न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)
Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda
विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५६ न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ प्रत्यक्ष-
भाषा-अर्थात् जलमें रस मधुरही है. तथा स्पर्श शीतही है. इसकाभी तिक्तादि
रसवालेमें न वर्तनेवाली तथा मधुररसवालेमें वर्तनेवाली जो द्रव्यत्वकी साक्षात् व्याप्य
जलत्वजाति तादृश जातिमत्ता जलका लक्षण है, ऐसा जातिघटित लक्षण करना
उचित है. ऐसा कहनेसे चीनी शर्करादिमें अतिव्याप्तिभी नहींहै. क्योंकि ये पार्थिव
हैं. इनमें रहनेवाली पृथ्वीत्व जाति तिक्तादिरसवालेमें न वर्तनेवाली नहींहै, किन्तु
वर्तनेवालीही है; याते जातिघटित लक्षणकी वहां प्रसक्ति नहींहै. शंका-'जलका
शुक्लही रूप है' यह कैसे निश्चय किया जावे? क्योंकि यमुनाके जलमें नीलरूपभी
दिखाईदेताहै. समाधान-नीलरूपनिष्ठ जन्यता निरूपिता जो जनकता तादृश
जनकताकी अवच्छेदक जो पृथिवीत्वजाति उसका जलमें अभाव होनेसे जलमें नील
रूपका सम्भव नहीं होसकता.यमुनाके जलमें नीलरूपकी प्रतीति तो पृथ्वीसम्बन्धसे
औपाधिकी है अर्थात् नीचेकी पृथिवी नीली है उसीकी नीलता जलमें दीख पड़ती है.
इसीसे यमुनाके जलको यदि ऊपरको फेंके तो श्वेत प्रतीत होता है.
अथ जले माधुर्ये किं मानं, न हि प्रत्यक्षेण कोऽपि रसस्तत्रानुभूय-
ते, नच नारिकेलजलादौ माधुर्यमुपलभ्यत एवेति वाच्यम् ।
तस्याश्रयोपाधिकत्वात् । अन्यथा जम्बीरजलादावम्लादिरसोप-
लब्धेरम्लादिमत्त्वमपि स्यादिति चेत्, न। हरीतक्यादिभक्षणस्य
जलरसव्यञ्जकत्वात् । नच हरीतक्यामेव जलोष्णसंयोगाद्रसा-
न्तरोत्पत्तिरिति वाच्यम् । कल्पनागौरवात् ।
शंका-जलके मीठेपनेमें क्या प्रमाण है? रासनज प्रत्यक्षसे तो जलमें किसी
रसकीभी प्रतीति नहीं होती. यदि कहो कि नारियल तथा इक्षु आदिका जल मधुर
ही होताहै, तो युक्त नहीं; क्योंकि वह मधुरता पृथ्वी सम्बन्धसे पृथिवीहीकीहै जलकी
नहीं. (अन्यथा) निम्बु गलगलादिके रसमें आम्ल ( खट्टा) रसभी प्रतीतहोता है वहभी
जलमें मानना चाहिये.समाधान-जलमें अनुद्बुद्ध मधुर रस है. हरीतकी(हरड़) या
आमला खानेके पश्चात् जल पीनेसे उसमें मधुरता उद्बुद्ध होतीहै.शंका-जल तथा
ऊष्म ( मुखकी भाफ ) के सम्बन्धसे हरीतकीमें ही रसान्तरकी उत्पत्ति मान लीजाय
तो क्या दोष है? समाधान-कल्पनागौरव है. अर्थात् फलादिरूप पृथिवीमें रसकी
उत्पत्ति तेजःसंयोगसे देखी जाती है और यदि पूर्वोक्त हरीतकीके उदाहरणके अनु-
रोधसे जलके संयोगकोभी पृथिव रसका उत्पादक माना जाय तो यह एक जुदा
कार्यकारणभाव माननेमें कल्पनागौरव है,