न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)
Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda
विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा
पृष्ठ 77, कुल 350 में से
संदर्भ में पढ़ेंपरिच्छेदः १ ] भाषाटीकासमेता. ५१
तसुरभिभागस्य दृष्टान्तत्वसम्भवात्। न च घ्राणेन्द्रियसन्निकर्षस्य
गन्धमात्रव्यञ्जकत्वात्तत्राव्यभिचार इति वाच्यम्, द्रव्यत्वे सती-
ति विशेषणात् ॥
शंका—पूर्वोक्त हेतु जलमें व्यभिचारी है; क्योंकि जलभी नवीन शराव (प्याले)
के गन्धहीका व्यंजक है. समाधान—नवीन शरावके गन्धका व्यंजक जल केवल
गन्धहीका व्यंजक नहीं है, किन्तु सक्तु ( सत्तु ) के रसकाभी व्यंजक है; याते पूर्वोक्त
हेतु जलमें व्यभिचारी नहीं अथवा लाघवानुरोधसे पूर्वोक्त हेतुमें 'परकीय' यह पद न
देना और घृतको दृष्टान्तभी न रखना चाहिये. वायुवेगसे देशान्तरमें प्राप्त जो पुष्पा-
दिकोंके सुगन्धितभाग वे दृष्टान्त बन सकतेहैं; क्योंकि वे रूपादिकोंके मध्यमें
केवल गन्धहीके व्यंजक हैं और पार्थिवभी हैं. शंका—घ्राणइन्द्रियका जो अपने गन्ध-
रूप विषयके साथ 'स्वसंयुक्तसमवाय' संबन्ध है उसको केवल गन्धहीका व्यंजक
होनेसे उसी संबन्धमें पूर्वोक्त हेतुका व्यभिचार होगा. समाधान—पूर्वोक्तहेतुमें 'द्रव्य
त्वे सति' यह विशेषण देना उचित है अर्थात् द्रव्य होकर रूपादिकोंके मध्यमें गन्ध-
हीका व्यंजक होना चाहिये. एवं पूर्वोक्त संबन्ध द्रव्य नहीं, याते दोष नहीं.
विषयो द्व्यणुकादिश्च ब्रह्माण्डान्त उदाहृतः ॥ ३८ ॥
भाषा—द्व्यणुकादिसे लेकर ब्रह्माण्डपर्य्यन्त विषयरूपा पृथ्वी है ॥ ३८ ॥
विषय इति । उपभोगसाधनं विषयः। सर्वमेव हि कार्यजात-
मदृष्टाधीनम् । यत्कार्यं यददृष्टाधीनं तत्तदुपभोगं साक्षात् प-
रम्परया वा जनयत्येव । न हि बीजप्रयोजनाभ्यां विना कस्य
चिदुत्पत्तिरस्ति, तेन द्व्यणुकादि ब्रह्माण्डान्तं सर्वमेव विषयो
भवति । शरीरेन्द्रिययोर्विषयत्वेपि प्रकारान्तरोपन्यासः शि-
प्यबुद्धिवैशद्यार्थः ॥ ३८ ॥
भाषा—सुखदुःखसाक्षात्कारके प्रयोजकका नाम विषय है. साक्षात् अथवा परंप-
रासंबन्धसे कार्यसंपादकका नाम प्रयोजक है. सम्पूर्ण कार्यसमुदाय जीवोंके अदृ-
ष्टोंके अधीनहै. जो कार्य जिस जीवके जिस अदृष्टके अधीन है वह कार्य उसी जीवको
उसी अदृष्टके अनुसार साक्षात् अथवा परम्परासम्बन्धसे सुखदुःख साक्षात्कारका प्रयो-
जक होताहै. इस संसारमें कारण अथवा प्रयोजनसे विना किसी वस्तुकीभी उत्पत्ति
नहीं है; याते द्व्यणुकादिसे लेकर ब्रह्माण्डपर्य्यन्त सम्पूर्ण विषय होसकताहै. विषयके