न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)
Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda
विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा
२५४ न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ गुण-
गविरोधिविभागभी मान लिया जाय तो उस विभागसे कमलके आरम्भकसंयोगके
नाश होनेके पश्चात् कमलका विनाशभी हुआ चाहिये परन्तु ऐसा होता देखनेमें
नहीं आता.
तस्माद्यदीदमनारम्भकसंयोगप्रतिद्वन्द्विविभागं जनयेत्, तदा
आरम्भकसंयोगप्रतिद्वन्द्विविभागं न जनयेत् ।
भाषा-इसलिये आरम्भकसंयोगविरोधि विभागजनक क्रियाको तथा अनारम्भ-
कसंयोगविरोधि विभागजनक क्रियाको एक मानना उचित नहीं है;किन्तु यही मानना
उचित है कि-क्रिया जिस कालमें अनारम्भकसंयोगविरोधि विभागको उत्पन्न करती है
उस कालमें आरम्भक संयोगके विरोधिविभागको नहीं उत्पन्न करती.
न च कारणविभागेनैव द्रव्यनाशात्पूर्वं कुतो देशान्तरविभागो
न जन्यत इति वाच्यम्। आरम्भकसंयोगप्रतिद्वन्द्विविभागवतो
ऽवयवस्य सति द्रव्ये देशान्तरविभागसम्भवात् ॥ १ ॥
शंका-कारणविभागहीसे अर्थात् कपालद्वयविभागादिहीसे घटादि द्रव्यनाशसे
पहले देशान्तरविभागभी क्यों नहीं उत्पन्न होता ? यदि होता है तो "ततो घटनाशः,
ततस्तैनैक कपालविभागेन सकर्मणः कपालस्याकाशविभागो जन्यते" यह पूर्वकथन
आपका असङ्गत होगा. समाधान-कपालद्वय विभागादिसे घटादिद्रव्यनाशके पहलें
देशान्तर विभाग उत्पन्न नहीं होसकता; क्योंकि आरम्भकसंयोगके ( प्रतिद्वंद्वि )
विरोधिविभागवाले कपालादि अवयवका ( सति द्रव्ये ) द्रव्यनाशके बिना देशान्तरकें
साथ विभाग होना असम्भव है १ ।
द्वितीयस्तावत् । यत्र हस्तक्रियया हस्ततरुविभागस्ततः शरी-
रेडपि विभक्तप्रत्ययो भवति तत्र च शरीरतरुविभागे हस्तक्रिया
न कारणं व्यधिकरणत्वात्,शरीरे तु क्रिया नास्त्येव,अवयविका
र्मणो यावदवयवकर्मनियतत्वात् । अतस्तत्र कारणाकारणवि-
भागेन कार्याकार्यविभागो जन्यत इति । २ ।
भाषा-एवं द्वितीयका उदाहरण जैसे जहां(हस्त)हाथमें क्रिया होनेसे हाथ वृक्षका
विभाग हुआहै. पश्चात् उसीसे शरीरमेंभी विभक्त (प्रत्यय) प्रतीति होतीहै, वहां शरीर
वृक्षके विभागमें हस्तक्रियाको कारणता नहीं है क्योंकि इन दोनोंका परस्पर एक
अधिकरण नहीं है और कार्यकारणभाव नियमसे समानाधिकरण पदार्थोंहीका होताहै-
परिच्छेदः ५ ] भाषाटीकासमेता. २५५
शरीरवृक्षके विभागके प्रति शरीरक्रियाको कारणता कहें तो वहभी ठीक नहीं क्योंकि
शरीरमें क्रिया हुईही नहीं. भाव यह कि-अवयवीके यावत् अवयवोंमें क्रिया होनेसे
अवयवीमें क्रिया मानी जातीहै, अन्यथा नहीं; इसलिये ऐसे स्थलमें कारणाकारणके
विभागसे कार्याकार्यविभागका उत्पन्न होनाही मानने योग्य है अर्थात् हस्तवृक्षके
विभागहीसे शरीरवृक्षका विभाग उत्पन्न हुआ मानना चाहिये. हस्तवृक्षके विभाग
होनेहीसे शरीरमेंभी विभक्तप्रत्यय होताहै ॥ ३ ॥
अत एव विभागो गुणन्तरम् । अन्यथा शरीरे विभक्तप्रत्ययो न
स्यात्। अतः संयोगनाशेन विभागो नान्यथासिद्धो भवति ॥ १२० ॥
भाषा-इसीलिये विभागभी गुणान्तर है, किन्तु संयोगनाशरूप नहीं है. (अन्यथा)
यदि गुणान्तर न मानें किन्तु संयोग नाशरूपही मानें तो शरीरमें विभक्तप्रत्यय नहीं
होना चाहिये इसलिये संयोगनाशसे विभाग अन्यथा सिद्ध नहीं है ॥ १२० ॥
परापरव्यवहारनिमित्ते परत्वापरत्वे निरूपयति, परत्वं चेति--
भाषा-एवं ' परत्वं ' इत्यादि ग्रन्थसे परापर व्यवहारके निमित्त कारणीभूत
परत्व तथा अपरत्वका निरूपण करतेहैं-
परत्वं चापरत्वं च द्विविधं परिकीर्तितम् ॥
दैशिकं कालिकं चेति मूर्त्त एव तु दैशिकम्॥१२१॥
परत्वं मूर्त्तसंयोगभूयस्त्वज्ञानतो भवेत् ॥
अपरत्वं तदल्पत्वबुद्धितः स्यादितीरितम् ॥१२२॥
भाषा-दैशिक कालिक भेदसे परत्व तथा अपरत्व दोप्रकारका कहा है. उनमेंसे
दैशिक परत्वापरत्व तो मूर्त्तपदार्थहीमें रहते हैं ॥ १२१ ॥ अधिकमूर्त्तसंयोगज्ञा-
नसे परत्व उत्पन्न होताहै. एवं उससे ( अल्प ) न्यून मूर्त्तसंयोगज्ञानसे अपरत्व
उत्पन्न होताहै ॥ १२२ ॥
दैशिकमिति । दैशिकपरत्वं बहुतरमूर्त्तसंयोगान्तरितत्वज्ञानादु-
त्पद्यते । एवं तदल्पीयस्त्वज्ञानादपरत्वमुत्पद्यते । अत्रावधि-
त्वार्थं पञ्चम्यपेक्षा । यथा पाटलिपुत्रात् काशीमपेक्ष्य प्रयागः
परः, पाटलिपुत्रात् कुरुक्षेत्रमपेक्ष्य प्रयागोऽपर इति ॥ १२१॥ १२२॥
भाषा--अनेक मूर्त्तपदार्थोंके परस्पर संयोगसंयोगान्तरज्ञानसे दैशिकपरत्व उत्पन्न
होताहै . एवं परत्वउत्पादक संयोगसंयोगान्तरकी अपेक्षा न्यूनसंयोगसंयोगान्तेक
३५६ न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ गुण-
ज्ञानसे अपरत्व उत्पन्न होताहै. यहां अवधिज्ञानार्थ पञ्चमीविभक्तिकी अपेक्षा है; जैसे
( पाटलिपुत्रात् ) “पटनाकी अवधि मानकर काशीकी अपेक्षा प्रयाग परे है अर्थात्
पटनेमें स्थित पुरुषको काशीकी अपेक्षा प्रयाग दूर है. एवं पटनेहीमें स्थित पुरुषको
कुरुक्षेत्रकी अपेक्षा प्रयाग अपर है अर्थात् समीप है.” इत्याकारक व्यवहारके असा-
धारण निमित्तभूत मूर्तपदार्थोंमें परत्वापरत्व ये दो धर्म रहते हैं ॥ १२१ ॥ १२२ ॥
तयोरसमवायी तु दिक्संयोगस्तदाश्रये ॥
भाषा-उन दैशिक परत्वापरत्वोंका असमवायिकारण दैशिक परत्वापरत्व
आश्रयके साथ दिशाका संयोगरूपही है.
तयोर्दैशिकपरत्वापरत्वयोः । असमवायी असमवायिकारणम् ।
तदाश्रये दैशिकपरत्वापरत्वाश्रये ।
भाषा-मूलनिष्ठ ‘तयोः’ इस पदसे दैशिक परत्वापरत्त्वका ग्रहण है. एवं
‘असमवायी’ पदसे असमवायिकारणका ग्रहण है. ‘तदाश्रये’ इस पदसे दैशिक
परत्वापरत्वके आश्रय अर्थात् पूर्वोक्तरीतिसे जिन प्रयागादि स्थलोंमें दैशिक परत्वाप-
रत्व उत्पन्न होताहै उसका ग्रहण है.
दिवाकरपरिस्पन्दभूयस्त्वज्ञानतो भवेत् ॥ १२३॥
परत्वमपरत्वं तु तदीयाल्पत्वबुद्धितः ॥
भाषा-एवं सूर्यक्रियाके भूयस्त्वज्ञानसे कालिकपरत्व उत्पन्न होताहै ॥ १२३ ॥
तथा सूर्यक्रियाके अल्पीयस्त्वज्ञानसे कालिकअपरत्व उत्पन्न होताहै.
