पाकदर्पण (राजा नल प्रणीत - इन्द्रदेव त्रिपाठी माधुरी हिन्दी व्याख्या सहित)
Pakadarpana of Raja Nala with Madhuri Hindi Commentary
राजा नल (टीकाकार: पं. इन्द्रदेव त्रिपाठी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें८६ पाकदर्पणम्
कपित्थस्य फलं तेषां तद्रसञ्च विनिक्षिपेत् ।
जाजीप्रसूनं तत्रैव न्यसेद्विद्वान् सकोविदः ॥ २६ ॥
फलानि चैवमादीनि तदीयांश्च रसांस्तथा ।
फलपुष्पपानक बनाने की विधि तथा गुण-पुनः चार प्रकार के पाकों
को इन पात्रों में छोड़ दे और इन पाकों में फल तथा पुष्प का रस छोड़ दे ।
इसके बाद परिमाण को जानने वाला उनमें परिपक्व क्षीर (दूध) को दे। उसमें
कटहल का फल तथा रस और केतकी (केवड़ा) का फूल छोड़ दे। अन्य पात्रों
में गन्ना का रस तथा कमल का फूल छोड़ दे। इस प्रकार किसी पात्र में पाचक
आम के फल का रस छोड़ दे। उसके उग्र रस (चोप) को निकाल कर उसके
गूदे को छोड़ दे। कुछ पाक पात्रों में अंगूर का फल तथा उसका रस छोड़ दे
और उसमें सुगन्ध से युक्त कह्लार (सफेद कमल) का फूल छोड़ दे। पाकवेत्ता
किन्हीं पाकपात्रों में अनार का फल तथा रस और सुगन्ध से युक्त वल्लिका का फूल
एवं कस्तूरी आदि के साथ उसमें छोड़ दे। अन्य पाकपात्र में पाकशास्त्रवेत्ता कैथ
का फल तथा रस और अजाजी (जीरा) तथा अजवायन का फूल छोड़ दे।
पूर्वोक्त प्रकार से पूर्वोक्त पाक में फलों को तथा उनके रसों को छोड़ दे ॥२०-२६½॥
तत्तद्योनीनि पुष्पाणि पात्रेष्वान्वेषु निक्षिपेत् ।
निक्षिपेन्माक्षिकं सर्पिः केषाञ्चित्सुदवित्तमः ॥ २७ ॥
सुगन्धीनि विकासानि प्रसूनानि न्यसेत्क्रमात् ।
एतैरालोड्य तं पाकं तत्प्रसूनानि संत्यजेत् ॥ २८ ॥
ततश्च पोटलीं कृत्वा जलपूर्णघटेन च ।
अन्तराट्टालकं कृत्वा तच्च तेषु विनिक्षिपेत् ॥ २९ ॥
सिकतावेदिकायां च न्यसेत्तान् पनसाहतान् ।
तालपत्रैर्बुधः सम्यग्वीजयेच्च पुनः पुनः ॥ ३० ॥
यावच्छैत्यम्भवेत्तावत्तत्रैव तापयेद्बुधः ।
मुक्तिकाले समालोच्य भक्षयेद्वा प्रदापयेत् ॥ ३१ ॥
अयं पित्तहरो वृष्यः पथ्यः शैत्यकरो नृणाम् ।
जगतामाश्रयं ब्रह्म यथा भवति सर्वदा ॥ ३२ ॥
पुनः अपनी-अपनी जाति के पुष्पों को प्रथम पात्र में छोड़े और पाकशास्त्र-
वेत्ता कुछ पाकपात्रों में मधु तथा घी छोडे। पुनः क्रम से सुगन्धित तथा खिले
हुए पुष्पों को छोड़े। पूर्वोक्त द्रव्यों के साथ उस पाक को मिलाकर पूर्वोक्त पुष्पों
को फेंक दे। इसके बाद पोटली बनाकर जलपूर्ण घड़े के साथ घर के अन्दर
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करके उसको उन पात्रों में छोड़ दे और उन सबों को (पनस पाकपात्र को छोड़-
कर) बालुका के वेदी पर रक्खे। बुद्धिमान् पाचक बार-बार तालपत्र से अच्छी
तरह हवा करे। जब तक शीतल न हो जाय तब तक हवा देता रहे। इसके बाद
भोजन का समय आने पर स्वयं भक्षण करे तथा खाने के लिये दे। यह पित्त को
दूर करनेवाला, वीर्यवर्द्धक, पथ्य तथा मनुष्यों को शीतल करने वाला है, जैसे ब्रह्म
हमेशा संसार का आश्रय होता है।
उपसंहारः
रसालायास्तथा भक्ष्यभोज्यादीनामिहाश्रयाः ।
स्तुवन्ति सम्यक् सुधियस्ततः सर्वं सदा मुदा ॥ ३३ ॥
इति नलकृतपाकदर्पणे पायसप्रकारनिरूपणं नाम चतुर्थप्रकरणं समाप्तम् ।
उपसंहार-यहाँ पर रसाला तथा भक्ष्य-भोज्यादि का सेवन करने वाले
बुद्धिमान् लोग अच्छी तरह स्तुति करते हैं तथा हमेशा प्रसन्न रहते हैं।
इति नलकृत पाकदर्पण का डा० इन्द्रदेव त्रिपाठीकृत माधुरी हिन्दी व्याख्या
सहित पायसप्रकारनिरूपण नामक चतुर्थ प्रकरण समाप्त ॥४॥
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