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न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda

विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा

DevanagariHindipublished350 पृष्ठ

४० न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ प्रत्यक्ष-
रूपानुमानं बोध्यम्। न च घटादौ द्रुतसुवर्णादिभिन्ने तेजसि च द्रव-
त्ववत्त्वमव्याप्तमिति वाच्यम्। द्रवत्ववद्वृत्तिद्रव्यत्वव्याप्यजाति-
मत्वस्य विवक्षितत्वात् । घृतजतुप्रभृतिषु पृथिवीषु जलेषु
द्रुतसुवर्णादौ तेजसि च द्रवत्वसत्त्वात्, तत्र च पृथिवीत्वादिसत्त्वा-
त्तदादाय सर्वत्र लक्षणसमन्वयः। न च प्रत्यक्षविषयत्वं परमाण्वा-
दावव्याप्तम्, अतिव्याप्तं च रूपादाविति वाच्यम्। चाक्षुषप्रत्यक्ष-
विषयवृत्तिद्रव्यत्वव्याप्यजातिमत्त्वस्य विवक्षितत्वात्। आत्मन्य-
तिव्याप्तिवारणाय चाक्षुषेति।
भाषा-पृथिवी जल अग्नि इन तीनोंका रूपवत्ता द्रवत्ववत्ता प्रत्यक्ष विषयता
समान धर्म्म है. शंका-नेत्र घ्राणादि इन्द्रियोंके तथा भर्जन कपालस्थ रेतेमें होने
वाले अग्निके तथा तैजस भाफके रूपवाले होनेमें क्या प्रमाण है ? समाधान-
इन सबको पक्ष बनाकर तेजस्त्वादिरूप हेतुओंसे रूपवत्त्वका अनुमान होसकता है; यथा
"नेत्रेन्द्रियं रूपवत् तेजस्त्वात्" इत्यादि. ऐसे वायुवेगसे देशान्तरसे आयेहुए पृथिवी
जल तथा अग्निके भागोंमेंभी "पृथिवीत्वात्" इत्यादि हेतुओंसे रूपका अनुमान
होसकता है. शंका-घटादिरूप पृथिवीमें तथा द्रुत सुवर्णादिसे भिन्न तेजमें द्रवत्वव-
त्त्वके न होनेसे अव्याप्ति होगी. समा०-वहांभी द्रवत्ववद्वृत्ति जो द्रव्यत्वकी
व्याप्य 'पृथिवीत्वादि' जाति तादृश जातिमत्त्व अपेक्षित होनेसे दोष नहीं है.
घृतलाक्षादि रूप पृथिवीमें जलमें तथा द्रुत सुवर्णादिरूप तेजमें द्रवत्वके विद्यमान
होनेसे तथा इनमें पृथिवीत्वादि रूपजातिके होनेसे सर्वत्र पूर्वोक्त जातिघटित लक्षण
समन्वय होसकता है. शंका-पूर्वोक्त प्रत्यक्ष विषयतारूप समानधर्म्म पृथिवी
आदिके परमाणुओंमें अव्याप्त है तथा रूपादिकोंमें अतिव्याप्त है. समाधान-
चाक्षुष प्रत्यक्षके विषयमें रहनेवाली जो द्रव्यत्वकी व्याप्य 'पृथिवीत्वादि' जाति
तादृशजातिमत्त्वके वहांभी अपेक्षित होनेसे दोष नहीं है. आत्मामें अतिव्याप्तिके
वारणार्थ 'चाक्षुष' पदका निवेश है.
गुरुणी द्वे रसवती-
भाषा-बोझेवाले अर्थात् भारी तथा रसवाले दो पदार्थ हैं.
गुरुणी इति। गुरुत्ववत्त्वं च पृथिवीजलयोरित्यर्थः। न च घ्राणेन्द्रि-

परिच्छेदः १ ] भाषाटीकासमेता. ४१
यादीनां वाय्वानीतपार्थिवादिभागानां च रसादिमत्त्वे किंमानमि-
तिवाच्यम् । तत्रापि पृथिवीत्वादिना तदनुमानात् ।
भाषा--गुरुत्ववत्ता तथा रसवत्ता पृथिवीजलका समान धर्म है. शंका-घ्राणादि
इन्द्रियोंके तथा वायुआनीत पार्थिवादि भागोंके रसवाले होनेमें क्या प्रमाण है?
समाधान-वहांभी "पृथिवीत्वात्" इत्यादि हेतुओंसे रसका अनुमान हो सक्ताहै.

  • द्वयोर्नैमित्तिको द्रवः ॥ २८ ॥
    द्वयोरिति पृथिवीतेजसोरित्यर्थः ।
    भाषा-पृथिवी, तेज, इन दोनोंका नैमित्तिक द्रवणरूप समान धर्म है ॥ २८ ॥
    न च नैमित्तिकद्रवत्ववत्त्वं घटादौ वह्न्यादौ चाव्याप्तमिति वाच्य-
    म् । नैमित्तिकद्रवत्वसमानाधिकरणद्रव्यत्वव्याप्यजातिमत्त्वस्य
    विवक्षितत्वात् ॥ २८ ॥
    शंका-नैमित्तिक द्रवत्ववत्ता घटादि पृथिवीमें तथा वह्निरूप तेजमें अव्याप्त है.
    समा०-वहांभी नैमित्तिक द्रवत्वके समानाधिकरणमें वर्तनेवाली जो द्रव्यत्वकी
    व्याप्य ( पृथिवीत्वादि ) जातिः तादृश जातिमत्त्व अपेक्षित होनेसे दोष नहीं है॥२८॥
    आत्मानो भूतवर्गाश्च विशेषगुणयोगिनः ॥
    यदुक्तं यस्य साधर्म्यं वैधर्म्यमितरस्य तत् ॥ २९ ॥
    भाषा-जीवात्मा तथा पञ्चभूत विशेष गुणोंवाले हैं. हमने जो जिसका समान
    धर्म कहा वह इतरका विरुद्ध धर्म जानना चाहिये ॥ २९ ॥
    आत्मान इति । पृथिव्यप्तेजोवाय्वाकाशात्मनां विशेषगुणवत्त्व
    मित्यर्थः ॥ यदुक्तमिति । ज्ञेयत्वादिकं विहायेति बोध्यम्। तत्तु न
    कस्यापि वैधर्म्यं केवलान्वयित्वात् ॥ २९ ॥
    भाषा-ज्ञेयत्व प्रमेयत्व वाच्यत्व अभिधेयत्व इन चारों धर्मोंको छोड़कर जो
    जिसका समान धर्म कहा वह दूसरेका विपरीत धर्म है और ज्ञेयत्वादि धर्म तो
    केवलान्वयी हैं. याते किसी पदार्थकेभी विरुद्ध धर्म नहीं हैं ॥ २९ ॥
    स्पर्शादयोऽष्टौ वेगाख्यसंस्कारो मरुतो गुणाः ॥
    अष्टौ स्पर्शादयो रूपं द्रवो वेगश्च तेजसि ॥ ३० ॥

