२ ॥
ऋतु के अनुसार मांस सेवन के योग्य जन्तु — वसन्त ऋतु में हरिण आदि
के मांस सेवन करने योग्य है। ग्रीष्म ऋतु में मेष ( भेड़ ) आदि का मांस सेवन
करने योग्य है। वर्षा ऋतु में कुक्कुट ( मुर्गा ) आदि का मांस, शरद् ऋतु में
मछली आदि का मांस, हेमन्त ऋतु में सूअर आदि का मांस, शिशिर ऋतु में
चटका ( गौरैया ) आदि का मांस क्रमशः पूर्वोक्त ऋतुओं में प्रयोग करें ॥ ३१ ॥
वसन्ते हितोपभोग्यमांसानि
अथ वक्ष्ये हितं मांसं क्रमशः ऋतुषट्कके ।
एणीहरिणयोर्मांसं वसन्तत्तौ हितं च तत् ॥ ३३ ॥
पथ्यं हितकरं वृष्यं परमं स्वादुबृंहणम् ।
वसन्त में उपभोग करने योग्य मांस — छहों ऋतुओं में उपभोग करने योग्य
हितकर मांस को कहते हैं। वसन्त ऋतु में हरिण तथा हरिणी का मांस हितकर
होता है। इन सबों का मांस सेवन करना पथ्य, हितकर, वीर्यवर्द्धक, उत्तम
स्वादिष्ट तथा मांसवर्द्धक होता है ॥ ३१ ॥
ग्रीष्मत्तौ हितोपभोग्यमांसानि
आविकञ्च फलं मेषमामिषं शीतलं मृदुः ।
ग्रीष्मत्तौ तु परं पथ्यमुष्णवारणं हितम् ॥
ग्रीष्म में उपभोग करने योग्य मांस — ग्रीष्म ऋतु में भेड़ी तथा भेड़ा का
मांस शीतल तथा मृदु होने के कारण उत्तम पथ्य है तथा उष्मा शामक होने से
हितकर है ॥ ३४२ ॥
वर्षत्तौ हितोपभोग्यमांसानि
लवणस्याब्धिजातानां मत्स्यानां कुक्कुटस्य च ॥ ३५ ॥
आमिषं परमं पथ्यं वर्षत्तौ शीतवारणम् ।
वर्षा ऋतु में उपभोग करने योग्य मांस — वर्षा ऋतु में लवण समुद्र में रहने
वाले मत्स्य ( मछली ) एवं मुर्गा का मांस उत्तम पथ्य होता है और यह शीत को
दूर करने वाला है ॥ ३५ ॥

७८ पाकदर्पणम्
शरदृतौ हितोपभोग्यमांसानि
नदीतटाकसम्भूतं मत्स्यानामामिषं हितम् ॥ ३६ ॥
ऋतौ शरदि तीक्ष्णोष्णसमरूपं सुखप्रदम् ।
शरद ऋतु में उपभोग योग्य मांस—शरद ऋतु में नदी तथा पोखरा में रहने
वाली मछलियों का मांस तीक्ष्ण तथा उष्ण सम रूप होने के कारण सुखप्रद एवं
हितकर होता है ॥ ३६ ॥
हेमन्तर्तौ हितोपभोग्यमांसानि
वाराहशशसंभूतं क्रव्यमुष्णकरं परम् ॥ ३७ ॥
लघु वृष्यं सुखकरं ऋतौ हेमन्तसंज्ञके ।
हेमन्त ऋतु में उपभोग योग्य मांस—हेमन्त ऋतु में सूअर तथा खरगोश का
मांस उत्तम गरम, हल्का, वीर्यवर्द्धक तथा सुखकारक होता है ॥ ३७ ॥
शिशिरर्तौ हितोपभोग्यमांसानि
आमिषं कलविङ्कस्य लावकोत्थं च शोभनम् ॥ ३८ ॥
उष्णवीर्यकरं स्वादु ऋतौ शिशिरसंज्ञके ॥ ३९ ॥
शिशिर ऋतु में उपभोगयोग्य मांस—शिशिर ऋतु में कलविङ्क (गौरैया)
तथा लावक पक्षी का मांस उत्तम होता है। यह उष्ण, वीर्यवर्द्धक तथा स्वादिष्ट
होता है ॥ ३८-३९ ॥
सूदकारगुणप्रशस्तयः
एवं वसन्तादि ऋतौ प्रसिद्धधर्मान् विदित्वा कुरुते यथात्मा ।
विमुक्तपापः स च सूददोषैः पुनर्जन्मना जठरं न याति ॥ ४० ॥
यदामिषं देवपित्तृप्रवृत्तये करोति सूदो यदि कामवर्जितः ।
प्रयाति लोकं कृतिना कृतियँथा सवासवस्तं मुमुदे सदा मुदा ॥ ४१ ॥
अकलार्थसकलं कलाविदः सूदकर्मकुशलं मृगादिषु ।
स्वामिकार्यमिति यः करोति तत् सूददोषकृतपापभाङ्नरः ॥ ४२ ॥
इति नलकृतपाकदर्पणे द्वितीयं प्रकरणं समाप्तम् ॥ २ ॥
पाचक की प्रशंसा—इस प्रकार पाचक वसन्तादि ऋतुओं में अच्छी तरह
प्रसिद्ध गुण-धर्मों को जानकर पाचक कार्य करता है वह पाचक के दोषों से मुक्त
होकर पुनः माता के पेट में नहीं जाता है। अर्थात् संसार से मुक्त हो जाता है।
यदि पाचक कामना रहित देवता पितर के लिये मांस का प्रकार बनाता है तो वह


नलविरचितम् ७९
पुण्यात्मा देवताओं के लोक में जाता है और हमेशा प्रसन्नता पूर्वक इन्द्र के साथ
रहता है। यो पाकशास्त्र को जाननेवाला मृग आदि के मांस को बनाने में कुशल
अच्छी तरह स्वामी के कार्य के लिये मांस पाक को बनाता हैं वह मनुष्य पाचक
के दोष जन्य पाप का भागी नहीं होता है ॥ ४०-४२ ॥
इति नलकृत पाकदर्पण का डा० इन्द्रदेव त्रिपाठीकृत माधुरी हिन्दी व्याख्या
सहित ऋतुधर्मनिरूपण नामक द्वितीय प्रकरण समाप्त ॥ २ ॥

Here is the complete, line-by-line transcription of the Sanskrit and Hindi text from the image:

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अथ भक्ष्यप्रकाराः
भक्ष्यराजः—
विभिन्नभक्ष्यपदार्थानां निर्माणप्रकारनिरूपणम्
शीतगोधूमशकलं भागमेकं समाहरेत् ।
नवमेकं सूक्ष्मवासो भागं सूदः प्रशान्तये ॥ १ ॥
सुपक्वं भिन्नचणकं निर्णयेदर्धभागकम् ।
एकं च मेदसोभागन्नयेन्निष्पावमानकम् ॥ २ ॥
नारिकेलकणैः सूक्ष्मं भागार्धस्य ग्रहेद् बुधः ।
एलासैंधवचूर्णञ्च किंचिदानीय मानवित् ॥ ३ ॥
समानीय सुपक्वं च घनसारार्दिनिर्मिते ।
मन्दक्षीरसमुद्भूतं नवनीतं नयेन्नवम् ॥ ४ ॥
मेलयेच्च यथायोग्यं पक्वं क्षीरेण मानवित् ।
जंबीरबीजवत्कुर्यात् मोदकान् बहुशः सुधीः ॥ ५ ॥
वासितेषु पुनः पूगपट्टेष्वेतान् पृथक् क्षिपेत् ।
अन्तराट्टालिके सम्यक् निधाय च पुनः पचेत् ॥ ६ ॥
तमादाय पुनस्तेषु सिद्धेद्धै स्थिरसर्पिषि ।
भक्ष्यराजाह्वयो राजन् कथिते पाककोविदैः ॥ ७ ॥
विभिन्न भक्ष्यपदार्थों में भक्ष्यराजनिर्माण-प्रकार— पाचक शीतल (कच्चा)
गेहूँ के टुकड़ों का एक भाग तथा नवीन महीन सुगन्धित द्रव्य एक भाग प्रशान्त के
लिये ग्रहण करे । अच्छी तरह पके हुए चने की दाल आधा भाग, लोबिया की
गूदी एक भाग, तथा नारियल के फल का सूक्ष्म कण आधा भाग ग्रहण करे और
इलायची तथा सेन्धा नमक का चूर्ण थोड़ा मिला दे । इनके बाद सबों को पका दे
और कर्पूर आदि से सुगन्धित दूध का निकाला हुआ नवीन मक्खन लेकर यथायोग्य
मात्रा के अनुसार पके दूध के साथ मिला दे । तदनन्तर बुद्धिमान् पाचक जम्बीरी
नींबू के बीज के समान बहुत सा मोदक बना ले और इन सबों को सुवासित पूगपट्ट
में अलग रक्खे । पुनः घर के अन्दर अच्छी तरह रखकर पकावे और पुनः उसको
लेकर घी में छोड़ दे । हे राजन्, इसको उत्तम पाचक भक्ष्यराज कहते हैं ॥१-७॥


