न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)
Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda
विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपरिच्छेदः ५ ] भाषाटीकासमेता. २६१
अवश्यज्ञानसामान्यकारणसे भिन्न किसी एक कारणसे जन्य है, ऐसा अनुमान कर
सकते हैं. वह ज्ञान सामान्यकारणसे भिन्न कारण गुणही होसकताहै.
न च दोषाभाव एव कारणमस्त्विति वाच्यम्। 'पीतः शङ्खः' इति
ज्ञानस्थलेऽपि पित्तरूपदोषसत्त्वाच्छङ्खप्रमानुत्पत्तिप्रसङ्गात्। वि-
निगमनाविरहादनन्तदोषाभावस्य कारणत्वमपेक्ष्य गुणकारण-
ताया न्याय्यत्वाच्च।
शंका-प्रमाज्ञानके प्रति दोषाभावकोही कारणता मानलें तो हानि क्याहै? समा-
धान- "पीतः शंखः" इत्याकारक ज्ञानस्थलमेंभी पीतरूप दोष विद्यमान है ऐसे
स्थलमें शंखत्वप्रकारक शंखविशेष्यक ज्ञान प्रमात्मक नहीं हुआ चाहिये; क्योंकि
यहां आपके सिद्धान्तानुसार दोषाभावरूप कारण विद्यमान नहीं है और विनिगमना-
विरहसे अर्थात् एकत्र पक्षपातिनीयुक्तिके न होनेसे अनन्तदोषाभावोंको कारणता
माननेकी अपेक्षा केवल गुणमें कारणता माननीही उचित है.
न च गुणसत्त्वेऽपि पित्तेन प्रतिबन्धाच्छङ्के न श्वैत्यज्ञानमतः
पित्तादिदोषाभावानां कारणत्वमवश्यं वाच्यम्,तथा च किं गुण-
स्य हेतुत्वकल्पनयेति वाच्यम् । तथाऽप्यन्वयव्यतिरेकाभ्यां
गुणस्यापि हेतुत्वसिद्धेः।
शंका-प्रमाज्ञानोत्पादक गुणके विद्यमान होनेसेभी पीतरूप दोषको प्रतिबन्धक
होनेसे शंखमें श्वेतताका ज्ञान नहीं होता, इसलिये पित्तादि दोषाभावोंकोभी कारणता
अवश्य माननी चाहिये. एवं यदि दोषाभावमें अवश्य कारणता कॢप्त है तो गुणोंमें
कारणता पृथक् कल्पना करनेसे क्या लाभहै? समाधान-तथापि अन्वयव्यतिरेकद्वारा
गुणोंमेंभी कारणता सिद्ध है. भाव यह कि-पित्तादि दोषाभावस्थलमेंभी विशेषणवद्विशे-
ष्यके साथ इन्द्रियसन्निकर्परूप गुणके न रहनेसे शंखमें 'पीतः' इत्याकारक ज्ञान प्रमा
नहीं होसकता; इसलिये दोषाभावसे गुण अन्यथासिद्ध नहीं होसकता.
एवं 'भ्रमं प्रति गुणाभावः कारणम्' इत्यस्यापि सुवचत्वाच्च ।
भाषा-(एवं) यदि अन्वयव्यतिरेक होनेसेभी गुणोंको अन्यथासिद्ध मानों तो
भ्रमज्ञानके प्रतिभी गुणाभावहीको कारणता होनी चाहिये तथा दोषको अन्यथासिद्ध
मानना चाहिये यह कथनभी सुवच होसकताहै.
तत्र दोषाः के इत्याकांक्षायामाह, पित्तेति-