४२ न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ प्रत्यक्ष-
भाषा-स्पर्शादि आठ तथा वेगाख्य संस्कार ये नव वायुके गुण हैं. स्पर्शादि
आठ रूप द्रव और वेग ये एकादश तेजके गुण हैं ॥ ३० ॥
स्पर्शादयोऽष्टौ वेगश्च गुरुत्वं च द्रवत्वकम् ॥
रूपं रसस्तथा स्नेहो वारिण्येते चतुर्दश ॥ ३१ ॥
भाषा-स्पर्शादि आठ वेग गुरुत्व द्रवत्व रूप रस तथा स्नेह ये चतुर्दश जलके
गुण हैं ॥ ३१ ॥
स्नेहहीना गन्धयुताः क्षितावेते चतुर्दश ॥
बुद्ध्यादिषट्कं संख्यादि पञ्चकं भावना तथा ॥३२॥
धर्म्मा धर्म्मौ गुणा एते आत्मनः स्युश्चतुर्दश ॥
संख्यादि पञ्चकं कालदिशोः शब्दश्च ते च खे ॥३३॥
तेच संख्यादयः पञ्च खे आकाशे ।
जलके गुणोंमेंसे 'स्नेह' को निकाल गन्धको डालकर गिने तो वेही १४ पृथिवीके
गुण हैं. बुद्ध्यादि छः, तथा संख्यादि पञ्च, भावनाख्य संस्कार, तथा धर्म्माधर्म्म ये
१४ गुण जीवात्माके हैं. संख्यादि पञ्च कालके तथा दिशाके गुण हैं। संख्यादि
पञ्च तथा शब्द ये छः आकाशके गुण हैं ॥ ३२ ॥ ३३ ॥
संख्यादयः पञ्च बुद्धिरिच्छायतोऽपि चेश्वरे ॥
परत्वापरत्वे संख्याद्याः पञ्च वेगश्च मानसे ॥३४॥
भाषा-संख्यादि पञ्च बुद्धि इच्छा यत्न ये आठ ईश्वरके गुण हैं. परत्व अपरत्व
संख्यादि पञ्च तथा वेग ये आठ मनके गुण हैं ॥ ३४ ॥
साधर्म्यवैधर्म्ये निरूप्य संप्रति प्रत्येकं पृथिव्यादिकं निरूपयति,
तत्र क्षितिरित्यादिना-
भाषा-समान धर्म विपरीत धर्मोंके निरूपणानन्तर ' तत्र क्षितिः ' इत्यादि
ग्रन्थसे मूलकार प्रत्येक पृथिवी आदिका निरूपण करता है--
तत्र क्षितिर्गन्धहेतुः-
गन्धहेतुरिति । गन्धसमवायिकारणमित्यर्थः ।
भाषा--उन नवद्रव्योंके मध्यमें गन्धसमवायिकारणका नाम पृथिवी है,
यद्यपि गन्धवत्त्वमात्रं लक्षणमुचितं तथापि पृथिवीत्वजातौ
प्रमाणोपन्यासाय कारणत्वमुपन्यस्तम् । तथाहि । पृथिवीत्वं हि

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परिच्छेदः १ ] भाषाटीकासमेता. ४३
गन्धसमवायिकारणतावच्छेदकतया सिद्धयति, अन्यथा गन्ध-
त्वावच्छिन्नस्याकास्मिकत्वापत्तेः । नच पाषाणादौ गन्धाभावा-
द्गन्धवत्त्वमव्याप्तमिति वाच्यम् । तत्रापि गन्धसत्त्वात् । अनुपल्-
ब्धिस्त्वनुत्कटत्वेनाप्युपपद्यते, कथमन्यथा तद्भस्मनि गन्ध
उपलभ्यते । भस्मनो हि पाषाणध्वंसजन्यत्वात् पाषाणोपादानो-
पादेयत्वं सिद्धयति । यद्द्रव्यं यद्द्रव्यध्वंसजन्यं तत्तदुपादानो-
पादेयमिति व्याप्तेः । दृष्टं चैतत्-खण्डपटे महापटनध्वंसजन्ये ।
भाषा-यद्यपि पृथिवीका लक्षण गन्धवत्त्वमात्र कहना उचित है तथापि
लक्षणमें समवायिकारणताका निवेश ' पृथिवीत्व ' जातिमें प्रमाण उपन्यासके
लिये जानना चाहिये ( तथाहि ) उसकी रीति यह है कि-गन्धकी जो समवायि

[४४] न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ प्रत्यक्ष-

भाषा--ऐसेही पाषाणके परमाणुओंको पृथिवी होनेसे उनसे उत्पन्न होनेवाला
पाषाणभी पृथिवीस्वरूपही है । एवं पाषाणको गन्धवाला होनेमेंभी कोई
बाधक नहीं है ॥
-नानारूपवती मता ।
भाषा--तथा वह पृथिवी नानाविध रूपवाली है.
नानारूपेति । शुक्लनीलादिभेदेन नानाजातीयं रूपं पृथिव्यामेव
वर्तते,नतु जलादौ तत्रशुक्लस्यैव सत्त्वात् पृथिव्यां त्वेकस्मिन्नपि
धर्मिणि पाकवशेन नानारूपसम्भवात् । नच यत्र नानारूपं नो-
त्पन्नं तत्राव्याप्तिः । रूपद्वयवद्वृत्तिद्रव्यत्वव्याप्यजातिमत्त्वस्य
रूपनाशवद्वृत्तिद्रव्यत्वव्याप्यजातिमत्त्वस्य वा वाच्यत्वात् ।
वैशेषिकनये पृथिवीपरमाणौ रूपनाशस्य रूपान्तरस्य च
सत्त्वात् । न्यायनये घटादावपि तत्सत्त्वाल्लक्षणसमन्वयः ।
भाषा-शुक्ल नीलादि भेदसे सात प्रकारका रूप पृथिवीहीमें रहता है; जलादिमें
नहीं रहता. जलादिमें तो केवल शुक्लरूपही रहता है और पृथिवीमें तो एक व्यक्ति
( घटादि ) मेंभी अग्निसंयोगसे नानारूपका सम्भव होता है. शंका-जिस पृथिवीमें
नानारूप उत्पन्न नहीं हुआ उसमें अव्याप्ति होगी. समाधान-वहांभी रूपद्वयवाले
में वर्तनेवाली जो द्रव्यत्वकी व्याप्य ( पृथिवीत्व ) रूपजाति तादृश जातिमत्त्व
अपेक्षित है. अथवा रूप नाशवालेमें वर्तनेवाली जो द्रव्यत्वकी व्याप्य ' पृथिवीत्व '
रूपजातिः तादृशजातिमत्त्व अपेक्षित होनेसे उक्त दोष नहीं है. वैशेषिकमतमें पृथिवी
परमाणुओंमें रूपका नाश तथा रूपान्तरकी उत्पत्ति मानी है और न्यायमतमें तो
घटादिकोंहींमें रूपको नाश तथा रूपान्तरकी उत्पत्ति मानी है याते उभयमतमें
पूर्वोक्त लक्षणमें दोष नहीं है.
षड्विधस्तु रसस्तत्र-
भाषा-षट् प्रकारका उस पृथिवीमें रस है.
षड्विधइति । मधुरकटुकाषायादिभेदेन यःषड्विधो रसः सपृथिव्यामेव,जले च मधुर एव रसः।अत्रापि पूर्ववद्रसद्वयवद्वृत्तिद्र-
व्यत्वव्याप्यजातिमत्त्वं लक्षणार्थोऽवसेयः ।
१ प्रथम लक्षण अपेक्षा बुद्धिविशेष विषयत्वरूपद्वित्व घटित होनेसे गौरवयुक्त है या...
' रूपनाश ' इत्यादिसे द्वितीय कहा है.

परिच्छेदः १ ] भाषाटीकासमेता. ४५
भाषा-मधुर कटु काषायादि भेदसे षट् प्रकारका रस पृथिवीहीमें रहता है;
जलमें तो केवल एक मधुररस है. यहांभी जिस पृथिवीमें नानाविध रस उत्पन्न
नहीं हुआ, उसमें अव्याप्ति वारणार्थ रसद्वयवालेमें वर्तनेवाली जो द्रव्यत्वकी व्याप्य
‘पृथिवीत्व’ रूपा जाति तादृश जातिमत्त्वरूप लक्षणार्थ जानना उचित है.
-- गन्धस्तु द्विविधो मतः ॥ ३५ ॥
भाषा-दोप्रकारका उस पृथिवीमें गन्ध है ॥ ३५ ॥
गन्धस्त्विति। द्विविध इति वस्तुस्थितिमात्रं न तु द्विविधगन्धवत्त्वं
लक्षणं द्विविधत्वस्य व्यर्थत्वात् । द्वैविध्यं च सौरभासौरभभेदेन
बोध्यम् ॥ ३६ ॥
भाषा-पृथिवीमें गन्धका द्विविध कहना केवल वस्तुकी स्थितिमात्रका बोधक है.
द्विविध गन्धवत्त्व मात्र लक्षण नहीं है. किन्तु केवल 'गन्धवत्त्व' मात्रही लक्षण सम्यक्
है. 'द्विविध' पद निष्फल है. सुरभि असुरभि भेदसे वह गन्ध दोप्रकारका जानना
चाहिये ॥ ३५ ॥
स्पर्शस्तस्यास्तु विज्ञेयो ह्यनुष्णाशीतपाकजः ।
स्पर्श इति । तस्याः पृथिव्याः ।
भाषा--अनुष्णाशीतपाकज स्पर्शभी पृथिवीकाही जानना योग्य है.
अनुष्णाशीतस्पर्शवत्त्वं वायावपि वर्तत इत्युक्तं पाकज इति ।
इत्थञ्च पृथिव्याः स्पर्शोऽनुष्णाशीत इति ज्ञापनार्थं तदुक्तम् ।
लक्षणं तु पाकजस्पर्शवत्त्वमात्रम् । अधिकस्य वैयर्थ्यात् ।
यद्यपि पाकजस्पर्शः पटादौ नास्ति, तथापि पाकजस्पर्शवद्वृ-
त्तिद्रव्यत्वव्याप्यजातिमत्त्वमर्थो बोध्यः ।
भाषा--अनुष्णाशीत स्पर्शवत्ता वायुमेंभी है उसके वारणार्थ 'पाकज' पदका निवेश
किया. वहस्पर्श वायुमें पाकज नहींहै. एवं यह पूर्व ग्रन्थ पृथिवीके लक्षणके अभिप्रायसे
नहीं कहा किन्तु पृथिवीका स्पर्श अनुष्णाशीत है यह बोधनार्थ कहा है. पृथिवीका
लक्षण तो 'पाकज स्पर्शवत्त्व' मात्रही साधु है; अधिक कथन निष्फल है. यद्यपि पाकज
स्पर्शवत्ता पटादिरूप पृथिवीमें नहीं है याते उक्त लक्षणकी अव्याप्ति होगी तथापि
पाकज स्पर्शवालेमें वर्तनेवाली जो द्रव्यत्वकी व्याप्य 'पृथिवीत्व' रूपा जाति तादृश
'जातिमत्त्व' पदादि रूप पृथिवीमेंभी प्रसिद्ध है. एवं जातिघटित लक्षण करनेसे
कहीं दोष नहीं.

