न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)
Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda
विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा
पृष्ठ 287, कुल 350 में से
संदर्भ में पढ़ेंपरिच्छेदः ५ ] भाषाटीकासमेता. २६३
भाषा-एवं पूर्वोक्त योग्यताका या वक्ताके तात्पर्यका प्रमात्मकज्ञान शाब्दबोधमें
गुण है. प्रत्यक्षज्ञानमें विशेषणवद्विशेष्यसन्निकर्षही गुणरूप है. एवं अनुमितिज्ञानमें
साध्यवालेमें जो साध्यव्याप्य वैशिष्ट्यज्ञान अर्थात् “ वन्हिव्याप्यधूमवानयं पर्वतः ”
इत्यादि परामर्शात्मक ज्ञान वही गुणरूप है. ऐसेही आगेभी जानलेना अर्थात् उपमिति
ज्ञानमें शक्यमें सादृश्यबुद्धिही गुणरूप है. एवं शाब्दबोधमें योग्यताज्ञान या तात्पर्यका
यथार्थज्ञानही गुणरूप है--इतिं ।
प्रमां निरूपयति, भ्रमभिन्नमिति-
भाषा-एवं ' भ्रमभिन्न ' इत्यादि ग्रन्थसे मूलकार प्रमाका निरूपण करते हैं-
-भ्रमभिन्नं तु ज्ञानमत्रोच्यते प्रमा ॥ १३४ ॥
भाषा-इस प्रकरणमें भ्रमभिन्नज्ञानकी प्रमा संज्ञा है ॥ १३४ ॥
ननु यत्र शुक्तिरजतयोः 'इमे रजते' इति ज्ञानं जातं तत्र रजतांशे
ऽपि प्रमा न स्यात् तज्ज्ञानस्य भ्रमभिन्नत्वाभावादत आह,
अथवेति-
शंका-जहां शुक्ति तथा रजत उभयमें “ इमे रजते ” इत्याकारक ज्ञान हुआ है
वहां इस ज्ञानको रजतांशमेंभी प्रमात्व नहीं हुआ चाहिये. क्योंकि यह ज्ञान भ्रम
भिन्न नहीं है किन्तु शुक्त्यंशमें भ्रमरूपही है. समाधान-इसका उत्तर 'अथवा'
इत्यादि ग्रन्थसे मूलकार स्वयं कहते हैं-
अथवा तत्प्रकारं यज्ज्ञानं तद्वद्विशेष्यकम् ॥
तत्प्रमा-
भाषा-अथवा तत्प्रकारक तद्वद्विशेष्यक ज्ञानका नाम 'प्रमाज्ञान' है.
तद्वद्विशेष्यकं तत्प्रकारकं ज्ञानं प्रमेत्यर्थः ।
भाषा-अर्थात् घटत्ववद्विशेष्यक घटत्वप्रकारक ज्ञानका नाम 'प्रमाज्ञान' है. ऐसेही
वस्तुमात्रके ज्ञानमें जानना चाहिये.
अथैवं स्मृतेरपि प्रमात्वं स्यात्ततः किमिति चेत्तथा सति तत्कर-
णस्यापि प्रमाणान्तरत्वं स्यादिति चेत् । नायथार्थानुभवकरणत्व
स्यैव प्रमाणत्वेन विवक्षणात् ।
शंका-इस लक्षणसे स्मृतिज्ञानकोभी प्रमात्व हुआचाहिये; क्योंकि स्मृतिभी
तद्वद्विशेष्यक तत्प्रकारकाही होतीहै. समाधान-यदि मानभी लें तो हानि क्या है ?