दिवाकरेति । अत्र परत्वमपरत्वं च कालिकं ग्राह्यम् । यस्य
सूर्यपरिस्पन्दापेक्षया यस्य सूर्यपरिस्पन्दोऽधिकः स ज्येष्ठः, यस्य
न्यूनः स कनिष्ठः । कालिकपरत्वापरत्वे जन्यद्रव्य एव ।
भाषा-( अत्र ) इस प्रकरणमें ‘परत्व’ तथा ‘अपरत्व’ कालिक जानना
चाहिये. ( यस्य ) जिस पीछे उत्पन्न हुए पदार्थके साथ सूर्यक्रियाकी अपेक्षासे
( यस्य ) जिस प्रथम उत्पन्न हुए पदार्थसे सूर्य्यकी क्रिया अधिक सम्बन्ध रखतीहै
वह पदार्थ ज्येष्ठ है अर्थात् अधिक आयुवाला है. एवं जिससे जिसमें न्यून सम्बन्ध
रखतीहै वह उससे कनिष्ठ है अर्थात् कम आयुःवाला है यह कालिक परत्वापरत्व
व्यवहार केवल जन्यद्रव्यहीमें होताहै, औरपदार्थोंमें नहीं होता.
अत्र त्वसमवायी स्यात्संयोगः कालपिण्डयोः १२४॥
परिच्छेदः ५ ] भाषाटीकासमेता, २५७
अत्र कालिकपरत्वापरत्वयोः ॥ १२४ ॥
भाषा-( अत्र ) इस कालिक परत्वापरत्वमें काल ( पिण्ड ) जन्यद्रव्यके संयो-
गको असमवायिकारणता है ॥ १२४ ॥
अपेक्षाबुद्धिनाशेन नाशस्तेषां निरूपितः ॥
तेषां कालिकदैशिकपरत्वापरत्वानाम् ।
भाषा-उन कालिक तथा दैशिक परत्वापरत्वोंका अपेक्षाबुद्धिके नाश होनेसे
नाश होताहै.
क्रमप्राप्तां बुद्धिं निरूपयितुमाह, । बुद्धेरिति-
भाषा-यहां ' बुद्धेः ' इत्यादि ग्रन्थसे क्रमप्राप्त बुद्धिका निरूपण करतेहैं-
बुद्धेः प्रकारः प्रागेव प्रायशो विनिरूपितः ॥ १२५ ॥
अथावशिष्टोऽप्यपरः प्रकारः परिदर्श्यते ॥
अप्रमा च प्रमा चेति ज्ञानं द्विविधमिष्यते ॥१२६॥
भाषा-बुद्धिका प्रकार तो हम बहुलरूपसे पीछे आत्मनिरूपणहीमें कह चुकेहैं
॥ १२५ ॥ परन्तु उसमें जितना कुछ थोड़ासा ( अविशिष्ट ) बाकी है वह यहांभी
दिखलातेहैं. अप्रमा तथा प्रमाभेदसे ज्ञान दोप्रकारका होताहै ॥ १२६ ॥
अप्रमां निरूपयति, तच्छून्य इति-
भाषा-यहां ' तच्छून्ये ' इत्यादि मूलग्रन्थसे अप्रमाज्ञानका निरूपण करतेहैं-
तच्छून्ये तन्मतिर्या स्यादप्रमा सा निरूपिता ॥
तत्प्रपञ्चो विपर्यासः संशयोऽपि प्रकीर्तितः ॥१२७॥
भाषा-( तत् ) रजतत्वादिधर्माभाववाली शुक्तिमें जो ( तन्मतिः ) "रजतत्ववद्
रजतं " इत्याकारक बुद्धि, ऐसी बुद्धिका नाम 'अप्रमा' है. विपर्यय तथा संशय
आत्मकज्ञान उसी अप्रमाआत्मक बुद्धिहीका प्रपञ्च समझना चाहिये ॥ १२७ ॥
तदभाववति तत्प्रकारकं ज्ञानं भ्रम इत्यर्थः । तत्प्रपञ्चो
ऽप्रमाप्रपञ्चः ॥ १२५ ॥ १२६ ॥ १२७ ॥
भाषा-अर्थात् तद्धर्माभाववालेमें जो तद्धर्मप्रकारक ज्ञान उस ज्ञानका नाम 'भ्रम'
है. मूलगत 'तत्प्रपञ्चः' इस पदसे अप्रमाज्ञानका प्रपञ्च समझना चाहिये ॥ १२७ ॥
आद्यो देहेष्वात्मबुद्धिः शङ्खादौ पीततामतिः ॥
२५८ न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ गुण-
भवेन्निश्चयरूपा या-
आद्य इति, विपर्यास इत्यर्थः ।
भाषा-देहमें आत्मबुद्धि, तथा शंखमें पीतबुद्धि, शुक्तिमें रजतबुद्धि, इत्यादि
यदि निश्चयरूपा होय तो उस बुद्धिका नाम 'विपर्ययज्ञान' है.
शरीरादौ यदात्मत्वप्रकारकं ज्ञानं गौरोऽहमित्याकारकमेवं श-
ङ्खादौ 'पीतः शङ्खः' इत्याकारकं यज्ज्ञानं निश्चयरूपं तद्भ्रम इति ।
भाषा-शरीरादिमें जो "गौरोऽहं, श्यामोऽहं" इत्याकारक आत्मत्वप्रकारक
ज्ञान तथा शंखादिमें जो "पीतः शंखः" इत्याकारक पीतत्वप्रकारक ज्ञान यह
यदि निश्चयरूप होय तो उसका नाम 'भ्रम' है-इति ।
-संशयोऽथ प्रदर्श्यते ॥ १२८॥
किंस्विन्नरो वा स्थाणुर्वेत्यादिबुद्धिस्तु संशयः ॥
भाषा-अब संशयात्मक ज्ञानका आकार दिखलातेहैं कि-॥ १२८ ॥ क्या यह
पुरुष है कि स्थाणु है? इत्यादि ज्ञानका नाम 'संशय' है.
किंस्विदिति वितर्के।
भाषा-मूलगत 'किंस्वित्' यह पद वितर्कका बोधक है तथा 'स्थाणुः' यह पद
शाखाच्छिन्नवृक्षका बोधक है. भाव यह कि-'एकस्मिन् धर्मिणि विरुद्धनानाधर्मावगाहि
ज्ञान' का नाम 'संशय' है. उदाहरण इसका 'किंस्वित्' इत्यादि ग्रन्थसे
मूलहीमें है.
निश्चयस्य लक्षणमाह, तद्भावेति-
भाषा-एवं 'तदभाव' इत्यादि ग्रन्थसे प्रमात्मक निश्चयज्ञानका लक्षण कहतेहैं-
तदभावाप्रकाराधीस्तत्प्रकारा तु निश्चयः ॥ १२९ ॥
भाषा-जो धर्म जिसमें नहीं रहता वह उसमें न भासे किन्तु जो धर्म जिस
वस्तुमें विद्यमान है तद्धर्मप्रकारक ज्ञानही होय तो उसका नाम 'निश्चय' अर्थात्
'प्रमाज्ञान' है ॥१२९॥
तदभावाप्रकारकत्वे सति तत्प्रकारकं ज्ञानं निश्चयः॥१२८॥१२९॥
भाषा-अर्थात् शुक्तित्वादि धर्माभावाप्रकारकत्वे सति जो शुक्तित्वप्रकारक
शुक्तिविशेष्यक 'शुक्तिरियं' इत्यादि ज्ञान, उसका नाम 'निश्चय' है; इस लक्षणमें प्रथम
सप्तम्यन्त विशेषण संशयमें अतिव्याप्तिवारणार्थ जानना चाहिये ॥१२८॥१२९॥
परिच्छेदः ५ ] भाषाटीकासमेता. २५९
संशयं लक्षयति, स संशय इति-
भाषा-एवं ' स संशयो ' इत्यादि मूलग्रंथसे संशयका लक्षण दिखलाते हैं-
स संशयो मतिर्या स्यादेकत्राभावभावयोः ॥
भाषा-( एकत्र ) एक धर्मीमें विरुद्धभावाभाव धर्मावगाही ज्ञानका नाम
' संशयज्ञान ' है.
एकधर्मिकविरुद्धभावाभावप्रकारकं ज्ञानं संशय इत्यर्थः ।
भाषा-अर्थात् एक धर्मिविषयक विरुद्धभावाभावप्रकारक ज्ञानका नाम 'संशय'
है. उदाहरण ' किंस्वित् ' इत्यादि मूल है.
