सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda

विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा

DevanagariHindipublished350 पृष्ठ

पृष्ठ 286, कुल 350 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 286

२६२ न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ गुण-
भाषा-इस प्रसङ्गमें दोष कौन हैं ? ऐसी आकांक्षाको लेकर ‘ पित्त ’ इत्यादि
मूलग्रन्थसे दोषोंका निरूपण करतेहैं—
पित्तदूरत्वादिरूपो दोषो नानाविधो मतः ॥१३१॥
भाषा-पित्तदूरत्वादिरूप दोष इस प्रकरणमें अनेक प्रकारके हैं ॥ १३१ ॥
क्वचित्पीतादिभ्रमे पित्तं दोषः, क्वचिच्चन्द्रादेः स्वल्पपरिमाणभ्रमे
दूरत्वं दोषः, क्वचिच्च वंशोरगभ्रमे मण्डूकवसाञ्जनमित्येवंरूपा-
दोषा अननुगता एव भ्रान्तिजनका इत्यर्थः ॥ १३१ ॥
भाषा-कहीं “ पीतः शंखः ” इत्यादिज्ञानस्थलमें पित्तरूप दोष है और कहीं
“ वितस्तिपरिमाणकश्चन्द्रः” इत्यादि ज्ञानस्थलमें दूरत्वरूप दोष है, एवं कहीं ( वंश )
बांसकी यष्टीमें सर्पभ्रमापादक मण्डूकवसाञ्जनरूप दोष है; इत्यादि अनेक प्रकारके
अननुगत दोष भ्रान्तिज्ञानके जनक हैं ॥ १३१ ॥
अथ के गुणा इत्याकांक्षायां प्रत्यक्षादौ क्रमशोगुणान् दर्शयति,
प्रत्यक्षेति—
भाषा-एवं इस प्रसङ्गमें गुण कौन हैं ? ऐसी आकांक्षाको लेकर ‘ प्रत्यक्षे ’
इत्यादि मूलसे प्रत्यक्षादि ज्ञानोंमें यथाक्रमानुसारेण ग्रन्थकार गुणोंको दिखलाता है—
प्रत्यक्षे तु विशेष्येण विशेषणवता समम् ॥
सन्निकर्षो गुणस्तु स्यादथ त्वनुमितौ पुनः॥१३२॥
पक्षे साध्यविशिष्टे तु परामर्शो गुणो भवेत् ॥
शक्ये सादृश्यबुद्धिस्तु भवेडुपमितौ गुणः ॥१३३॥
शाब्दबोधे योग्यतायास्तात्पर्यस्याथ वा प्रमा ॥
गुणः स्यात्—
भाषा-विशेषणविशिष्ट विशेष्यके साथ जो नेत्रादि इन्द्रियोंका सन्निकर्ष वह
प्रत्यक्षात्मक ज्ञानका जनक गुण है ॥ १३२ ॥ एवं साध्यविशिष्ट पक्षमें पूर्वोक्त
परामर्शामक ज्ञान अनुमितिज्ञानका जनक गुण है, गवयादि शक्यमें जो “ गोसदृशो
गवयपदवाच्यः” इत्याकारक सादृश्यबुद्धि, वह उपमितिज्ञानका जनक गुण है॥१३३॥
प्रत्यक्षे विशेषणवद्विशेष्यसन्निकर्षो गुणः, अनुमितौ साध्यवति
साध्यव्याप्यवैशिष्ट्यज्ञानं गुण इति । एवमग्रेऽप्यूह्यम् ॥१३३॥