४६ न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ प्रत्यक्ष-
नित्याऽनित्या च सा द्वेधा नित्या स्यादणुलक्षणा॥३६
अनित्या तु तदन्या स्यात्सैवावयवयोगिनी ।
भाषा--नित्या तथा अनित्या भेदसे वह पृथिवी दोप्रकारकी है. उसमें परमाणु
रूप पृथिवी नित्या है ॥ ३६ ॥ उसमें भिन्नकार्यरूपा सावयव पृथिवी अनित्या है ।
नित्येति। सा पृथिवी द्विविधा नित्याऽनित्या चेत्यर्थः । अणुलक्ष-
णापरमाणुरूपा पृथिवी नित्या ॥ ३६ ॥ तदन्या परमाणुभिन्ना
पृथिवीद्व्यणुकादिरूपा सर्वाऽप्यनित्येत्यर्थः। सैवानित्या पृथिव्ये-
वावयववतीत्यर्थः ।
भाषा-वह पृथिवी दोप्रकारकीहै, एका नित्याहै और दूसरी अनित्याहै इन दोनोंमें
अणुलक्षणा अर्थात् परमाणुरूपा पृथिवी नित्या है ॥ ३६ ॥ और परमाणुओंसे भिन्न
द्व्यणुकादि रूपा यावत् पृथिवी अनित्या है. वह अनित्या पृथिवी ही अवयवयोगिनी
अर्थात् सावयवा कही जाती है.
नन्ववयविनि किं मानम्, परमाणुपुञ्जैरेवोपपत्तेः । न च परमाणू-
नामतीन्द्रियत्वाद्वटादेः प्रत्यक्षं न स्यादिति वाच्यम्, एकस्य
परमाणोरप्रत्यक्षत्वेऽपि तत्समूहस्य प्रत्यक्षत्वसम्भवात् । यथै-
कस्य केशस्य दूरेऽप्रत्यक्षत्वेऽपि तत्समूहस्य प्रत्यक्षत्वम् । न
चैकः स्थूलो महान् घट इति बुद्धेरनुपपत्तिरिति वाच्यम् ।
बौद्ध--शंका-सावयवा पृथिवीमें क्या प्रमाणहै? 'अयंघटः' इत्यादि प्रतीतिका निर्वाह
तो विलक्षण संस्थान विशिष्ट परमाणुपुंजसेही होसकताहै. सिद्धान्ती--परमाणु तो
अतीन्द्रिय पदार्थ हैं. यदि घटादि पदार्थोंको परमाणु पुञ्जस्वरूप माने तो परमाणुओंकी
तरह घटादिकाभी प्रत्यक्ष नहीं होगा. बौद्ध--यद्यपि पृथक् २ यावत् परमाणु अतीन्द्रियहैं
तथापि उनके समुदायका साक्षात्कार होसक्ताहै. जैसे एक (केश) बाल दूरसे नहींभी
दीखता तौभी उसके समुदायका प्रत्यक्ष होसकताहै. सिद्धान्ती-यह एक महत्त्व
परिमाणवाला स्थूल घट है ऐसी बुद्धि परमाणुपुंजमें नहीं होसकती.
एको महान् धान्यराशिरितिवदुपपत्तेः। मैवम्। परमाणोरतीन्द्रि-
यत्वेन तत्समूहस्यापि प्रत्यक्षत्वायोगात् । दूरस्थकेशस्तु नाती-
न्द्रियः, सन्निधाने तस्यैव प्रत्यक्षत्वात् । नच तदानीमदृष्टयपर-

परिच्छेदः १ ] भाषाटीकासमेता. ४७
माणुपुञ्जाद्दृश्यपरमाणुपुञ्जस्योत्पन्नत्वान्न प्रत्यक्षत्वे विरोध इति
वाच्यम् । अदृश्यस्य दृश्यानुपादानत्वात् । अन्यथा चक्षूरूष्मा-
दिसन्ततेरपि कदाचिद्दृश्यत्वं स्यात् ।
बौद्ध-यह एक महान् धान्यराशिहै, इस बुद्धिकी तरह घटमेंभी बुद्धि होसकतीहै.
समाधान--परमाणु अतीन्द्रिय हैं उनका समूहभी प्रत्यक्षके योग्य नहीं है, दूरस्थ
केश तो अतीन्द्रिय नहींहै नेत्रादिकोंके समीप होनेसे उसी केशका प्रत्यक्षभी होसक्ता
है.शंका-कार्य्योत्पत्तिकालमें दर्शनयोग्यपरमाणुपुंजसे दर्शनयोग्य परमाणुपुंजकी
उत्पत्ति होतीहै. याने घटादिक साक्षात् होजानेमें कोई विरोध नहीं समाधान-अ-
दृश्यपदार्थ दृश्यपदार्थका उपादान नहीं होसकताहै. ( अन्यथा ) यदि अदृश्यपदार्थ
सेभी दृश्यपदार्थकी उत्पत्ति होवे तो कदाचित् नेत्रइन्द्रियका तथा ( ऊष्म ) भाफादि
अदृश्य तेजःपदार्थोकाभी साक्षात्कार होना चाहिये ।
न चातितप्ततैलादौ कथमदृश्यदहनसन्ततेर्दृश्यदहनोत्पत्तिरिति
वाच्यम् । तत्र तदन्तःपातिभिर्दृश्यैरेव दहनावयवैः स्थूलदहनो-
त्पत्तेरभ्युपगमात् । न चादृश्यद्वयणुकेन कथं त्रसरेणोरुत्पत्तिरि
तिवाच्यम्। यतो न वयं दृश्यत्वमदृश्यत्वं वा कस्यचित् स्वभा-
वादाचक्ष्महे किंतु महत्त्वोद्भूतरूपादिकारणसमुदायवशाद्दृश्यत्व
म् । तदभावेचादृश्यत्वम् । तथा च त्रसरेणोर्महत्त्वात्प्रत्यक्षं न
तु द्वयणुकादेस्तदभावात् । न हि तन्मतेऽपीदं सम्भवति,
परमाणौ महत्त्वाभावात् ।
शंका-अतितप्त तैलादिकोंविषे कैसे अदृश्यअग्निके भागोंसे दृश्य अग्निभागोंकी
उत्पत्ति होतीहै अर्थात् अतितप्त तैलादि पदार्थ पात्रव्यवहित अग्निसंयोगसेभी शीघ्र
जल उठते हैं; वहां प्रथम उनमें दहनसंतति अदृश्य होतीहै, पश्चात् दृश्य होजातीहै.
समाधान-वहांभी हम ऐसा मानते हैं कि, दर्शनयोग्य अग्निके भागोंने तैलादि
पदार्थमें प्रविष्ट होकर स्थूलदाहकी उत्पत्ति करीहै; याते अदृश्यसे दृश्यकी उत्पत्ति नहीं
है. शंका-अदृश्य द्वयणुकसे दृश्य त्रसरेणुकी उत्पत्ति आपने कैसे मानीहै ? समा०-
इसीकारणसे हम दर्शनयोग्यता अथवा अदर्शनयोग्यता किसी पदार्थको स्वरूपसे नहीं
कहते किन्तु-महत्त्व परिमाण उद्भूतरूपादि कारण समुदायसे पदार्थोंमें दर्शनयोग्यता
होतीहै इनके अभावसे पदार्थ अदृश्य रहताहै. इसीरीतिसे त्रसरेणुका महत्त्वपरिमाण