साधारणादिधर्मस्य ज्ञानं संशयकारणम् ॥ १३० ॥
भाषा-साधारणादि धर्मका ज्ञान संशयमें कारणीभूत है ॥१३०॥
साधारणेति । उभयसाधारणो यो धर्मस्तज्ज्ञानं संशयकारणम् ।
यथोच्चैस्तरत्वं स्थाणुपुरुषसाधारणं ज्ञात्वा 'अयं स्थाणुर्न वा'
इति सन्दिग्धे । एवमसाधारणधर्मज्ञानमपि कारणम् । यथा श-
ब्दत्वं नित्यानित्यव्यावृत्तं शब्दे गृहीत्वा शब्दो नित्यो न वेति
सन्दिग्धे ।
भाषा-अर्थात् उभयपदार्थ साधारण जो कोई एक धर्म उस धर्मका ज्ञान
संशयका कारण है; जैसे ऊँचापना स्थाणु तथा पुरुष इन दोनोंमें एक जैसा है, उस
ऊँचेपनेको मन्दअन्धकारमें दूरसे देखकर " अयं स्थाणुर्न वा ' इत्याकारक पुरुषकों
सन्देह होताहै. ऐसेही असाधारण धर्मका ज्ञानभी संशयका कारण है; जैसे शब्दत्वध-
र्मकी गगनादि नित्य पदार्थोंसे तथा घटपटादि अनित्य पदार्थोंसे व्यावृत्ति ग्रहण
पूर्वक केवल शब्दमात्र वृत्तित्ता ग्रहण करकेभी " शब्दो नित्यो न वा " इत्या-
कारक पुरुषको सन्देह उत्पन्न होता है.
विप्रतिपत्तिस्तु 'शब्दो नित्यो न वा' इत्यादिशब्दात्मिका न संशय-
कारणम्। शब्दव्याप्तिज्ञानादीनां निश्चयमात्रजनकत्वस्वाभाव्यात्
किंतु तत्र शब्देन कोटिद्वयज्ञानं जन्यते, संशयस्तु मानस एवेति ।
भाषा-यहां यदि कोई कहे कि-' शब्दो नित्यो न वा ' इत्याकारक
वादियोंका ( विप्रतिपत्ति ) विवादही संशयमें कारण है तो यह ठीक नहीं. क्योंकि
'शब्दो नित्यो न वा ' इत्याकारक वादियोंका विवाद शब्दात्मक है और शाब्दज्ञान-
२६० न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ गुण-
में तथा व्याप्तिज्ञानमें स्वभावसे निश्चयमात्र जनकता रहती है किन्तु संशयकारणता
नहीं रहती; ( किन्तु ) परन्तु इतना भेद है कि-ऐसे स्थलमें शब्दसे समरूपेण
कोटिद्वयावगाही ज्ञान उत्पन्न होता है; तदनन्तर वहांही मानसिक संशय ज्ञान उत्पन्न
होता है.
एवं ज्ञाने प्रामाण्यसंशयाद्विषयसंशय इति ।
भाषा-एवं ( ज्ञाने ) इदं जलं इत्यादिज्ञानमें ( प्रामाण्यसंशयात् ) “ इदं
जलत्वप्रकारकं ज्ञानं प्रमा न वा ” इत्यादि प्रामाण्यसंशयसे ( विषय ) “ इदं जलं
न वा ” इत्यादि संशयभी उत्पन्न होता है.
एवं व्याप्यसंशयादपि व्यापकसंशय इत्यादिकं बोध्यम् । किंतु
संशये धर्मिज्ञानं धर्मीन्द्रियसन्निकर्षो वा कारणमिति ॥१३०॥
भाषा-एवं धूमादि व्याप्यमें “ पर्वतो धूमवान्न वा ” इत्याकारक सन्देह
होनेसे वह्निआदि व्यापकमेंभी “ पर्वतो वह्निमान्न वा ” इत्याकारक सन्देह होताहै
इत्यादि औरभी जान लेने; परन्तु संशयमें धर्मीका ज्ञान या धर्मीके साथ इन्द्रियका
सम्बन्ध नियमसे कारणीभूत है ॥ १३० ॥
दोषोऽप्रमाया जनकः प्रमायास्तु गुणो भवेत् ।
भाषा-अप्रमात्मक ज्ञानका उत्पादक दोष है तथा प्रमात्मक ज्ञानका
उत्पादक गुण है.
दोष इति । अप्रमां प्रति दोषः कारणं, प्रमां प्रति गुणः कारणम्।
तत्रापि पित्तादिरूपा दोषा अननुगतास्तेषां कारणत्वमन्वयव्य-
तिरेकाभ्यामेव सिद्धम् । गुणस्य प्रमाजनकत्वं त्वनुमानात्सि-
द्धम् । यथा प्रमा ज्ञानसाधारणकारणभिन्नकारणजन्या जन्यज्ञा-
नत्वादप्रमावत् ।
भाषा-अर्थात् अप्रमाज्ञानके प्रति दोषको कारणता है तथा प्रमाज्ञानके
प्रति गुणको कारणता है; उनमेंभी पित्तादिरूप अनेक दोष अननुगत हैं अर्थात् कहीं
कोई रहता है, कहीं कोई रहता है; उन दोषोंको अप्रमाज्ञानके प्रति कारणता अन्व-
यव्यतिरेकद्वारा सिद्ध है अर्थात् कोई एक दोष विद्यमान होय तो अप्रमाज्ञान उत्पन्न
होता है, न होय तो नहीं होता और गुणको प्रमात्मक ज्ञान जनकता तो अनुमान
द्वारा सिद्ध है; ( यथा ) जैसे अप्रमाज्ञानकी तरह जन्यज्ञान होनेसे प्रमाज्ञानभी
परिच्छेदः ५ ] भाषाटीकासमेता. २६१
अवश्यज्ञानसामान्यकारणसे भिन्न किसी एक कारणसे जन्य है, ऐसा अनुमान कर
सकते हैं. वह ज्ञान सामान्यकारणसे भिन्न कारण गुणही होसकताहै.
न च दोषाभाव एव कारणमस्त्विति वाच्यम्। 'पीतः शङ्खः' इति
ज्ञानस्थलेऽपि पित्तरूपदोषसत्त्वाच्छङ्खप्रमानुत्पत्तिप्रसङ्गात्। वि-
निगमनाविरहादनन्तदोषाभावस्य कारणत्वमपेक्ष्य गुणकारण-
ताया न्याय्यत्वाच्च।
शंका-प्रमाज्ञानके प्रति दोषाभावकोही कारणता मानलें तो हानि क्याहै? समा-
धान- "पीतः शंखः" इत्याकारक ज्ञानस्थलमेंभी पीतरूप दोष विद्यमान है ऐसे
स्थलमें शंखत्वप्रकारक शंखविशेष्यक ज्ञान प्रमात्मक नहीं हुआ चाहिये; क्योंकि
यहां आपके सिद्धान्तानुसार दोषाभावरूप कारण विद्यमान नहीं है और विनिगमना-
विरहसे अर्थात् एकत्र पक्षपातिनीयुक्तिके न होनेसे अनन्तदोषाभावोंको कारणता
माननेकी अपेक्षा केवल गुणमें कारणता माननीही उचित है.
न च गुणसत्त्वेऽपि पित्तेन प्रतिबन्धाच्छङ्के न श्वैत्यज्ञानमतः
पित्तादिदोषाभावानां कारणत्वमवश्यं वाच्यम्,तथा च किं गुण-
स्य हेतुत्वकल्पनयेति वाच्यम् । तथाऽप्यन्वयव्यतिरेकाभ्यां
गुणस्यापि हेतुत्वसिद्धेः।
शंका-प्रमाज्ञानोत्पादक गुणके विद्यमान होनेसेभी पीतरूप दोषको प्रतिबन्धक
होनेसे शंखमें श्वेतताका ज्ञान नहीं होता, इसलिये पित्तादि दोषाभावोंकोभी कारणता
अवश्य माननी चाहिये. एवं यदि दोषाभावमें अवश्य कारणता कॢप्त है तो गुणोंमें
कारणता पृथक् कल्पना करनेसे क्या लाभहै? समाधान-तथापि अन्वयव्यतिरेकद्वारा
गुणोंमेंभी कारणता सिद्ध है. भाव यह कि-पित्तादि दोषाभावस्थलमेंभी विशेषणवद्विशे-
ष्यके साथ इन्द्रियसन्निकर्परूप गुणके न रहनेसे शंखमें 'पीतः' इत्याकारक ज्ञान प्रमा
नहीं होसकता; इसलिये दोषाभावसे गुण अन्यथासिद्ध नहीं होसकता.
एवं 'भ्रमं प्रति गुणाभावः कारणम्' इत्यस्यापि सुवचत्वाच्च ।
भाषा-(एवं) यदि अन्वयव्यतिरेक होनेसेभी गुणोंको अन्यथासिद्ध मानों तो
भ्रमज्ञानके प्रतिभी गुणाभावहीको कारणता होनी चाहिये तथा दोषको अन्यथासिद्ध
मानना चाहिये यह कथनभी सुवच होसकताहै.
