पाकदर्पण (राजा नल प्रणीत - इन्द्रदेव त्रिपाठी माधुरी हिन्दी व्याख्या सहित)
Pakadarpana of Raja Nala with Madhuri Hindi Commentary
राजा नल (टीकाकार: पं. इन्द्रदेव त्रिपाठी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें७६ पाकदर्पणम्
शिशिरेऽह्नि ऋतौ तावत् तिक्तस्वादुरसास्समाः ।
अनेकान् कायसम्भूतान् दोषान्नाशु हरन्ति च ॥ २६ ॥
देशकालवयोऽवस्था — धातुदोषबलाबलम् ।
विद्वान् विचार्य तान्येव प्रयत्नेन प्रयोजयेत् ॥ २७ ॥
वसन्तादि ऋतुओं में पथ्य तथा उनके गुण — वसन्त ऋतु के दिनों में कटु,
मधुर तथा लवण रस वाले पदार्थ पथ्य होते हैं। ये यथा क्रम बल की वृद्धि,
जाठराग्नि की वृद्धि तथा रुचि को बढाने वाले होते हैं। ग्रीष्म ऋतु के दिन में
मधुर, अम्ल तथा लवण रस वाले पदार्थ खाने के योग्य हैं। ये वात-विकार को
शान्त करते हैं तथा शरीर को शान्त रखते हैं। वर्षा ऋतु के दिन में कटु, मधुर
तथा लवण रस वाले पदार्थ पथ्य हैं और ये वात आदि विकार को शान्त करते हैं
तथा जाठराग्नि को बढ़ाते हैं। शरद् ऋतु के दिन में मधुर तथा तिक्त रस वाले
पदार्थ खाने योग्य हैं। हेमन्त ऋतु के दिन में मधुर कटु तिक्त तथा कषाय रस
वाले पदार्थ पथ्य हैं। शिशिर ऋतु में तिक्त तथा मधुर रस वाले पदार्थ सामा-
न्यतः सेवन करने योग्य हैं। ये अनेक प्रकार के शरीर में होने वाले दोषों को
शीघ्र ही नाश करते हैं। विद्वान् मनुष्य देश, काल, वय, अवस्था, धातु तथा
दोषों के सबल एवं निर्बल का विचार कर उसी के अनुसार प्रयत्न पूर्वक प्रयोग
करें ॥ २२-२७ ॥
ऋतुसन्धिधर्मनिरूपणम्
ऋतुसन्धिषु सर्वेषु जन्तूनाञ्जायते कफः ।
अन्नारेकव्यतिकराद् अग्निमेदसमुद्भवात् ॥ २८ ॥
वसन्तग्रीष्मवर्षेषु अग्निर्ज्वलति देहिनाम् ।
शरद्धेमन्तशिशिर — ऋतुष्वनिलसम्भवः ॥ २९ ॥
सच्चिदानन्दरूपोऽयं पक्वापक्वरसात्मकः ।
अस्ति योऽसौ प्रकाशात्मा सर्वं पायात्सदाशिवः ॥ ३० ॥
ऋतुओं के सन्धिधर्म का निरूपण — सभी ऋतुओं की सन्धियों में अन्न तथा
जल के व्यतिक्रम होने से तथा अग्नि एवं मेद के उत्पन्न होने से प्राणियों का कफ
बढ़ जाता है। वसन्त; ग्रीष्म तथा वर्षा ऋतु में प्राणियों की अग्नि प्रज्वलित रहती
है। शरद् हेमन्त तथा शिशिर ऋतुओं में वायु की उत्पत्ति होती है। पक्वापक्व
रसात्मक, सच्चिदानन्द रूप यह जो प्रकाशात्मक अग्नि स्वरूप शिव है वे सभी
पापियों की रक्षा करें ॥ २८-३० ॥
नलविरचितम् ७७
ऋतुक्रमानुसारण मांससेवनजन्तवः
हरिणादिर्वसन्ते च ग्रीष्मे मेषादि सम्भवम् ।
वर्षत्तौ कुक्कुटादीनां मत्स्यादीनां शरत्समे ॥ ३१ ॥
हेमन्ते शूक्रादीनाञ्चटकादेश्च शैशिरे ।
आमिषं क्रमशस्तेषामृतुष्वेतेषु योजयेत् ॥ ३२ ॥
ऋतु के अनुसार मांस सेवन के योग्य जन्तु — वसन्त ऋतु में हरिण आदि
के मांस सेवन करने योग्य है। ग्रीष्म ऋतु में मेष ( भेड़ ) आदि का मांस सेवन
करने योग्य है। वर्षा ऋतु में कुक्कुट ( मुर्गा ) आदि का मांस, शरद् ऋतु में
मछली आदि का मांस, हेमन्त ऋतु में सूअर आदि का मांस, शिशिर ऋतु में
चटका ( गौरैया ) आदि का मांस क्रमशः पूर्वोक्त ऋतुओं में प्रयोग करें ॥ ३१ ॥
वसन्ते हितोपभोग्यमांसानि
अथ वक्ष्ये हितं मांसं क्रमशः ऋतुषट्कके ।
एणीहरिणयोर्मांसं वसन्तत्तौ हितं च तत् ॥ ३३ ॥
पथ्यं हितकरं वृष्यं परमं स्वादुबृंहणम् ।
वसन्त में उपभोग करने योग्य मांस — छहों ऋतुओं में उपभोग करने योग्य
हितकर मांस को कहते हैं। वसन्त ऋतु में हरिण तथा हरिणी का मांस हितकर
होता है। इन सबों का मांस सेवन करना पथ्य, हितकर, वीर्यवर्द्धक, उत्तम
स्वादिष्ट तथा मांसवर्द्धक होता है ॥ ३१ ॥
ग्रीष्मत्तौ हितोपभोग्यमांसानि
आविकञ्च फलं मेषमामिषं शीतलं मृदुः ।
ग्रीष्मत्तौ तु परं पथ्यमुष्णवारणं हितम् ॥
ग्रीष्म में उपभोग करने योग्य मांस — ग्रीष्म ऋतु में भेड़ी तथा भेड़ा का
मांस शीतल तथा मृदु होने के कारण उत्तम पथ्य है तथा उष्मा शामक होने से
हितकर है ॥ ३४२ ॥
वर्षत्तौ हितोपभोग्यमांसानि
लवणस्याब्धिजातानां मत्स्यानां कुक्कुटस्य च ॥ ३५ ॥
आमिषं परमं पथ्यं वर्षत्तौ शीतवारणम् ।
वर्षा ऋतु में उपभोग करने योग्य मांस — वर्षा ऋतु में लवण समुद्र में रहने
वाले मत्स्य ( मछली ) एवं मुर्गा का मांस उत्तम पथ्य होता है और यह शीत को
दूर करने वाला है ॥ ३५ ॥