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सर्वकोश
पाकदर्पण (राजा नल प्रणीत - इन्द्रदेव त्रिपाठी माधुरी हिन्दी व्याख्या सहित)

पाकदर्पण (राजा नल प्रणीत - इन्द्रदेव त्रिपाठी माधुरी हिन्दी व्याख्या सहित)

Pakadarpana of Raja Nala with Madhuri Hindi Commentary

राजा नल (टीकाकार: पं. इन्द्रदेव त्रिपाठी) द्वारा

DevanagariHindipublished69 पृष्ठ

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कर शाक बना ले । यह हल्का, कृमिनाशक, मलस्त्रावक ( दस्तावर) तथा त्रिदोष
को जीतने वाला होता है ।। ४८५ ।।
धत्तूरपत्रशाकनिर्माणविधिर्गुणाश्च
धत्तूरपत्रं विपचेत् पद्मपत्रेण कोमलम् ।
गोक्षुरस्य च मूलेन बिल्वपत्रेण पाकवित् ॥ ४८६ ॥
सम्भारमेलनं कुर्यात् पूर्ववत्साधुसिद्धये ।
एतत्कफहरं पथ्यं शीतव्याधिहरं परम् ॥ ४८७ ॥
**धत्तूर पत्र का शाक बनाने की विधि तथा गुण—**मुलायम धत्तूर के पत्तों
को लेकर कमल के पत्तों के साथ पकावे । पाकवेत्ता पाचक गोक्षुर ( गोखरू )
तथा बिल्वपत्र के साथ पकावे और अच्छीतरह सिद्ध होने के लिये सम्भार (नमक
मसाला आदि ) मिला दे । इसके बाद सुगन्धित एवं आवेष्टित कर खाने को दे ।
यह कफ को दूर करने वाला, पथ्य तथा अच्छी तरह शीतजन्य रोगों को नाश
करने वाला है ।। ४८६-४८७ ।।
पद्मपत्रशाकनिर्माणविधिर्गुणाश्च
पद्मपत्रं श्वदंष्ट्राणां मूलेनैव पचेद् यदि ।
स्वादु पथ्यं लघुहितं वृष्यं पित्तहरं भवेत् ॥ ४८८ ॥
**पद्म (कमल) पत्र का शाक बनाने की विधि तथा गुण—**कमल के मुला-
यम पत्तों को लेकर श्वदंष्ट्रा (गोखरू) की जड़ के साथ ही यदि पकाया जाय तो
वह स्वादिष्ट, पथ्य, हल्का, हितकर, वीर्यवर्द्धक तथा पित्तहर होता है ।। ४८८ ।।
किंशुकपत्रशाकनिर्माणविधिर्गुणाश्च
किंशुकस्य दलस्पाकं कुर्यात्तित्तिमोचनम् ।
तण्डुलीयकमूलैर्वा तद्दलैर्वा विधानतः ।
श्लेष्मवातहरं पथ्यं व्रणनुत् क्रिमिदोषनुत् ॥ ४८९ ॥
**किंशुक (ढाक) के पत्तों का शाक बनाने की विधि तथा गुण—**पलाश के
पत्तों को लेकर चौराई की जड़ या पत्तों के साथ तिक्तता को दूर करने के लिए
विधिपूर्वक पाक करे । शेष सम्भार आदि का मेलन, आवासन एवं आवेष्टन आदि
पूर्ववत् करे और खाने में प्रयोग करे । यह पलाशपत्र शाक कफ एवं वात को दूर
करनेवाला, पथ्य, व्रण तथा क्रिमिविकार को दूर करनेवाला है ।। ४८९ ।।
वनशिग्रुपत्रशाकनिर्माणविधिर्गुणाश्च
वनशिग्रुदलं चैव पचेत् श्रीहस्तिनोदलैः ।
यद्वा पुनर्नवदलैः शङ्खचूर्णेन वा पुनः ॥ ४९० ॥


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कन्दवत्सा प्रयोक्तव्या सर्पिषा भर्जयेत्पुनः ।
इदं स्वादुतरा लघ्वो वातपित्तविनाशिनी ॥ ४९१ ॥
**वन सहिजन के पत्तों का शाक बनाने की विधि तथा गुण—**वन सहिजन
के पत्तों को लेकर गजशुण्डी के पत्तों ( या इन्द्र वारुणी के पत्तों ) के साथ पकावे
अथवा पुनर्नवा के पत्ते या शंख के चूर्ण के साथ पकावे । इसका प्रयोग कन्दशाक
की तरह करना चाहिए और पुनः घी के साथ भून ले । यह गजशुण्डी अत्यन्त
स्वादिष्ट, हल्की तथा वात-पित्त को नाश करनेवाली है ।। ४९०-४९१ ।।
कुरण्टदलशाकनिर्माणविधिर्गुणाश्च
शिग्रुमूलेन संयुक्तं कुरण्टकदलं पचेत् ।
स्वादु श्लेष्महरं पथ्यं बृंहणं बलवर्द्धनम् ॥ ४९१ ॥
कुरण्ट (कट सरैया) के पत्तों का शाक बनाने की विधि तथा गुण—
कटसरैया के पत्तों को सहिजन की जड़ के साथ पकावे और पूर्ववत् मसाला आदि
मिला कर शाक तैयार करे तथा खाने के लिये प्रयोग करे। यह स्वादिष्ट, कफ-
हर, पथ्य, मांसवर्द्धक तथा वातवर्द्धक है ।। ४९२ ।।
पलाण्डुशाकनिर्माणविधिर्गुणाश्च
भवेत्पलाण्डुः सुरभिस्तण्डुलीयनलैः पचेत् ।
वातश्लेष्मही रुच्यः पथ्यः कायाग्निदीपकः ॥ ४९३ ॥
**प्याज का शाक बनाने की विधि तथा गुण—**प्याज को चौराई के क्वाथ के
साथ पकावे वह सुगन्धित हो जाता है । प्याज का शाक वात-कफ को दूर करने
वाला, रुचिकारक, पथ्य तथा जाठराग्नि को प्रदीप्त करने वाला है ।। ४९३ ।।
सैकसशाकनिर्माणविधिर्गुणाश्च
सैकसं विपचेद्विद्वान् क्षुद्रदन्तिदलैः सह ।
मृदुत्वं स्वादुतां याति गोधूमकणवच्च तत् ॥ ४९४ ॥
**सैकस का शाक बनाने की विधि तथा गुण—**विद्वान् पाचक सैकस को
क्षुद्रदन्ति के पत्तों के साथ पकावे । यह गेहूं के चूर्ण सदृश मुलायम तथा स्वादिष्ट
हो जाता है ।। ४९४ ।।
वासापत्रशाकनिर्माणविधिर्गुणाश्च
वासापत्रं तु तरुणमानीय क्रिमिवर्जितम् ।
चूर्णतोयेन विपचेत्तिक्तविनिवृत्तये ॥ ४९५ ॥
गते तिक्ते पुनस्तच्च मन्थानेन विलोडयेत् ।
तत्र निक्षिप्य संभारान् पूर्ववद्विपचेच्च तत् ॥ ४९६ ॥