तत्र दोषाः के इत्याकांक्षायामाह, पित्तेति-
२६२ न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ गुण-
भाषा-इस प्रसङ्गमें दोष कौन हैं ? ऐसी आकांक्षाको लेकर ‘ पित्त ’ इत्यादि
मूलग्रन्थसे दोषोंका निरूपण करतेहैं—
पित्तदूरत्वादिरूपो दोषो नानाविधो मतः ॥१३१॥
भाषा-पित्तदूरत्वादिरूप दोष इस प्रकरणमें अनेक प्रकारके हैं ॥ १३१ ॥
क्वचित्पीतादिभ्रमे पित्तं दोषः, क्वचिच्चन्द्रादेः स्वल्पपरिमाणभ्रमे
दूरत्वं दोषः, क्वचिच्च वंशोरगभ्रमे मण्डूकवसाञ्जनमित्येवंरूपा-
दोषा अननुगता एव भ्रान्तिजनका इत्यर्थः ॥ १३१ ॥
भाषा-कहीं “ पीतः शंखः ” इत्यादिज्ञानस्थलमें पित्तरूप दोष है और कहीं
“ वितस्तिपरिमाणकश्चन्द्रः” इत्यादि ज्ञानस्थलमें दूरत्वरूप दोष है, एवं कहीं ( वंश )
बांसकी यष्टीमें सर्पभ्रमापादक मण्डूकवसाञ्जनरूप दोष है; इत्यादि अनेक प्रकारके
अननुगत दोष भ्रान्तिज्ञानके जनक हैं ॥ १३१ ॥
अथ के गुणा इत्याकांक्षायां प्रत्यक्षादौ क्रमशोगुणान् दर्शयति,
प्रत्यक्षेति—
भाषा-एवं इस प्रसङ्गमें गुण कौन हैं ? ऐसी आकांक्षाको लेकर ‘ प्रत्यक्षे ’
इत्यादि मूलसे प्रत्यक्षादि ज्ञानोंमें यथाक्रमानुसारेण ग्रन्थकार गुणोंको दिखलाता है—
प्रत्यक्षे तु विशेष्येण विशेषणवता समम् ॥
सन्निकर्षो गुणस्तु स्यादथ त्वनुमितौ पुनः॥१३२॥
पक्षे साध्यविशिष्टे तु परामर्शो गुणो भवेत् ॥
शक्ये सादृश्यबुद्धिस्तु भवेडुपमितौ गुणः ॥१३३॥
शाब्दबोधे योग्यतायास्तात्पर्यस्याथ वा प्रमा ॥
गुणः स्यात्—
भाषा-विशेषणविशिष्ट विशेष्यके साथ जो नेत्रादि इन्द्रियोंका सन्निकर्ष वह
प्रत्यक्षात्मक ज्ञानका जनक गुण है ॥ १३२ ॥ एवं साध्यविशिष्ट पक्षमें पूर्वोक्त
परामर्शामक ज्ञान अनुमितिज्ञानका जनक गुण है, गवयादि शक्यमें जो “ गोसदृशो
गवयपदवाच्यः” इत्याकारक सादृश्यबुद्धि, वह उपमितिज्ञानका जनक गुण है॥१३३॥
प्रत्यक्षे विशेषणवद्विशेष्यसन्निकर्षो गुणः, अनुमितौ साध्यवति
साध्यव्याप्यवैशिष्ट्यज्ञानं गुण इति । एवमग्रेऽप्यूह्यम् ॥१३३॥
परिच्छेदः ५ ] भाषाटीकासमेता. २६३
भाषा-एवं पूर्वोक्त योग्यताका या वक्ताके तात्पर्यका प्रमात्मकज्ञान शाब्दबोधमें
गुण है. प्रत्यक्षज्ञानमें विशेषणवद्विशेष्यसन्निकर्षही गुणरूप है. एवं अनुमितिज्ञानमें
साध्यवालेमें जो साध्यव्याप्य वैशिष्ट्यज्ञान अर्थात् “ वन्हिव्याप्यधूमवानयं पर्वतः ”
इत्यादि परामर्शात्मक ज्ञान वही गुणरूप है. ऐसेही आगेभी जानलेना अर्थात् उपमिति
ज्ञानमें शक्यमें सादृश्यबुद्धिही गुणरूप है. एवं शाब्दबोधमें योग्यताज्ञान या तात्पर्यका
यथार्थज्ञानही गुणरूप है--इतिं ।
प्रमां निरूपयति, भ्रमभिन्नमिति-
भाषा-एवं ' भ्रमभिन्न ' इत्यादि ग्रन्थसे मूलकार प्रमाका निरूपण करते हैं-
-भ्रमभिन्नं तु ज्ञानमत्रोच्यते प्रमा ॥ १३४ ॥
भाषा-इस प्रकरणमें भ्रमभिन्नज्ञानकी प्रमा संज्ञा है ॥ १३४ ॥
ननु यत्र शुक्तिरजतयोः 'इमे रजते' इति ज्ञानं जातं तत्र रजतांशे
ऽपि प्रमा न स्यात् तज्ज्ञानस्य भ्रमभिन्नत्वाभावादत आह,
अथवेति-
शंका-जहां शुक्ति तथा रजत उभयमें “ इमे रजते ” इत्याकारक ज्ञान हुआ है
वहां इस ज्ञानको रजतांशमेंभी प्रमात्व नहीं हुआ चाहिये. क्योंकि यह ज्ञान भ्रम
भिन्न नहीं है किन्तु शुक्त्यंशमें भ्रमरूपही है. समाधान-इसका उत्तर 'अथवा'
इत्यादि ग्रन्थसे मूलकार स्वयं कहते हैं-
अथवा तत्प्रकारं यज्ज्ञानं तद्वद्विशेष्यकम् ॥
तत्प्रमा-
भाषा-अथवा तत्प्रकारक तद्वद्विशेष्यक ज्ञानका नाम 'प्रमाज्ञान' है.
तद्वद्विशेष्यकं तत्प्रकारकं ज्ञानं प्रमेत्यर्थः ।
भाषा-अर्थात् घटत्ववद्विशेष्यक घटत्वप्रकारक ज्ञानका नाम 'प्रमाज्ञान' है. ऐसेही
वस्तुमात्रके ज्ञानमें जानना चाहिये.
अथैवं स्मृतेरपि प्रमात्वं स्यात्ततः किमिति चेत्तथा सति तत्कर-
णस्यापि प्रमाणान्तरत्वं स्यादिति चेत् । नायथार्थानुभवकरणत्व
स्यैव प्रमाणत्वेन विवक्षणात् ।
शंका-इस लक्षणसे स्मृतिज्ञानकोभी प्रमात्व हुआचाहिये; क्योंकि स्मृतिभी
तद्वद्विशेष्यक तत्प्रकारकाही होतीहै. समाधान-यदि मानभी लें तो हानि क्या है ?
२६४ न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ गुण-
शंका-ऐसे माननेसे स्मृतिके कारणीभूत अनुभवको या संस्कारकोभी प्रमाणान्तर मानना
होगा. समाधान-'प्रमाण' नाम तौ हमको यथार्थ अनुभवके करणहीका विवक्षित है.
स्मृतिज्ञान यथार्थ अनुभव नहींहै. इसलिये उसके कारणको प्रमाणभी नहीं कहसकते.
इदं तु बोध्यम् । येन सम्बन्धेन यद्वत्ता तेन सम्बन्धेन तद्वद्विशे-
ष्यकत्वं तेन सम्बन्धेन तत्प्रकारकत्वं वाच्यम्, तेन कपालादौ
संयोगादिना घटादिज्ञाने नातिव्याप्तिः ।
भाषा-(इदं तु बोध्यम्) इतना यहां औरभी जानना चाहिये कि-जिस वस्तुकों
जिस सम्बन्धसे यद्धर्मवत्ता है उसमें उसीसम्बन्धसे तद्वद्विशेष्यकत्व तथा उसी सम्ब-
न्धसे तत्प्रकारकत्व समझना चाहिये. एतादृश निवेशसे “संयोगेन घटवन्तौ कपालौ”
इत्यादि भ्रमज्ञानमें प्रमालक्षणकी अतिव्याप्ति नहीं होसकती.
एवं सति निर्विकल्पकं प्रमा न स्यात् तस्य सप्रकारकत्वाभा-
वादत आह, न प्रमेति-
शंका--ऐसे स्वीकार करनेसे निर्विकल्पक ज्ञान प्रमा नहीं होसकता; क्योंकि वह
किञ्चित्प्रकारक नहीं है. समाधान-इसका उत्तर मूलकार स्वयं कहते हैं-
-न प्रमा नापि भ्रमः स्यान्निर्विकल्पकम् ॥ १३५ ॥
प्रकारतादिशून्यं हि सम्बन्धानवगाहि तत् ॥
भाषा-निर्विकल्पक ज्ञानको प्रमारूप या भ्रमरूप नहीं कहसकते ॥ १३५ ॥
क्योंकि उसका स्वरूपासम्बन्धानवगाहि तथा विशेष्यताप्रकारतासे रहित है.
ननु वृक्षे कपिसंयोगज्ञानं भ्रमः स्यात् प्रमा च स्यादिति चेत् ।
नाप्रतियोगिव्यधिकरणसंयोगाभाववति संयोगज्ञानस्य भ्रमत्वात् ।
शंका-आपके कथनानुसार “वृक्षः कपिसंयोगी” इत्याकारक ज्ञानको भ्रम-
रूपभी होना चाहिये तथा प्रमारूपभी होना चाहिये; क्योंकि वृक्षमें शाखावच्छेदेन
कपिसंयोग हैभी, तथा मूलावच्छेदेन नहींभी है. समाधान--कपिरूप प्रतियोगीके
व्यधिकरण कपिसंयोगाभाव वालेमें यदि कपिसंयोगका ज्ञान होय तो वह ज्ञान
भ्रमरूप होसकताहै; अन्यथा नहीं.
