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सर्वकोश
पाकदर्पण (राजा नल प्रणीत - इन्द्रदेव त्रिपाठी माधुरी हिन्दी व्याख्या सहित)

पाकदर्पण (राजा नल प्रणीत - इन्द्रदेव त्रिपाठी माधुरी हिन्दी व्याख्या सहित)

Pakadarpana of Raja Nala with Madhuri Hindi Commentary

राजा नल (टीकाकार: पं. इन्द्रदेव त्रिपाठी) द्वारा

DevanagariHindipublished69 पृष्ठ

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पृष्ठ 48

७२ पाकदर्पणम्
पुनश्च वासनादौ च कृते तन्मधुरायते ।
विपाकसमये चेदं कासश्वासहरं भवेत् ॥ ४९७ ॥
वासा (अडूसा) के पत्र का शाक बनाने की विधि तथा गुण—क्रिमिक्षं
रहित मुलायम अडूसा के पत्तों को लेकर उसकी तित्ताई दूर करने के लिये चूने
के पानी के साथ पकावे । पुनः तित्ताई निकल जाने के बाद उसको मथनी से मथ
दे । इसके बाद उसमें सम्भार (नमक-मसाला आदि) पहिले की तरह छोड़कर
पकावे । पुनः कर्पूर आदि सुगन्धित द्रव्यों से सुगन्धित करने पर मधुर हो जाता
है । यह शाक विपाक के समय में श्वास-कास को दूर करने वाला होता
है ॥ ४९५-४९७ ॥
सूपराजपदप्राप्तिनिरूपणम्
सूपवेदमखिलं सुसूक्ष्मया संविदा समवलोक्य सर्वतः ।
पाकरूपमभिधेयमादराद्यो बिभर्ति हृदयेन सूपराट् ॥ ४९८ ॥
सूपराज पद की प्राप्ति - यो उत्तम पाचक सूक्ष्म विचार से चारो तरफ देख-
कर पाक रूप अभिधेय सम्पूर्ण सूपवेद (पाकशास्त्र) को हृदय से आदरपूर्वक
ग्रहण करता है वह सूपराज (पाचकों का राजा) होता है ॥ ४९८ ॥
पाकोपसंहारः
इति नलकृतं पाकं यो बिभर्त्यात्मबुद्धौ
स खलु परहितार्थं पूज्यते राजसङ्घैः ।
अपि च रिपुसमाजे संस्थिता कीर्तिनारी-
निजपतिमनुयामीत्यब्रुवन् प्रत्यगात्तम् ॥ ४९९ ॥
इति नलकृत पाकदर्पणे प्रथमप्रकरणं समाप्तम्
पाक प्रकरण का उपसंहार - यो पाचक इस नल कृत पाक शास्त्र को अपनी
बुद्धि से दूसरों के हित के लिये धारण करता है वह राजाओं से पूजित होता है
और भी शत्रुओं के समाज में स्थित कीर्तिरुपी स्त्री अपने पति के साथ जाऊँगी
यह कहती हुई उसके पीछे चली जाती है ।
इति नलकृत पाकदर्पण का डा० इन्द्रदेव त्रिपाठीकृत माधुरी हिन्दी व्याख्या
सहित पाकनिरूपण नामक प्रथम प्रकरण समाप्त ॥ १ ॥
अथ ऋतुधर्मनिरूपणम्
राजोवाच
पाकक्रियाविदां श्रेष्ठ ! सूद ! सर्वज्ञ ! सुव्रत ! ।
अनेकविद्याकुशल ! पाकवित् करिकेसरिन् ॥ १ ॥
वसन्तादि-ऋतोर्धर्माः पृथग्वस्तुनिषेविताः ।
एकस्तेन हितानेव परिकल्प्य प्रदर्शय ॥ २ ॥
राजा ऋतुपर्ण का प्रश्न - हे पाक क्रियाओं को जानने वालों में श्रेष्ठ ! सभी
पाक विधि को जानने वाले ! शुद्ध व्रत को धारण करने वाले ! अनेक विद्या के
विशेषज्ञ करिरूप पाक विद्या जानने वालों में सिंहरूप आप अलग-अलग वस्तुओं
को सेवन किये जानेवाले वसन्त आदि ऋतुओं के धर्मों को एक-एक करके जिनसे
हित होता है उनकी कल्पना कर प्रदर्शित करें ॥ १-२ ॥
राजाऋतुपर्णस्योत्तरम्
तस्योत्तरं वक्तुकामो राजानमिदमब्रवीत् ।
दण्डचण्डादिदोर्दण्ड ! खण्डितारातिमण्डल ! ॥ ३ ॥
चण्डांशुमण्डलारेख ! कुण्डलद्वयमण्डित ! ।
श्रूयतां राजशार्दूल ! ऋतुपर्ण ! महामते ! ॥ ४ ॥
सन्ति प्रतिदिनं चित्रं ऋतवः स्वस्वधर्मकाः ।
प्रमाणं चेत्प्रवक्ष्यामि तेषां लक्षणमुत्तमम् ॥ ५ ॥
मासद्वयेन शीतो हि ऋतुरेकदिनेऽप्ययम् ॥ ६ ॥
राजा ऋतुपर्ण के प्रश्न का उत्तर - पाकसर्वज्ञ नल राजा ऋतुपर्ण के प्रश्न
का उत्तर देने की इच्छा से उनसे बोले - हे दण्ड देने में प्रचण्ड (मजबूत) हाथों
से शत्रु समूह को परास्त करनेवाले तथा प्रचण्ड सूर्यमण्डल के किरण के रेख से
चमकते हुए दोनों कुण्डल वाले, राजाओं में सिंह, महान्, बुद्धिमान्, महाराज
ऋतुपर्ण ! आप सुनें । प्रतिदिन चित्र-विचित्र, अपने-अपने धर्मवाले ऋतु ये हैं
जिनके लक्षणों को प्रमाणसहित कहूँगा । दो माह शीत ऋतु होता है । यह नियम
एक दिन में भी है ॥ ३-६ ॥
ऋतुभेदविवेचनम्
ऋतुभेदं प्रवक्ष्यामि शृणु वेदप्रमाणतः ।
किमर्थमृतुभेदोऽयमुच्यते लोकमानतः ॥ ७ ॥