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पाकदर्पण (राजा नल प्रणीत - इन्द्रदेव त्रिपाठी माधुरी हिन्दी व्याख्या सहित)

पाकदर्पण (राजा नल प्रणीत - इन्द्रदेव त्रिपाठी माधुरी हिन्दी व्याख्या सहित)

Pakadarpana of Raja Nala with Madhuri Hindi Commentary

राजा नल (टीकाकार: पं. इन्द्रदेव त्रिपाठी) द्वारा

DevanagariHindipublished69 पृष्ठ

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पृष्ठ 46

६८ पाकदर्पणम्
पूगपट्ट नेत्र से आवेष्टित कर खाने के लिये दे । यह वात को दूर करनेवाला पथ्य
तथा कफ-पित्त को दूर करता है ॥ ४७३-४७५ ॥
वटपत्रपाकनिर्माणविधिर्गुणाश्च
वटच्छदान् पचेदाम्ले दलैश्चिञ्चासमुद्भवैः ।
पूर्वं वै भेदनं पाकं सम्भारस्य च मेलनम् ॥ ४७६ ॥
कृत्वा च पूर्ववत् तत्र वासनादींस्तदाचरेत् ।
एतद् वटच्छदं पथ्यं व्रणजित् सर्वदोषजित् ॥ ४७७ ॥
कफपित्तहरं पथ्यं दीपनं पाचनं भवेत् ॥ ४७८ ॥
वटपत्र का शाक बनाने की विधि तथा गुण—वट के पत्तों को इमली के
पत्तों के अम्ल रस में पकावे । पहले काट ले तथा पका ले और सम्भार (नमक-
मसाला आदि) मिला दे। इसके बाद पूर्ववत् घी में भूनकर तथा कर्पूर आदि से
सुगन्धित कर पूगपट्ट नेत्र से आवेष्टित कर खाने को दे । यह वटपत्र का शाक
पथ्य है तथा व्रण एवं सभी दोषों को जीतने वाला है। इसके अतिरिक्त कफ-
पित्त को दूर करनेवाला, पथ्य जाठराग्नि दीपक तथा पाचक होता है ॥ ४७६-
४७८ ॥
सुकुण्डलीपत्रशाकनिर्माणविधिर्गुणाश्च
एवं सुकुण्डलीपत्रं मेघनाददलैः पचेत् ।
वृश्चिकस्य विषं हन्यात् कफदोषहरं भवेत् ॥ ४७९ ॥
सुकुण्डली पत्र का शाक बनाने की विधि तथा गुण—सुकुण्डली पत्र को
लेकर मेघनाद पत्र (चौराई पत्र) के साथ पकावे और पूर्ववत् घी में भूनकर कर्पूर
आदि से सुगन्धित तथा पूगपट्ट नेत्र से आवेष्टित कर खाने को दे । यह वृश्चिक
(बिच्छू) के विष को नाश करता है तथा कफविकार को दूर करता है ॥ ४६९॥
शाल्मलीकुसुमपर्णयोःपाकनिर्माणविधिर्गुणाश्च
शाल्मलीकुसुमं पर्णं समादाय च पाकवित् ।
जम्बूकल्केन सम्मिश्रं पचेत्तत्स्वादु जायते ॥ ४८० ॥
सम्भारादिप्रयोगं तु सर्वं पूर्ववदाचरेत् ।
सेमर के फूल तथा पत्तों का शाक बनाने की विधि तथ गुण—पाकज्ञ-
पाचक सेमर के पुष्प तथा पत्र को लेकर जामुन के कल्क में मिलाकर पकावे इससे
वह स्वादिष्ट हो जाता है । सम्भार ( नमक-मसाला ) आदि सभी प्रयोग पूर्ववत्
करे । अर्थात् पाक, घी में भूनना, सुवासित करना तथा पूगपट्ट नेत्र से आवेष्टित
करे ॥ ४८० ॥


नलविरचितम् ६९
इक्ष्वालिकाप्रशाकनिर्माणविधिर्गुणाश्च
इक्ष्वालिकाग्रमानीय तण्डुलीयशिखैः पचेत् ॥ ४८१ ॥
एवं पाके कृते तस्य मृदुत्वं स्वादु जायते ।
स्वादु वृष्यं हिमकरं श्रमजित् पित्तजिद्भवेत् ॥ ४८२ ॥
इक्ष्वालिकाग्र (कास का अग्रभाग) का शाक बनाने की विधि तथा गुण—
कास का अग्र भाग लेकर चौलाई की जड़ के साथ पकावे । इस प्रकार पाक करने
से वह मुलायम तथा स्वादिष्ट हो जाता है। यह स्वादिष्ट, वीर्यवर्द्धक, शीत-
कारक, थकावट एवं पित्त को जीतने वाला है ॥ ४८१-४८२ ॥
अक्षीवपल्लवशाकनिर्माणविधिर्गुणाश्च
अक्षीवपल्लवं शाकं पचेत्केतकिमस्तकैः ।
अथवा वंशमूलेन मधुरत्वं च मार्दवम् ।
इदं रुचिकरं पथ्यं श्लेष्मवातविनाशनम् ॥ ४८३ ॥
अक्षीव (महानिम्ब) पत्र का शाक बनाने की विधि तथा गुण—महा-
निम्ब (बकायन) के पत्तों को केतकी के मस्तक के साथ पकावे अथवा बाँस की
जड के साथ पकावे । इससे वह मधुर तथा मुलायम हो जाता है। यह रुचि-
कारक पथ्य तथा कफ एवं वात को नाश करता है ॥ ४८३ ॥
शिलाशाकनिर्माणविधिर्गुणाश्च
विषघ्नीं चूर्णिकालेपा शेफाली मदपीतका ।
एतासां मूलपत्राद्यैः पक्वा मृद्वीभवेच्छिला ॥ ४८४ ॥
शिला (नील दूर्वा) का शाक बानने की विधि तथा गुण—शिला (नील
दूर्वा) विषघ्नी (कटुकी) चूर्णिका, आलोपा, शेफाली (मेउड़ी) तथा मद-
पीतिका के मूल एवं पत्र के साथ पकाने पर मुलायम हो जाती है। इसका शाक
पूर्ववत् विधि के अनुसार बना कर प्रयोग करे ॥ ४८४ ॥
आकलीदलपाकनिर्माणविधिर्गुणाश्च
मुण्डिकापत्रपक्वञ्चेत् स्वादु स्यादाकलीदलम् ।
अत्रापि पाकवित् श्रेष्ठं सर्वं पूर्ववदाचरेत् ।
इदं लघु क्रिमिहरं मलस्रावि त्रिदोषजित् ॥ ४८५ ॥
आकली पत्र का शाक बनाने की विधि तथा गुण—आकली पत्र को लेकर
मुण्डी के पत्तों के साथ पकावे । इससे वह स्वादिष्ट हो जाता है। यहाँ पर भी
पाकवेत्ता पूर्वपाकविधि के अनुसार सब कुछ अच्छी तरह सम्भार आदि मिला