होनेसे प्रत्यक्ष होसकताहै द्व्यणुकका महत्त्वपरिमाणके अभावसे प्रत्यक्ष नहीं होसकता;
इसीनियमसे तुम्हारे मतमें तो निर्वाह नहीं होसकता, क्योंकि आपने परमाणुपुंजहीका
प्रत्यक्ष माना है और परमाणुमें महत्त्वरूप कारणके अभावसे प्रत्यक्ष योग्यता नहीं है.
इत्थं चावयवसिद्धौ तेषामुत्पादविनाशयोः प्रत्यक्षत्वाद नित्यत्व-
म्। तेषांचावयवधाराया अनन्तत्वे मेरुसर्षपयोरपि साम्यप्रसंगः ।
अतः क्वचिद्विश्रामो वाच्यः । यत्र च विश्रामस्तस्याऽनित्यत्वे
त्वसमवेतभावकार्योत्पत्तिप्रसङ्ग इति तस्य नित्यत्वम्। महत्प-
रिमाणतारतम्यस्य गगनादौ विश्रान्तत्वमिवाणुपरिमाणतार-
तम्यस्यापि क्वचिद्विश्रान्तत्वमस्तीति तस्य परमाणुत्वसिद्धिः ।
भाषा--इस पूर्वोक्तविचारसे (अवयवी) कार्यद्रव्यकी सिद्धि हुई तो उन कार्यद्रव्योंको
उत्पन्न विनष्ट होनेसे अनित्यत्व स्पष्ट है; उन कार्यद्रव्योंकी अवयवपरंपरा यदि असं-
ख्यात मानी जाय तो मेरुपर्वत तथा (सर्षप) सरसोंके दानेकी तुल्यता होनीचाहिये; याते
किसी एक स्थलमें अवयवपरंपराका विश्राम कहना उचितहै. जहां अवयवपरंपराका
पर्यवसान है यदि उसको अनित्य मानाजाय तो समवायिकारणसे विनाही भावकार्य-
की उत्पत्ति होनी चाहिये; सो तो संभव नहीं, याते अवयवपरंपराकी विश्राम
अवधिको नित्य मानना उचित है. जैसे महत्परिमाणकी न्यूनाधिकता त्रसरेणुसे लेकर
आकाशादिकोंमें विश्रामको प्राप्त होतीहै वैसेही अणुपरिमाणकी न्यूनाधिकताकी
विश्रान्तिकी अवधिभी कहीं कहनी उचित है. अणुपरिमाणकी न्यूनाधिकताकी
विश्रान्तिकी अवधि जहां है वही परमाणु है. इसरीतिसे परमाणुकी सिद्धि होसकतीहै.
न च त्रसरेणावेव विश्रमोऽस्त्विति वाच्यम् । त्रसरेणुः सावयवः
चाक्षुषद्रव्यत्वाद्धटवदित्यनुमानेन तदवयवसिद्धौ, त्रसरेणोरव-
यवाः सावयवा महदवयवत्वात् कपालवदित्यनुमानेन तद्व-
यवसिद्धेः ।
शंका-अणुपरिमाणकी विश्रामावधि त्रसरेणुहीमें मानलें तो दोष क्या है? समा०--
त्रसरेणु घटकी तरह नेत्रग्राह्य होनेसे सावयवहैं. इस अनुमानसे त्रसरेणुके अवयव सिद्ध
होनेसे पश्चात् त्रसरेणुके अवयवभी त्रसरेणुरूप महान्कार्यके आरम्भक होनेसे साव-
यव हैं जैसे कपाल घटरूप महान् कार्यके आरम्भक होनेसे सावयव हैं. इस
अनुमानसे त्रसरेणुके अवयवोंकेभी अवयव सिद्ध होसकते हैं.

परिच्छेदः १ ] भाषाटीकासमेता. ४९
न चेदमप्रयोजकम् । अपकृष्टमहत्त्वं प्रत्यनेकद्रव्यवत्त्वस्य प्र-
योजकत्वात् । न चैवं क्रमेण तदवयवधारापि सिद्ध्येदिति वा-
च्यम्, अनवस्थाभयेन तत्सिद्धेः ।
शंका-इस पूर्वोक्त अनुमानमें अनुकूल तर्कका अभाव है. समाधान--अपकृष्ट
महत्त्वके प्रति अनेकद्रव्यको कारणतारूपही अनुकूलतर्क प्रसिद्ध है.शंका-इसी क्रमसे
उन अवयवोंकी धाराभी सिद्ध हो तो क्या हानि है? समाधान--अनवस्थारूप दोषके
भयसे तथा मेरु सरसोंके साम्यप्रसंगके भयसे अवयवोंकी धारा माननी अनुचित
है. इससे अणुपरिमाणकी विश्रांतिकी अवधि परमाणुनामक पदार्थ सिद्ध हुआ.
सा च त्रिधा भवेद्देहमिन्द्रियं विषयस्तथा ॥ ३७॥
सा च त्रिधेति । सा कार्यरूपा पृथिवी त्रिविधा शरीरेन्द्रियवि-
षयभेदादित्यर्थः ॥ ३७ ॥
भाषा-वह कार्यरूपा पृथिवी शरीरभेदसे तथा इन्द्रियभेदसे तथा विषयभेदसे तीन
प्रकारकी है ॥ ३७ ॥
तत्र देहमुदाहरति, योनिजादीति-
भाषा-उनमें 'योनिजादि' इत्यादि ग्रन्थसे मूलकार देहके भेदको दिखलाताहै-
योनिजादि भवेद्देहं--
योनिजमयोनिजं चेत्यर्थः ।
भाषा-योनिज तथा अयोनिजभेदसे वह देह दो प्रकारका है.
योनिजमपि जरायुजमण्डजं च । जरायुजं मानुषादीनाम्,अण्ड-
जं सर्पादीनाम् । अयोनिजं स्वेदजोद्भिज्जादिकम् । स्वेदजाः
कृमिदंशाद्याः, उद्भिज्जास्तरुगुल्माद्याः । नारकिणां शरीरमप्य-
योनिजम् ।
भाषा-योनिजशरीरभी जरायुज तथा अण्डजभेदसे दो प्रकारके हैं. उनमें पुरु-
षादिकोंके शरीर जरायुज कहे जाते हैं; तथा सर्पादिकोंके शरीर अण्डज कहे जातेहैं
तैसे अयोनिज शरीरभी स्वेदज तथा उद्भिज्ज भेदसे दो प्रकारके हैं. पसीनेसे उत्पन्न
होनेवाले कीटदंशादिक जीव स्वेदज कहेजातेहैं; तथा भूमिकेभेदनसे उत्पन्न होनेवाले
४

