पाकदर्पण (राजा नल प्रणीत - इन्द्रदेव त्रिपाठी माधुरी हिन्दी व्याख्या सहित)
Pakadarpana of Raja Nala with Madhuri Hindi Commentary
राजा नल (टीकाकार: पं. इन्द्रदेव त्रिपाठी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअथ घृतान्नपाकप्रकरणम्
घृतान्नपाकनिर्माणविधिर्गुणाश्च
सुपक्वं राजशाल्यन्नमानीय सुमनोहरम् ।
विशालविभ्रमे देशे पात्रेषु विविधेष्वथ ॥ १ ॥
स्थितेषु सर्वपात्रेषु क्षिपेदन्येन सैन्धवम् ।
हैयङ्गवीनमेकस्मिन् सिञ्चेत्पात्रे सुसंयुते ॥ २ ॥
क्षिपेच्चूर्णं पुनस्तत्र दग्धपर्पटकस्य च ।
निक्षिपेच्च ततस्तत्र लशुनाद्रॅकयोः कणान् ॥ ३ ॥
चूर्णं च निविशेत् किंचित् मेथीजोरकसम्भवम् ।
कुस्तुंबरीञ्च कैटर्यं केतकीकुसुमं न्यसेत् ॥ ४ ॥
बीजपूरदलं तत्र निक्षिपेत्सूपराट् ततः ।
एभिर्द्रव्यैर्भोजनस्थमन्नं कुर्याच्च मेलनम् ॥ ५ ॥
पुनश्च निक्षिपेत्तत्र कस्तूरीं कर्पूरीं तथा ।
पुनश्च पूगपट्टे न बद्ध्वा भोक्त्रे निवेदयेत् ॥ ६ ॥
घृतमन्नमिदं रम्यं बलवृद्धिकरं भवेत् ।
हृद्यं पित्तहरं नित्यं चक्षुरिन्द्रियवर्धनम् ॥ ७ ॥
घृतान्न पाक बनाने की विधि तथा गुण—अच्छी तरह परिपक्व, मनोहर
राज शाल्यन्न (जड़हन का पूर्वोक्त विधि से निर्मित भात ) को लेकर विस्तृत स्थान
में विविध सभी पात्रों में रखे हुए अन्न में सेन्धा नमक छोड़े और उसी के साथ
रखे हुए एक पात्र में घी छोड़ दे। पुन: भूने हुए पापड़ को रख दे। पुन:
उसमें लहसुन तथा अदरक के टुकड़ों को छोड़े । उसी में थोड़ा मेथी तथा
जीरा का चूर्ण छोड़ दे। पुन: धनिया, कायफर तथा केवड़ा के फल को छोड़ दे ।
इसके बाद बिजौरा नींबू के फल के दल को श्रेष्ठ पाचक छोड़ दे । इस प्रकार
पात्र में स्थित अन्न को पूर्वोक्त द्रव्यों के साथ मिला दे और पुन: उसमें कस्तूरी
तथा कर्पूर छोड़ दे । तदनन्तर पूगपट्ट से बाँधकर खाने वाले को दे । यह घृतान्न
रम्य, बलवृद्धिकारक हृद्य पित्तहर तथा, दृष्टिशक्ति को बढ़ाने वाला है ॥ १-७ ॥
अन्य घृतान्ननिर्माणविधिर्गुणाश्च
अन्यस्मिन्नपि पात्रस्थे शाल्यन्नेषु सुसंयुते ।
तिलतैलं नवं रम्यं सिञ्चेत्सूपदः समं ततः ॥ ८ ॥
नलविरचितम् ९७
जम्बीराम्लं ततस्तत्र प्रमाणेन प्रसेचयेत् ।
चूर्णञ्च निक्षिपेत्तत्र पिण्याकवटकोग्द्भवम् ॥ ९ ॥
लशुनाद्रेककैंडर्यधान्यकानां क्षिपेत्कणान् ।
तप्ततैलं पुनस्तत्र हिंगुना सहितं क्षिपेत् ॥ १० ॥
कृत्वा तन्मेलनं तत्र कर्पूरादींश्च निक्षिपेत् ।
तद्बद्ध्वा पूगनेत्रेण निवेशेदपरस्थले ॥ ११ ॥
बलकृद्दीपनकरं वातश्लेष्महरं तथा ।
प्रकारान्तर से घृतान्न बनाने की विधि तथा गुण—अन्य प्रकार से घृतान्न
बनाने के लिये अन्य पात्रों में स्थित शाल्यन्नों में पाचक सुन्दर, रमणीय, नवीन
तिल का तेल मिला दे । इसके बाद उचित मात्रा में जम्बीरी नींबू का रस (सत्व)
छोड़ दे । पुनः तिल के खली के वटक चूर्ण को उसमें मिला दे और लहसुन,
अदरक, कैडर्य ( कायफल ) तथा धनियां के चूर्ण को मिला दे । पुन: गरम
तेल में हींग पका कर छोड़ दे । इन सबों को एकत्र कर कर्पूर आदि सुगन्धित
द्रव्यों से सुगन्धित बना ले । पुनः उसको पूगपट्ट नेत्र से बाँधकर दूसरे स्थान
पर रख दे और खाने के लिये दे । यह बलवर्द्धक, जाठराग्निदीपक तथा वात-
कफ को दूर करता है ॥ ८-११ ॥
चिञ्चाफलरसयुक्तशाल्यन्नपाकनिर्माणविधिर्गुणाश्च
अथ चिञ्चा पक्वफलसमुद्भूतरसं हरेत् ॥ १२ ॥
शालिन्या तं पुनः सम्यग् भर्जयेद्रामठादिभिः ।
अन्यस्मिन् नवशाल्यन्ने निक्षिपेत्तादृशं रसम् ॥ १३ ॥
कणांश्च निक्षिपेत्तत्र लशुनाद्रेकसम्भवान् ।
तदेभिर्मेलयेत्सर्वं वासनादीन् समावेशेत् ॥ १४ ॥
पूगपट्टे न तद्भक्तं वेष्टयित्वा च दापयेत् ।
पित्तवृद्धिकरो रुच्यः शूलव्याधिहरो ह्ययम् ॥ १५ ॥
इमली फल के रस से मिश्रित शाल्यन्न बनाने की विधि तथा गुण—इमली
के पके फल का रस निकाल ले । पुनः शालि धान के चावल के साथ अच्छी
तरह हींग के साथ भून ले । दूसरे नवीन शाल्यन्न में पूर्वोक्त इमली के रस को
छोड़ दे और लहसुन तथा अदरक के टुकड़ों को छोड़ दे । इसके बाद सभी को
एकत्र मिला दे तथा सुगन्धित द्रव्यों से सुगन्धित कर ले । तदनन्तर उस भात को
पूगपट्ट से वेष्टित कर खाने के लिये दे । यह पित्त को बढ़ाने वाला, रुचिकारक
तथा शूल एवं व्याधि को दूर करता है ॥ १२-१५ ॥