पाकदर्पण (राजा नल प्रणीत - इन्द्रदेव त्रिपाठी माधुरी हिन्दी व्याख्या सहित)
Pakadarpana of Raja Nala with Madhuri Hindi Commentary
राजा नल (टीकाकार: पं. इन्द्रदेव त्रिपाठी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें७८ पाकदर्पणम्
शरदृतौ हितोपभोग्यमांसानि
नदीतटाकसम्भूतं मत्स्यानामामिषं हितम् ॥ ३६ ॥
ऋतौ शरदि तीक्ष्णोष्णसमरूपं सुखप्रदम् ।
शरद ऋतु में उपभोग योग्य मांस—शरद ऋतु में नदी तथा पोखरा में रहने
वाली मछलियों का मांस तीक्ष्ण तथा उष्ण सम रूप होने के कारण सुखप्रद एवं
हितकर होता है ॥ ३६ ॥
हेमन्तर्तौ हितोपभोग्यमांसानि
वाराहशशसंभूतं क्रव्यमुष्णकरं परम् ॥ ३७ ॥
लघु वृष्यं सुखकरं ऋतौ हेमन्तसंज्ञके ।
हेमन्त ऋतु में उपभोग योग्य मांस—हेमन्त ऋतु में सूअर तथा खरगोश का
मांस उत्तम गरम, हल्का, वीर्यवर्द्धक तथा सुखकारक होता है ॥ ३७ ॥
शिशिरर्तौ हितोपभोग्यमांसानि
आमिषं कलविङ्कस्य लावकोत्थं च शोभनम् ॥ ३८ ॥
उष्णवीर्यकरं स्वादु ऋतौ शिशिरसंज्ञके ॥ ३९ ॥
शिशिर ऋतु में उपभोगयोग्य मांस—शिशिर ऋतु में कलविङ्क (गौरैया)
तथा लावक पक्षी का मांस उत्तम होता है। यह उष्ण, वीर्यवर्द्धक तथा स्वादिष्ट
होता है ॥ ३८-३९ ॥
सूदकारगुणप्रशस्तयः
एवं वसन्तादि ऋतौ प्रसिद्धधर्मान् विदित्वा कुरुते यथात्मा ।
विमुक्तपापः स च सूददोषैः पुनर्जन्मना जठरं न याति ॥ ४० ॥
यदामिषं देवपित्तृप्रवृत्तये करोति सूदो यदि कामवर्जितः ।
प्रयाति लोकं कृतिना कृतियँथा सवासवस्तं मुमुदे सदा मुदा ॥ ४१ ॥
अकलार्थसकलं कलाविदः सूदकर्मकुशलं मृगादिषु ।
स्वामिकार्यमिति यः करोति तत् सूददोषकृतपापभाङ्नरः ॥ ४२ ॥
इति नलकृतपाकदर्पणे द्वितीयं प्रकरणं समाप्तम् ॥ २ ॥
पाचक की प्रशंसा—इस प्रकार पाचक वसन्तादि ऋतुओं में अच्छी तरह
प्रसिद्ध गुण-धर्मों को जानकर पाचक कार्य करता है वह पाचक के दोषों से मुक्त
होकर पुनः माता के पेट में नहीं जाता है। अर्थात् संसार से मुक्त हो जाता है।
यदि पाचक कामना रहित देवता पितर के लिये मांस का प्रकार बनाता है तो वह
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पुण्यात्मा देवताओं के लोक में जाता है और हमेशा प्रसन्नता पूर्वक इन्द्र के साथ
रहता है। यो पाकशास्त्र को जाननेवाला मृग आदि के मांस को बनाने में कुशल
अच्छी तरह स्वामी के कार्य के लिये मांस पाक को बनाता हैं वह मनुष्य पाचक
के दोष जन्य पाप का भागी नहीं होता है ॥ ४०-४२ ॥
इति नलकृत पाकदर्पण का डा० इन्द्रदेव त्रिपाठीकृत माधुरी हिन्दी व्याख्या
सहित ऋतुधर्मनिरूपण नामक द्वितीय प्रकरण समाप्त ॥ २ ॥