सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda

विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा

DevanagariHindipublished350 पृष्ठ

पृष्ठ 79, कुल 350 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 79

परिच्छेदः १ ] भाषाटीकासमेता. ५५
अवश्य होना चाहिये, सो तो नहीं होता; याते स्नेहरूप कार्यकी समवायिकारणताकी
अवच्छेदक एक अनुगत जलत्व जातिकी सिद्धि नहीं होसकती. समाधान-जन्य-
स्नेहनिष्ठ जन्यता निरूपित जो जन्यजलनिष्ठा जनकता तादृश जनकताकी अवच्छे-
दक होनेसे जन्यजलमें जलत्वजाति सिद्ध हुए पश्चात् जन्यजलनिष्ठ जन्यतानिरू-
पित जो शुद्ध जलनिष्ठा जनकता तादृश जनकताकी अवच्छेदक होनेसे शुद्ध जल-
त्वजातिकी सिद्धि होतीहै. जलका रूप श्वेत है, केवल यह दिखलानेके लिये मूलमें
“वर्णः शुक्लः” यह पाठ लिखा है; किन्तु श्वेतरूपवत्त्व जलका लक्षण नहीं है.
अथवा नैमित्तिकद्रवत्ववदवृत्तिरूपवद्वृत्तिद्रव्यत्वसाक्षाद्व्याप्य-
जातिमत्त्वम्, अभास्वरशुक्लेतररूपासमानाधिकरणरूपवद्वृत्तिद्र-
व्यत्वसाक्षाद्व्याप्यजातिमत्त्वं वा तदर्थः । तेन स्फटिकादौ ना-
तिव्याप्तिः ।
भाषा-अथवा नैमित्तिक द्रवणवाले जो 'पृथिवी तेजः'उनमें न वर्तनेवाली तथा रूपवा-
लेंमें वर्तनेवाली जो द्रव्यत्वकी साक्षात् व्याप्य 'जलत्व' जाति तादृश जातिवाले होना
जलका लक्षण है; किंवा अप्रकाशक श्वेतरूपसे इतर जो 'नीलपीतादि तथा प्रकाशक
श्वेतरूप'उनका असमानाधिकरण होकर रूपवद् जो जलउसमें वर्तनेवाली जो द्रव्यत्वकी
साक्षात् व्याप्य जलत्वजाति तादृश जातिमत्ताही पूर्वोक्त “वर्णः शुक्लः” इस ग्रन्थका
अर्थ है. एवं लक्षण करनेसे स्फटिकमणिआदिमें अतिव्याप्ति नहींहै. अन्यथा शुक्ल
वर्णवत्त्वेन स्फटिकमणिरूप पृथिवीमें अतिव्याप्ति स्पष्टही थी.
-रसस्पर्शौ जले मधुरशीतलौ ।
भाषा-जलमें रस तथा स्पर्श यथाक्रम मधुर तथा शीतल है.
रसस्पर्शाविति । जलस्य मधुर एव रसः। शीत एव स्पर्शः । ति-
क्तरसवदवृत्तिमधुरवद्वृत्तिद्रव्यत्वसाक्षाद्व्याप्यजातिमत्त्वं तदर्थः,
तेन शर्करादौ नातिव्याप्तिः । ननु शुक्लरूपवत्त्वमेवेति कुतः,
कालिन्दीजलादौ नीलोपलब्धेरिति चेत्,न । नीलजनकतावच्छे-
दिकायाः पृथिवीत्वजातेरभावाज्जले नीलरूपासम्भवात् । का-
लिन्दीजले नीलत्वप्रतीतिस्त्वाश्रयौपाधिकी । अतएव वियति
विक्षेपे धवलिमोपलब्धिः ।