[५० न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ प्रत्यक्ष-

वृक्षलतादिके शरीर द्विज्ज कहे जातेहैं. नरकमें होनेवाले जीवोंके शरीरभी अयो-
निजही हैं; याते पृथक् परिगणन नहींकिये.
न च मानुषादिशरीराणां पार्थिवत्त्वे किं मानमिति वाच्यम्,
गन्धादिमत्त्वस्यैव प्रमाणत्वात् । न च क्लेदोष्मादेरुपलम्भादाप्य-
त्वादिकमपि स्यादिति वाच्यम्, तथा सति जलत्वपृथिवीत्वादि-
ना सङ्करप्रसङ्गात् । न च तर्हि जलत्वादिकमेवास्तु, न तु पार्थि-
वत्त्वमिति वाच्यम् । क्लेदादीनां विनाशेऽपि शरीरत्वेन प्रत्यभि-
ज्ञानात्, गन्धाद्युपलब्धेश्च पृथिवीत्वसिद्धेः । तेन पार्थिवादिशरीरे
जलादीनां निमित्तत्वमात्रं बोध्यम् ।
शंका-पूर्वोक्त पुरुषादिकोंके शरीर पृथिवीसे उत्पन्न होनेवाले हैं इसमें क्या प्रमा-
णहै? समाधान-पुरुषादिकोंके शरीर पार्थिव है, गन्धवाले होनेसे किंवा शुक्लेतररूप-
वाले होनेसे 'घटादिवत्' इत्याकारक अनुमानही प्रमाण है. शंका-पुरुषादि शरी-
रोंहीमें कदाचित् स्वेदादिसे गीलापना और कदाचित् ज्वरादिकोंसे उष्णता प्रतीत
होतीहै, इससे पुरुषादि शरीरोंको जलसे उत्पन्न होनेवाले किंवा तेजसे उत्पन्न
होनेवालेभी कहना चाहिये. समाधान--ऐसा माननेसे जलत्व जातिका तथा पृथिवीत्व
जातिका परस्पर संकर होगा. शंका-यदि ऐसाही है तो इन शरीरोंको जलसे वा
तेजसे उत्पन्न होनेवाला माननाही उचितहै और पार्थिव मानना व्यर्थ है. समाधान-
शरीरसे गीलेपनेके विनाशके पश्चात् किंवा उष्णताके विनाशके पश्चात् भी पुरुषादि
शरीरोंमें 'यह वही देवदत्तका शरीर है' इत्याकारक शरीरत्वरूपसे प्रत्यभिज्ञात्मकज्ञान
होताहै और गन्धके तथा श्वेतेतररूपादिकोंके उपलाभ होनेसे पुरुषादिशरीरोंमें पार्थि-
वत्व निश्चय होताहै, पुरुषादिशरीरोंको पार्थिव सिद्ध होनेसे इनमें जलादिभूतोंको
निमित्तकारण मात्र जानना चाहिये. पुरुषादिशरीरोंमें पाञ्चभौतिकत्वव्यवहारभी पञ्च-
भूतजन्यत्वमात्रको लेकर है किन्तु उपादान तात्पर्य्यसे नहींहै.
शरीरत्वं न जातिः पृथिवीत्वादिना साङ्कर्यात्, किंतु चेष्टाश्र-
यत्वम् । वृक्षादीनामपि चेष्टासत्त्वान्नाव्याप्तिः । नच वृक्षादीनां
शरीरत्वे किं मानमिति वाच्यम् । आध्यात्मिकवायुसम्बन्धस्य


१ यहां संकरका प्रकार ऐसेहै कि-पृथिवीत्वधर्मको छोड़कर शरीरत्वधर्म जलादिशरीरोंमें है
ऐसे शरीरत्वधर्मको छोड़कर पृथिवीत्वघटादिकोंमेंहै एवं दोनों धर्मोंका समावेश मानुषादिशरी-
रोंमें है याते पूर्वोक्तसंकरका लक्षणसमन्वय होसकता है ।

परिच्छेदः १ ] भाषाटीकासमेता. ५१
प्रमाणत्वात्। तत्रैव किं मानमिति चेत्, भग्नक्षतसंरोहणादिना
तदनुमानात् ।
भाषा-पृथ्वीत्वादिजातियोंके साथ संकर होनेसे शरीरत्व जाति नहींहै,किंतु उपाधि
है,चेष्टा के आश्रयका नाम शरीर है यह उसका निर्वचन है. (चेष्टा) क्रियाका व्याप्य
जाति विशेष है, सो "चेष्टते२" इत्यादि व्यवहारसे प्रत्यक्ष सिद्ध है वह चेष्टा वृक्षादि
शरीरोंमेंभी है याते उनमें अव्याप्ति नहीं है शंका-वृक्षादिकोंके शरीर होनेमें क्या
प्रमाण है? समाधान-वृक्षादिकोंमें प्राणवायुका सम्बन्ध ही उनके शरीरमें प्रमाण है.
शंका-वृक्षादिकोंमें प्राणवायुका सम्बन्ध है. इसीमें क्या प्रमाण है?समाधान-१वृ-
क्षादिके स्वयं फूटनेसे, २तथा वृक्षादि शरीरोंमें स्वयं ( विस्फोट ) गूमड़ा होजानेसे,
३ एवं वृक्षादिके परस्पर एक दूसरे पर संरोहण होजानेसे,४ तथा वृक्षादिके वर्द्धनसे,
वृक्षादिकोंमें प्राणवायुका अनुमान होता है.
यदि हस्तादौ शरीरव्यवहारो न भवति, तदाऽन्त्यावयवित्वेन
विशेषणीयम्। न च यत्र शरीरे चेष्टा न जाता तत्राव्याप्तिरिति
वाच्यम्, तादृशे प्रमाणाभावात् । अथवा चेष्टावदन्त्यावयवि-
मात्रवृत्तिद्रव्यत्वव्याप्यजातिमत्त्वं तत्, मानुषत्वचैत्रत्वजातिमा-
दाय लक्षणसमन्वयः । न च नृसिंहशरीरे कथं लक्षणसमन्वयः,
तत्र नृसिंहत्वस्यैकव्यक्तिवृत्तितया जातित्वाभावात् । जलीयतै-
जसशरीरवृत्तितया देवत्वस्यापि¹ जातित्वाभावादिति वाच्यम् ।
कल्पभेदेन नृसिंहशरीरस्य नानात्वेन नृसिंहत्वजात्या लक्षण-
समन्वयात् ॥
शंका-पूर्वोक्त क्रियाविशेषरूप चेष्टा हस्त पादादिकोंमेंभी रह सकतीहै परन्तु वहां
शरीरव्यवहार कोई नहीं करता. समाधान-यदि ऐसा है तो "अन्त्यावयवित्वे सति
चेष्टाश्रयत्वं" ऐसा लक्षण करनेसे दोष नहीं द्रव्यान्तरके अनारम्भकका नाम 'अ-
न्त्यावयवि' है ऐसा शरीर है; हस्तपादादि नहीं हैं. शंका-जिस शरीरमें चेष्टा नहीं
उत्पन्न हुई उसमें पूर्वोक्तलक्षणकी अव्याप्ति होगी. समाधान-ऐसे शरीरमें प्रमाण
१ देवत्वधर्मभी संकरदोषसे दूषित होनेसे जातिरूप नहींहै. उसका प्रकार यह है कि-देवत्व
धर्मको छोड़कर तैजसत्व धर्म स्वर्णादि तैजस पदार्थोंमें रहताहै. एवं तैजसत्वधर्मको छोड़
कर देवत्व जलीय देवोंमें है. उभयका समावेश तैजसदेवोंके शरीरमें है. इसलिये देवत्वधर्म
जातिरूप नहीं है ।

५२ - न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ प्रत्यक्ष-
नहीं है. शंका-मृतशरीरमें चेष्टा नहींहै परन्तु शरीर व्यवहार होताहै. समाधान-
यदि ऐसा है तो चेष्टावाला जो अन्त्यावयवि उसमें वर्तनेवाली जो द्रव्यत्वकी व्याप्य
(मानुषत्व आदिजाति) तादृश जातिमत्त्व पूर्वोक्त लक्षणका विवरण करना उचित है. ऐसा
जातिघटित लक्षण करनेसे दोष नहीं. मानुषत्व चैत्रत्वादि जातिको लेकर लक्षणसम-
न्वय होसकताहै. शंका-नृसिंहके शरीरमें कैसे लक्षणसमन्वय होगा? वहां 'नृसिंहत्व'
धर्मको एकव्यक्तिमें रहनेवाला होनेसे जातिरूपता नहींहै. समाधान-नृसिंहशरीरमें
देवत्वजातिको लेकर लक्षणसमन्वय हो सकताहै. शंका--जलीयशरीरोंमें तथा
तैजसशरीरोंमें वर्तनेवाला होनेसे देवत्वधर्मभी जातिरूप नहीं है. समाधान-कल्प-
कल्पान्तरोंके भेदसे नृसिंहके शरीरोंकीभी अनन्त होनेसे लक्षणसमन्वय होसकताहै.
– इन्द्रियं घ्राणलक्षणम् ।
इन्द्रियमिति । घ्राणेन्द्रियं पार्थिवमित्यर्थः ।
भाषा-इन्द्रियोंमेंसे घ्राण नामक इन्द्रिय पृथिवीसे उत्पन्न होताहै.
पार्थिवत्त्वं कथमितिचेत्। इत्थम्। घ्राणेन्द्रियं पार्थिवं रूपादिषुमध्ये
गन्धस्यैव व्यञ्जकत्वात्, कुङ्कुमगन्धाभिव्यञ्जकगोघृतवत् । नच
दृष्टान्ते स्वकीयरूपादिव्यञ्जकत्वादसिद्धिरिति वाच्यम्। परकी-
यरूपाद्यव्यञ्जकत्वस्य तदर्थत्वात् ।
शंका-'घ्राणइन्द्रिय पार्थिव है' इसमें क्या प्रमाणहै? समाधान-जैसे कुंकुम
(केसर) के गन्धक अभिव्यंजक गोघृत कुंकुमके रूपादिकोंका अभिव्यंजक न होकर
केवल कुंकुमके गन्धहीका व्यंजक है और पार्थिवभी है; वैसेही घ्राणइन्द्रियभी
रूपादिकों के मध्यमें केवल गन्धहीका व्यंजक होनेसे पार्थिव सिद्ध होताहै. शंका-
घृतरूप दृष्टान्त कुंकुमयोगसे उसके गन्धका व्यंजक होकर अपने रूपकाभी व्यंज-
क है; इसलिये पूर्वोक्त हेतु दृष्टान्तमें स्वरूपासिद्ध है. समाधान-परकीयरूपा-
दिकोंके अव्यंजक होकर केवल गन्धहीके व्यंजक होना पूर्वोक्त हेतुका अर्थ है.
ऐसा हेतु घृतरूप दृष्टान्तमें सिद्ध है; क्योंकि घृत अपनेसे पर कुंकुमके रूपादिकोंका
व्यंजक न होकर केवल गन्धहीका व्यंजकहै.
न च नवशरावगन्धव्यञ्जकजलेनैकान्तिकत्वमिति वाच्यम्,
तस्य सक्तुरसाभिव्यञ्जकत्वात्। यद्वा परकीयेति न देयं वायूपनी-