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नलविरचितम् \hfill ८१
भक्ष्यराजस्य गुणाः
वातपित्तहरश्चायं वृष्यः कायविवर्द्धनः ।
सद्योलघुतरः स्वादुः शरीरस्य बलप्रदः ॥ ८ ॥
भक्ष्यराज के गुण— भक्ष्यराज वात एवं पित्त को दूर करनेवाला, वीर्यवर्द्धक,
शीघ्र ही जाठराग्नि दीपक, अत्यन्त हल्का, स्वादिष्ट तथा शरीर को बल देने
वाला है ॥ ८ ॥
अन्यदभक्ष्यप्रकारनिर्माणविधिर्गुणाः
निधाय सूक्ष्मवासश्च प्रवण्वां सूदकोविदः ।
प्रथमं रसमासिच्य पेषयेन्नवनीतवत् ॥ ९ ॥
निक्षिपेत्तादृशं मांसं पात्रे तस्मिन् ततः परम् ।
गोधूमस्य कणान् पेषान् भिन्नमुद्गकणांस्तथा ॥ १० ॥
भर्जयित्वा पुनः किञ्चित् पचेद्वै पयसा च तान् ।
खण्डानि निक्षिपेतत्र तेभ्यो द्विगुणितानि च ॥ ११ ॥
दुग्धोद्भवानि खण्डानि तदर्द्धानि च निक्षिपेत् ।
जातीचम्पकपुन्नागपुष्पादीन् तत्र निक्षिपेत् ॥ १२ ॥
सुपक्वं कुक्कुटाण्डान्तं लोहितं तत्समं न्यसेत् ।
कल्कं च घनसारस्य एलाचूर्णञ्च निक्षिपेत् ॥ १३ ॥
मुहूर्तमेकमास्थाय पुनः पुष्पाणि संत्यजेत् ।
मेलयित्वा तु तत्कल्कं पात्रेऽन्यस्मिन् विनिक्षिपेत् ॥ १४ ॥
मानवित् मांसकल्केन कुर्याद् वै तेषु कर्पूराम् ।
निधाय तेषु मुद्गादिकल्कं कुर्याच्च शक्तिवत् ॥ १५ ॥
तच्छोभार्थं पुनः कुर्यादाकारान् द्विधा द्विधा ।
एवं बहूनि वै कुर्याद् भक्ष्याणि च पृथक् पृथक् ॥ १६ ॥
निधाय पूगपट्टस्य नेत्रेतानि पचेद्बुधः ।
अनेनैव प्रकारेण पश्चाद्भक्ष्यं प्रदापयेत् ॥ १७ ॥
रुच्यं पथ्यं तथा बल्यं वृष्यं दोषत्रयापहम् ।
एवमादीनि भक्ष्याणि कर्त्तव्यानि मनीषिभिः ॥ १८ ॥
अन्य प्रकार का भक्ष्य बनाने की विधि तथा गुण— पाकशास्त्रवेत्ता महीन
सुगन्धित द्रव्य प्रवणी (बटलोहो) में रक्खे । पहले इसके जल के साथ मांस को
नवनीत की तरह पीस ले । इसके बाद पूर्वोक्त प्रकार से पीसा हुआ मांस उस पात्र
में रक्खे । पुनः पीसे हुए गेहूँ के कण, तथा मूँग की दाल को घी के साथ भून ले

४२ पाकदर्पणम्
और दूध में पका ले। इन सभी द्रव्यों के दुगुना शक्कर तथा उसके आधा दूध
की खोया छोड़ दे। तदनन्तर जाती (चमेली) चम्पा तथा सफेद कमल का पुष्प
छोड़ दे। पुनः मुर्गी के छिलका रहित अण्डा को लाल वर्ण होने तक पकाकर
छोड़ दे और कर्पूर का कल्क तथा इलायची का चूर्ण मिला दे। थोड़ी देर
पूर्वोक्त पुष्पों को रखने के बाद निकाल कर फेंक दे। पूर्वोक्त सभी चीजों को
एक दूसरे पात्र में रखकर मांस के कल्क के साथ कर्पूर से सुवासित कर मूँग का
कल्क बनाकर सीप की तरह बनाये। उसको सुन्दर बनाने के लिये दो तीन प्रकार
के आकार का बना ले। इसी प्रकार अलग-अलग बहुत प्रकार के भक्ष्य पदार्थ बना
कर पूगपट्ट नेत्र में रखकर पकावे। इसीप्रकार तैयार होने के बाद बुद्धिमान् पाचक
खाने के लिये दे। यह रुचिकारक, पथ्य, बलवर्द्धक, वीर्यवर्द्धक तथा त्रिदोषनाशक
होता है। इस प्रकार बुद्धिमान् पाचक अनेक वस्तुओं से अनेक प्रकार के भक्ष्य
पदार्थों को बनावे ॥ ९-१८ ॥
भक्ष्यपदार्थोपसंहारः
भक्ष्यजालमिदमर्पितं प्रियं सेव्यतां सुकृतिभिः परं मुदा ।
पाकसारसरसं सदा समं कान्तिदीपनकरं बलप्रदम् ॥ १९ ॥
इति नलकृत पाकदर्पणे भक्ष्यवर्णनं नाम तृतीयं प्रकरणं समाप्तम् ॥
भक्ष्य पदार्थ विषयक उपसंहार—इस प्रकार प्रिय भक्ष्य पदार्थों के समूहों
को मैंने बताया। इसको प्रसन्नता के साथ पुण्यवान व्यक्ति सेवन करें। यह सरस-
पाक सरस, सदा शान्ति देनेवाला, कान्तिवर्द्धक तथा बलकारक होता है॥ १९॥
इति नलकृत पाकदर्पण का डा० इन्द्रदेव त्रिपाठीकृत माधुरी हिन्दी व्याख्या
सहित भक्ष्यवर्णन नामक तृतीय प्रकरण समाप्त ॥ ३ ॥


अथ पायसप्रकारनिरूपणम्
विचित्रलशुनपायसनिर्माणविधिर्गुणाश्च
अथ भेदान् प्रवक्ष्यामि पायसस्य विचित्रकान् ।
त्वचं लशुनभागानां समुत्सृज्य प्रयत्नतः ॥ १ ॥
अग्रतो मूलतः किञ्चित् छित्त्वा छेदान् समुत्सृजेत् ।
विरूढार्थं स्रजन्तेषां कुर्यात्सूच्यार्धतन्तुभिः ॥ २ ॥
पायसं यावता सिद्धं तावदेव परिग्रहेत् ।
यावता स्यात्क्रियाशुद्धिः तावदेव प्रयोजयेत् ॥ ३ ॥
भागान् लशुनकन्दस्य छिन्त्यात्सूक्ष्मंश्चतुर्विधम् ।
तेषां विरूढगर्भस्थं समादाय समुत्सृजेत् ॥ ४ ॥
तानेव पोटलीं विद्वान् कुर्याद्वै सूक्ष्मवाससा ।
काञ्जिकामिश्रिते पाके यावत्तण्डुलसम्भवे ॥ ५ ॥
कृत्वा स्थानं पचेत्सम्यग्गन्धकटुमोचनात् ।
पक्वं लशुनमादाय सघृतं मांसमुत्सृजेत् ॥ ६ ॥
क्षालयेद्वारिणा सम्यक् पचेत् क्षीरेण पाकवित् ।
चतुःकृत्वः पञ्चकृत्वः क्षालयेद्वारिणा पुनः ॥ ७ ॥
विचित्र लशुन पायस बनाने की विधि तथा गुण—भक्ष्यप्रकार बनाने के
बाद पायस (खीर) के विचित्र प्रकारों को बताता हूँ। लहसुन को लेकर
प्रयत्नपूर्वक उसकी त्वचा को निकाल कर फेंक दे और थोड़ा अग्रभाग तथा
मूलभाग को भी काटकर फेंक दे। उसको एकत्र रहने के लिये सूई-तागा से
माला की तरह पिरो ले। जितनी मात्रा में पायस बनाना हो उतनी ही मात्रा में
ग्रहण करे और जितने से कार्य की सिद्धि हो जाय उतना ही प्रयोग में ले।
पाचक लहसुन के कन्द को चार भाग में काटे। उसके अन्दर स्थित कंडी (डंठल)
निकाल कर फेंक दे। इसके बाद उनको महीन वस्त्र से पोटली में बाँध ले और
काञ्जीमिश्रित पाक में चावल पकने तक पोटली तथा लहसुन की माला को किसी
स्थान पर राख कर जब तक उसका कटु गन्ध दूर न हो जाय तब तक पकावे।
इसके बाद पके लहसुन को लेकर घृत युक्त मांस को छोड़ दे तथा जल से
प्रक्षालन कर दे और पाक को जानने वाला दूध के साथ अच्छी तरह पकावे।
चार बार या पाँच बार जल से प्रक्षालन करें ॥ १-७ ॥
८ पा.द.