न च वृक्षे कपिसंयोगाभावावच्छेदेन संयोगज्ञानं भ्रमो न स्यात्,
तत्र संयोगाभावस्य प्रतियोगिसमानाधिकरणत्वादिति वाच्यम् !
परिच्छेदः ५ ] भाषाटीकामेता. २६५
तत्र संयोगाभावावच्छेदेन संयोगज्ञानस्य भ्रमत्वात् । लक्ष्यस्या-
ननुगमाल्लक्षणाननुगमेऽपि न क्षतिः ।
शंका-जहां वृक्षहीमें कपिसंयोगाभावावच्छेदेन कपिसंयोगज्ञान हुआहै वहां उस
ज्ञानको भ्रमात्मक नहीं हुआ चाहिये; क्योंकि वहां संयोगाभावप्रतियोगि व्यधिकरण
नहीं है,किन्तु प्रतियोगिसमानाधिकरणही है. समाधान-ऐसे स्थलमें संयोगाभाव-
च्छेदेन संयोगज्ञानभी भ्रमरूपही है. शंका-एवं प्रमालक्षणका अननुगम हुआ ?
समा०-लक्ष्यस्थलोंके अननुगम अर्थात् विचित्र भिन्न २ होनेसे लक्षणाननुगम
अर्थात् लक्षण अनेकरूप माननेमेंभी हानि नहीं-इति ।
प्रमात्वं न स्वतो ग्राह्यं संशयानुपपत्तितः ॥ १३६ ॥
भाषा-प्रमाज्ञानमें प्रमात्वधर्म स्वतो ग्रहण नहीं होता यदि ऐसा होय तो संशय
ज्ञान कहींभी नहीं हुआ चाहिये ॥ १३६ ॥
प्रमात्वमिति । मीमांसका हि प्रमात्वं स्वतो ग्राह्यमिति वदन्ति,
तत्र गुरूणां मते ज्ञानस्य स्वप्रकाशरूपत्वात् तज्ज्ञानप्रामाण्यं
तेनैव गृह्यत इति ॥ १ ॥ भट्टानां मते ज्ञानमतीन्द्रियं ज्ञानज-
न्यज्ञातता प्रत्यक्षा तया च ज्ञानमनुमीयते ॥२॥ मुरारिमिश्राणां
मतेऽनुव्यवसायेन ज्ञानं गृह्यते । सर्वेषामपि मते तज्ज्ञानवि-
षयकज्ञानेन तज्ज्ञानप्रामाण्यं गृह्यते ॥ ३ ॥
भाषा-मीमांसकलोग ज्ञानमें प्रमात्वधर्मका स्वतः ग्रहण मानतेहैं. उनमें (गुरु )
प्रभाकरके मतमें ज्ञानस्वप्रकाशरूप है अर्थात् जैसे वस्त्वन्तरको विषय करताहै वैसेही
अपने आपकोभी करताहै. एवं जैसे वह स्वनिष्ठज्ञानत्वादि धर्मोंको स्वयं ग्रहण
करताहै वैसेही स्वनिष्ठ प्रमात्वधर्मकोभी स्वयं ग्रहण करताहै १ । और कुमारलभ-
ट्टके मतमें ज्ञान अतीन्द्रियपदार्थ है किन्तु ज्ञानसे उत्पन्न हुई विषयनिष्ठ ज्ञातता
प्रत्यक्षरूपा है. उस ज्ञातताद्वारा ज्ञानका तथा उसके प्रमात्वका अनुमान होताहै,
उस अनुमानका प्रकार यह है कि.-इयं घटनिष्ठ ज्ञातता घटविशेष्यकघटत्वप्रकारक
ज्ञानजन्या घटवृत्तिघटत्वप्रकारकज्ञाततात्वात् या यद्वृत्तियत्प्रकारिका ज्ञातता सा तद्वि-
शेष्यकतत्प्रकारकज्ञानसाध्या यथा पटे पटत्वप्रकारिका ज्ञातता इति २ । एवं
मुरारिमिश्रके मतमें प्रथमव्यवसायात्मक ज्ञाननिष्ठ यावत् धर्मोंका द्वितीय ( अनुव्य-
वसाय ) ज्ञानविषयक ज्ञानसे ग्रहण होताहै ३ । एवं औरभी सब वादियोंके मतमें
२१
२६६ न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ गुण-
( तत् ) उसी अनुव्यवसायात्मक ज्ञानविषयक ज्ञानसे ( तत् ) उस व्यवसायात्मक
ज्ञानका प्रमात्व ग्रहण होताहै.
विषयनिरूप्यं हि ज्ञानमतो ज्ञानवित्तिवेद्यो विषयस्तन्मतं दूषय-
ति । न स्वतः ग्राह्यमिति ।
शंका-ज्ञानविषयक ज्ञान तो विषयानवगाही है अर्थात् केवलज्ञानहीको विषय
करताहै, उसके विषयको नहीं करता और प्रथम ज्ञानगत प्रमात्वधर्म विषयघटित है
इसलिये वह उसका विषय होना दुर्घट है. समाधान-ज्ञानका यह स्वभाव है
कि-यह विषयनिरूप्यही होताहै अर्थात् विषयविषयकही होताहै; ( अतो ) इसलिये
( ज्ञानवित्ति ) ज्ञानविषयक ज्ञानके घटादि विषयभी (वेद्य) विषय होसकतेहैं. भाव यह
कि-ज्ञानविषयक ज्ञान स्वविषयभूत ज्ञानके विषयको तथा स्वविषयभूत ज्ञानको तद्-
धर्मादिके सहित ग्रहण करता है. ये सब पूर्वोक्त वादियोंके सिद्धान्त हैं. इन सबका
“ प्रमात्वं न स्वतः ग्राह्यं ” इत्यादि ग्रन्थसे मूलकार खण्डन करतेहैं-
संशयेति । यदि ज्ञानस्य प्रामाण्यं स्वतः ग्राह्यं स्यात्तदाऽनभ्या-
सदशापन्नज्ञाने प्रामाण्यसंशयो न स्यात्, तत्र हि यदि ज्ञानं
ज्ञातं तदा तन्मते प्रामाण्यं ज्ञातमेवेति कथं संशयः। यदि तु ज्ञा-
नं न ज्ञातं तदा धर्मिज्ञानाभावात् कथं संशयः, तस्माज्ज्ञाने
प्रामाण्यमनुमेयम् ।
भाषा-( संशयेति ) यदि ज्ञानगत प्रमात्व धर्मका ( स्वतः ) अपने आपसे
ग्रहण होय तो अनभ्यासदशापन्न ज्ञानमें अर्थात् जिस ज्ञानके सजातीयज्ञानमें
कदापि प्रमात्व ग्रहण नहीं किया उसमें प्रमात्वका सन्देह नहीं हुआ चाहिये और
होता तो है परन्तु आपके सिद्धान्तसे उसका समर्थन दुर्घट है; क्योंकि आपके
सिद्धान्तसे वहां यदि ज्ञान ज्ञात है अर्थात् निश्चित है तो तन्निष्ठ प्रामाण्यभी ज्ञातही है.
उसमें संशयकी योग्यताही नहीं और यदि कहो कि, वहां ज्ञानही अज्ञात है तो
तौभी धर्मिज्ञानकेही न होनेसे संशयकी योग्यता नहीं है. भाव यह कि-धर्मिसामान्य-
ज्ञानानन्तरही धर्मसंशयका सम्भव होसकता है, अन्यथा नहीं; इसलिये ज्ञानमें प्रमा-
त्वधर्मका अनुमान करनाही उचित है.
तथाहि । इदं ज्ञानं प्रमा संवादिप्रवृत्तिजनकत्वात्, यन्नैवं तन्नैवं
यथाऽप्रमा। इदं पृथिवीत्वप्रकारकं ज्ञानं प्रमा गन्धवति पृथिवी-
परिच्छेदः ५ ] भाषाटीकासमेता. २६७
त्वप्रकारकज्ञानत्वात् । एवमिदं जलत्वप्रकारकं ज्ञानं प्रमा स्नेह-
वति जलत्वप्रकारकज्ञानत्वात् ।
भाषा-( तथाहि ) वह अनुमान इस रीतिसे करना चाहिये कि-यह ज्ञान
( संवादि ) सफलप्रवृत्तिका जनक होनेसे प्रमारूप है. ( यन्नैवं ( जो सफल )
प्रवृत्तिका जनक नहीं होता ( तन्नैवं ) वह प्रमारूपभी नहीं होता; ( यथा ) जैसे
अप्रमाज्ञान सफलप्रवृत्तिजनकभी नहीं है इसलिये प्रमाभी नहीं है. ऐसेही प्रवृत्तिके
अजनक ज्ञाननिष्ठ प्रमात्वके ग्राहक अनुमानभी है; जैसे यह पृथिवीत्व प्रकारकज्ञान
गन्धवालेमें पृथिवीत्व प्रकारकज्ञान होनेसे प्रमारूप है.भाव यह कि-गन्ध केवल पृथि-
वीहीका व्याप्यधर्म ह एवं यदि उस गन्धवालेमें “ इयं पृथिवी ” इत्याकारक
पृथिवीत्वप्रकारक ज्ञान होगा तो वह अवश्य प्रमारूपही होगा. ऐसेही यह “ इदं
जलं ” इत्याकारक जलत्वप्रकारक जलविशेष्यक ज्ञानभी स्नेहवालेमें जलत्वप्रकारक
ज्ञान होनेसे प्रमारूप है.