परिच्छेदः १ ] भाषाटीकासमेता. ५१
तसुरभिभागस्य दृष्टान्तत्वसम्भवात्। न च घ्राणेन्द्रियसन्निकर्षस्य
गन्धमात्रव्यञ्जकत्वात्तत्राव्यभिचार इति वाच्यम्, द्रव्यत्वे सती-
ति विशेषणात् ॥
शंका—पूर्वोक्त हेतु जलमें व्यभिचारी है; क्योंकि जलभी नवीन शराव (प्याले)
के गन्धहीका व्यंजक है. समाधान—नवीन शरावके गन्धका व्यंजक जल केवल
गन्धहीका व्यंजक नहीं है, किन्तु सक्तु ( सत्तु ) के रसकाभी व्यंजक है; याते पूर्वोक्त
हेतु जलमें व्यभिचारी नहीं अथवा लाघवानुरोधसे पूर्वोक्त हेतुमें 'परकीय' यह पद न
देना और घृतको दृष्टान्तभी न रखना चाहिये. वायुवेगसे देशान्तरमें प्राप्त जो पुष्पा-
दिकोंके सुगन्धितभाग वे दृष्टान्त बन सकतेहैं; क्योंकि वे रूपादिकोंके मध्यमें
केवल गन्धहीके व्यंजक हैं और पार्थिवभी हैं. शंका—घ्राणइन्द्रियका जो अपने गन्ध-
रूप विषयके साथ 'स्वसंयुक्तसमवाय' संबन्ध है उसको केवल गन्धहीका व्यंजक
होनेसे उसी संबन्धमें पूर्वोक्त हेतुका व्यभिचार होगा. समाधान—पूर्वोक्तहेतुमें 'द्रव्य
त्वे सति' यह विशेषण देना उचित है अर्थात् द्रव्य होकर रूपादिकोंके मध्यमें गन्ध-
हीका व्यंजक होना चाहिये. एवं पूर्वोक्त संबन्ध द्रव्य नहीं, याते दोष नहीं.
विषयो द्व्यणुकादिश्च ब्रह्माण्डान्त उदाहृतः ॥ ३८ ॥
भाषा—द्व्यणुकादिसे लेकर ब्रह्माण्डपर्य्यन्त विषयरूपा पृथ्वी है ॥ ३८ ॥
विषय इति । उपभोगसाधनं विषयः। सर्वमेव हि कार्यजात-
मदृष्टाधीनम् । यत्कार्यं यददृष्टाधीनं तत्तदुपभोगं साक्षात् प-
रम्परया वा जनयत्येव । न हि बीजप्रयोजनाभ्यां विना कस्य
चिदुत्पत्तिरस्ति, तेन द्व्यणुकादि ब्रह्माण्डान्तं सर्वमेव विषयो
भवति । शरीरेन्द्रिययोर्विषयत्वेपि प्रकारान्तरोपन्यासः शि-
प्यबुद्धिवैशद्यार्थः ॥ ३८ ॥
भाषा—सुखदुःखसाक्षात्कारके प्रयोजकका नाम विषय है. साक्षात् अथवा परंप-
रासंबन्धसे कार्यसंपादकका नाम प्रयोजक है. सम्पूर्ण कार्यसमुदाय जीवोंके अदृ-
ष्टोंके अधीनहै. जो कार्य जिस जीवके जिस अदृष्टके अधीन है वह कार्य उसी जीवको
उसी अदृष्टके अनुसार साक्षात् अथवा परम्परासम्बन्धसे सुखदुःख साक्षात्कारका प्रयो-
जक होताहै. इस संसारमें कारण अथवा प्रयोजनसे विना किसी वस्तुकीभी उत्पत्ति
नहीं है; याते द्व्यणुकादिसे लेकर ब्रह्माण्डपर्य्यन्त सम्पूर्ण विषय होसकताहै. विषयके

पूर्वोक्त लक्षणानुसार यद्यपि शरीर तथा इन्द्रियकी गणनाभी विषयहीके अन्तर्भूत
करनी उचितहै तथापि जुदा परिगणन केवल शिष्यलोगोंकी बुद्धि विशदार्थ है॥३८॥
जलं निरूपयति, वर्णः शुक्ल इति-
भाषा-'वर्णः शुक्ल' इत्यादि ग्रन्थसे मूलकार जलका निरूपण करता है-
वर्णः शुक्लः-
भाषा-जलका शुक्ल अर्थात् सफेद वर्ण है.
स्नेहसमवायिकारणतावच्छेदकतया जलत्वं जातिः सिद्धयति ।
यद्यपि स्नेहत्वं नित्यानित्यवृत्तितया न कार्यतावच्छेदकम्,
तथापि जन्यस्नेहत्वं तथा बोध्यम् । अथ परमाणौ जलत्वं न
स्यात्, तत्र जन्यस्नेहाभावात्। नित्यस्य स्वरूपयोग्यत्वे फला-
वश्यम्भावनियमादिति चेत्, न । जन्यस्नेहजनकतावच्छेदकत-
या जन्यजलत्वजातेः सिद्धौ, तदवच्छिन्नजनकतावच्छेदकतया
जलत्वजातिसिद्धेः । शुक्लरूपवत्त्वमेव दर्शयितुमुक्तं 'वर्णः शुक्ल'
इति । न तु शुक्लरूपवत्त्वं लक्षणम् ।
भाषा-स्नेहरूप कार्यकी समवायिकारणताकी अवच्छेदक होनेसे जलत्वरूपा
जाति सिद्ध है. यद्यपि स्नेहत्वरूप धर्म नित्य जल तथा अनित्य जल उभयमें वृत्ति
होनेसे कार्यताका अवच्छेदक नहीं हो सकता तथापि जन्यस्नेहत्वरूप धर्म कार्यताका
अवच्छेदक जानना चाहिये. शंका-परमाणुओंमें जलत्वजातिकी सिद्धि न होगी;
क्योंकि वहां जन्य स्नेह नहींहै. यदि स्नेहरूप कार्यके प्रति जलीयपरमाणुओंमें स्वरू-
पयोग्यतारूप कारणता माने तो उस स्वरूपयोग्यतारूप कारणतासे कदाचित् फलभी
१ 'समवायसम्बन्धावच्छिन्न स्नेहत्वावच्छिन्न स्नेहनिष्ठ कार्यता निरूपिता तादात्म्यसम्ब-
न्धावच्छिन्ना या जलनिष्ठा समवायिकारणता सा किंचिद्धर्मावच्छिन्ना कारणतात्वात्' इत्यादि ।
२ 'समवायसम्बन्धावच्छिन्नजन्यस्नेहत्वावच्छिन्न जन्यस्नेहनिष्ठजन्यता निरूपिता । तादात्म्य
सम्बन्धावच्छिन्ना या जन्यजलनिष्ठा समवायिकारणता सा किञ्चिद्धर्मावच्छिन्ना कारणतात्वात्'
इत्यादि ।
३ 'एवं समवायसम्बन्धावाच्छिन्नजन्यजलत्वावाच्छिन्नजन्यजलनिष्ठजन्यता निरूपिता तादा-
म्यसंबन्धावच्छिन्ना या शुद्धजलनिष्ठा समवायिकारणता सा किञ्चिद्धर्मावाच्छिन्ना कारणतात्वात्,
इत्यादि । इन प्रयोगोंसे शुद्धजलत्वजातिकी सिद्धि होती है,

