पाकदर्पण (राजा नल प्रणीत - इन्द्रदेव त्रिपाठी माधुरी हिन्दी व्याख्या सहित)
Pakadarpana of Raja Nala with Madhuri Hindi Commentary
राजा नल (टीकाकार: पं. इन्द्रदेव त्रिपाठी) द्वारा
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कुम्भीपत्रं च धान्यं च मातुलुङ्गदलं क्षिपेत् ।
केतकीकुसुमं तेषु सहकारफलं क्षिपेत् ॥ १८ ॥
नानाविधानि पुष्पाणि फलं निक्षिपेत्सल्लकीफलम् ।
तदीयं निक्षिपेत्पत्रं तद्योग्यं द्रव्यमादिशेत् ॥ १९ ॥
राजशाल्यन्न यूष बनाने की विधि तथा गुण—पूर्वोक्त प्रकार से शालि
चावल १ किलो को पीस कर तथा काञ्जी मिलाकर पाँच गुना जल में पका ले
तथा दही में मर्दन कर गाढ़े वस्त्र से छान ले और बहुत पात्रों में पूगपट्ट नेत्र
में रख कर उनमें पूर्वनिर्मित यूष सहित दधि शाल्यन्न को रक्खे । पुनः उचित
मात्रा में सेन्धा नमक का चूर्ण छोड़ दे । साथ ही मेथी, जीरा तथा इलायची
का चूर्ण छोड़ दे और अदरक तथा प्याज को काटकर छोड़ दे । कुम्भीपत्र (काय-
फल) धनियां तथा बिजौरा नींबू के फल का दल छोड़ दे । पुनः केतकी का
फूल तथा आम का फल छोड़ दे । अनेक प्रकार के पुष्पों तथा (सल्लकी) सल्लई
का फल छोड़ दे । पूर्वोक्त द्रव्यों का पत्र तथा यथायोग्य द्रव्यों को छोड़ दे ॥
पाकज्ञः क्रमशःस्तेषु सामुद्रफलमाहरेत् ।
केषांचिदाम्रशकलं तदीयं कुसुमं न्यसेत् ॥ २० ॥
मरीचिस्तबकं केषां जातीयं कुसुमं न्यसेत् ।
नारिंगकुसुमं केषु न्यसेद्विल्वफलानि च ॥ २१ ॥
कल्हारकुसुमं किन्तु सारङ्गस्य फलं क्षिपेत् ।
एलाफलस्य स्तवकं केषांचिद्धेमपुष्पकम् ॥ २२ ॥
एवमादीनि पुष्पाणि लवणस्य फलानि च ।
क्षिप्त्वा कुर्याच्च यूषस्य बहून् भेदान् विचक्षणः ॥ २३ ॥
क्षणमात्रं समालोक्य ततः पुष्पाणि संत्यजेत् ।
ततश्च पोटलीं कुर्यात् प्रयत्नेन ततः परम् ॥ २४ ॥
वेष्टयित्वा पुनः सूदः कुर्याच्छैत्यं च पूर्ववत् ।
मुक्तं च जीर्ण समया लघु वृष्यो बलप्रदः ॥ २५ ॥
पाक को जानने वाला पाचक क्रमशः उन पात्रस्थ पूगपट्ट नेत्रों में सामुद्र
फल छोड़ दे । कुछ पात्रों में आम के टुकड़े तथा उनके फूल छोड़ दे । कुछ
पात्रों में मरिच के गुच्छे तथा चमेली का फूल छोड़ दे । कुछ पात्रों में नारंगी
का फूल तथा बेल का फल छोड़ दे । कुछ पात्रों में कल्हार (कुई) का
फूल तथा सारंग (कमल) का फल छोड़ दे । कुछ पात्रों में इलायची का
गुच्छा तथा हेम पुष्प (नागकेशर) छोड़ दे । इसी प्रकार विभिन्न पुष्पों एवं
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समुद्र फल को छोड़ दे । इस प्रकार बुद्धिमान् पाचक पूर्वोक्त प्रकार से पुष्प एवं
फलों को मिला कर अनेक प्रकार के यूष बना ले । पुनः पुष्पों को कुछ देर
रहने के बाद निकाल कर फेंक दे । इसके बाद प्रयत्नपूर्वक पोटली बनावे और
उसको वेष्टित कर पूर्वोक्त प्रकार से ताल एवं खस आदि के पंखों से हवा कर
शीतल बना ले । यह भोजन के साथ खाने से अन्न को पचाता है और यह वीर्य-
वर्द्धक, सुपच तथा बलकारक होता है ॥ २०-२५ ॥
यूषपाकस्योपसंहारः
नानाविधद्रव्यफलप्रसूनैरुत्पादिताथैः खलु कल्पवृक्षः ।
श्रमान्वितानां श्रमन्नुत्सुसेव्यः सुपूजितः सर्वमनोभिरामः ॥ २६ ॥
सयूषभेदाः कथिता भोजनानन्ददाः शुभाः ।
घृताद्यंशप्रभेदाश्च कथ्यन्ते रुचिमर्दनाः ॥ २७ ॥
इति नलकृतपाकदर्पणे यूषपाकनाम षष्ठप्रकरणं समाप्तम् ॥ ६ ॥
**यूषपाक का उपसंहार—**यह अनेक प्रकार के द्रव्यों, फल एवं पुष्पों के द्वारा
निर्मित यूष कल्पवृक्ष की तरह श्रमिकों के श्रम (थकावट) को दूर करने वाला
अच्छी तरह सेवनयोग्य प्रशंसित एवं सभीके मन को प्रसन्न करनेवाला है । भोजन
के समय आनन्द देनेवाले यूष के अनेक भेद कहे गये । अब अरुचि को नष्ट करने
वाले अनेक प्रकार के घृतभेद को कहेंगे ॥ २६-२७ ॥
**नोट—**आजकल भी विविध प्रकार के सेन्ट भोजन में मिलाने की परम्परा है ।
प्राचीन काल में सेन्ट का प्रादुर्भाव न होने कारण पुष्प छोड़ने की परम्परा थी ।
इति नलकृत पाकदर्पण का डा० इन्द्रदेव त्रिपाठीकृत माधुरी हिन्दी व्याख्या
सहित यूषनिरूपण नामक षष्ठ प्रकरण समाप्त ॥ ६ ॥