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सर्वकोश
पाकदर्पण (राजा नल प्रणीत - इन्द्रदेव त्रिपाठी माधुरी हिन्दी व्याख्या सहित)

पाकदर्पण (राजा नल प्रणीत - इन्द्रदेव त्रिपाठी माधुरी हिन्दी व्याख्या सहित)

Pakadarpana of Raja Nala with Madhuri Hindi Commentary

राजा नल (टीकाकार: पं. इन्द्रदेव त्रिपाठी) द्वारा

DevanagariHindipublished69 पृष्ठ

पृष्ठ 56, कुल 69 में से

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पृष्ठ 56

अथ पानकभेदिरूपणम्
रसालायाश्च कथिता सर्वारुचिविमर्दिताः ।
पानभेदाश्च कथ्यन्ते भुक्तवान्नस्य विरेचकाः ॥ १ ॥
पानक का भेद निरूपण—पूर्व प्रकारण में सम्पूर्ण अरुचियों को नष्ट करने
वाली रसाला का वर्णन किया गया । अब भुक्त (खाये गये) अन्न को विरेचन
करने वाले पान (पानक) के भेद कहते हैं ॥ १ ॥
पानकनिर्माणविधिर्गुणाश्च
हिरण्मये च चित्रे च नानारत्न विराजिते ।
शर्कराभागमेकं च सखण्डं तत्र निक्षिपेत् ॥ २ ॥
गाङ्गन्तद्विगुणं तोयं सिञ्चेद्वस्त्रेण शोधितम् ।
यावत्प्रलीयखण्डं तत्तावत्तत्रैव तन्न्यसेत् ॥ ३ ॥
तदादाय न्यसेद्यन्त्रे तुलितं घटनिर्मितम् ।
भवेद्विभाम्बुवद्यावत् तावत्तत्र पुनः पुनः ॥ ४ ॥
शोधयेद्वच्छाकरं तोयं सम्यक्सदः प्रमाणवित् ।
दशविंशतिपात्रेषु सूक्ष्मरूपेषु शोभिषु ॥ ५ ॥
प्रत्येकं पूगपट्टस्य लोचनानि न्यसेत्क्रमात् ।
फलानां तेषु नेत्रेषु रसं च कुसुमं क्षिपेत् ॥ ६ ॥
विभिन्न पानक बताने की विधि तथा गुण—अनेक रत्नों से जटिल चित्र-
विचित्र स्वर्णपात्र में खांड सहित एक भाग शक्कर छोड़े और वस्त्र से छाना हुआ
गंगाजल दुगुना छोड़ दे । जब तक शक्कर गल न जाय तब तक चलाते रहे
और तुला के आकार का बनाया हुआ घटनिर्मित यन्त्र पर रक्खे । जब तक
वह पारदर्शक जल के तरह न हो जाय तब तक जलमाण यन्त्र पर रक्खे । प्रणाम
को जानने वाला पाचक आमोद युक्त उस जल को अच्छी तरह शुद्ध कर ले ।
इसके बाद छोटे-छोटे सुन्दर दस-बीस पात्रों में पूगपट्ट नेत्र (नली) क्रमशः
रख दे और उन नलियों में फलों का रस तथा पुष्प छोड़ दे ॥ २-६ ॥
चिञ्चाफलरसं सिञ्चेदन्यं तादृशपुष्पकम् ।
कल्हारकुसुमं तत्र न्यसेत्तत्रैव बुद्धिमान् ॥ ७ ॥
जम्बूफलं तथान्यस्मिन् सुपक्वञ्च न्यसेद्बुधः ।
नारिङ्गपुष्पं तत्रैव पुन्नागकुसुमं न्यसेत् ॥ ८ ॥


नलविरचितम् ८९
पारावतफलान्यानि रसमेकत्र निक्षिपेत् ।
रम्भाफलरसं सिञ्चेत् अन्यस्मिन्नपि लोचने ॥ ९ ॥
करवीरस्य कुसुमं कुसुमं बकुलस्य च ।
एकत्रलकुचस्यादि फलं प्रक्षिप्य शास्त्रवित् ॥ १० ॥
सुगन्धमुत्पलं चात्र शतपत्रप्रसूनकम् ।
अन्यत्र निक्षिपेद् विद्वान् फलमाम्रातकस्य च ॥ ११ ॥
मातुलुंगस्य कुसुमं कुन्दस्य कुसुमं न्यसेत् ।
केतकीकुसुमं त्वेकं सर्व नेत्रेषु निक्षिपेत् ॥ १२ ॥
एलोनागरचूर्णञ्च जम्बीरस्य सरन्ततः ।
लोचनेषु च सर्वेषु किञ्चित्किञ्चित् विनिक्षिपेत् ॥ १३ ॥
कर्पूरं मृगनाभिं च कुङ्कुमं हिमवारिणा ।
पेषयित्वा च तत्कल्कं मानवित्प्रक्षिपेत्क्रमात् ॥ १४ ॥
पूर्वोक्त पात्रों में स्थित नेत्रों (नलिका) में भिन्न फलों का रस तथा पुष्प छोड़े ।
एक पात्र में इमली के फल का रस तथा उसी प्रकार का कोई पुष्प छोड़े । उसमें
बुद्धिमान् पाचक कल्हार (कूई) का पुष्प छोड़ दे । दूसरे पात्र में पके
जामुन के फल का रस छोड़े और उसी में नारङ्ग (गाजर) पुष्प तथा पुन्नाग
(सुलतान चम्पक) का पुष्प छोड़ दे । एक दूसरी नलिका में पारावत (परुषक-
शरीफा) के फल का रस तथा अन्य नलिका में केले के फल का रस छोड़ दे ।
पुनः क्रमशः एक पात्र में करवीर (कनैल) का फूल तथा दूसरे में मौलसर का
फूल छोड़ दे । एक नलिका में बड़हल के फल का रस तथा सुगन्धित कमल एवं
गुलाब का पुष्प छोड़ दे । एक नलिका में आम्रातक (आमड़ा) के फल का
रस तथा मातुलुङ्ग (बिजौरा नींबू) का फल एवं कुन्द का पुष्प छोड़ । इलायची
तथा सोंठ का चूर्ण और जम्बीरी नीम्बू का रस थोड़ा-थोड़ा सभी नलिकाओं में
छोड़ दे । कर्पूर, कस्तूरी तथा केशर का शीतल जल के साथ कल्क बना कर
प्रमाण को जानने वाला पाचक उचित मात्रा में छोड़ दे ॥ ७-१४ ॥
एवं सम्भारयुक्तेषु लोचनेषु प्रमाणवित् ।
शुद्धतच्छाकरं तोयं यथायोग्यं प्रसेचयेत् ॥ १५ ॥
मन्दमारुतसंचारपानागरे ततः सुधीः ।
सिकतानिर्मितायाञ्च वेदिकायाञ्च पण्डितः ॥ १६ ॥
निधाय तानि पात्राणि शुद्धवस्त्रेण वेष्टयेत् ।
उशीरनिर्मितेनाथ तालवृन्तेन बीजयेत् ॥ १७ ॥