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न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda

विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा

DevanagariHindipublished350 पृष्ठ

पृष्ठ 76, कुल 350 में से

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पृष्ठ 76

५२ - न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ प्रत्यक्ष-
नहीं है. शंका-मृतशरीरमें चेष्टा नहींहै परन्तु शरीर व्यवहार होताहै. समाधान-
यदि ऐसा है तो चेष्टावाला जो अन्त्यावयवि उसमें वर्तनेवाली जो द्रव्यत्वकी व्याप्य
(मानुषत्व आदिजाति) तादृश जातिमत्त्व पूर्वोक्त लक्षणका विवरण करना उचित है. ऐसा
जातिघटित लक्षण करनेसे दोष नहीं. मानुषत्व चैत्रत्वादि जातिको लेकर लक्षणसम-
न्वय होसकताहै. शंका-नृसिंहके शरीरमें कैसे लक्षणसमन्वय होगा? वहां 'नृसिंहत्व'
धर्मको एकव्यक्तिमें रहनेवाला होनेसे जातिरूपता नहींहै. समाधान-नृसिंहशरीरमें
देवत्वजातिको लेकर लक्षणसमन्वय हो सकताहै. शंका--जलीयशरीरोंमें तथा
तैजसशरीरोंमें वर्तनेवाला होनेसे देवत्वधर्मभी जातिरूप नहीं है. समाधान-कल्प-
कल्पान्तरोंके भेदसे नृसिंहके शरीरोंकीभी अनन्त होनेसे लक्षणसमन्वय होसकताहै.
– इन्द्रियं घ्राणलक्षणम् ।
इन्द्रियमिति । घ्राणेन्द्रियं पार्थिवमित्यर्थः ।
भाषा-इन्द्रियोंमेंसे घ्राण नामक इन्द्रिय पृथिवीसे उत्पन्न होताहै.
पार्थिवत्त्वं कथमितिचेत्। इत्थम्। घ्राणेन्द्रियं पार्थिवं रूपादिषुमध्ये
गन्धस्यैव व्यञ्जकत्वात्, कुङ्कुमगन्धाभिव्यञ्जकगोघृतवत् । नच
दृष्टान्ते स्वकीयरूपादिव्यञ्जकत्वादसिद्धिरिति वाच्यम्। परकी-
यरूपाद्यव्यञ्जकत्वस्य तदर्थत्वात् ।
शंका-'घ्राणइन्द्रिय पार्थिव है' इसमें क्या प्रमाणहै? समाधान-जैसे कुंकुम
(केसर) के गन्धक अभिव्यंजक गोघृत कुंकुमके रूपादिकोंका अभिव्यंजक न होकर
केवल कुंकुमके गन्धहीका व्यंजक है और पार्थिवभी है; वैसेही घ्राणइन्द्रियभी
रूपादिकों के मध्यमें केवल गन्धहीका व्यंजक होनेसे पार्थिव सिद्ध होताहै. शंका-
घृतरूप दृष्टान्त कुंकुमयोगसे उसके गन्धका व्यंजक होकर अपने रूपकाभी व्यंज-
क है; इसलिये पूर्वोक्त हेतु दृष्टान्तमें स्वरूपासिद्ध है. समाधान-परकीयरूपा-
दिकोंके अव्यंजक होकर केवल गन्धहीके व्यंजक होना पूर्वोक्त हेतुका अर्थ है.
ऐसा हेतु घृतरूप दृष्टान्तमें सिद्ध है; क्योंकि घृत अपनेसे पर कुंकुमके रूपादिकोंका
व्यंजक न होकर केवल गन्धहीका व्यंजकहै.
न च नवशरावगन्धव्यञ्जकजलेनैकान्तिकत्वमिति वाच्यम्,
तस्य सक्तुरसाभिव्यञ्जकत्वात्। यद्वा परकीयेति न देयं वायूपनी-