Left Page:

८४ \hspace{4cm} पाकदर्पणम्
भाण्डद्वये च लशुनं निक्षिपेत्तादृशं ततः ।
एकस्मिन्निक्षिपेद्भाण्डे सहो लशुन साभिधा ॥ ८ ॥
अन्यस्मिन् विन्यसेद्भाण्डे सहः सरलिकास्ततः ।
शृतमर्धविशिष्टं च क्षीरं विश्रावयेद् बुधः ॥ ९ ॥
यथार्हं शर्करार्युक्तं क्षीरं भाण्डद्वये क्षिपेत् ।
निक्षिप्य पायसेऽन्यस्मिन् रम्भाफलमनुत्तमम् ॥ १० ॥
पनसस्य फलं रम्यमपरे पायसे न्यसेत् ।
कल्कं च घनसार्रादि निक्षिपेदुभयत्र हि ॥ ११ ॥
निक्षिपेत्तत्र जात्यादि कुसुममभ्युमयं हि ।
पायसं लघुवातघ्नं रम्यं व्याधिहरं शुभम् ॥ १२ ॥
पूर्वोक्त प्रकार से पकाये हुए लहसुन को दो पात्रों में रक्खे। एक पात्र में लहसुन
को मसाला आदि के साथ छोड़ दे और दूसरे पात्र में सरलिका के साथ रक्खे ।
इसके बाद आधा पकाया हुआ दूध छान ले और उसमें उचित मात्रा में शक्कर
मिलाकर दोनों पात्रों में छोड़ दे। एक पायस पात्र में उत्तम केला का फल छोड़-
कर दूसरे पायस पात्र में सुन्दर कटहल का फल छोड़ दे । घनसार कर्पूर आदि
का कल्क दोनों में ही छोड़ दे । पुनः उसमें चमेली आदि का फूल दोनों में
छोड़ दे इसके बाद पुष्पों को निकालक रख ले और खाने के समय दे। यह लशुन
पायस हल्का होता है और यह वातनाशक, रम्य तथा अच्छी तरह व्याधिनाशक
होता है ॥ ८-१२ ॥
गोधूमपायसनिर्माणविधिर्गुणाश्च
नवगोधूममानीय सम्मुत्सार्य सम्मृत्कणान् ।
ईषज्जलेन संक्लन्नमपहन्न्यादुलूखले ॥ १३ ॥
मोचयेत्तत्तुषं सम्यक् कुर्यादेवं द्विधाद्विधा ।
अवहन्याच्च तक्रेण श्लिष्टं यावद् भवेत्पुनः ॥ १४ ॥
दशविंशतिकृत्वस्तान् अवहन्याच्च सर्पिषा ।
संस्पृश्य केनचित् सम्यक् कुर्यात्तत्तुषमोचनम् ॥ १५ ॥
त्रिभाग माहिषं क्षीरं क्षीरभाण्डे प्रसिद्ध्ययेत् ।
एकेन जलभागेन सह मृद्वग्निना पचेत् ॥ १६ ॥
जलनिर्गमनं यावत् तावत्तावद् प्रसाधयेत् ।
तेषां पयस्तथा सिञ्चेत् समभाण्डेऽष्टभागिकम् ॥ १७॥


Right Page:

नलविरचितम् \hspace{4cm} ८५
एकभागं च गोधूमं तादृशं तत्र निक्षिपेत् ।
यथा च धूमसंस्पर्शो न भवेत्तं तथा पचेत् ॥ १८ ॥
दर्याविघट्टयन् शोध्या तथा भाण्डे स्थितं यदि ।
विभज्यैवं चतुर्थागं पानं पात्रेषु निक्षिपेत् ॥ १९ ॥
गेहूँका पायस बनाने की विधि तथा गुण— नवीन गेहूँ को लेकर उसके सूखे
पके एवं जीर्ण-शीर्ण गेहूँ के कणों को निकाल कर थोड़े जल से गीला कर ओखली
में कूटे । उसकी त्वचा अच्छी तरह निकाल कर फेंक दे और इसी प्रकार दो-दो
वार करे । इसके बाद तक्र के साथ तब तक कूटे जब तक वह एक लट ( मिला
हुआ ) हो जाय । पुनः घी के साथ दश-बीस बार कूटे। किसी चीज से पकड़
कर इसकी भूसी को अच्छी तरह निकाल दे । भैंस का दूध तीन भाग दूध के
पात्र में रक्खे और उसमें एक भाग जल छोड़कर मन्दाग्नि से पकावे । उसको
तब तक पकावे जब तक उसका जल न जल जाय । उस दूध को एक उसी के
समान पात्र में आठ भाग छोडे और एक भाग पूर्वोक्त प्रकार से सिद्ध किया,
हुआ गोधूम ( गेहूँ ) का कल्क छोड़ दे । पुनः उसको ऐसा पकावे जैसा कि धूम
से स्पर्श ( जलना ) न हो जाय । यदि वह क्षीर पात्र लग जाय तो कलछुल से
चला कर शोधन कर ले । इस प्रकार इसको पाचक चार पात्रों में रक्खे और
इसी प्रकार पूगपट्ट के बहुत से नेत्रों में रक्खे । उन पात्रों को बार-बार अनेक
सुगन्धित द्रव्यों से सुगन्धित कर ले तथा कर्पूर आदि से धूपित पात्र में उचित
प्रमाण में मात्रा को जानने वाला पाचक रक्खे ॥ १३-१९ ॥
फलपुष्पपानकनिर्माणविधिर्गुणाश्च
चतुर्विधं तथा पाकं पात्रेष्वेतेषु निक्षिपेत् ।
निक्षिपेत् तेषु पाकेषु फलपुष्परसं ततः ॥ २० ॥
तेषां च निक्षिपेत् क्षीरं सुपक्वं तत्प्रमाणवित् ।
फलञ्च पनस फलञ्च पनस तत् तद्रसं केतकीदलम् ॥ २१ ॥
अन्येषामिक्षुदण्डं च तद्रसं कमलं क्षिपेत् ।
तेषां च सहकारस्य फलं सूदस्त्व निक्षिपेत् ॥ २२ ॥
तदोग्रं रसमासिच्य तदीयं कुसुमं न्यसेत् ।
द्राक्षाफलं च केषाञ्चित् निक्षिपेत्तद्रसं बुधः ॥ २३ ॥
कल्हार कुसुमं तत्र सुगन्धेन समन्वितम् ।
दाडिमस्य फलं केषान्तद्रसञ्च विनिक्षिपेत् ॥ २४ ॥
वल्लिकाकुसुमं तत्र सुगन्धेन समन्वितम् ।
कस्तूर्यादिसमं युक्त न्यसेत्तत्रैव पाकवित् ॥ २५ ॥

८६ पाकदर्पणम्
कपित्थस्य फलं तेषां तद्रसञ्च विनिक्षिपेत् ।
जाजीप्रसूनं तत्रैव न्यसेद्विद्वान् सकोविदः ॥ २६ ॥
फलानि चैवमादीनि तदीयांश्च रसांस्तथा ।
फलपुष्पपानक बनाने की विधि तथा गुण-पुनः चार प्रकार के पाकों
को इन पात्रों में छोड़ दे और इन पाकों में फल तथा पुष्प का रस छोड़ दे ।
इसके बाद परिमाण को जानने वाला उनमें परिपक्व क्षीर (दूध) को दे। उसमें
कटहल का फल तथा रस और केतकी (केवड़ा) का फूल छोड़ दे। अन्य पात्रों
में गन्ना का रस तथा कमल का फूल छोड़ दे। इस प्रकार किसी पात्र में पाचक
आम के फल का रस छोड़ दे। उसके उग्र रस (चोप) को निकाल कर उसके
गूदे को छोड़ दे। कुछ पाक पात्रों में अंगूर का फल तथा उसका रस छोड़ दे
और उसमें सुगन्ध से युक्त कह्लार (सफेद कमल) का फूल छोड़ दे। पाकवेत्ता
किन्हीं पाकपात्रों में अनार का फल तथा रस और सुगन्ध से युक्त वल्लिका का फूल
एवं कस्तूरी आदि के साथ उसमें छोड़ दे। अन्य पाकपात्र में पाकशास्त्रवेत्ता कैथ
का फल तथा रस और अजाजी (जीरा) तथा अजवायन का फूल छोड़ दे।
पूर्वोक्त प्रकार से पूर्वोक्त पाक में फलों को तथा उनके रसों को छोड़ दे ॥२०-२६½॥
तत्तद्योनीनि पुष्पाणि पात्रेष्वान्वेषु निक्षिपेत् ।
निक्षिपेन्माक्षिकं सर्पिः केषाञ्चित्सुदवित्तमः ॥ २७ ॥
सुगन्धीनि विकासानि प्रसूनानि न्यसेत्क्रमात् ।
एतैरालोड्य तं पाकं तत्प्रसूनानि संत्यजेत् ॥ २८ ॥
ततश्च पोटलीं कृत्वा जलपूर्णघटेन च ।
अन्तराट्टालकं कृत्वा तच्च तेषु विनिक्षिपेत् ॥ २९ ॥
सिकतावेदिकायां च न्यसेत्तान् पनसाहतान् ।
तालपत्रैर्बुधः सम्यग्वीजयेच्च पुनः पुनः ॥ ३० ॥
यावच्छैत्यम्भवेत्तावत्तत्रैव तापयेद्बुधः ।
मुक्तिकाले समालोच्य भक्षयेद्वा प्रदापयेत् ॥ ३१ ॥
अयं पित्तहरो वृष्यः पथ्यः शैत्यकरो नृणाम् ।
जगतामाश्रयं ब्रह्म यथा भवति सर्वदा ॥ ३२ ॥
पुनः अपनी-अपनी जाति के पुष्पों को प्रथम पात्र में छोड़े और पाकशास्त्र-
वेत्ता कुछ पाकपात्रों में मधु तथा घी छोडे। पुनः क्रम से सुगन्धित तथा खिले
हुए पुष्पों को छोड़े। पूर्वोक्त द्रव्यों के साथ उस पाक को मिलाकर पूर्वोक्त पुष्पों
को फेंक दे। इसके बाद पोटली बनाकर जलपूर्ण घड़े के साथ घर के अन्दर