परिच्छेदः १ ] भाषाटीकासमेता. ५५
अवश्य होना चाहिये, सो तो नहीं होता; याते स्नेहरूप कार्यकी समवायिकारणताकी
अवच्छेदक एक अनुगत जलत्व जातिकी सिद्धि नहीं होसकती. समाधान-जन्य-
स्नेहनिष्ठ जन्यता निरूपित जो जन्यजलनिष्ठा जनकता तादृश जनकताकी अवच्छे-
दक होनेसे जन्यजलमें जलत्वजाति सिद्ध हुए पश्चात् जन्यजलनिष्ठ जन्यतानिरू-
पित जो शुद्ध जलनिष्ठा जनकता तादृश जनकताकी अवच्छेदक होनेसे शुद्ध जल-
त्वजातिकी सिद्धि होतीहै. जलका रूप श्वेत है, केवल यह दिखलानेके लिये मूलमें
“वर्णः शुक्लः” यह पाठ लिखा है; किन्तु श्वेतरूपवत्त्व जलका लक्षण नहीं है.
अथवा नैमित्तिकद्रवत्ववदवृत्तिरूपवद्वृत्तिद्रव्यत्वसाक्षाद्व्याप्य-
जातिमत्त्वम्, अभास्वरशुक्लेतररूपासमानाधिकरणरूपवद्वृत्तिद्र-
व्यत्वसाक्षाद्व्याप्यजातिमत्त्वं वा तदर्थः । तेन स्फटिकादौ ना-
तिव्याप्तिः ।
भाषा-अथवा नैमित्तिक द्रवणवाले जो 'पृथिवी तेजः'उनमें न वर्तनेवाली तथा रूपवा-
लेंमें वर्तनेवाली जो द्रव्यत्वकी साक्षात् व्याप्य 'जलत्व' जाति तादृश जातिवाले होना
जलका लक्षण है; किंवा अप्रकाशक श्वेतरूपसे इतर जो 'नीलपीतादि तथा प्रकाशक
श्वेतरूप'उनका असमानाधिकरण होकर रूपवद् जो जलउसमें वर्तनेवाली जो द्रव्यत्वकी
साक्षात् व्याप्य जलत्वजाति तादृश जातिमत्ताही पूर्वोक्त “वर्णः शुक्लः” इस ग्रन्थका
अर्थ है. एवं लक्षण करनेसे स्फटिकमणिआदिमें अतिव्याप्ति नहींहै. अन्यथा शुक्ल
वर्णवत्त्वेन स्फटिकमणिरूप पृथिवीमें अतिव्याप्ति स्पष्टही थी.
-रसस्पर्शौ जले मधुरशीतलौ ।
भाषा-जलमें रस तथा स्पर्श यथाक्रम मधुर तथा शीतल है.
रसस्पर्शाविति । जलस्य मधुर एव रसः। शीत एव स्पर्शः । ति-
क्तरसवदवृत्तिमधुरवद्वृत्तिद्रव्यत्वसाक्षाद्व्याप्यजातिमत्त्वं तदर्थः,
तेन शर्करादौ नातिव्याप्तिः । ननु शुक्लरूपवत्त्वमेवेति कुतः,
कालिन्दीजलादौ नीलोपलब्धेरिति चेत्,न । नीलजनकतावच्छे-
दिकायाः पृथिवीत्वजातेरभावाज्जले नीलरूपासम्भवात् । का-
लिन्दीजले नीलत्वप्रतीतिस्त्वाश्रयौपाधिकी । अतएव वियति
विक्षेपे धवलिमोपलब्धिः ।

५६ न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ प्रत्यक्ष-
भाषा-अर्थात् जलमें रस मधुरही है. तथा स्पर्श शीतही है. इसकाभी तिक्तादि
रसवालेमें न वर्तनेवाली तथा मधुररसवालेमें वर्तनेवाली जो द्रव्यत्वकी साक्षात् व्याप्य
जलत्वजाति तादृश जातिमत्ता जलका लक्षण है, ऐसा जातिघटित लक्षण करना
उचित है. ऐसा कहनेसे चीनी शर्करादिमें अतिव्याप्तिभी नहींहै. क्योंकि ये पार्थिव
हैं. इनमें रहनेवाली पृथ्वीत्व जाति तिक्तादिरसवालेमें न वर्तनेवाली नहींहै, किन्तु
वर्तनेवालीही है; याते जातिघटित लक्षणकी वहां प्रसक्ति नहींहै. शंका-'जलका
शुक्लही रूप है' यह कैसे निश्चय किया जावे? क्योंकि यमुनाके जलमें नीलरूपभी
दिखाईदेताहै. समाधान-नीलरूपनिष्ठ जन्यता निरूपिता जो जनकता तादृश
जनकताकी अवच्छेदक जो पृथिवीत्वजाति उसका जलमें अभाव होनेसे जलमें नील
रूपका सम्भव नहीं होसकता.यमुनाके जलमें नीलरूपकी प्रतीति तो पृथ्वीसम्बन्धसे
औपाधिकी है अर्थात् नीचेकी पृथिवी नीली है उसीकी नीलता जलमें दीख पड़ती है.
इसीसे यमुनाके जलको यदि ऊपरको फेंके तो श्वेत प्रतीत होता है.
अथ जले माधुर्ये किं मानं, न हि प्रत्यक्षेण कोऽपि रसस्तत्रानुभूय-
ते, नच नारिकेलजलादौ माधुर्यमुपलभ्यत एवेति वाच्यम् ।
तस्याश्रयोपाधिकत्वात् । अन्यथा जम्बीरजलादावम्लादिरसोप-
लब्धेरम्लादिमत्त्वमपि स्यादिति चेत्, न। हरीतक्यादिभक्षणस्य
जलरसव्यञ्जकत्वात् । नच हरीतक्यामेव जलोष्णसंयोगाद्रसा-
न्तरोत्पत्तिरिति वाच्यम् । कल्पनागौरवात् ।
शंका-जलके मीठेपनेमें क्या प्रमाण है? रासनज प्रत्यक्षसे तो जलमें किसी
रसकीभी प्रतीति नहीं होती. यदि कहो कि नारियल तथा इक्षु आदिका जल मधुर
ही होताहै, तो युक्त नहीं; क्योंकि वह मधुरता पृथ्वी सम्बन्धसे पृथिवीहीकीहै जलकी
नहीं. (अन्यथा) निम्बु गलगलादिके रसमें आम्ल ( खट्टा) रसभी प्रतीतहोता है वहभी
जलमें मानना चाहिये.समाधान-जलमें अनुद्बुद्ध मधुर रस है. हरीतकी(हरड़) या
आमला खानेके पश्चात् जल पीनेसे उसमें मधुरता उद्बुद्ध होतीहै.शंका-जल तथा
ऊष्म ( मुखकी भाफ ) के सम्बन्धसे हरीतकीमें ही रसान्तरकी उत्पत्ति मान लीजाय
तो क्या दोष है? समाधान-कल्पनागौरव है. अर्थात् फलादिरूप पृथिवीमें रसकी
उत्पत्ति तेजःसंयोगसे देखी जाती है और यदि पूर्वोक्त हरीतकीके उदाहरणके अनु-
रोधसे जलके संयोगकोभी पृथिव रसका उत्पादक माना जाय तो यह एक जुदा
कार्यकारणभाव माननेमें कल्पनागौरव है,

