पाकदर्पण (राजा नल प्रणीत - इन्द्रदेव त्रिपाठी माधुरी हिन्दी व्याख्या सहित)
Pakadarpana of Raja Nala with Madhuri Hindi Commentary
राजा नल (टीकाकार: पं. इन्द्रदेव त्रिपाठी) द्वारा
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८४ \hspace{4cm} पाकदर्पणम्
भाण्डद्वये च लशुनं निक्षिपेत्तादृशं ततः ।
एकस्मिन्निक्षिपेद्भाण्डे सहो लशुन साभिधा ॥ ८ ॥
अन्यस्मिन् विन्यसेद्भाण्डे सहः सरलिकास्ततः ।
शृतमर्धविशिष्टं च क्षीरं विश्रावयेद् बुधः ॥ ९ ॥
यथार्हं शर्करार्युक्तं क्षीरं भाण्डद्वये क्षिपेत् ।
निक्षिप्य पायसेऽन्यस्मिन् रम्भाफलमनुत्तमम् ॥ १० ॥
पनसस्य फलं रम्यमपरे पायसे न्यसेत् ।
कल्कं च घनसार्रादि निक्षिपेदुभयत्र हि ॥ ११ ॥
निक्षिपेत्तत्र जात्यादि कुसुममभ्युमयं हि ।
पायसं लघुवातघ्नं रम्यं व्याधिहरं शुभम् ॥ १२ ॥
पूर्वोक्त प्रकार से पकाये हुए लहसुन को दो पात्रों में रक्खे। एक पात्र में लहसुन
को मसाला आदि के साथ छोड़ दे और दूसरे पात्र में सरलिका के साथ रक्खे ।
इसके बाद आधा पकाया हुआ दूध छान ले और उसमें उचित मात्रा में शक्कर
मिलाकर दोनों पात्रों में छोड़ दे। एक पायस पात्र में उत्तम केला का फल छोड़-
कर दूसरे पायस पात्र में सुन्दर कटहल का फल छोड़ दे । घनसार कर्पूर आदि
का कल्क दोनों में ही छोड़ दे । पुनः उसमें चमेली आदि का फूल दोनों में
छोड़ दे इसके बाद पुष्पों को निकालक रख ले और खाने के समय दे। यह लशुन
पायस हल्का होता है और यह वातनाशक, रम्य तथा अच्छी तरह व्याधिनाशक
होता है ॥ ८-१२ ॥
गोधूमपायसनिर्माणविधिर्गुणाश्च
नवगोधूममानीय सम्मुत्सार्य सम्मृत्कणान् ।
ईषज्जलेन संक्लन्नमपहन्न्यादुलूखले ॥ १३ ॥
मोचयेत्तत्तुषं सम्यक् कुर्यादेवं द्विधाद्विधा ।
अवहन्याच्च तक्रेण श्लिष्टं यावद् भवेत्पुनः ॥ १४ ॥
दशविंशतिकृत्वस्तान् अवहन्याच्च सर्पिषा ।
संस्पृश्य केनचित् सम्यक् कुर्यात्तत्तुषमोचनम् ॥ १५ ॥
त्रिभाग माहिषं क्षीरं क्षीरभाण्डे प्रसिद्ध्ययेत् ।
एकेन जलभागेन सह मृद्वग्निना पचेत् ॥ १६ ॥
जलनिर्गमनं यावत् तावत्तावद् प्रसाधयेत् ।
तेषां पयस्तथा सिञ्चेत् समभाण्डेऽष्टभागिकम् ॥ १७॥
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नलविरचितम् \hspace{4cm} ८५
एकभागं च गोधूमं तादृशं तत्र निक्षिपेत् ।
यथा च धूमसंस्पर्शो न भवेत्तं तथा पचेत् ॥ १८ ॥
दर्याविघट्टयन् शोध्या तथा भाण्डे स्थितं यदि ।
विभज्यैवं चतुर्थागं पानं पात्रेषु निक्षिपेत् ॥ १९ ॥
गेहूँका पायस बनाने की विधि तथा गुण— नवीन गेहूँ को लेकर उसके सूखे
पके एवं जीर्ण-शीर्ण गेहूँ के कणों को निकाल कर थोड़े जल से गीला कर ओखली
में कूटे । उसकी त्वचा अच्छी तरह निकाल कर फेंक दे और इसी प्रकार दो-दो
वार करे । इसके बाद तक्र के साथ तब तक कूटे जब तक वह एक लट ( मिला
हुआ ) हो जाय । पुनः घी के साथ दश-बीस बार कूटे। किसी चीज से पकड़
कर इसकी भूसी को अच्छी तरह निकाल दे । भैंस का दूध तीन भाग दूध के
पात्र में रक्खे और उसमें एक भाग जल छोड़कर मन्दाग्नि से पकावे । उसको
तब तक पकावे जब तक उसका जल न जल जाय । उस दूध को एक उसी के
समान पात्र में आठ भाग छोडे और एक भाग पूर्वोक्त प्रकार से सिद्ध किया,
हुआ गोधूम ( गेहूँ ) का कल्क छोड़ दे । पुनः उसको ऐसा पकावे जैसा कि धूम
से स्पर्श ( जलना ) न हो जाय । यदि वह क्षीर पात्र लग जाय तो कलछुल से
चला कर शोधन कर ले । इस प्रकार इसको पाचक चार पात्रों में रक्खे और
इसी प्रकार पूगपट्ट के बहुत से नेत्रों में रक्खे । उन पात्रों को बार-बार अनेक
सुगन्धित द्रव्यों से सुगन्धित कर ले तथा कर्पूर आदि से धूपित पात्र में उचित
प्रमाण में मात्रा को जानने वाला पाचक रक्खे ॥ १३-१९ ॥
फलपुष्पपानकनिर्माणविधिर्गुणाश्च
चतुर्विधं तथा पाकं पात्रेष्वेतेषु निक्षिपेत् ।
निक्षिपेत् तेषु पाकेषु फलपुष्परसं ततः ॥ २० ॥
तेषां च निक्षिपेत् क्षीरं सुपक्वं तत्प्रमाणवित् ।
फलञ्च पनस फलञ्च पनस तत् तद्रसं केतकीदलम् ॥ २१ ॥
अन्येषामिक्षुदण्डं च तद्रसं कमलं क्षिपेत् ।
तेषां च सहकारस्य फलं सूदस्त्व निक्षिपेत् ॥ २२ ॥
तदोग्रं रसमासिच्य तदीयं कुसुमं न्यसेत् ।
द्राक्षाफलं च केषाञ्चित् निक्षिपेत्तद्रसं बुधः ॥ २३ ॥
कल्हार कुसुमं तत्र सुगन्धेन समन्वितम् ।
दाडिमस्य फलं केषान्तद्रसञ्च विनिक्षिपेत् ॥ २४ ॥
वल्लिकाकुसुमं तत्र सुगन्धेन समन्वितम् ।
कस्तूर्यादिसमं युक्त न्यसेत्तत्रैव पाकवित् ॥ २५ ॥