नलविरचितम् ८७
करके उसको उन पात्रों में छोड़ दे और उन सबों को (पनस पाकपात्र को छोड़-
कर) बालुका के वेदी पर रक्खे। बुद्धिमान् पाचक बार-बार तालपत्र से अच्छी
तरह हवा करे। जब तक शीतल न हो जाय तब तक हवा देता रहे। इसके बाद
भोजन का समय आने पर स्वयं भक्षण करे तथा खाने के लिये दे। यह पित्त को
दूर करनेवाला, वीर्यवर्द्धक, पथ्य तथा मनुष्यों को शीतल करने वाला है, जैसे ब्रह्म
हमेशा संसार का आश्रय होता है।
उपसंहारः
रसालायास्तथा भक्ष्यभोज्यादीनामिहाश्रयाः ।
स्तुवन्ति सम्यक् सुधियस्ततः सर्वं सदा मुदा ॥ ३३ ॥
इति नलकृतपाकदर्पणे पायसप्रकारनिरूपणं नाम चतुर्थप्रकरणं समाप्तम् ।
उपसंहार-यहाँ पर रसाला तथा भक्ष्य-भोज्यादि का सेवन करने वाले
बुद्धिमान् लोग अच्छी तरह स्तुति करते हैं तथा हमेशा प्रसन्न रहते हैं।
इति नलकृत पाकदर्पण का डा० इन्द्रदेव त्रिपाठीकृत माधुरी हिन्दी व्याख्या
सहित पायसप्रकारनिरूपण नामक चतुर्थ प्रकरण समाप्त ॥४॥
•

अथ पानकभेदिरूपणम्
रसालायाश्च कथिता सर्वारुचिविमर्दिताः ।
पानभेदाश्च कथ्यन्ते भुक्तवान्नस्य विरेचकाः ॥ १ ॥
पानक का भेद निरूपण—पूर्व प्रकारण में सम्पूर्ण अरुचियों को नष्ट करने
वाली रसाला का वर्णन किया गया । अब भुक्त (खाये गये) अन्न को विरेचन
करने वाले पान (पानक) के भेद कहते हैं ॥ १ ॥
पानकनिर्माणविधिर्गुणाश्च
हिरण्मये च चित्रे च नानारत्न विराजिते ।
शर्कराभागमेकं च सखण्डं तत्र निक्षिपेत् ॥ २ ॥
गाङ्गन्तद्विगुणं तोयं सिञ्चेद्वस्त्रेण शोधितम् ।
यावत्प्रलीयखण्डं तत्तावत्तत्रैव तन्न्यसेत् ॥ ३ ॥
तदादाय न्यसेद्यन्त्रे तुलितं घटनिर्मितम् ।
भवेद्विभाम्बुवद्यावत् तावत्तत्र पुनः पुनः ॥ ४ ॥
शोधयेद्वच्छाकरं तोयं सम्यक्सदः प्रमाणवित् ।
दशविंशतिपात्रेषु सूक्ष्मरूपेषु शोभिषु ॥ ५ ॥
प्रत्येकं पूगपट्टस्य लोचनानि न्यसेत्क्रमात् ।
फलानां तेषु नेत्रेषु रसं च कुसुमं क्षिपेत् ॥ ६ ॥
विभिन्न पानक बताने की विधि तथा गुण—अनेक रत्नों से जटिल चित्र-
विचित्र स्वर्णपात्र में खांड सहित एक भाग शक्कर छोड़े और वस्त्र से छाना हुआ
गंगाजल दुगुना छोड़ दे । जब तक शक्कर गल न जाय तब तक चलाते रहे
और तुला के आकार का बनाया हुआ घटनिर्मित यन्त्र पर रक्खे । जब तक
वह पारदर्शक जल के तरह न हो जाय तब तक जलमाण यन्त्र पर रक्खे । प्रणाम
को जानने वाला पाचक आमोद युक्त उस जल को अच्छी तरह शुद्ध कर ले ।
इसके बाद छोटे-छोटे सुन्दर दस-बीस पात्रों में पूगपट्ट नेत्र (नली) क्रमशः
रख दे और उन नलियों में फलों का रस तथा पुष्प छोड़ दे ॥ २-६ ॥
चिञ्चाफलरसं सिञ्चेदन्यं तादृशपुष्पकम् ।
कल्हारकुसुमं तत्र न्यसेत्तत्रैव बुद्धिमान् ॥ ७ ॥
जम्बूफलं तथान्यस्मिन् सुपक्वञ्च न्यसेद्बुधः ।
नारिङ्गपुष्पं तत्रैव पुन्नागकुसुमं न्यसेत् ॥ ८ ॥


नलविरचितम् ८९
पारावतफलान्यानि रसमेकत्र निक्षिपेत् ।
रम्भाफलरसं सिञ्चेत् अन्यस्मिन्नपि लोचने ॥ ९ ॥
करवीरस्य कुसुमं कुसुमं बकुलस्य च ।
एकत्रलकुचस्यादि फलं प्रक्षिप्य शास्त्रवित् ॥ १० ॥
सुगन्धमुत्पलं चात्र शतपत्रप्रसूनकम् ।
अन्यत्र निक्षिपेद् विद्वान् फलमाम्रातकस्य च ॥ ११ ॥
मातुलुंगस्य कुसुमं कुन्दस्य कुसुमं न्यसेत् ।
केतकीकुसुमं त्वेकं सर्व नेत्रेषु निक्षिपेत् ॥ १२ ॥
एलोनागरचूर्णञ्च जम्बीरस्य सरन्ततः ।
लोचनेषु च सर्वेषु किञ्चित्किञ्चित् विनिक्षिपेत् ॥ १३ ॥
कर्पूरं मृगनाभिं च कुङ्कुमं हिमवारिणा ।
पेषयित्वा च तत्कल्कं मानवित्प्रक्षिपेत्क्रमात् ॥ १४ ॥
पूर्वोक्त पात्रों में स्थित नेत्रों (नलिका) में भिन्न फलों का रस तथा पुष्प छोड़े ।
एक पात्र में इमली के फल का रस तथा उसी प्रकार का कोई पुष्प छोड़े । उसमें
बुद्धिमान् पाचक कल्हार (कूई) का पुष्प छोड़ दे । दूसरे पात्र में पके
जामुन के फल का रस छोड़े और उसी में नारङ्ग (गाजर) पुष्प तथा पुन्नाग
(सुलतान चम्पक) का पुष्प छोड़ दे । एक दूसरी नलिका में पारावत (परुषक-
शरीफा) के फल का रस तथा अन्य नलिका में केले के फल का रस छोड़ दे ।
पुनः क्रमशः एक पात्र में करवीर (कनैल) का फूल तथा दूसरे में मौलसर का
फूल छोड़ दे । एक नलिका में बड़हल के फल का रस तथा सुगन्धित कमल एवं
गुलाब का पुष्प छोड़ दे । एक नलिका में आम्रातक (आमड़ा) के फल का
रस तथा मातुलुङ्ग (बिजौरा नींबू) का फल एवं कुन्द का पुष्प छोड़ । इलायची
तथा सोंठ का चूर्ण और जम्बीरी नीम्बू का रस थोड़ा-थोड़ा सभी नलिकाओं में
छोड़ दे । कर्पूर, कस्तूरी तथा केशर का शीतल जल के साथ कल्क बना कर
प्रमाण को जानने वाला पाचक उचित मात्रा में छोड़ दे ॥ ७-१४ ॥
एवं सम्भारयुक्तेषु लोचनेषु प्रमाणवित् ।
शुद्धतच्छाकरं तोयं यथायोग्यं प्रसेचयेत् ॥ १५ ॥
मन्दमारुतसंचारपानागरे ततः सुधीः ।
सिकतानिर्मितायाञ्च वेदिकायाञ्च पण्डितः ॥ १६ ॥
निधाय तानि पात्राणि शुद्धवस्त्रेण वेष्टयेत् ।
उशीरनिर्मितेनाथ तालवृन्तेन बीजयेत् ॥ १७ ॥

९० पाकदर्पणम्
यावच्छैत्यं भवेत्पानं कुर्यात्तेनैव वीजनम् ।
आदाय तानि नेत्राणि पात्रेभ्यः सीदकानि च ॥ १८ ॥
त्यज्येत्पुष्पाणि सर्वत्र केतकीकुसुमादृतेः ।
आदावन्योन्यनेत्रेण पानभेदं प्रमाणवित् ॥ १९ ॥
बहवः पानभेदा स्युः शुद्धसङ्करभेदतः ।
विच्छेदनं बिना विद्वान् बुद्ध्वा कुर्याच्च पोटलीम् ॥ २० ॥
मन्दमारुतसंचारे धोमामाहरेच्च धोम् ।
एवं विधानि पानानि कुर्याद्ग्रीष्मे सुबुद्धिमान् ॥ २१ ॥
सेवितानि पुनस्तानि पानानि च मनीषिभिः ।
तत्तद्द्रव्यगुणान् कुर्युः संस्थितानात्मसुप्रभः ॥२२॥
पूर्वोक्त प्रकार से प्रमाण जानने वाला पाचक सम्भार ( मसाला आदि सामग्री
युक्त से ) पात्रस्थ नलिकाओं में पूर्वनिर्मित शर्करोदक (चीनी का शर्बत ) उचित
मात्रा में मिला दे । इसके बाद बुद्धिमान् पाचक मन्द हवा संचारयुक्त पान-
[L

[पृष्ठ १]