परिच्छेदः १ ] भाषाटीकासमेता. ५७
पृथिवीत्वस्याम्लादिजनकतावच्छेदकत्वाच्च जलेनाम्लादिकम् ।
जम्बीररसादौ त्वाश्रयोपाधिकी तथा प्रतीतिः । एवं जन्यशीत-
स्पर्शजनकतावच्छेदकं जन्यजलत्वम्, तदवच्छिन्नजनकताव-
च्छेदकं तु जलत्वमिति बोध्यम् । घृष्टचन्दनादौ तु शैत्योपलब्धि-
श्चन्दनान्तर्वर्तिशीततरसलिलस्यैव । तेजःसंयोगाज्जले उष्णप्रती-
तिरौपाधिकी स्फुटैव, तत्र पाकासम्भवात् ।
भाषा-अम्लादिनिष्ठ जन्यता निरूपित जनकतावच्छेदकत्व पृथिवीत्वको है; याते
अम्लादिक जलके धर्म नहींहैं. निम्बु गरगलादिके रसमें अम्लप्रतीति तो स्वसमवा-
यिसंयोग सम्बन्धसेहै याते औपाधिकी है. ऐसे जन्यशीतस्पर्शनिष्ठ जन्यता निरूपित जन-
कताकी अवच्छेदक जन्य जलमें जलत्वजाति है और जन्यजलनिष्ठ जन्यता निरूपित
जनकताकी अवच्छेदक शुद्ध जलत्व जाति है. शंका-घिसेहुये चन्दनकाभी तो शीत
स्पर्श होताहै याते जलका लक्षण चन्दनमें अतिप्रसक्त होगा. समाधान-चन्दनमें
शीतलता प्रतीति चन्दनान्तर्गत जलहीकी है, चन्दन शीतल नहीं है. आगआदिके
संयोगसे जलमें उष्णताकी प्रतीति तो औपाधिकी स्पष्टही है. जलमें पाक तो होही
नहीं सकता.
स्नेहस्तत्र-
भाषा-स्नेह अर्थात् चिकनापना जलहीमें रहता है.
स्नेहस्तत्रेति । घृतादावपि तदन्तर्वर्तिजलस्यैव स्नेहो जलस्य
स्नेहसमवायिकारणत्वात् । तेन जल एव स्नेह इति मन्तव्यम् ।
भाषा-घृतादिकोंमेंभी स्नेह घृतान्तर्वर्ति जलहीका है, क्योंकि स्नेहकी समवा-
यिकारणता जलहीमें सिद्ध है इससे जलहीमें स्नेहका मानना उचित है.
-द्रवत्वं तु सांसिद्धिकमुदाहृतम् ॥ ३९ ॥
भाषा-द्रवणगुण जलमें स्वाभाविक स्वीकार किया है ॥ ३९ ॥
द्रवत्वमिति । सांसिद्धिकद्रवत्वत्वं जातिविशेषः प्रत्यक्षसिद्धस्त-
दवच्छिन्नजनकतावच्छेदकमपि तदेवेति भावः । तैलादावापि
जलस्येव द्रवत्वम्, स्नेहप्रकर्षेण च दहनानुकूल्यमिति वक्ष्यति३९
भाषा-स्वाभाविक द्रवणमें स्वाभाविक द्रवणत्वरूपा जातिविशेष तो प्रत्यक्षही
सिद्ध है, स्वाभाविक द्रवणत्वावच्छिन्न जन्यता निरूपित जनकताकी अवच्छेदक भी

५८ न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ प्रत्यक्ष-
वही स्वाभाविक द्रवत्वरूपा जाति है.तैलादिकोंमेंभी द्रवणगुण जलहीका है स्नेहगुण
की अधिकतासे दहनानुकूलता तैलमें है, इस वार्त्ताको ग्रन्थकार आगे कहेगा.
नित्यतादि प्रथमवत्-
भाषा-जलमें नित्य अनित्यादि यावत् व्यवहार प्रथमवत् करने चाहिये,
प्रथमवदिति । पृथिव्या इवेत्यर्थः।तथाहि । जलं द्विविधं नित्यम-
नित्यं च । परमाणुरूपं नित्यम्, द्व्यणुकादिकं सर्वमनित्यम
वयवसमवेतं च । अनित्यमपि त्रिविधं शरीरेन्द्रियविषयभेदा त् ।
भाषा-अर्थात् पृथिवीवत् जलभी नित्य अनित्य भेदसे दो प्रकारका है,जो नित्य
है वह परमाणुरूप है, शेष द्व्यणुकादिरूप सम्पूर्ण अनित्य है तथा अवयवोंमें समवाय
सम्बन्धसे रहता है. शरीरभेदसे तथा इन्द्रिय भेदसे तथा विषयभेदसे अनित्यभी
तीन प्रकारका है.
पृथिवीतो यो विशेषस्तमाह, किंत्विति-
भाषा-'किंतु' इत्यादि ग्रंथसे पृथिवीसे जो विशेष है वह कहता है--

  • किंतु देहमयोनिजम् ।
    भाषा--पृथिवीसे जलमें इतना भेद है कि जलका शरीर योनिसे पैदा नहीं होता,
    अयोनिजमिति । अयोनिजमेवेत्यर्थः । जलीयं शरीरमयोनिजं
    वरुणलोके प्रसिद्धम् ।
    भाषा-जलसे उत्पन्न होनेवाला शरीर योनिसे पैदा नहीं होता यह वार्ता वरुण-
    लोकमें प्रसिद्ध है ।
    इन्द्रियं रसनं-
    भाषा-जलसे उत्पन्न होनेवाला इन्द्रिय रसना है.
    इन्द्रियमिति । रसनं जलीयमित्यर्थः।तथाहि रसनं जलीयं गन्धा-
    द्यव्यञ्जकत्वे सति रसव्यञ्जकत्वात्, सक्तुरसाभिव्यञ्जकोदकव
    त् । रसनसन्निकर्षे व्यभिचारवारणाय द्रव्यत्वं देयम् ।
    भाषा-यह कल्पना अनुमानसे करी जाती है. तथाहि गन्धादिकोंका न उद्बोधक
    होकर केवल रसहीका उद्बोधक होनेसे-रसना इन्द्रिय जलीय प्रतीत होताहै. दृष्टान्त
    में जैसे जल सक्तुओं ( सत्तूओं ) के गन्धादिका न उद्बोधक होकर केवल रसहीका
    उद्बोधक है, गन्धादिकोंका न उद्बोधक होकर केवल रसका उद्बोधक रसना वस्तुका

परिच्छेदः १ ] भाषाटीकासमेता. ५९
संयोगभी है. उसमें पूर्वोक्त हेतुका व्यभिचार है.उसके वारणार्थ हेतुमें "द्रव्यत्वेसति"
यह विशेषण देना उचित है. अर्थात् द्रव्यत्वे सति गन्धादिकोंका न उद्बोधक होकर
केवल रसका उद्बोधक होनेसे रसना इन्द्रिय जलीय है.
विषयं दर्शयति, सिन्धुरिति-
भाषा-'सिन्धु' इत्यादि ग्रन्थसे विषयको दिखलाता है-
-सिन्धुहिमादिर्विषयो मतः ॥ ४० ॥
सिन्धुः समुद्रः । हिमं तुषारः। आदिपदात् सरित्कासारकरकादिः
सर्वो ग्राह्यः ।
भाषा-समुद्र, तुषार (बर्फ), आदि पदसे नदी, सरोवर, करक (गड़ा ), ये सम्पूर्ण
जलीय विषय हैं ॥ ४० ॥
न च हिमकरकयोः कठिनत्वात्पार्थिवत्वमिति वाच्यम्। ऊष्मणा
विलीनस्य तस्य जलत्वस्य प्रत्यक्षसिद्धत्वात् । यद्द्रव्यं यद्द्रव्य-
ध्वंसजन्यमिति व्याप्तेर्जलोपादानोपादेयत्वसिद्धेः। अदृष्टविशेषेण
द्रवत्वप्रतिरोधात् करकादीनां काठिन्यप्रत्ययस्य भ्रान्तित्वात् १॰
शंका-हिमकरकादि कठिन स्पर्शवाले होनेसे पार्थिव प्रतीत होतेहैं. समा-
धान-तेजःसंयोगसे विलीन (गले) हुये हिमकरकादि जलरूपसे साक्षात् प्रतीत
होते हैं. जो (जलरूप) द्रव्य जिस (हिमकरकादि) रूप द्रव्यके ध्वंससे उत्पन्न हो
वह (जल रूप) द्रव्य उस (हिमकरकादिरूप) द्रव्यका उपादानरूपेण (उपा-
देय) ग्रहण होता है, इस व्याप्तिसे हिमकरकादि जलसे अतिरिक्त पदार्थ नहीं है
हिमकरकादिमें द्रवणका प्रतिरोध जीवोंके हानिलाभकारक अदृष्टविशेषसे है, तथा
कठिनस्पर्शकी प्रतीति भ्रान्ति सिद्ध है ॥ ४० ॥
तेजो निरूपयति, स्पर्श उष्ण इत्यादिना-
भाषा-'स्पर्श उष्ण' इत्यादि ग्रन्थसे मूलकार तेजःका निरूपण करता है-
स्पर्श उष्णस्तेजसस्तु-
भाषा-जिसका स्पर्श उष्ण हो वह तेजःपदार्थ है.
उष्णत्वं स्पर्शनिष्ठो जातिविशेषः प्रत्यक्षसिद्धः। इत्थं च जन्यो
१ भ्रान्तित्वं नामातात्विकान्यथाभावेन वस्त्ववगाहनत्वम् ।