न च हेतुज्ञानं कथं जातमिति वाच्यम्। पृथिवीत्वप्रकारकत्वस्य
स्वतो ग्राह्यत्वात्, तत्र गन्धग्रहेण गन्धवद्विशेष्यकत्वस्यापि
सुग्रहत्वात् । तत्प्रकारकत्वावच्छिन्नतद्विशेष्यकत्वं परं न गृह्यते
संशयानुरोधात् ।
शंका-इन स्थलोंमें पहले हेतुका ज्ञान कैसे होताहै? समा०-यहां पृथिवीत्वप्रकार-
कत्वका अर्थात् पृथिवीत्वप्रकारावगाही ज्ञाननिष्ठ धर्मका स्वतो ग्रहण होताहै; एवं
पृथिवीमें गन्धके ग्रहणसे गन्धवद्विशेष्यकत्वका अर्थात् गन्धवद्विशेष्यावगाहि ज्ञाननिष्ठ
धर्म्मकाभी स्वतोही ग्रहण होताहै किन्तु केवल संशयानुपपत्तिके अनुरोधसे पृथिवी-
त्वप्रकारकत्वावच्छिन्न पृथिवीत्त्ववद्विशेष्यकत्व धर्ममात्रका ग्रहण नहीं होता.
न च प्रमात्वस्य साध्यस्य प्रसिद्धिः कथमिति वाच्यम् । इदं
ज्ञानप्रमात्वस्य स्वतो ग्राह्यत्वात् ।
शंका-प्रमात्वात्मक साध्यकी प्रसिद्धि प्रथम कौन स्थलमें है और कैसे
होती है? समाधान-( इदन्ता ) ज्ञाननिष्ठ प्रमात्वधर्मका स्वतो ग्रहण होताहै. भाव
यह कि-इदन्ताज्ञानमें “इदमनिदं न वा” इत्याकारक सन्देह कभी किसीको नहीं होता
इसलिये यह स्वतो ग्राह्य है.
न च प्रकारभेदेन प्रामाण्यभेदाद्धटत्वप्रकारकत्वादेः कथं प्रसिद्धि-
रिति वाच्यम् । घटत्वप्रकारकत्वस्य स्वविशेष्यकत्वस्य च स्व-
तो ग्राह्यत्वात् । घटस्य च पूर्वमुपस्थितत्वात् । घटविशेष्यकं
घटत्वप्रकारकमिति ज्ञाने प्रामाण्यस्य बाधकाभावः । व्यवसा-
यपरं तु प्रामाण्यं न गृह्यते तत्र संशयसामग्रीसत्त्वे संशयस्यैवो-
पपत्तेः ।
शंका-इदन्ताज्ञाननिष्ठ प्रमात्वधर्म स्वतो ग्राह्य रहो परन्तु प्रकारभेदसे प्रमात्व-
काभी तो भेद है. एवं घटत्वप्रकारकत्वकी अर्थात् घटत्वप्रकारावगाही ज्ञाननिष्ठधर्मकी
प्रसिद्धि कैसे होसकतीहै? समा०-घटत्वप्रकारकत्वका अर्थात् घटत्वप्रकारावगाहि
ज्ञाननिष्ठ धर्मका तथा स्वविशेष्यकत्वका अर्थात् घटत्ववद्विशेष्यावगाहि ज्ञाननिष्ठ
धर्मकाभी स्वतो ग्रहण होताहै. घटको प्रथम उपस्थित होनेसे घटनिष्ठ विशेष्यताव-
गाहि ज्ञाननिष्ठप्रमात्वग्रहण करनेमें तथा घटत्वनिष्ठप्रकारतावगाहि ज्ञाननिष्ठप्रमा-
त्वके ग्रहण करनेमें कोई बाधक नहीं है. भाव यह कि-विशकलित विशेष्यविशेष-
णावगाहि ज्ञानगत प्रमात्वधर्मका स्वतोही ग्रहण हो सकताहै; किन्तु केवल विशेषण,
विशेष्य उभयविशिष्टावगाहि ज्ञाननिष्ठ प्रमात्वका स्वतो ग्रहण नहीं होता क्योंकि वहां
संशयसामग्रीके होत संते संशयही उत्पन्न होताहै.
किंचाभ्यासदशायां तृतीयानुव्यवसायादिना प्रामाण्यस्य स्वत
एव ग्रहसम्भवात् प्रथमानुव्यवसायपरं न तद्ग्राहकमिति
कल्प्यते संशयानुरोधात् ।
भाषा-(किञ्च ) अभ्यासदशामें अर्थात् जहां ज्ञानके सजातीय ज्ञानमें प्रमा-
त्वग्रहण होचुका है वहां तीसरे ( अनुव्यवसाय) ज्ञानविषयक ज्ञानद्वारा प्रमात्वधर्मका
स्वतोही ग्रहण होसकता है. एवं ऐसे स्थलमेंभी संशयानुरोधसे केवल यही कल्पना
करसकतेहैं कि-प्रथम अनुव्यवसायात्मक ज्ञान प्रमात्वधर्मका ग्राहक नहीं होसकता
अन्यथा संशय नहीं हुआ चाहिये.
अथ प्रामाण्यानुमितौ प्रामाण्याग्रहेण तस्या विषयनिश्चय-
रूपत्वार्थं तत्र प्रामाण्यग्रहो वाच्यः, सोऽप्यनुमित्यन्तरेणेति
फलमुखी कारणमुखी वाऽनवस्थेति चेत् । न ।
शंका-प्रमात्वधर्मग्राहक पूर्वोक्त अनुमितिज्ञानमेंभी तो प्रमात्वग्रहण नहीं हुआहै
( तस्याः ) उस अनुमितिके विषयकी निश्चयरूपताके लिये ( तत्र ) उस अनुमि-
तिज्ञानमेंभी प्रमात्वग्रह अवश्य हुआ चाहिये. एवं उस अनुमितिज्ञानमेंभी प्रमात्वका
ग्रहण दूसरी अनुमितिहीसे होगा. एवं दूसरीमें प्रमात्वग्रहार्थ तीसरीकी अपेक्षा होगी.
'परिच्छेदः ५ ] भाषाटीकासमेता. २६९
ऐसेही आगे आगे फलमुखी अर्थात् प्रमात्वग्रहरूप फलप्रधाना या कारणमुखी
अर्थात् अनुमितिज्ञानात्मक कारण प्रधानाऽनवस्थाभी हो सकती है अर्थात् एकप्र-
मात्वकी सिद्धयर्थ दूसरे ज्ञाननिष्ठ प्रमात्वकी अपेक्षा, एवं द्वितीयप्रमात्वकी सिद्धयर्थ
तृतीयज्ञाननिष्ठ प्रमात्वकी अपेक्षा, एवं आगे आगे इस रीतिसे फलमुखी अनवस्था
होसकतीहै. एवं प्रथम अनुमितिज्ञानरूप कारणकी पुष्टिके लिये द्वितीय अनुमिति-
ज्ञानकी अपेक्षा, द्वितीयके लिये तृतीयकी अपेक्षा, एवं आगे २ इस रीतिसे कारण-
मुखी अनवस्था होसकतीहै ।
अगृहीताऽप्रामाण्यग्राहकस्यैव निश्चयरूपत्वात् । यत्र च प्रामा-
ण्यसंशयस्तत्रैव परं प्रामाण्यानुमितेरपेक्षा, यावदाशङ्कं प्रामा-
ण्यानुमितिरिष्यत एव ।
समा०-अनवस्था नहीं होसकती क्योंकि जिस ज्ञानमें अप्रमात्वग्रह नहीं गृहीत
हुआ है अर्थात् “ इदं ज्ञानमप्रमा ” इत्याकारक व्यवहार जिस ज्ञानमें नहीं हुआ
है; हम लोग उस ज्ञानको निश्चयरूपही मानते हैं किन्तु जिस स्थलमें ज्ञाननिष्ठप्रमा-
त्वका संशय होता है वहांही केवल प्रामाण्यग्राहक अनुमितिज्ञानकी अपेक्षा होती है
स्थलान्तरमें नहीं होती जहां पर्यन्त आशंका होय वहां पर्यन्त प्रामाण्यग्राहक अनु-
मितिकोभी हम स्वीकार करतेहैं. भाव यह कि-यदि प्रमात्वग्राहक उत्तरउत्तर सभी
ज्ञानोंमें “ इदं ज्ञानं प्रमा न वा ” इत्याकारक आशंका उत्पन्न होती जाय तो अन-
वस्था होसकती है; परन्तु ऐसा तो कदापि सम्भव नहीं इसलिये अनवस्था नहीं
होसकती.