अथ विविधान्नयूषपाकनिर्माणप्रकरणम्
शाल्यन्नयूषानिर्माणविधिर्गुणाश्च
प्रस्थमेकं सुशाल्यन्नं संक्षाल्य च पुनः पुनः ।
पेषयित्वा च तान् पिष्टं काञ्जिकीभिश्च मेलयेत् ॥ १ ॥
तत्पञ्चगुणितैस्तोयैः सह चुल्यां पचेद्बुधः ।
कुस्तुम्बुरीं च कैडर्यं पाकमध्ये विनिक्षिपेत् ॥ २ ॥
पिष्टञ्च दर्ष्या लिप्तञ्च अवतार्य प्रशामयेत् ।
धवलं दधिमादाय तत्समं तत्र मेलयेत् ॥ ३ ॥
शोधयेत् सितवस्त्रेण घने यत्नेन पाकवित् ।
शोधितं तद्विशालेषु पात्रेषु बहुषु क्रमात् ॥ ४ ॥
स्थितेषु पूगपट्टस्य लोचनेषु विनिक्षिपेत् ।
केतकीकुसुमं सद्यः सर्वत्रैव निवेशयेत् ॥ ५ ॥
रुच्यर्थं सर्वपात्रेषु फलं पुष्पं समाहरेत् ।
शाल्यन्न का यूष (यूषामृत) बनाने की विधि तथा गुण — स्वच्छ जड़हन
धान का चावल एक सेर (१ किलो) को अच्छी तरह बार-बार धोकर तथा
पीसकर उसकी पीठी बना कर काञ्जी के साथ मिला ले । इसके बाद उसको
पाँच गुना जल के साथ बुद्धिमान् पाचक चुल्हे पर पकावे । पीठी के दर्वी लेप
(पक जाने पर) हो जाने पर उतार कर ठण्डा कर ले । तत्पश्चात् उसी के बरा-
बर सफेद दही लेकर उसमें मिला दे और पाकशास्त्र को जानने वाला पाचक
प्रयत्नपूर्वक सफेद वस्त्र से छान ले । छानने के बाद उसको बड़े-बड़े कई पात्रों
में स्थित पूगपट्ट नेत्रों में रक्खे । प्रत्येक पात्र में पाचक केतकी का फूल रक्खे
और रुचि को बढ़ाने के लिये सभी पात्रों में फल तथा पुष्प छोड़ दे ॥ २-५ १/२ ॥
बीजपूरफलच्छेदान् केषाञ्चिद्धेमपुष्पकम् ॥ ६ ॥
सत्फलाकुसुमं तेषु न्यसेदयोग्यं यथा बुधः ।
सहकारफलं केषां जाजीकुसुममेव च ॥ ७ ॥
नारङ्गस्य प्रसूनं च न्यसेत्तन्मानवित् पुनः ।
सल्लकीफलमन्येषां पाटलीकुसुमं न्यसेत् ॥ ८ ॥
पूगस्य पुष्पं निविशेत् कस्तूरीगुणसंयुतम् ।
कुम्भीफलं तथान्येषां वासन्ती कुसुमं न्यसेत् ॥ ९ ॥


[पृष्ठ २]

नलविरचितम् ९३
कल्हारकुसुमं तत्र प्रक्षिपेत्समनोहरम् ।
बालमुर्वारुकं केषां नमेरुकुसुमं न्यसेत् ॥ १० ॥
सुगन्धि कुसुमं तत्र प्रविशेत् तत्प्रमाणवित् ।
निक्षिपेदष्टपात्रेषु यथायोग्यं क्रमात्सुधीः ॥ ११ ॥
पूर्वोक्त विभिन्न पात्रस्थयूषोपाकों में किसी में बिजौरा नींबू के फल के टुकड़े
हेम पुष्प (नाग केशर) तथा सत्फला कुसुम (अनार का फूल) यथायोग्य
मिला दे । किसी पात्र में आम का फल तथा अजवायन का फल तथा नारंगी
का फूल प्रमाण को जानने वाला पाचक छोड़ दे । अन्य पात्रों में सल्लकी
(शालई) का फल तथा पाटली (पुन्नाग) का पुष्प छोड़ दे और कस्तूरी के
गुण से युक्त पूगपुष्प को छोड़ दे । अन्य दूसरे पात्रों में कुम्भी का फल तथा
वासन्ती का फूल छोड़ दे और कल्हार का मनोहर पुष्प छोड़ दे । किन्हीं पात्रों में
उर्वारु (खरबूजा) का बाल फल तथा नमेरु का पुष्प छोड़ दे और प्रमाण को
जानने वाला सुगन्धित द्रव्य का फूल छोड़ दे । इस प्रकार बुद्धिमान् पाचक आठों
पात्रों में यथा योग्य फल-पुष्प को छोड़ दे ॥ ६-११ ॥
एवं चेद्बहवो भेदाः सुचियूषस्य भूमिप ! ।
एतच्च यूषमालोड्य प्रसूनान्येव संत्यजेत् ॥ १२ ॥
प्रयत्नेन पुनस्तांश्च वेष्टयित्वाथ संविशेत् ।
शैत्यादिगुणसंसर्गः कार्यस्तेषां च पूर्ववत् ॥ १३ ॥
अयं च यूषः पीयूषः पित्तघ्नः श्रमहा भवेत् ॥ १४ ॥
हे राजन् इस प्रकार पवित्र यूष के अनेक भेद होते हैं। इस यूष को अच्छी
तरह चलाकर पुष्पोंको निकाल फेंक दे। पुनः इसको अच्छी तरह वेष्टित कर रक्खे
और पहले की तरह पंखा आदि की हवा से शीतल गुण से युक्त कर दे। यह यूष
पीयूष (यूषामृत) पित्त को शान्त करने वाला तथा थकावट को दूर करने
वाला है ॥ १२-१४ ॥
राजशाल्यन्नयूषनिर्माणविधिर्गुणाश्च
मर्दयित्वा पुनः सम्यक् शोधयेत् घनवाससा ।
पूगपट्टस्य नेत्राणि बहुपात्रेषु निक्षिपेत् ॥ १५ ॥
सयूषं दधिशाल्यन्नं सम्भवन्तेषु निक्षिपेत् ।
प्रमाणेन न्येसेत्तेषु चूर्णं सैन्धवसम्भवम् ॥ १६ ॥
मेथीजीरकचूर्णं च एलाचूर्णं च निक्षिपेत् ।
आर्द्रकस्य पलाण्डोश्च शकलानि च निक्षिपेत् ॥ १७ ॥

पृष्ठ ९४

कुम्भीपत्रं च धान्यं च मातुलुङ्गदलं क्षिपेत् ।
केतकीकुसुमं तेषु सहकारफलं क्षिपेत् ॥ १८ ॥
नानाविधानि पुष्पाणि फलं निक्षिपेत्सल्लकीफलम् ।
तदीयं निक्षिपेत्पत्रं तद्योग्यं द्रव्यमादिशेत् ॥ १९ ॥
राजशाल्यन्न यूष बनाने की विधि तथा गुण—पूर्वोक्त प्रकार से शालि
चावल १ किलो को पीस कर तथा काञ्जी मिलाकर पाँच गुना जल में पका ले
तथा दही में मर्दन कर गाढ़े वस्त्र से छान ले और बहुत पात्रों में पूगपट्ट नेत्र
में रख कर उनमें पूर्वनिर्मित यूष सहित दधि शाल्यन्न को रक्खे । पुनः उचित
मात्रा में सेन्धा नमक का चूर्ण छोड़ दे । साथ ही मेथी, जीरा तथा इलायची
का चूर्ण छोड़ दे और अदरक तथा प्याज को काटकर छोड़ दे । कुम्भीपत्र (काय-
फल) धनियां तथा बिजौरा नींबू के फल का दल छोड़ दे । पुनः केतकी का
फूल तथा आम का फल छोड़ दे । अनेक प्रकार के पुष्पों तथा (सल्लकी) सल्लई
का फल छोड़ दे । पूर्वोक्त द्रव्यों का पत्र तथा यथायोग्य द्रव्यों को छोड़ दे ॥
पाकज्ञः क्रमशःस्तेषु सामुद्रफलमाहरेत् ।
केषांचिदाम्रशकलं तदीयं कुसुमं न्यसेत् ॥ २० ॥
मरीचिस्तबकं केषां जातीयं कुसुमं न्यसेत् ।
नारिंगकुसुमं केषु न्यसेद्विल्वफलानि च ॥ २१ ॥
कल्हारकुसुमं किन्तु सारङ्गस्य फलं क्षिपेत् ।
एलाफलस्य स्तवकं केषांचिद्धेमपुष्पकम् ॥ २२ ॥
एवमादीनि पुष्पाणि लवणस्य फलानि च ।
क्षिप्त्वा कुर्याच्च यूषस्य बहून् भेदान् विचक्षणः ॥ २३ ॥
क्षणमात्रं समालोक्य ततः पुष्पाणि संत्यजेत् ।
ततश्च पोटलीं कुर्यात् प्रयत्नेन ततः परम् ॥ २४ ॥
वेष्टयित्वा पुनः सूदः कुर्याच्छैत्यं च पूर्ववत् ।
मुक्तं च जीर्ण समया लघु वृष्यो बलप्रदः ॥ २५ ॥
पाक को जानने वाला पाचक क्रमशः उन पात्रस्थ पूगपट्ट नेत्रों में सामुद्र
फल छोड़ दे । कुछ पात्रों में आम के टुकड़े तथा उनके फूल छोड़ दे । कुछ
पात्रों में मरिच के गुच्छे तथा चमेली का फूल छोड़ दे । कुछ पात्रों में नारंगी
का फूल तथा बेल का फल छोड़ दे । कुछ पात्रों में कल्हार (कुई) का
फूल तथा सारंग (कमल) का फल छोड़ दे । कुछ पात्रों में इलायची का
गुच्छा तथा हेम पुष्प (नागकेशर) छोड़ दे । इसी प्रकार विभिन्न पुष्पों एवं


पृष्ठ ९५

समुद्र फल को छोड़ दे । इस प्रकार बुद्धिमान् पाचक पूर्वोक्त प्रकार से पुष्प एवं
फलों को मिला कर अनेक प्रकार के यूष बना ले । पुनः पुष्पों को कुछ देर
रहने के बाद निकाल कर फेंक दे । इसके बाद प्रयत्नपूर्वक पोटली बनावे और
उसको वेष्टित कर पूर्वोक्त प्रकार से ताल एवं खस आदि के पंखों से हवा कर
शीतल बना ले । यह भोजन के साथ खाने से अन्न को पचाता है और यह वीर्य-
वर्द्धक, सुपच तथा बलकारक होता है ॥ २०-२५ ॥

