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सर्वकोश
न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda

विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा

DevanagariHindipublished350 पृष्ठ

पृष्ठ 83, कुल 350 में से

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पृष्ठ 83

परिच्छेदः १ ] भाषाटीकासमेता. ५९
संयोगभी है. उसमें पूर्वोक्त हेतुका व्यभिचार है.उसके वारणार्थ हेतुमें "द्रव्यत्वेसति"
यह विशेषण देना उचित है. अर्थात् द्रव्यत्वे सति गन्धादिकोंका न उद्बोधक होकर
केवल रसका उद्बोधक होनेसे रसना इन्द्रिय जलीय है.
विषयं दर्शयति, सिन्धुरिति-
भाषा-'सिन्धु' इत्यादि ग्रन्थसे विषयको दिखलाता है-
-सिन्धुहिमादिर्विषयो मतः ॥ ४० ॥
सिन्धुः समुद्रः । हिमं तुषारः। आदिपदात् सरित्कासारकरकादिः
सर्वो ग्राह्यः ।
भाषा-समुद्र, तुषार (बर्फ), आदि पदसे नदी, सरोवर, करक (गड़ा ), ये सम्पूर्ण
जलीय विषय हैं ॥ ४० ॥
न च हिमकरकयोः कठिनत्वात्पार्थिवत्वमिति वाच्यम्। ऊष्मणा
विलीनस्य तस्य जलत्वस्य प्रत्यक्षसिद्धत्वात् । यद्द्रव्यं यद्द्रव्य-
ध्वंसजन्यमिति व्याप्तेर्जलोपादानोपादेयत्वसिद्धेः। अदृष्टविशेषेण
द्रवत्वप्रतिरोधात् करकादीनां काठिन्यप्रत्ययस्य भ्रान्तित्वात् १॰
शंका-हिमकरकादि कठिन स्पर्शवाले होनेसे पार्थिव प्रतीत होतेहैं. समा-
धान-तेजःसंयोगसे विलीन (गले) हुये हिमकरकादि जलरूपसे साक्षात् प्रतीत
होते हैं. जो (जलरूप) द्रव्य जिस (हिमकरकादि) रूप द्रव्यके ध्वंससे उत्पन्न हो
वह (जल रूप) द्रव्य उस (हिमकरकादिरूप) द्रव्यका उपादानरूपेण (उपा-
देय) ग्रहण होता है, इस व्याप्तिसे हिमकरकादि जलसे अतिरिक्त पदार्थ नहीं है
हिमकरकादिमें द्रवणका प्रतिरोध जीवोंके हानिलाभकारक अदृष्टविशेषसे है, तथा
कठिनस्पर्शकी प्रतीति भ्रान्ति सिद्ध है ॥ ४० ॥
तेजो निरूपयति, स्पर्श उष्ण इत्यादिना-
भाषा-'स्पर्श उष्ण' इत्यादि ग्रन्थसे मूलकार तेजःका निरूपण करता है-
स्पर्श उष्णस्तेजसस्तु-
भाषा-जिसका स्पर्श उष्ण हो वह तेजःपदार्थ है.
उष्णत्वं स्पर्शनिष्ठो जातिविशेषः प्रत्यक्षसिद्धः। इत्थं च जन्यो
१ भ्रान्तित्वं नामातात्विकान्यथाभावेन वस्त्ववगाहनत्वम् ।