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सर्वकोश
पाकदर्पण (राजा नल प्रणीत - इन्द्रदेव त्रिपाठी माधुरी हिन्दी व्याख्या सहित)

पाकदर्पण (राजा नल प्रणीत - इन्द्रदेव त्रिपाठी माधुरी हिन्दी व्याख्या सहित)

Pakadarpana of Raja Nala with Madhuri Hindi Commentary

राजा नल (टीकाकार: पं. इन्द्रदेव त्रिपाठी) द्वारा

DevanagariHindipublished69 पृष्ठ

पृष्ठ 63, कुल 69 में से

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पृष्ठ 63

अथ शैत्यजलनिर्माणप्रकरणम्
शैत्यजलनिर्माणप्रकारो गुणाश्च
नुदलाबुफले सूक्ष्मं यत्नेन च जलं शुभम् ।
आनीय गाङ्गमुरंसि शुभ्रवस्त्रेण शोधयेत् ॥ १ ॥
पूरयेच्च शुभे कुम्भे तप्तस्वर्णविनिर्मिते ।
कल्कमालोडयेत्तत्र कर्पूरादि प्रमाणवित् ॥ २ ॥
विस्तृते पूगपट्टे च तज्जलं वेष्टयेत्ततः ।
कारयेत्प्रांशुतरुभिः दोलां सम्यक्प्रमाणवित् ॥ ३ ॥
सिक्थं च स्थापयेत्तत्र शुभ्रद्रव्यंविनिर्मितम् ।
सूदस्तु निःक्षिपेत्तत्र पोटलीं जलपूरिते ॥ ४ ॥
एकं सूत्रं ततः कुर्यात् एकनिष्कप्रमाणकम् ।
रुचकस्य मुखं तस्य वेष्टयेदग्रभागतः ॥ ५ ॥
मूलदेशे पुनस्तस्य शकलान् सन्निवेशयेत् ।
स्रजश्च तत्र बघ्नीयाज्जातीचम्पकनिर्मिता ॥ ६ ॥
सूक्ष्मरन्ध्रं ततः कुर्यादधस्तस्याः प्रमाणवित् ।
सूत्रस्थितशलाकायाः कुर्यात्सरन्ध्रशृङ्खलम् ॥ ७ ॥
शनैः शनैर्जलं तत्र यथा स्रवति विन्यसेत् ।
विना वस्त्रेण तस्याधो हेमभाण्डं विनिक्षिपेत् ॥ ८ ॥
तस्मिन् पाटलिजात्यादि प्रसूननि न्यसेद्बुधः ।
हिमाम्बुनाऽऽर्द्रवस्त्रेण तन्मुखं वेष्टयेद्बुधः ॥ ९ ॥
जलं स्रवति निःशेषमुदरस्थे व्यवस्थिते ।
शीतल जल बनाने का प्रकार तथा गुण — नवीन कद्दू के फल में प्रयत्न-
पूर्वक सूक्ष्म, स्वच्छ गंगा जल को लेकर स्वच्छ वस्त्र से छान ले और चमकीले
स्वर्णनिर्मित घड़े में भर दे । पुनः प्रमाण को जानने वाला पाचक उसमें कर्पूर
आदि सुगन्धित द्रव्यों का कल्क छोड़ दे । उसके बाद उस जल को विस्तृत
पूगपट्ट में आवेष्टित कर दे और प्रांशुवृक्षों के साथ प्रमाण को जानने वाला
पाचक अच्छी तरह दोला (झूला) बनाये । वहीं पर अच्छे द्रव्यों से निर्मित
सिक्थ (मोतियों का गुच्छा) रखे । पुनः पाचक उस जलपूरित घड़े में
पोटली छोड़ दे । इसके बाद एक निष्क प्रमाण का एक सूत्र बनाये और उससे
नलविरचितम् १०३
घड़े के आगे के चारों तरफ के भाग को आवेष्टित कर दे । पुनः उसके नीचे
टुकड़ों को रख दे तथा उसमें चमेली आदि सुगन्धित पुष्पों की माला बाँध दे ।
प्रमाण को जानने वाला उसके नीचे छोटा-छोटा छिद्र बना दे । सूत्र में स्थित
शलाका से अच्छे छिद्रों की शृङ्खला बना दे । उसमें जैसे धीरे-धीरे जल गिरे वैसे
रक्खे और उसके नीचे बिना वस्त्र का सोने का पात्र रख ले और उस में पाटिल,
चमेली आदि का फूल रख दे । पुनः ठण्डा जल से भीगे हुए वस्त्र से उसके मुख
को आवेष्टित कर दे । सुव्यवस्थित उसके अन्दर पूरा जल स्रवित हो जाता है ।
घटान्तरं न्यसेत्सूदो बालुकावेदिकां ततः ॥ १० ॥
स्रग्भिः समन्ततो युक्तां दक्षिणाानलसंयुताम् ।
तालवृन्तानिलैः सम्यक् शैत्यं कुर्याच्च तज्जलम् ॥ ११ ॥
अन्यस्मिन् पूगपट्टे च नानापुष्पैश्च वासिते ।
पूरयित्वा तु तत्तोयं प्रसूनानि च संत्यजेत् ॥ १२ ॥
न्यसेत् पोटलीं कृत्वा पात्रे सुजलपूरिते ।
तालवृन्तानिलैः सम्यक् कुर्याच्छैत्यतमं सुधीः ॥ १३ ॥
पानीयमीदृशं ग्रीष्मे कर्त्तव्यं मनुजेश्वर ! ।
पीपासां शमयेत्सम्यक् पिपासूनां श्रमं हरेत् ॥ १४ ॥
विधूमं जरयत्याशु भक्ष्यादीनां तथैव च।
पुनः पाचक दूसरा घड़ा लाये और उसको बालू की वेदी पर रक्खे । तदनन्तर
उसको दक्षिणी हवा के सम्मुख कर चारो तरफ से मालाएँ लगा दे और ताल
पंखा की हवा से इस जल को अच्छी तरह शीतल करे । अनेक पुष्पों से सुवा-
सित दूसरे पूगपट्ट में उस जल को भर कर फूलों को फेंक दे । पुष्प की पोटली
बनाकर स्वच्छ जल में रक्खे और बुद्धिमान् पाचक ताल पंखा की हवा से
शीतल बना ले । हे राजन् ! इस प्रकार का शीतल जल ग्रीष्म-ऋतु में बनावे ।
यह जल प्यासे व्यक्तियों की प्यास तथा थकावट को दूर करता है और भोजन
आदि के बिना पचे अन्न को पचाता है ॥ १०-१४ ॥
राज्ञः ऊषरजलस्वादुकरणविषयकः प्रश्नः
ऊषरक्षेत्रजातानां जलानां स्वादुवर्जितम् ॥ १५ ॥
स्वादुत्वं कथमापन्नमस्माकं वद बाहुक ! ।
राजा के ऊषर क्षेत्र के जल को स्वादिष्ट बनाने के सम्बन्ध में प्रश्न — हे
बाहुक ! मधुरता से रहित ऊषर स्थान पर उत्पन्न हम लोगों का जल कैसे स्वादिष्ट
हो जाता है इस को बतावें ॥ १५ ॥