पाकदर्पण (राजा नल प्रणीत - इन्द्रदेव त्रिपाठी माधुरी हिन्दी व्याख्या सहित)
Pakadarpana of Raja Nala with Madhuri Hindi Commentary
राजा नल (टीकाकार: पं. इन्द्रदेव त्रिपाठी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१०४ पाकदर्पणम्
बाहुकेन ऊषरजलस्वादुनिर्माणप्रकारनिरूपणम्
विचित्रं शृणु भूपाल ! प्रयोगं किल साम्प्रतम् ॥ १६ ॥
अष्टाद्विगुणितं तोयं कषायेण समन्वितम् ।
एकेन शोणवर्णेन मृद्भाण्डेन विलोडयेत् ॥ १७ ॥
तत्तादृशं पचेत्सम्यक् आकषायविमोचनात् ।
कथं भवति पाकेन कषायगुणमोचनम् ॥ १८ ॥
किन्तु पाकविशेषेण द्रव्ययुक्तेन तद्भवेत् ।
यस्मादुत्पद्यते दोषस्तेनानेन प्रणश्यति ॥ १९ ॥
मृद्योगेन च सम्भूतो मृद्विशेषेण नश्यति ।
नल के द्वारा ऊषर जल स्वादिष्ट बनाने का प्रकार निरूपण — नल ने राजा
ऋतुपर्ण से कहा कि हे राजन् ! ऊषर जल को स्वादिष्ट बनाने का विचित्र प्रयोग
सुने । कषाय से युक्त अठारह गुना जल को एक शोणवर्ण (लाल वर्ण) के मिट्टी
के घड़े में मिलाये और उसको इस प्रकार तब तक पकाये जब तक कि उसका कषाय
गुण नष्ट न हो जाय । पकाने से कषाय गुण से मुक्ति कैसे सम्भव है ? किन्तु पाक
की विशेषता तथा विशिष्ट द्रव्यों के संयोग से यह सम्भव है । जिससे दोष
उत्पन्न होता है वह इस विधि से कषाय दोष नष्ट हो जाता है । मिट्टी के संयोग
से उत्पन्न दोष विशेष मिट्टी के संयोग से नष्ट हो जाता है ॥ १६-१९½ ॥
अतो मृदस्य सहजो दोषो नास्ति नराधिप ! ॥ २० ॥
तप्तं पयश्च विशमेत् तत्र कुर्यादनाविलम् ।
अनाविलं जलं भूयः पात्रेऽन्यस्मिन् प्रपूरयेत् ॥ २१ ॥
कल्कं कतकबोजस्य भाण्डेऽम्भसि समाविशेत् ।
तत्तादृशं सटीसान्द्रे तथा मण्डं विशोधयेत् ॥ २२ ॥
निःक्षिपेत्तत्र रम्याणि जात्यादिकुसुमानि च ।
हे राजन् ! इस प्रकार मिट्टी का कोई स्वाभाविक दोष नहीं है । गरम जल
जब शीतल हो जाय तब मिट्टी निकाल दे और उस अनाविल जल को दूसरे पात्र
में भर दे । इसके बाद निर्मली (रीठा) के बीज का कल्क उस जलपूर्ण पात्र
में छोड़ दे । वह घनी पोटली में बांधकर घुमाने से मण्ड (पंक) का शोधन हो
जाता है । इसके बाद उसमें सुगन्धित एवं रमणीय चमेली आदि के पुष्प को
छोड़ दे ॥ २०-२२ ॥
यस्मिन् देशे प्रसूनानि नास्ति तत्र कथं भवेत् ॥ २३ ॥
नलविरचितम् १०५
राजा ऋतुपर्ण ने नल से पूछा कि जिस देश में पुष्प न मिले वहाँ पर कैसे
जल को सुगन्धित किया जाय ॥ २३ ॥
उपायस्तन्त्ररूपोऽत्र सूक्ष्मोऽस्ति सुदुर्लभम् ।
यस्मिन् सन्ति प्रसूनानि देशे काले च बुद्धिमान् ॥ २४ ॥
तस्मिंस्तदा हि संगृह्य संगृही नावसीदति ।
तं प्रकाशमहं वच्मि शृणु भूपालसत्तम ! ॥ २५ ॥
हे राजन् ! जहाँ जिस देश में पुष्प नहीं हैं वहाँ के लिये देवताओं को भी
दुर्लभ, सूक्ष्म एवं तन्त्र रूप में उपाय है ।¹ बुद्धिमान् व्यक्ति जिस देश एवं काल
में पुष्प नहीं होते हैं उस समय पहले से ही पुष्पों का संग्रह कर ले । संग्रह करने
वाला व्यक्ति दुःखी नहीं होता । हे राजन् ! उसको हम अच्छी तरह समझा
कर कह रहे हैं ॥ २४-२५ ॥
प्रसूनाभावे देशे काले च तन्त्ररूपेण सुवासनाविधिः
अपक्वभाण्डमानीय कुम्भकारगृहान्नवम् ।
कल्केन घनसारादिसम्भवेन सुगन्धिना ॥ २६ ॥
अन्तर्बहिश्च तस्यापि लेपयेच्च समन्ततः ।
आतपेन विना कुर्यात् च्छायाशुष्कं पुनः पुनः ॥ २७ ॥
दिनेष्वेवं बहुषु कुर्यात्तत्र प्रयत्नतः ।
तथाविधं च तं भाण्डं छिन्द्यान्निष्पावमानतः ॥ २८ ॥
फलेन निर्मितं पात्रं नारिकेलस्य मानवित् ।
भावयेद्बहुभिः पुष्पैः घनसारादिना बहु ॥ २९ ॥
पुराणानि च पुष्पाणि प्रसूनानि नवानि च ।
पक्त्वा च पूरयित्वा च मासमेकं पुनः पुनः ॥ ३० ॥
पूरयेत्तादृशान् तस्मिन् वटकान् घटसम्भवान् ।
तस्मिंश्च घटखण्डानि पूरयेत्तानि गोपयेत् ॥ ३१ ॥
प्रसूनाभावदेशे च खण्डानेतान् घटोद्भवान् ।
पाने तक्रे च मूषादिवस्तुष्वेतान् प्रतिक्षिपेत् ॥ ३२ ॥
भवेयुस्तानि तान्येव तत्तद्गुणयुतानि च ।
तोरेषु घटखण्डानि तादृशानि विनिक्षिपेत् ॥ ३३ ॥
१. तन्त्र रूप से आज कल पुष्पों का सेन्ट एवं एसेन्स आदि का प्रयोग
होता है । प्राचीन काल में सुगन्धित बनाने की तन्त्ररूप प्रक्रिया का
आगे निरूपण है ।