सर्वत्र तु न संशयः क्वचित्कोट्यनुपस्थितेः, क्वचिद्विशेषदर्शना-
दितः, क्वचिद्विषयान्तरसञ्चारादिति संक्षेपः । ]
भाषा-और युक्तिसेभी हरएक स्थलमें संशयका होना दुर्घट है; वह यह है कि-
संशयज्ञान स्वभावसे परस्पर विरुद्ध नानाधर्मावगाहि होता है. एवं जहां कोट्यनुपस्थित
है अर्थात् जहां विरोधि धर्मकी उपस्थिति नहीं हुई है वहां संशय नहीं होसकता
एवं जहां विषयका विशेषरूपसे दर्शन होचुकाहै वहांभी संशय नहीं होसकता; अथवा
जहां एकविषयविषयक ज्ञानानन्तर शीघ्रही ज्ञान प्रवाहका विषयान्तरमें संचार हुआ
है वहांभी संशय नहीं होसकता; इत्यादि अनेकस्थलोंमें संशयके असम्भवसे पूर्वोक्त
फलमुखी या कारणमुखी अनवस्थाकी शंकाभी निरर्थक है. (इति संक्षेपः) यह संक्षेपसे
ज्ञाननिष्ठ प्रमात्वका परतो ग्रहण दिखलाया है. यहां प्रमाके लक्षणमें ( गुरु ) प्रभाकर
शंका करतेहैं. ]
२७० न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ गुण-
ननु सर्वेषां ज्ञानानां यथार्थत्वात् प्रमालक्षणे तद्वद्विशेष्यकत्वं
विशेषणं व्यर्थम् ।
शंका-सभी ज्ञान यथार्थही होतेहैं इसलिये प्रमाज्ञानके लक्षणमें 'तद्वद्विशेष्यकत्व'
यह विशेषण देना व्यर्थ है किन्तु ( तत्मकारक ज्ञानं प्रभा ) इतना मात्र कहना-
उचित है. भाव यह कि-अन्यथाख्यातिके वारणार्थ आपने प्रमालक्षणमें 'तद्वद्विशेष्यकत्व'
यह विशेषण दिया है सो वह अन्यथाख्याति कुछ वस्तु नहीं क्योंकि "ख्यानं ख्यातिः
अन्यथा प्रकारान्तरेण ख्यातिः अन्यथाख्यातिः " इस व्युत्पत्तिसे प्रकारान्तरसे वस्तु
प्रतीतिका नाम 'अन्यथाख्याति' है और किसी वस्तुकीभी कहीं प्रकारान्तरसे प्रतीति
होतीही नहीं किन्तु जो वस्तु जैसी होतीहै उसकी वैसीही प्रतीतिभी होती है.
न च रङ्गे रजतार्थिनः प्रवृत्तिर्भमजन्या न स्यात्, तव मते भ्रम-
स्याभावादिति वाच्यम् । तत्र हि दोषाधीनस्य पुरोवर्तिनि स्व-
तन्त्रोपस्थितरजतभेदाग्रहस्य हेतुत्वात् ।
नैयायिक-रजतार्थि पुरुषकी जो राँगेमें भ्रमजन्या प्रवृत्ति वह आपके मतसे
नहीं हुई चाहिये क्योंकि आपके सिद्धान्तमें ( भ्रम ) अन्यथाख्याति कुछ वस्तु नहीं
है. प्रभाकर-अग्रभागवर्ति राँगेआदि पदार्थोंमें रजतार्थिपुरुषकी निष्फल प्रवृत्तिमें
केवल दोषवशसे स्वतंत्र उपस्थित रजतादि पदार्थके भेदाग्रहकी हेतुता है. भाव यह कि-
आपने प्रमाताके लोभभयादि दोषसे और प्रमाणके पित्तादि दोषसे तथा प्रमेयके
सादृश्यादि दोषसे राँगे आदिकोंमें रजतादि पदार्थोंकी अन्यथाख्याति मानी है परन्तु
यह मन्तव्य ठीक नहीं है, क्योंकि ज्ञान ज्ञेयवस्तुके अनुसारही होता है; जहां ज्ञेय
वस्तु राँगा या रज्जुआदि है वहां रजत तथा सर्पादिका ज्ञान मानना अत्यन्त असंगत
है; इसलिये ऐसे स्थलोंमें पूर्वोक्त दोषोंको केवल भेदाग्रहमात्रमें कारणता माननीही
उचित है उसका प्रकार यह है कि-जहां राँगे आदिमें रजतादिकी प्रतीति हुई है,
वहां नेत्रका अपनी वृत्तिद्वारा राँगे आदिके साथ सम्बन्ध हुए राँगे आदिका इदंरूपसे
सामान्यज्ञान होता है और रजतका स्मरण होता है एवं भ्रमस्थलमें " इदं रजतम् "
ये दो ज्ञान हैं. उसमें 'इदम' अंश तो राँगेका है इसलिये सामान्यरूपसे प्रत्यक्षात्मक
है और रजतअंशमें स्मरणात्मक ज्ञान है परन्तु पूर्वोक्त दोषबलसे पुरुषको यह प्रतीत
नहीं होता कि मेरेको दो ज्ञान हुए हैं यद्यपि यह दोनों ज्ञानयथार्थहि हैं तथापि ये
मेरेको दो ज्ञान हुए हैं उनमें राँगेका सामान्य प्रत्यक्षात्मक है और रजतका
स्मरणात्मक है, इत्याकारक पुरुषको भेदाग्रह होवे है अर्थात् विवेक नहीं होवे है
यह ज्ञान द्वयका अविवेकही हमारे मतमें भ्रम है इसीको अग्रदेशावच्छेदेन उपस्थित
शुक्तिरजतादि पदार्थोंकी निष्फल प्रवृत्तिमें हेतुता है.
परिच्छेदः ५ ] भाषाटीकासमेता. २७१
सत्यरजतस्थले तु विशिष्टज्ञानस्य सत्त्वात्तदेव कारणम्, अस्तु
वा तत्रापि भेदाग्रह एव कारणमिति ।
भाषा-और सत्यरजतस्थलीय प्रवृत्तिमें तो रजतत्वप्रकारक रजतविशेष्यक
‘ इदं रजतम् ’ इस एकही विशिष्टज्ञानका सद्भाव होनेसे उसीको कारणता है अथवा
सत्यरजतगोचर प्रवृत्तिमेंभी रजतभेदाग्रहकोही कारणता माननी उचित है.“ स्वस्मिन्
स्वस्य भेदाभावादेव रजते रजतभेदाग्रहः”उसीको सत्यस्थलीय रजतप्रवृत्तिमें हेतुताहै.
नवाऽन्यथाख्यातिः सम्भवति रजतप्रत्यक्षकारणस्य रजतसन्नि-
कर्षस्याभावाद्रङ्गे रजतबुद्धेरनुपपत्तेरिति चेत् । न । सत्यरजत-
स्थले प्रवृत्तिं प्रति विशिष्टज्ञानस्य हेतुतायाः क्लृप्तत्वादन्यत्रापि
तत्कल्पनात् ।
भाषा-परन्तु अन्यथाख्यातिका तो सम्भवही नहीं होसकता क्योंकि रजत
प्रत्यक्षके कारणीभूत रजतसन्निकर्षके न होनेसे रङ्गमें रजतबुद्धिकी उपस्थिति
होनीही दुर्घट है. ( इति चेन्न) नैयायिक-यह कथन आपका युक्त नहीं है क्योंकि
सत्यरजतस्थलीय प्रवृत्तिके प्रति पूर्वोक्त विशिष्टज्ञानको हेतुता क्लृप्तही है अर्थात् स्पष्ट
सिद्ध है उसीकी रङ्गगोचर रजतार्थिपुरुषकी प्रवृत्तिमेंभी कल्पना करनी उचित है
अर्थात् रङ्गगोचर रजतार्थिपुरुषकी प्रवृत्तिमेंभी विशिष्टज्ञानहीको हेतुता माननी
उचित है.
न च संवादिप्रवृत्तौ तत्कारणं विसंवादिप्रवृत्तौ तु भेदाग्रहः का-
रणमिति वाच्यम् । लाघवात्प्रवृत्तिमात्रे तस्य हेतुत्वकल्पनात् ।
शंका-यदि ( संवादि ) सफलप्रवृत्तिमें विशिष्टज्ञानकी कारणता तथा ( विसं-
वादि ) निष्फलप्रवृत्तिमें भेदाग्रहको कारणता मानली जाय तो हानि क्या है ?
अर्थात् प्रवृत्तिरूप कार्यकी विलक्षणतासे उसके कारणम विलक्षणता माननेमेंभी दोष
नहीं. समाधान-संवादिविसंवादिभेदेन कार्यकारणभावद्वयकल्पना करनेकी अपेक्षा
प्रवृत्तिमात्रके प्रति केवल विशिष्टज्ञानको हेतुता माननेमें लाघव है.
