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सर्वकोश
पाकदर्पण (राजा नल प्रणीत - इन्द्रदेव त्रिपाठी माधुरी हिन्दी व्याख्या सहित)

पाकदर्पण (राजा नल प्रणीत - इन्द्रदेव त्रिपाठी माधुरी हिन्दी व्याख्या सहित)

Pakadarpana of Raja Nala with Madhuri Hindi Commentary

राजा नल (टीकाकार: पं. इन्द्रदेव त्रिपाठी) द्वारा

DevanagariHindipublished69 पृष्ठ

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६६ पाकदर्पणम्
इसके बाद टुकड़ा-टुकड़ा बनाकर कर्पूर से सुगन्धित बना ले और पूगपट से बाँध
कर खाने के लिये प्रदान करे। यह रसायन, रुचिकारक, बलदायक तथा धातुओं
को बढ़ाने वाला है ॥ ४५७-४६१ ॥
अमृतापत्रशाकनिर्माणविधिर्गुणाश्च
ततोऽमृतालतोत्पन्नं पर्णमानीय शोभनम् ।
तत्तिक्तोमोचनं कुर्यान्निशाचूर्णेन यत्नतः ॥ ४६२ ॥
शंखचूर्णेन वा कुर्यात् क्रमुकस्य फलेन वा ।
तरुदुग्धेन वा कुर्यात्तद्दलैस्तण्डुलेन वा ॥ ४६३ ॥
अनेनैव प्रकारेण त्यक्ततिक्तञ्च तद्दलम् ।
प्रक्षिपन् तद्दलेर्माषं मरीचाजाजिसैन्धवम् ॥ ४६४ ॥
घृतेन भर्जयेत्तस्मात् तेन त्वमृतभर्जितम् ।
रुच्यं बल्यं त्रिदोषघ्नं दीपनं धातुवर्धनम् ॥ ४६५ ॥
गुडूची के पत्तों का शाक बनाने की विधि तथा गुण—अमृता (गुडूची)
लता के सुन्दर पत्तों को लेकर हल्दी के चूर्ण के साथ इसकी तिक्तता को दूर करे
या शङ्ख के चूर्ण क्रमुक (सुपारी) का फल, बरगद का दूध या बरगद का
पत्ता अथवा चावल के साथ उसकी तिक्तता को दूर करे। इसी प्रकार तिक्तता
रहित उन पत्तों को बटलोही में छोड़कर उनके साथ उड़द, मरिच, जीरा तथा
सेन्धा नमक के चूर्ण को मिला दे और घी के साथ भून ले। यह घी के साथ
भूनने पर अमृत के साथ भूनने की तरह हो जाता है। यह रुचिकारक, बल-
दायक, त्रिदोषनाशक, जाठराग्निदीपक तथा धातुवर्द्धक होता है ॥ ४६२-४६५ ॥
निम्बपत्रशाकनिर्माणविधिर्गुणाश्च
पत्रं निम्बस्य तरुणं समादेयमनामयम् ।
पचेत्पौननँवैः पत्रैर्मत्स्याक्ष्याश्च फलैस्तथा ॥ ४६६ ॥
तद्गतं मोचयेत्तिक्तं कार्पासस्य दलेन वा ।
ततः सम्भारसंयुक्तं तस्मिन् मधुरता भवेत् ॥ ४६७ ॥
वासयेद् घनशारेण पूगनेत्रेण वेष्टयेत् ।
त्रिदोषशमनं पथ्यं सर्वव्याधिहरं शुभम् ॥ ४६८ ॥
नीम के पत्तों का शाक बनाने की विधि तथा गुण—निरोग स्वच्छ एवं
तरुण नीम के पत्तों को लेकर पुनर्नवा के पत्तों के साथ या मत्स्याक्षि (मकोय)
के फलों के साथ पकावे अथवा कपास के पत्तों के साथ पकाकर उसकी तिताई
को दूर करे । इसके बाद उसमें सम्भार नमक मसाला आदि मिला दे । इससे


नलविरचितम् ६७
उसमें मिठास आ जाती है। तदनन्तर कर्पूर से सुगन्धित बना दे तथा पूगपट्ट नेत्र
से आवेष्टित कर दे । यह खाने से त्रिदोष को शान्त करता है, पथ्य है तथा अच्छी
तरह सभी रोगों को दूर करता है ॥ ४६६-४६८ ॥
अर्कपत्रस्य शाकनिर्माणविधिर्गुणाश्च
अर्कस्य तरुणमानीय दलमात्रन्तु सूदराट् ।
आर्द्रतालगदलैस्तिक्तं तद्गतं परिमोचयेत् ॥ ४६९ ॥
कलिकन्या तद्दलं सूक्ष्मं च्छित्त्वा तत्प्रवणीं नयेत् ।
लवणादीन् विनिक्षिप्य सर्पिषा भर्जयेच्च तत् ॥ ४७० ॥
वासयेत् घनशारेण वेष्टयेत् क्रमुकस्य च ।
तप्ते सर्पिषि निक्षिप्य दापयेत्तद्दलं बुधः ॥ ४७१ ॥
विपाकसमये तत्तु समीरणहरं भवेत् ॥ ४७२ ॥
अर्क (मदार विशेष) के पत्तों का शाक बनाने की विधि तथा गुण—उत्तम
पाचक मदार के तरुण पत्तों को लेकर गीले ताड़ के पत्तों के साथ पकावे और
उसके अन्दर की तिक्तता को दूर करे। इसके बाद उसके पत्तों को चाकू से
छोटे-छोटे टुकड़े बना ले। बटलोही में छोड़ के पुनः उसमें नमक मसाला छोड़कर
घी में भून ले और कर्पूर से सुगन्धित करे तथा पूगपट्ट नेत्र से आवेष्टित कर ले ।
तदनन्तर गरम घी में छोड़कर खाने के लिये दे। यह विपाक के समय में वात
नाशक होता है ॥ ४६९-४७२ ॥
पाटलीपर्णशाकनिर्माणविधिर्गुणाश्च
पाटलीपर्णमादाय तरुणं व्रणवर्जितम् ।
संच्छित्त्वा सूक्ष्मकलिकन्या प्रविण्यां प्रक्षिपेत्ततः ॥ ४७३ ॥
चिञ्चालवणिकापत्रं निक्षिप्य विपचेच्च तत् ।
तत्र विद्वान् प्रकुर्वीत सर्वसम्भारमेलनम् ॥ ४७४ ॥
स्नेहश्रेष्ठं च तत्कुर्यात् वासनादींश्च पूर्ववत् ।
समीरहरणं पथ्यं कफपित्तहरं भवेत् ॥ ४७५ ॥
पाटली (पाढ़ल) पत्र का शाक बनाने की विधि तथा गुण—क्रिमिदंश
आदि से रहित; निरोग तथा तरुण पाटली (पाढ़ल) के पत्तों को लेकर तथा छोटी
चाकू से काटकर बटलोही में रक्खे। इसके बाद इमली तथा लवणिका (लोना)
का पत्र छोड़कर उसको पकावे। तदन्तर विद्वान् पाचक सम्भार (नमक मसाला
आदि) को मिला दे और घी में भून ले। इसके बाद कर्पूर से सुगन्धित कर तथा
७ पा. द.