यूषपाकस्योपसंहारः

नानाविधद्रव्यफलप्रसूनैरुत्पादिताथैः खलु कल्पवृक्षः ।
श्रमान्वितानां श्रमन्नुत्सुसेव्यः सुपूजितः सर्वमनोभिरामः ॥ २६ ॥
सयूषभेदाः कथिता भोजनानन्ददाः शुभाः ।
घृताद्यंशप्रभेदाश्च कथ्यन्ते रुचिमर्दनाः ॥ २७ ॥
इति नलकृतपाकदर्पणे यूषपाकनाम षष्ठप्रकरणं समाप्तम् ॥ ६ ॥
**यूषपाक का उपसंहार—**यह अनेक प्रकार के द्रव्यों, फल एवं पुष्पों के द्वारा
निर्मित यूष कल्पवृक्ष की तरह श्रमिकों के श्रम (थकावट) को दूर करने वाला
अच्छी तरह सेवनयोग्य प्रशंसित एवं सभीके मन को प्रसन्न करनेवाला है । भोजन
के समय आनन्द देनेवाले यूष के अनेक भेद कहे गये । अब अरुचि को नष्ट करने
वाले अनेक प्रकार के घृतभेद को कहेंगे ॥ २६-२७ ॥
**नोट—**आजकल भी विविध प्रकार के सेन्ट भोजन में मिलाने की परम्परा है ।
प्राचीन काल में सेन्ट का प्रादुर्भाव न होने कारण पुष्प छोड़ने की परम्परा थी ।
इति नलकृत पाकदर्पण का डा० इन्द्रदेव त्रिपाठीकृत माधुरी हिन्दी व्याख्या
सहित यूषनिरूपण नामक षष्ठ प्रकरण समाप्त ॥ ६ ॥

अथ घृतान्नपाकप्रकरणम्
घृतान्नपाकनिर्माणविधिर्गुणाश्च
सुपक्वं राजशाल्यन्नमानीय सुमनोहरम् ।
विशालविभ्रमे देशे पात्रेषु विविधेष्वथ ॥ १ ॥
स्थितेषु सर्वपात्रेषु क्षिपेदन्येन सैन्धवम् ।
हैयङ्गवीनमेकस्मिन् सिञ्चेत्पात्रे सुसंयुते ॥ २ ॥
क्षिपेच्चूर्णं पुनस्तत्र दग्धपर्पटकस्य च ।
निक्षिपेच्च ततस्तत्र लशुनाद्रॅकयोः कणान् ॥ ३ ॥
चूर्णं च निविशेत् किंचित् मेथीजोरकसम्भवम् ।
कुस्तुंबरीञ्च कैटर्यं केतकीकुसुमं न्यसेत् ॥ ४ ॥
बीजपूरदलं तत्र निक्षिपेत्सूपराट् ततः ।
एभिर्द्रव्यैर्भोजनस्थमन्नं कुर्याच्च मेलनम् ॥ ५ ॥
पुनश्च निक्षिपेत्तत्र कस्तूरीं कर्पूरीं तथा ।
पुनश्च पूगपट्टे न बद्ध्वा भोक्त्रे निवेदयेत् ॥ ६ ॥
घृतमन्नमिदं रम्यं बलवृद्धिकरं भवेत् ।
हृद्यं पित्तहरं नित्यं चक्षुरिन्द्रियवर्धनम् ॥ ७ ॥
घृतान्न पाक बनाने की विधि तथा गुण—अच्छी तरह परिपक्व, मनोहर
राज शाल्यन्न (जड़हन का पूर्वोक्त विधि से निर्मित भात ) को लेकर विस्तृत स्थान
में विविध सभी पात्रों में रखे हुए अन्न में सेन्धा नमक छोड़े और उसी के साथ
रखे हुए एक पात्र में घी छोड़ दे। पुन: भूने हुए पापड़ को रख दे। पुन:
उसमें लहसुन तथा अदरक के टुकड़ों को छोड़े । उसी में थोड़ा मेथी तथा
जीरा का चूर्ण छोड़ दे। पुन: धनिया, कायफर तथा केवड़ा के फल को छोड़ दे ।
इसके बाद बिजौरा नींबू के फल के दल को श्रेष्ठ पाचक छोड़ दे । इस प्रकार
पात्र में स्थित अन्न को पूर्वोक्त द्रव्यों के साथ मिला दे और पुन: उसमें कस्तूरी
तथा कर्पूर छोड़ दे । तदनन्तर पूगपट्ट से बाँधकर खाने वाले को दे । यह घृतान्न
रम्य, बलवृद्धिकारक हृद्य पित्तहर तथा, दृष्टिशक्ति को बढ़ाने वाला है ॥ १-७ ॥
अन्य घृतान्ननिर्माणविधिर्गुणाश्च
अन्यस्मिन्नपि पात्रस्थे शाल्यन्नेषु सुसंयुते ।
तिलतैलं नवं रम्यं सिञ्चेत्सूपदः समं ततः ॥ ८ ॥


नलविरचितम् ९७
जम्बीराम्लं ततस्तत्र प्रमाणेन प्रसेचयेत् ।
चूर्णञ्च निक्षिपेत्तत्र पिण्याकवटकोग्द्भवम् ॥ ९ ॥
लशुनाद्रेककैंडर्यधान्यकानां क्षिपेत्कणान् ।
तप्ततैलं पुनस्तत्र हिंगुना सहितं क्षिपेत् ॥ १० ॥
कृत्वा तन्मेलनं तत्र कर्पूरादींश्च निक्षिपेत् ।
तद्बद्ध्वा पूगनेत्रेण निवेशेदपरस्थले ॥ ११ ॥
बलकृद्दीपनकरं वातश्लेष्महरं तथा ।
प्रकारान्तर से घृतान्न बनाने की विधि तथा गुण—अन्य प्रकार से घृतान्न
बनाने के लिये अन्य पात्रों में स्थित शाल्यन्नों में पाचक सुन्दर, रमणीय, नवीन
तिल का तेल मिला दे । इसके बाद उचित मात्रा में जम्बीरी नींबू का रस (सत्व)
छोड़ दे । पुनः तिल के खली के वटक चूर्ण को उसमें मिला दे और लहसुन,
अदरक, कैडर्य ( कायफल ) तथा धनियां के चूर्ण को मिला दे । पुन: गरम
तेल में हींग पका कर छोड़ दे । इन सबों को एकत्र कर कर्पूर आदि सुगन्धित
द्रव्यों से सुगन्धित बना ले । पुनः उसको पूगपट्ट नेत्र से बाँधकर दूसरे स्थान
पर रख दे और खाने के लिये दे । यह बलवर्द्धक, जाठराग्निदीपक तथा वात-
कफ को दूर करता है ॥ ८-११ ॥
चिञ्चाफलरसयुक्तशाल्यन्नपाकनिर्माणविधिर्गुणाश्च
अथ चिञ्चा पक्वफलसमुद्भूतरसं हरेत् ॥ १२ ॥
शालिन्या तं पुनः सम्यग् भर्जयेद्रामठादिभिः ।
अन्यस्मिन् नवशाल्यन्ने निक्षिपेत्तादृशं रसम् ॥ १३ ॥
कणांश्च निक्षिपेत्तत्र लशुनाद्रेकसम्भवान् ।
तदेभिर्मेलयेत्सर्वं वासनादीन् समावेशेत् ॥ १४ ॥
पूगपट्टे न तद्भक्तं वेष्टयित्वा च दापयेत् ।
पित्तवृद्धिकरो रुच्यः शूलव्याधिहरो ह्ययम् ॥ १५ ॥
इमली फल के रस से मिश्रित शाल्यन्न बनाने की विधि तथा गुण—इमली
के पके फल का रस निकाल ले । पुनः शालि धान के चावल के साथ अच्छी
तरह हींग के साथ भून ले । दूसरे नवीन शाल्यन्न में पूर्वोक्त इमली के रस को
छोड़ दे और लहसुन तथा अदरक के टुकड़ों को छोड़ दे । इसके बाद सभी को
एकत्र मिला दे तथा सुगन्धित द्रव्यों से सुगन्धित कर ले । तदनन्तर उस भात को
पूगपट्ट से वेष्टित कर खाने के लिये दे । यह पित्त को बढ़ाने वाला, रुचिकारक
तथा शूल एवं व्याधि को दूर करता है ॥ १२-१५ ॥

