न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)
Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda
विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपूर्वोक्त लक्षणानुसार यद्यपि शरीर तथा इन्द्रियकी गणनाभी विषयहीके अन्तर्भूत
करनी उचितहै तथापि जुदा परिगणन केवल शिष्यलोगोंकी बुद्धि विशदार्थ है॥३८॥
जलं निरूपयति, वर्णः शुक्ल इति-
भाषा-'वर्णः शुक्ल' इत्यादि ग्रन्थसे मूलकार जलका निरूपण करता है-
वर्णः शुक्लः-
भाषा-जलका शुक्ल अर्थात् सफेद वर्ण है.
स्नेहसमवायिकारणतावच्छेदकतया जलत्वं जातिः सिद्धयति ।
यद्यपि स्नेहत्वं नित्यानित्यवृत्तितया न कार्यतावच्छेदकम्,
तथापि जन्यस्नेहत्वं तथा बोध्यम् । अथ परमाणौ जलत्वं न
स्यात्, तत्र जन्यस्नेहाभावात्। नित्यस्य स्वरूपयोग्यत्वे फला-
वश्यम्भावनियमादिति चेत्, न । जन्यस्नेहजनकतावच्छेदकत-
या जन्यजलत्वजातेः सिद्धौ, तदवच्छिन्नजनकतावच्छेदकतया
जलत्वजातिसिद्धेः । शुक्लरूपवत्त्वमेव दर्शयितुमुक्तं 'वर्णः शुक्ल'
इति । न तु शुक्लरूपवत्त्वं लक्षणम् ।
भाषा-स्नेहरूप कार्यकी समवायिकारणताकी अवच्छेदक होनेसे जलत्वरूपा
जाति सिद्ध है. यद्यपि स्नेहत्वरूप धर्म नित्य जल तथा अनित्य जल उभयमें वृत्ति
होनेसे कार्यताका अवच्छेदक नहीं हो सकता तथापि जन्यस्नेहत्वरूप धर्म कार्यताका
अवच्छेदक जानना चाहिये. शंका-परमाणुओंमें जलत्वजातिकी सिद्धि न होगी;
क्योंकि वहां जन्य स्नेह नहींहै. यदि स्नेहरूप कार्यके प्रति जलीयपरमाणुओंमें स्वरू-
पयोग्यतारूप कारणता माने तो उस स्वरूपयोग्यतारूप कारणतासे कदाचित् फलभी
१ 'समवायसम्बन्धावच्छिन्न स्नेहत्वावच्छिन्न स्नेहनिष्ठ कार्यता निरूपिता तादात्म्यसम्ब-
न्धावच्छिन्ना या जलनिष्ठा समवायिकारणता सा किंचिद्धर्मावच्छिन्ना कारणतात्वात्' इत्यादि ।
२ 'समवायसम्बन्धावच्छिन्नजन्यस्नेहत्वावच्छिन्न जन्यस्नेहनिष्ठजन्यता निरूपिता । तादात्म्य
सम्बन्धावच्छिन्ना या जन्यजलनिष्ठा समवायिकारणता सा किञ्चिद्धर्मावच्छिन्ना कारणतात्वात्'
इत्यादि ।
३ 'एवं समवायसम्बन्धावाच्छिन्नजन्यजलत्वावाच्छिन्नजन्यजलनिष्ठजन्यता निरूपिता तादा-
म्यसंबन्धावच्छिन्ना या शुद्धजलनिष्ठा समवायिकारणता सा किञ्चिद्धर्मावाच्छिन्ना कारणतात्वात्,
इत्यादि । इन प्रयोगोंसे शुद्धजलत्वजातिकी सिद्धि होती है,