न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)
Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda
विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५८ न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ प्रत्यक्ष-
वही स्वाभाविक द्रवत्वरूपा जाति है.तैलादिकोंमेंभी द्रवणगुण जलहीका है स्नेहगुण
की अधिकतासे दहनानुकूलता तैलमें है, इस वार्त्ताको ग्रन्थकार आगे कहेगा.
नित्यतादि प्रथमवत्-
भाषा-जलमें नित्य अनित्यादि यावत् व्यवहार प्रथमवत् करने चाहिये,
प्रथमवदिति । पृथिव्या इवेत्यर्थः।तथाहि । जलं द्विविधं नित्यम-
नित्यं च । परमाणुरूपं नित्यम्, द्व्यणुकादिकं सर्वमनित्यम
वयवसमवेतं च । अनित्यमपि त्रिविधं शरीरेन्द्रियविषयभेदा त् ।
भाषा-अर्थात् पृथिवीवत् जलभी नित्य अनित्य भेदसे दो प्रकारका है,जो नित्य
है वह परमाणुरूप है, शेष द्व्यणुकादिरूप सम्पूर्ण अनित्य है तथा अवयवोंमें समवाय
सम्बन्धसे रहता है. शरीरभेदसे तथा इन्द्रिय भेदसे तथा विषयभेदसे अनित्यभी
तीन प्रकारका है.
पृथिवीतो यो विशेषस्तमाह, किंत्विति-
भाषा-'किंतु' इत्यादि ग्रंथसे पृथिवीसे जो विशेष है वह कहता है--
- किंतु देहमयोनिजम् ।
भाषा--पृथिवीसे जलमें इतना भेद है कि जलका शरीर योनिसे पैदा नहीं होता,
अयोनिजमिति । अयोनिजमेवेत्यर्थः । जलीयं शरीरमयोनिजं
वरुणलोके प्रसिद्धम् ।
भाषा-जलसे उत्पन्न होनेवाला शरीर योनिसे पैदा नहीं होता यह वार्ता वरुण-
लोकमें प्रसिद्ध है ।
इन्द्रियं रसनं-
भाषा-जलसे उत्पन्न होनेवाला इन्द्रिय रसना है.
इन्द्रियमिति । रसनं जलीयमित्यर्थः।तथाहि रसनं जलीयं गन्धा-
द्यव्यञ्जकत्वे सति रसव्यञ्जकत्वात्, सक्तुरसाभिव्यञ्जकोदकव
त् । रसनसन्निकर्षे व्यभिचारवारणाय द्रव्यत्वं देयम् ।
भाषा-यह कल्पना अनुमानसे करी जाती है. तथाहि गन्धादिकोंका न उद्बोधक
होकर केवल रसहीका उद्बोधक होनेसे-रसना इन्द्रिय जलीय प्रतीत होताहै. दृष्टान्त
में जैसे जल सक्तुओं ( सत्तूओं ) के गन्धादिका न उद्बोधक होकर केवल रसहीका
उद्बोधक है, गन्धादिकोंका न उद्बोधक होकर केवल रसका उद्बोधक रसना वस्तुका