इत्थं च रंगे रजतत्वविशिष्टबुद्ध्यनुरोधेन ज्ञानलक्षणप्रत्यास-
त्तिकल्पनेऽपि न क्षतिः फलमुखगौरवस्यादोषत्वात् ।
भाषा-( इत्थञ्च ) इस रीतिसे प्रवृत्तिमात्रके प्रति विशिष्टबुद्धिको हेतुता सिद्ध
होनेसे पीछे जो आपने कहा कि-रजतांशमें सन्निकर्षके न होनेसे अन्यथाख्यातिका
सम्भव नहीं होसकता, वह दोषभी नहीं है; क्योंकि रांगेमें रजतत्वविशिष्ट रजतबुद्धिके
अनुरोधसे रजतके साथ ज्ञानलक्षणाप्रत्यासत्तिरूप सन्निकर्षकी कल्पना करनेमेंभी
विरोध नहीं है. यहां यह भाव है कि-'ज्ञानलक्षणाप्रत्यासत्ति' पूर्वोक्त रीतिसे अलौकिक
सम्बन्धविशेषका नाम है. जहां इन्द्रिययोग्य पदार्थके साथ इन्द्रियका सम्बन्ध होय
और उसी कालमें उस इन्द्रियके अयोग्यपदार्थका स्मरण होय तो वहां इन्द्रियसम्बन्ध
पदार्थका तथा स्मृतिगोचर पदार्थका एक ज्ञान होताहै. एवं स्मरणांशमें वह ज्ञान
अलौकिक है और इन्द्रियसम्बन्धजन्य अंशमें लौकिक है. इस रीतिसे प्रकृतमें पूर्वानु-
भवजन्य रजतके संस्कारका "इदं रजतं" इत्याकारक प्रत्यक्षके साथ अन्वयव्यति-
रेक है. इसलिये राँगेआदिमें 'इदं रजतं' इस चाक्षुषज्ञानका रजतानुभवजन्य
संस्कारजन्य रजतस्मृति कारण है. एवं ऐसे स्थलमें 'नेत्रसंयुक्तमनःसंयुक्तात्मसमवेत
स्मृतिज्ञानविषयत्व' रूप परंपरा सन्निकर्षात्मक ज्ञानलक्षणाप्रत्यासत्तिके सम्भव होनेसे
अन्यथाख्यातिभी बन सकती है अर्थात् जैसे 'सुरभि चन्दनं,' इत्यादि स्थलमें सौर-
भांशमें ज्ञानलक्षणा प्रत्यासत्तिरूप अलौकिक सन्निकर्ष स्वीकृत है, वैसेही 'इदं रजतं'
इत्यादि स्थलमें रजतांशमेंभी ज्ञानलक्षणाप्रत्यासत्तिकी कल्पना करली जाय तो (क्षति)
हानि नहीं है. (शंका) आपको सम्बन्धविशेषकी अधिक कल्पना करनेमें गौरव होगा?
समाधान-फलमुखगौरव दोषकर नहीं होता अर्थात् जिस गौरवसे इष्टार्थकी सिद्धि
होय उस गौरवको विद्वान्लोग दोषकर नहीं मानते.
किंच रङ्गरजतयोः 'इमे रजते रङ्गे वा' इति ज्ञानं यत्र जातं तत्र
न कारणबाधोऽपि ।
भाषा-किञ्च जिस स्थलमें रङ्ग तथा रजत इन दोनोंमें "इमे रजते" अथवा
"इमे रङ्गे" इत्याकारक ज्ञान हुआ है वहां रजतादिसाक्षात्कारके कारणीभूत रजता-
दिके सन्निकर्षका बाधभी नहीं है. भाव यह कि-ऐसे स्थलमें रङ्गरजत उभयके साथ
युगपत् इन्द्रियसन्निकर्ष हुए पश्चात् रङ्गरजतमें "इमे रजते" या "इमे रङ्गे" इत्या-
कारक ज्ञानमें कोई बाधक नहीं है क्योंकि रजतत्व या रङ्गत्व इन दोनोंमें किसीएक
धर्मके साथ इन्द्रियसंयुक्त समवायरूप सम्बन्ध विद्यमान है, परन्तु एतादृश ज्ञान
उभयअंशमें प्रमारूप कदापि नहीं होसकता, क्योंकि विशेषणवद्विशेष्य सन्निकर्षरूप
प्रमासामग्रीका उभयअंशमें अभाव है, किन्तु उभयस्थलीय ज्ञानमें आंशिकप्रमात्वही
रहेगा इसलिये ऐसे स्थलमें अन्यथाख्याति अवश्य माननी पड़ती है.
अपि च यत्र रङ्गरजतयोः 'इमे रजतरङ्गे' इति ज्ञानं तत्रोभयत्रयु-
गपत्प्रवृत्तिनिवृत्ती स्याताम्। रङ्गे रङ्गभेदग्रहे रजते रजतभेदग्र-
परिच्छेदः ५ ] भाषाटीकासमेता. २७३
हे चान्यथाख्यातिभयात्तन्मते दोषादेव रङ्गे रजतभेदाग्रहस्य
रजते रङ्गभेदाग्रहस्य च सत्त्वात् ।
भाषा-( अपिच )आपके अख्यातिवादमें औरभी किंचिद्विचारणीय है कि-जिस
स्थलमें रङ्ग रजत उभयमें "इमे रजतरङ्गे" इत्याकारक उभयत्र विपरीतज्ञान हुआहै वहां
उभयत्रही एककालावच्छेदेन पुरुषकी प्रवृत्ति तथा निवृत्ति हुई चाहिये, अर्थात्
रङ्गमेंभी एककालावच्छेदेन प्रवृत्तिनिवृत्ति दोनों हुई चाहिये तथा रजतमेंभी
उसी कालमें प्रवृत्ति निवृत्ति दोनों हुईं चाहिये. क्योंकि अन्यथाख्यातिके
भयसे आपको रङ्गमें रङ्गप्रतियोगिक भेदज्ञानका तथा रजतमें रजतप्रतियोगिक
भेदज्ञानका तो स्वीकारही नहीं अर्थात् रङ्गमें रङ्गप्रतियोगिक भेदज्ञान मानने
से तथा रजतमें रजतप्रतियोगिक भेदज्ञान माननेसे अन्यथाख्याति अवश्य माननी
पड़ती है; इसलिये आपके सिद्धान्तसे रङ्गमें रङ्गभेदाग्रहका तथा रजतमें रजतभेदा-
ग्रहका सर्वथा सत्त्व प्रतीत होताहै और यही अनिष्टसाधनताज्ञानपूर्वक रङ्गमें निवृत्ति-
का कारण है तथा इष्टसाधनताज्ञानपूर्वक रजतमें प्रवृत्तिका कारण है. एवं अन्यथा
ख्यातीके भयसे आपके सिद्धान्तानुसार दोषवशसे रङ्गमें रजतभेदाग्रहका तथा
रजतमें रङ्गभेदाग्रहकाभी सत्त्व है. भाव यह कि-रङ्गमें रजतभेदाग्रह होनेसे रङ्गमें
इष्टभेदाग्रहरूपा प्रवृत्तिसामग्री विद्यमान है; एवं रजतमें रङ्गभेदाग्रह होनेसे रजतमें
अनिष्टभेदाग्रहरूपा अर्थात् “ इदं मदनिष्टसाधनं ” इत्याकारक ज्ञानरूपा निवृत्तिसा-
मग्रीभी विद्यमान है, इसलिये उभयत्र युगपत् प्रवृत्ति तथा निवृत्ति हुई चाहिये. तात्पर्य
यह कि-पुरोवर्त्ति एकदेशमें उपस्थित हुए रङ्गरजतमें विपरीतबुद्धया उभयत्र युगपत्
प्रवृत्ति तथा निवृत्ति दोनों हुईं चाहिये, परन्तु हो नहीं सकतीं क्योंकि इष्टसाधनता
ज्ञानपूर्वक विषयके अभिमुखगमनका नाम 'प्रवृत्ति' है तथा अनिष्टसाधनताज्ञानपूर्वक
विषयके विमुखगमनका नाम 'निवृत्ति' है. यह परस्पर विपरीतगति एक कालमें एक
पुरुषमें एक विषयके उद्देशसे असम्भव है.
किंचानुमितिं प्रति भेदाग्रहस्य हेतुत्वे जलह्रदे वह्निव्याप्यधूम-
वद्भेदाग्रहादनुमितिर्निर्बाधा, यदि च विशिष्टज्ञानं कारणं तदा-
ऽयोगोलके वह्निव्याप्यधूमज्ञानमनुमित्यनुरोधादापतितम्, से-
यमुभयतःपाशा रज्जुः ।
भाषा-( किञ्च ) आपके अख्यातिवादमें औरभी थोडा विचारणीय है कि आप
अनुमितिज्ञानके प्रति व्याप्यवद् भेदाग्रहको कारणता मानतेहैं या कि विशिष्टज्ञानको?
यदि व्याप्यवद्भेदाग्रहको कहो तो जलहदमें वह्निव्याप्यधूमवत्पर्वतके भेदाग्रहसे
“ हदो वह्निमान् ” इत्याकारिका अन्यथाख्यातिरूपा अनुमिति आपके सिद्धान्तसे