पाकदर्पण (राजा नल प्रणीत - इन्द्रदेव त्रिपाठी माधुरी हिन्दी व्याख्या सहित)
Pakadarpana of Raja Nala with Madhuri Hindi Commentary
राजा नल (टीकाकार: पं. इन्द्रदेव त्रिपाठी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें७४ पाकदर्पणम्
अयमेव भवत्यस्मिन् न कालनियमो ऋतुः ।
मासद्वयेन कथितः क्रमोऽयं नोपपद्यते ॥ ८ ॥
तत्सृष्टिसमये सत्यं विचारविमुखो विधिः ॥ ९ ॥
ऋतुओं के प्रकार का विचार— हे राजन् ! ऋतुओं के भेदों को वेद-प्रमाण
के अनुसार कहता हूँ, सुनें । लोकप्रमाण के अनुसार यह ऋतुभेद किसलिये कहा
गया है। इस सम्बन्ध में लोकप्रमाण से ही ऋतुओं का विभाग है । समय का कोई
नियम नहीं है। दो माह का ऋतु होता है यह क्रम उपयुक्त नहीं है। यह सत्य है
कि सृष्टि के समय में ब्रह्मा विचारविमुख हो गये थे ॥ ७-९ ॥
मूलप्रमाणरहितो लोके श्रौतप्रवाहतः ।
ऋतूनामयमेवेति नियमो नोपपद्यते ॥ १० ॥
तस्माद्दिने दिने युक्त्या ऋतुभेदस्तु युज्यते ।
दिनप्रथमभागेन ऋतुधर्मा भवन्त्यमी ॥ ११ ॥
भागेऽप्यस्मिन् भवन्त्येव ऋतवोऽन्ये तु कौशलात् ।
ऋतुव्यतिकरे मानं देहभागधियो यतः ॥ १२ ॥
न च कालक्रमो बुद्धिः परं मानं मनीषिणः ।
अर्थोऽयं कविभिस्सम्यक् कथितोऽयं विचार्यताम् ॥ १३ ॥
लोक में मूल प्रमाण के विना शास्त्र के कथनानुसार ऋतुओं का यही नियम
है ऐसा कहना उपयुक्त नहीं है। अतः युक्ति से प्रतिदिन ऋतुभेद होता है दिन
के पहले भाग में ये ऋतुधर्म होते हैं। दूसरे भाग में कुशलतापूर्वक विभाग के
अनुसार अन्य ऋतुओं के धर्म होते ही हैं क्योंकि ऋतुओं के व्यतिक्रम (विभाजन)
देहविभाग में बुद्धि ही प्रमाणित है अर्थात् जैसे देह के विभाग हैं वैसे ही ऋतुओं
के विभाग हैं। विद्वानों की बुद्धि कालक्रम के अनुसार ऋतुपरक नहीं है। इस
तात्पर्य को विद्वानों ने अच्छी तरह बताया है इसका विचार करें ॥ १०-१३ ॥
श्रुतिरप्याह तद्भेदानिच्छया तद्विकल्पतः ।
मूलशास्त्रप्रमाणेण भोक्त्रे भोगप्रमाणतः ॥ १४ ॥
राज्ञः शक्तिबलादैव सेवकानां च कौशलात् ।
क्रीडातिशक्ता राजानः प्रवक्ष्ये तान्यतः स्वयम् ॥ १५ ॥
षड्गुणा भिन्नधर्मांश्च यथा राजानमाश्रिताः ।
भिन्नधर्मांश्च कतमा दिनमेकं तथा श्रिताः ॥ १६ ॥
श्रुति ने भी ऋतुओं के भेदों को वैकल्पिक इच्छा के अनुसार, मूल-शास्त्र के
प्रमाण के अनुसार, खानेवाले के भोग के अनुसार, राजाओं की शक्ति से, सेवकों की
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कुशलता से तथा क्रीडासक्त राजाओं का जो धर्म है उनको मैं कहूँगा। उन ऋतु-
धर्मों को मैं कहता हूँ। छः गुण वाले ऋतुओं के भिन्नधर्म जिस प्रकार राजा में
रहते हैं उसी प्रकार आश्रित कितने ऋतुधर्म एक दिन में रहते हैं उसको कहता
हूँ ॥ १४-१६ ॥
प्रतिदिनमृतूनां विभागक्रमनिरूपणम्
अहोरात्रं तु षड्भागं कुर्यात्सूर्योदयात् सुधीः ।
न्यूनाधिकं विना कुर्यात् यथा कालक्रमाद्दिनम् ॥ १७ ॥
दिनस्य प्रथमे भागे वसन्ताख्यो ऋतुर्भवेत् ।
अन्ये द्वितीये घस्रस्य वदेद् ग्रीष्माभिधो ऋतुः ॥ १८ ॥
दिवसस्त्रिगुणे भागे भवेद्वर्षाभिधो ऋतुः ।
अह्रश्चतुर्थभागे च शरदाख्यो ऋतुर्भवेत् ॥ १९ ॥
दिनस्य पञ्चमे भागे हेमन्ताख्यो भवेद्ऋतुः ।
षड्भागे तु घस्रस्य शिशिराख्यो ऋतुर्भवेत् ॥ २० ॥
तद्धर्मास्तत्र तेनैव भवन्ति कुशलैः क्रमात् ॥ २१ ॥
प्रतिदिन के ऋतुओं के विभागक्रम का निरूपण— बुद्धिमान् व्यक्ति दिन
तथा रात्रि को सूर्योदय से लेकर सूर्यास्त होने तक यथा काल क्रम के अनुसार
छः भाग करे। दिन के पहले भाग में वसन्त नामक ऋतु होता है। दिन के दूसरे
भाग में ग्रीष्म नामक ऋतु होता है। दिन के तीसरे भाग में वर्षा नामक ऋतु
होता है। दिन के चौथे भाग में शरद् ऋतु होता है। दिन के पाँचवें भाग में
हेमन्त नामक ऋतु होता है तथा दिन के छठवें भाग में शिशिर नामक ऋतु
होता है। दिन के उन-उन भागों में क्रमशः पूर्वोक्त ऋतुओं के गुण होते हैं ऐसा
बुद्धिमान जन समझें ॥ १७-२१ ॥
वसन्तादिऋतुषु पथ्यं तद्गुणाश्च
वसन्तेऽह्नि ऋतौ पथ्यः कटुस्वादुरसः पटुः ।
कुर्वन्ति बलकायाग्निं रुचीनर्थान् यथाक्रमम् ॥ २२ ॥
मध्वम्ललवणा भोग्या ऋतौ ग्रीष्मदिनस्य च ।
शमयन्ति च पित्तादीन् शान्तिं कायस्य नित्यशः ॥ २३ ॥
वर्षाऋतौ दिने पथ्याः कटुतित्करसास्तथा ।
शमयन्ति च वातादीन् कायाग्निं वर्द्धयन्ति च ॥ २४ ॥
शारदेऽह्नि ऋतौ भक्ष्याः स्वादुतिक्तरसान्विताः ।
हेमन्तेऽह्नि ऋतौ स्वादु कटुतिक्तकषायकाः ॥ २५ ॥