पाकदर्पण (राजा नल प्रणीत - इन्द्रदेव त्रिपाठी माधुरी हिन्दी व्याख्या सहित)
Pakadarpana of Raja Nala with Madhuri Hindi Commentary
राजा नल (टीकाकार: पं. इन्द्रदेव त्रिपाठी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४२ पाकदर्पणम्
और दूध में पका ले। इन सभी द्रव्यों के दुगुना शक्कर तथा उसके आधा दूध
की खोया छोड़ दे। तदनन्तर जाती (चमेली) चम्पा तथा सफेद कमल का पुष्प
छोड़ दे। पुनः मुर्गी के छिलका रहित अण्डा को लाल वर्ण होने तक पकाकर
छोड़ दे और कर्पूर का कल्क तथा इलायची का चूर्ण मिला दे। थोड़ी देर
पूर्वोक्त पुष्पों को रखने के बाद निकाल कर फेंक दे। पूर्वोक्त सभी चीजों को
एक दूसरे पात्र में रखकर मांस के कल्क के साथ कर्पूर से सुवासित कर मूँग का
कल्क बनाकर सीप की तरह बनाये। उसको सुन्दर बनाने के लिये दो तीन प्रकार
के आकार का बना ले। इसी प्रकार अलग-अलग बहुत प्रकार के भक्ष्य पदार्थ बना
कर पूगपट्ट नेत्र में रखकर पकावे। इसीप्रकार तैयार होने के बाद बुद्धिमान् पाचक
खाने के लिये दे। यह रुचिकारक, पथ्य, बलवर्द्धक, वीर्यवर्द्धक तथा त्रिदोषनाशक
होता है। इस प्रकार बुद्धिमान् पाचक अनेक वस्तुओं से अनेक प्रकार के भक्ष्य
पदार्थों को बनावे ॥ ९-१८ ॥
भक्ष्यपदार्थोपसंहारः
भक्ष्यजालमिदमर्पितं प्रियं सेव्यतां सुकृतिभिः परं मुदा ।
पाकसारसरसं सदा समं कान्तिदीपनकरं बलप्रदम् ॥ १९ ॥
इति नलकृत पाकदर्पणे भक्ष्यवर्णनं नाम तृतीयं प्रकरणं समाप्तम् ॥
भक्ष्य पदार्थ विषयक उपसंहार—इस प्रकार प्रिय भक्ष्य पदार्थों के समूहों
को मैंने बताया। इसको प्रसन्नता के साथ पुण्यवान व्यक्ति सेवन करें। यह सरस-
पाक सरस, सदा शान्ति देनेवाला, कान्तिवर्द्धक तथा बलकारक होता है॥ १९॥
इति नलकृत पाकदर्पण का डा० इन्द्रदेव त्रिपाठीकृत माधुरी हिन्दी व्याख्या
सहित भक्ष्यवर्णन नामक तृतीय प्रकरण समाप्त ॥ ३ ॥
अथ पायसप्रकारनिरूपणम्
विचित्रलशुनपायसनिर्माणविधिर्गुणाश्च
अथ भेदान् प्रवक्ष्यामि पायसस्य विचित्रकान् ।
त्वचं लशुनभागानां समुत्सृज्य प्रयत्नतः ॥ १ ॥
अग्रतो मूलतः किञ्चित् छित्त्वा छेदान् समुत्सृजेत् ।
विरूढार्थं स्रजन्तेषां कुर्यात्सूच्यार्धतन्तुभिः ॥ २ ॥
पायसं यावता सिद्धं तावदेव परिग्रहेत् ।
यावता स्यात्क्रियाशुद्धिः तावदेव प्रयोजयेत् ॥ ३ ॥
भागान् लशुनकन्दस्य छिन्त्यात्सूक्ष्मंश्चतुर्विधम् ।
तेषां विरूढगर्भस्थं समादाय समुत्सृजेत् ॥ ४ ॥
तानेव पोटलीं विद्वान् कुर्याद्वै सूक्ष्मवाससा ।
काञ्जिकामिश्रिते पाके यावत्तण्डुलसम्भवे ॥ ५ ॥
कृत्वा स्थानं पचेत्सम्यग्गन्धकटुमोचनात् ।
पक्वं लशुनमादाय सघृतं मांसमुत्सृजेत् ॥ ६ ॥
क्षालयेद्वारिणा सम्यक् पचेत् क्षीरेण पाकवित् ।
चतुःकृत्वः पञ्चकृत्वः क्षालयेद्वारिणा पुनः ॥ ७ ॥
विचित्र लशुन पायस बनाने की विधि तथा गुण—भक्ष्यप्रकार बनाने के
बाद पायस (खीर) के विचित्र प्रकारों को बताता हूँ। लहसुन को लेकर
प्रयत्नपूर्वक उसकी त्वचा को निकाल कर फेंक दे और थोड़ा अग्रभाग तथा
मूलभाग को भी काटकर फेंक दे। उसको एकत्र रहने के लिये सूई-तागा से
माला की तरह पिरो ले। जितनी मात्रा में पायस बनाना हो उतनी ही मात्रा में
ग्रहण करे और जितने से कार्य की सिद्धि हो जाय उतना ही प्रयोग में ले।
पाचक लहसुन के कन्द को चार भाग में काटे। उसके अन्दर स्थित कंडी (डंठल)
निकाल कर फेंक दे। इसके बाद उनको महीन वस्त्र से पोटली में बाँध ले और
काञ्जीमिश्रित पाक में चावल पकने तक पोटली तथा लहसुन की माला को किसी
स्थान पर राख कर जब तक उसका कटु गन्ध दूर न हो जाय तब तक पकावे।
इसके बाद पके लहसुन को लेकर घृत युक्त मांस को छोड़ दे तथा जल से
प्रक्षालन कर दे और पाक को जानने वाला दूध के साथ अच्छी तरह पकावे।
चार बार या पाँच बार जल से प्रक्षालन करें ॥ १-७ ॥
८ पा.द.