९८ पाकदर्पणम्
कैटर्यकल्कयुक्तशाल्यन्ननिर्माणविधिर्गुणाश्च
कैटर्यकल्कमन्यस्मिन्नन्ने निक्षिप्य मेलयेत् ।
भर्जितं रामठं तैले निक्षिपेद्रामठादिकम् ॥ १६ ॥
कर्पूरादींश्च निक्षिप्य नेत्रेण परिवेष्टयेत् ।
स्तन्यप्रदं क्रिमिहरं श्लेष्मदोषहरं भवेत् ॥ १७ ॥
कैटर्य कल्क के साथ शाल्यन्न बनाने की विधि तथा गुण - दूसरे शाल्यन्न
पात्र में कैटर्य ( कायफल ) का कल्क छोड़ कर तेल में भूने हुए हींग को मिला
दे और कर्पूर आदि सुगन्धित द्रव्यों से सुवासित कर तथा पूगपट्ट नेत्र से वेष्टित
कर खाने को दे । यह स्तन्यवर्द्धक, क्रिमिनाशक तथा कफ-विकार को नाश
करने वाला है ॥ १६-१७ ॥
सर्षपकल्कयुक्तशाल्यन्ननिर्माणविधिर्गुणाश्च
सर्षपोद्भवकल्केन मिलदन्नं कुर्याद्बुधः ।
जम्बीराम्लं यथायोग्यं निक्षिपेद्रामठादिभिः ॥ १८ ॥
कृत्वा च वासनादींश्च बद्ध्वा नेत्रेण दापयेत् ।
हिंगुमुष्णकरं भक्तं तथा छर्दिहरं भवेत् ॥ १९ ॥
सरसों के कल्क के साथ शाल्यन्न बनाने की विधि तथा गुण - पाकक्रिया
को जानने वाला बुद्धिमान् पाचक सरसों के कल्क के साथ शाल्यन्न को बनावे और
उचित मात्रा में जम्बीरी नींबू का रस ( या सत्व ) एवं भूने हुए ( तैलभृष्ट ) हींग
जीरा आदि छोड़ दे । कर्पूर आदि सुगन्धित द्रव्यों से सुवासित कर तथा पूगपट्ट
नेत्र से वेष्टित कर खाने के लिये दे । यह हिंगुयुक्त अन्न उष्णकारक होता है
तथा वमन को दूर करता है ॥ १८-१९ ॥
एवमादीनि भक्तानि तत्तद्द्रव्यैश्च साधयेत् ।
बहूनामन्नभेदानां स्वं स्वं तत्तद्गुणं भवेत् ॥ २० ॥
पूर्वोक्त प्रकार से भिन्न-भिन्न द्रव्यों के साथ अनेक प्रकार के भातों को सिद्ध
करे । वे सब अपने-अपने द्रव्यों के गुण के अनुसार गुणकारक होते हैं।
दधियुक्तशाल्यन्ननिर्माणप्रकारोगुणाश्च
अपरे सूदराड्भक्ते निक्षिपेन्मधुरं दधि ।
सहकारकणांस्तत्र लशुनादींश्च निक्षिपेत ॥ २१ ॥
शीतोष्णकणांस्तत्र शुंठीचूर्णं च निक्षिपेत ।
निस्त्वगाद्रंककैटर्यधान्याकशकलान्यपि ॥ २२ ॥
नलविरचितम् ९९
एतत्सर्वं विनिक्षिप्य कुर्यात्तन्मेलनं बुधः ।
पुनश्च निक्षिपेत्तत्र चूर्णमेलासमुद्भवम् ॥ २३ ॥
बीजपूरदलं तत्र केतकी कुसुमं न्यसेत् ।
कर्पूरादींश्च निक्षिप्य वेष्टयित्वा प्रदापयेत् ॥ २४ ॥
इदं जाड्यहरं रुच्यं वह्निमान्द्यहरं भवेत् ॥ २५ ॥
दधिमिश्रित शाल्यन्न का प्रकार तथा गुण - श्रेष्ठ पाचक दूसरे भात में
मीठा दही छोड़ दे और उसमें आम के टुकड़े तथा लहसुन के टुकड़े छोड़ दे ।
पुनः शीतल मरिच, सोंठ का चूर्ण, छिलका रहित अदरक के टुकड़े, कैटर्य तथा
धनिया के टुकड़ों को भी छोड़ दे । इन सब द्रव्यों को छोड़ कर मिला दे । पुनः
उसमें बिजौरा नींबू का रस तथा केतकी के पुष्प को छोड़ दे । इसके बाद कर्पूर
आदि सुगन्धित द्रव्यों से सुवासित कर तथा पूगपट्ट नेत्र से आवेष्टित कर खाने के
लिये दे । यह जड़ता को दूर करने वाला रुचिकारक तथा मन्दाग्नि को दूर करने
वाला है ॥ २१-२५ ॥
उपसंहारः
स्वैरप्रभेदाकृतिरन्नरूपा धेनुर्धरित्र्यां प्रवदन्ति भूरि ।
पयांसि सम्यग्रसनान्नपाने सदा दुदोहार्थिषु सादरेण ॥ २६ ॥
इति नलकृतपाकदर्पणे घृतान्ननिरूपणं नाम सप्तमप्रकरणं समाप्तम् ॥ ७ ॥
घृतशाल्यन्न प्रकरण का उपसंहार - इस पृथ्वी पर अपनी इच्छा के अनुसार
निर्मित विभिन्न आकृति वाली बहुत से अन्नरूप धेनु को बताते हैं । उस धेनु के
दूध को चाहनेवालों के जिह्वा की तृप्ति के लिये अन्नपान को सदा आदर पूर्वक
दुहते हैं ।
इति नलकृत पाकदर्पण का डा० इन्द्रदेव त्रिपाठीकृत माधुरी हिन्दी व्याख्या-
सहित घृतान्ननिरूपण नामक सप्तम प्रकरण समाप्त ॥ ७ ॥
च पा.द.

अथ लेह्यप्रकरणम्
सहकारादिलेह्यनिर्माणप्रकारोगुणश्च
सुपक्वफलसंदोहं सहकारादिसम्भवम् ।
आनीय सूदः शास्त्रज्ञः क्रिमिभ्यः शोधयेत् पृथक् ॥ १ ॥
भर्जयेच्च पुनस्तानि पृथक् शर्करया सह ।
तदुत्थमाहरेद्द्रव्यं त्वग्बीजानि समुत्सृजेत् ॥ २ ॥
द्रव्ये तस्मिन् घनीभूते सिञ्चेत्किञ्चिज्जलंततः ।
द्रव्यञ्च सूक्ष्मवस्त्रेण यावल्लेह्यं तु शोधयेत् ॥ ३ ॥
आनयेत् पूगपट्टस्य नेत्राण्यथ शुभानि च।
अनेकेषु च पात्रेषु मध्ये तेषु पुनर्न्यसेत् ॥ ४ ॥
लेह्यं चाङ्गुलिकं तेषु निक्षिपेच्च पृथक् पृथक् ।
ततश्च घनसारादि कल्कं तेषु च मेलयेत् ॥ ५ ॥
विचित्रवासनापुष्पैः लेह्यं सम्यक् च वासयेत् ।
ततः पुष्पाणि संत्यज्य सहकुर्याच्च पोटलीः ॥ ६ ॥
पूर्ववत्स्थापन

