पाकदर्पण (राजा नल प्रणीत - इन्द्रदेव त्रिपाठी माधुरी हिन्दी व्याख्या सहित)
Pakadarpana of Raja Nala with Madhuri Hindi Commentary
राजा नल (टीकाकार: पं. इन्द्रदेव त्रिपाठी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें९८ पाकदर्पणम्
कैटर्यकल्कयुक्तशाल्यन्ननिर्माणविधिर्गुणाश्च
कैटर्यकल्कमन्यस्मिन्नन्ने निक्षिप्य मेलयेत् ।
भर्जितं रामठं तैले निक्षिपेद्रामठादिकम् ॥ १६ ॥
कर्पूरादींश्च निक्षिप्य नेत्रेण परिवेष्टयेत् ।
स्तन्यप्रदं क्रिमिहरं श्लेष्मदोषहरं भवेत् ॥ १७ ॥
कैटर्य कल्क के साथ शाल्यन्न बनाने की विधि तथा गुण - दूसरे शाल्यन्न
पात्र में कैटर्य ( कायफल ) का कल्क छोड़ कर तेल में भूने हुए हींग को मिला
दे और कर्पूर आदि सुगन्धित द्रव्यों से सुवासित कर तथा पूगपट्ट नेत्र से वेष्टित
कर खाने को दे । यह स्तन्यवर्द्धक, क्रिमिनाशक तथा कफ-विकार को नाश
करने वाला है ॥ १६-१७ ॥
सर्षपकल्कयुक्तशाल्यन्ननिर्माणविधिर्गुणाश्च
सर्षपोद्भवकल्केन मिलदन्नं कुर्याद्बुधः ।
जम्बीराम्लं यथायोग्यं निक्षिपेद्रामठादिभिः ॥ १८ ॥
कृत्वा च वासनादींश्च बद्ध्वा नेत्रेण दापयेत् ।
हिंगुमुष्णकरं भक्तं तथा छर्दिहरं भवेत् ॥ १९ ॥
सरसों के कल्क के साथ शाल्यन्न बनाने की विधि तथा गुण - पाकक्रिया
को जानने वाला बुद्धिमान् पाचक सरसों के कल्क के साथ शाल्यन्न को बनावे और
उचित मात्रा में जम्बीरी नींबू का रस ( या सत्व ) एवं भूने हुए ( तैलभृष्ट ) हींग
जीरा आदि छोड़ दे । कर्पूर आदि सुगन्धित द्रव्यों से सुवासित कर तथा पूगपट्ट
नेत्र से वेष्टित कर खाने के लिये दे । यह हिंगुयुक्त अन्न उष्णकारक होता है
तथा वमन को दूर करता है ॥ १८-१९ ॥
एवमादीनि भक्तानि तत्तद्द्रव्यैश्च साधयेत् ।
बहूनामन्नभेदानां स्वं स्वं तत्तद्गुणं भवेत् ॥ २० ॥
पूर्वोक्त प्रकार से भिन्न-भिन्न द्रव्यों के साथ अनेक प्रकार के भातों को सिद्ध
करे । वे सब अपने-अपने द्रव्यों के गुण के अनुसार गुणकारक होते हैं।
दधियुक्तशाल्यन्ननिर्माणप्रकारोगुणाश्च
अपरे सूदराड्भक्ते निक्षिपेन्मधुरं दधि ।
सहकारकणांस्तत्र लशुनादींश्च निक्षिपेत ॥ २१ ॥
शीतोष्णकणांस्तत्र शुंठीचूर्णं च निक्षिपेत ।
निस्त्वगाद्रंककैटर्यधान्याकशकलान्यपि ॥ २२ ॥
नलविरचितम् ९९
एतत्सर्वं विनिक्षिप्य कुर्यात्तन्मेलनं बुधः ।
पुनश्च निक्षिपेत्तत्र चूर्णमेलासमुद्भवम् ॥ २३ ॥
बीजपूरदलं तत्र केतकी कुसुमं न्यसेत् ।
कर्पूरादींश्च निक्षिप्य वेष्टयित्वा प्रदापयेत् ॥ २४ ॥
इदं जाड्यहरं रुच्यं वह्निमान्द्यहरं भवेत् ॥ २५ ॥
दधिमिश्रित शाल्यन्न का प्रकार तथा गुण - श्रेष्ठ पाचक दूसरे भात में
मीठा दही छोड़ दे और उसमें आम के टुकड़े तथा लहसुन के टुकड़े छोड़ दे ।
पुनः शीतल मरिच, सोंठ का चूर्ण, छिलका रहित अदरक के टुकड़े, कैटर्य तथा
धनिया के टुकड़ों को भी छोड़ दे । इन सब द्रव्यों को छोड़ कर मिला दे । पुनः
उसमें बिजौरा नींबू का रस तथा केतकी के पुष्प को छोड़ दे । इसके बाद कर्पूर
आदि सुगन्धित द्रव्यों से सुवासित कर तथा पूगपट्ट नेत्र से आवेष्टित कर खाने के
लिये दे । यह जड़ता को दूर करने वाला रुचिकारक तथा मन्दाग्नि को दूर करने
वाला है ॥ २१-२५ ॥
उपसंहारः
स्वैरप्रभेदाकृतिरन्नरूपा धेनुर्धरित्र्यां प्रवदन्ति भूरि ।
पयांसि सम्यग्रसनान्नपाने सदा दुदोहार्थिषु सादरेण ॥ २६ ॥
इति नलकृतपाकदर्पणे घृतान्ननिरूपणं नाम सप्तमप्रकरणं समाप्तम् ॥ ७ ॥
घृतशाल्यन्न प्रकरण का उपसंहार - इस पृथ्वी पर अपनी इच्छा के अनुसार
निर्मित विभिन्न आकृति वाली बहुत से अन्नरूप धेनु को बताते हैं । उस धेनु के
दूध को चाहनेवालों के जिह्वा की तृप्ति के लिये अन्नपान को सदा आदर पूर्वक
दुहते हैं ।
इति नलकृत पाकदर्पण का डा० इन्द्रदेव त्रिपाठीकृत माधुरी हिन्दी व्याख्या-
सहित घृतान्ननिरूपण नामक सप्तम प्रकरण समाप्त ॥ ७ ॥
च पा.द.