अथ शैत्यजलनिर्माणप्रकरणम्
शैत्यजलनिर्माणप्रकारो गुणाश्च
नुदलाबुफले सूक्ष्मं यत्नेन च जलं शुभम् ।
आनीय गाङ्गमुरंसि शुभ्रवस्त्रेण शोधयेत् ॥ १ ॥
पूरयेच्च शुभे कुम्भे तप्तस्वर्णविनिर्मिते ।
कल्कमालोडयेत्तत्र कर्पूरादि प्रमाणवित् ॥ २ ॥
विस्तृते पूगपट्टे च तज्जलं वेष्टयेत्ततः ।
कारयेत्प्रांशुतरुभिः दोलां सम्यक्प्रमाणवित् ॥ ३ ॥
सिक्थं च स्थापयेत्तत्र शुभ्रद्रव्यंविनिर्मितम् ।
सूदस्तु निःक्षिपेत्तत्र पोटलीं जलपूरिते ॥ ४ ॥
एकं सूत्रं ततः कुर्यात् एकनिष्कप्रमाणकम् ।
रुचकस्य मुखं तस्य वेष्टयेदग्रभागतः ॥ ५ ॥
मूलदेशे पुनस्तस्य शकलान् सन्निवेशयेत् ।
स्रजश्च तत्र बघ्नीयाज्जातीचम्पकनिर्मिता ॥ ६ ॥
सूक्ष्मरन्ध्रं ततः कुर्यादधस्तस्याः प्रमाणवित् ।
सूत्रस्थितशलाकायाः कुर्यात्सरन्ध्रशृङ्खलम् ॥ ७ ॥
शनैः शनैर्जलं तत्र यथा स्रवति विन्यसेत् ।
विना वस्त्रेण तस्याधो हेमभाण्डं विनिक्षिपेत् ॥ ८ ॥
तस्मिन् पाटलिजात्यादि प्रसूननि न्यसेद्बुधः ।
हिमाम्बुनाऽऽर्द्रवस्त्रेण तन्मुखं वेष्टयेद्बुधः ॥ ९ ॥
जलं स्रवति निःशेषमुदरस्थे व्यवस्थिते ।
शीतल जल बनाने का प्रकार तथा गुण — नवीन कद्दू के फल में प्रयत्न-
पूर्वक सूक्ष्म, स्वच्छ गंगा जल को लेकर स्वच्छ वस्त्र से छान ले और चमकीले
स्वर्णनिर्मित घड़े में भर दे । पुनः प्रमाण को जानने वाला पाचक उसमें कर्पूर
आदि सुगन्धित द्रव्यों का कल्क छोड़ दे । उसके बाद उस जल को विस्तृत
पूगपट्ट में आवेष्टित कर दे और प्रांशुवृक्षों के साथ प्रमाण को जानने वाला
पाचक अच्छी तरह दोला (झूला) बनाये । वहीं पर अच्छे द्रव्यों से निर्मित
सिक्थ (मोतियों का गुच्छा) रखे । पुनः पाचक उस जलपूरित घड़े में
पोटली छोड़ दे । इसके बाद एक निष्क प्रमाण का एक सूत्र बनाये और उससे
नलविरचितम् १०३
घड़े के आगे के चारों तरफ के भाग को आवेष्टित कर दे । पुनः उसके नीचे
टुकड़ों को रख दे तथा उसमें चमेली आदि सुगन्धित पुष्पों की माला बाँध दे ।
प्रमाण को जानने वाला उसके नीचे छोटा-छोटा छिद्र बना दे । सूत्र में स्थित
शलाका से अच्छे छिद्रों की शृङ्खला बना दे । उसमें जैसे धीरे-धीरे जल गिरे वैसे
रक्खे और उसके नीचे बिना वस्त्र का सोने का पात्र रख ले और उस में पाटिल,
चमेली आदि का फूल रख दे । पुनः ठण्डा जल से भीगे हुए वस्त्र से उसके मुख
को आवेष्टित कर दे । सुव्यवस्थित उसके अन्दर पूरा जल स्रवित हो जाता है ।
घटान्तरं न्यसेत्सूदो बालुकावेदिकां ततः ॥ १० ॥
स्रग्भिः समन्ततो युक्तां दक्षिणाानलसंयुताम् ।
तालवृन्तानिलैः सम्यक् शैत्यं कुर्याच्च तज्जलम् ॥ ११ ॥
अन्यस्मिन् पूगपट्टे च नानापुष्पैश्च वासिते ।
पूरयित्वा तु तत्तोयं प्रसूनानि च संत्यजेत् ॥ १२ ॥
न्यसेत् पोटलीं कृत्वा पात्रे सुजलपूरिते ।
तालवृन्तानिलैः सम्यक् कुर्याच्छैत्यतमं सुधीः ॥ १३ ॥
पानीयमीदृशं ग्रीष्मे कर्त्तव्यं मनुजेश्वर ! ।
पीपासां शमयेत्सम्यक् पिपासूनां श्रमं हरेत् ॥ १४ ॥
विधूमं जरयत्याशु भक्ष्यादीनां तथैव च।
पुनः पाचक दूसरा घड़ा लाये और उसको बालू की वेदी पर रक्खे । तदनन्तर
उसको दक्षिणी हवा के सम्मुख कर चारो तरफ से मालाएँ लगा दे और ताल
पंखा की हवा से इस जल को अच्छी तरह शीतल करे । अनेक पुष्पों से सुवा-
सित दूसरे पूगपट्ट में उस जल को भर कर फूलों को फेंक दे । पुष्प की पोटली
बनाकर स्वच्छ जल में रक्खे और बुद्धिमान् पाचक ताल पंखा की हवा से
शीतल बना ले । हे राजन् ! इस प्रकार का शीतल जल ग्रीष्म-ऋतु में बनावे ।
यह जल प्यासे व्यक्तियों की प्यास तथा थकावट को दूर करता है और भोजन
आदि के बिना पचे अन्न को पचाता है ॥ १०-१४ ॥
राज्ञः ऊषरजलस्वादुकरणविषयकः प्रश्नः
ऊषरक्षेत्रजातानां जलानां स्वादुवर्जितम् ॥ १५ ॥
स्वादुत्वं कथमापन्नमस्माकं वद बाहुक ! ।
राजा के ऊषर क्षेत्र के जल को स्वादिष्ट बनाने के सम्बन्ध में प्रश्न — हे
बाहुक ! मधुरता से रहित ऊषर स्थान पर उत्पन्न हम लोगों का जल कैसे स्वादिष्ट
हो जाता है इस को बतावें ॥ १५ ॥

१०४ पाकदर्पणम्
बाहुकेन ऊषरजलस्वादुनिर्माणप्रकारनिरूपणम्
विचित्रं शृणु भूपाल ! प्रयोगं किल साम्प्रतम् ॥ १६ ॥
अष्टाद्विगुणितं तोयं कषायेण समन्वितम् ।
एकेन शोणवर्णेन मृद्भाण्डेन विलोडयेत् ॥ १७ ॥
तत्तादृशं पचेत्सम्यक् आकषायविमोचनात् ।
कथं भवति पाकेन कषायगुणमोचनम् ॥ १८ ॥
किन्तु पाकविशेषेण द्रव्ययुक्तेन तद्भवेत् ।
यस्मादुत्पद्यते दोषस्तेनानेन प्रणश्यति ॥ १९ ॥
मृद्योगेन च सम्भूतो मृद्विशेषेण नश्यति ।
नल के द्वारा ऊषर जल स्वादिष्ट बनाने का प्रकार निरूपण — नल ने राजा
ऋतुपर्ण से कहा कि हे राजन् ! ऊषर जल को स्वादिष्ट बनाने का विचित्र प्रयोग
सुने । कषाय से युक्त अठारह गुना जल को एक शोणवर्ण (लाल वर्ण) के मिट्टी
के घड़े में मिलाये और उसको इस प्रकार तब तक पकाये जब तक कि उसका कषाय
गुण नष्ट न हो जाय । पकाने से कषाय गुण से मुक्ति कैसे सम्भव है ? किन्तु पाक
की विशेषता तथा विशिष्ट द्रव्यों के संयोग से यह सम्भव है । जिससे दोष
उत्पन्न होता है वह इस विधि से कषाय दोष नष्ट हो जाता है । मिट्टी के संयोग
से उत्पन्न दोष विशेष मिट्टी के संयोग से नष्ट हो जाता है ॥ १६-१९½ ॥
अतो मृदस्य सहजो दोषो नास्ति नराधिप ! ॥ २० ॥
तप्तं पयश्च विशमेत् तत्र कुर्यादनाविलम् ।
अनाविलं जलं भूयः पात्रेऽन्यस्मिन् प्रपूरयेत् ॥ २१ ॥
कल्कं कतकबोजस्य भाण्डेऽम्भसि समाविशेत् ।
तत्तादृशं सटीसान्द्रे तथा मण्डं विशोधयेत् ॥ २२ ॥
निःक्षिपेत्तत्र रम्याणि जात्यादिकुसुमानि च ।
हे राजन् ! इस प्रकार मिट्टी का कोई स्वाभाविक दोष नहीं है । गरम जल
जब शीतल हो जाय तब मिट्टी निकाल दे और उस अनाविल जल को दूसरे पात्र
में भर दे । इसके बाद निर्मली (रीठा) के बीज का कल्क उस जलपूर्ण पात्र
में छोड़ दे । वह घनी पोटली में बांधकर घुमाने से मण्ड (पंक) का शोधन हो
जाता है । इसके बाद उसमें सुगन्धित एवं रमणीय चमेली आदि के पुष्प को
छोड़ दे ॥ २०-२२ ॥
यस्मिन् देशे प्रसूनानि नास्ति तत्र कथं भवेत् ॥ २३ ॥


नलविरचितम् १०५
राजा ऋतुपर्ण ने नल से पूछा कि जिस देश में पुष्प न मिले वहाँ पर कैसे
जल को सुगन्धित किया जाय ॥ २३ ॥
उपायस्तन्त्ररूपोऽत्र सूक्ष्मोऽस्ति सुदुर्लभम् ।
यस्मिन् सन्ति प्रसूनानि देशे काले च बुद्धिमान् ॥ २४ ॥
तस्मिंस्तदा हि संगृह्य संगृही नावसीदति ।
तं प्रकाशमहं वच्मि शृणु भूपालसत्तम ! ॥ २५ ॥
हे राजन् ! जहाँ जिस देश में पुष्प नहीं हैं वहाँ के लिये देवताओं को भी
दुर्लभ, सूक्ष्म एवं तन्त्र रूप में उपाय है ।¹ बुद्धिमान् व्यक्ति जिस देश एवं काल
में पुष्प नहीं होते हैं उस समय पहले से ही पुष्पों का संग्रह कर ले । संग्रह करने
वाला व्यक्ति दुःखी नहीं होता । हे राजन् ! उसको हम अच्छी तरह समझा
कर कह रहे हैं ॥ २४-२५ ॥
प्रसूनाभावे देशे काले च तन्त्ररूपेण सुवासनाविधिः
अपक्वभाण्डमानीय कुम्भकारगृहान्नवम् ।
कल्केन घनसारादिसम्भवेन सुगन्धिना ॥ २६ ॥
अन्तर्बहिश्च तस्यापि लेपयेच्च समन्ततः ।
आतपेन विना कुर्यात् च्छायाशुष्कं पुनः पुनः ॥ २७ ॥
दिनेष्वेवं बहुषु कुर्यात्तत्र प्रयत्नतः ।
तथाविधं च तं भाण्डं छिन्द्यान्निष्पावमानतः ॥ २८ ॥
फलेन निर्मितं पात्रं नारिकेलस्य मानवित् ।
भावयेद्बहुभिः पुष्पैः घनसारादिना बहु ॥ २९ ॥
पुराणानि च पुष्पाणि प्रसूनानि नवानि च ।
पक्त्वा च पूरयित्वा च मासमेकं पुनः पुनः ॥ ३० ॥
पूरयेत्तादृशान् तस्मिन् वटकान् घटसम्भवान् ।
तस्मिंश्च घटखण्डानि पूरयेत्तानि गोपयेत् ॥ ३१ ॥
प्रसूनाभावदेशे च खण्डानेतान् घटोद्भवान् ।
पाने तक्रे च मूषादिवस्तुष्वेतान् प्रतिक्षिपेत् ॥ ३२ ॥
भवेयुस्तानि तान्येव तत्तद्गुणयुतानि च ।
तोरेषु घटखण्डानि तादृशानि विनिक्षिपेत् ॥ ३३ ॥
१. तन्त्र रूप से आज कल पुष्पों का सेन्ट एवं एसेन्स आदि का प्रयोग
होता है । प्राचीन काल में सुगन्धित बनाने की तन्त्ररूप प्रक्रिया का
आगे निरूपण है ।