न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)
Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda
विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा
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शंका-ऐसे माननेसे स्मृतिके कारणीभूत अनुभवको या संस्कारकोभी प्रमाणान्तर मानना
होगा. समाधान-'प्रमाण' नाम तौ हमको यथार्थ अनुभवके करणहीका विवक्षित है.
स्मृतिज्ञान यथार्थ अनुभव नहींहै. इसलिये उसके कारणको प्रमाणभी नहीं कहसकते.
इदं तु बोध्यम् । येन सम्बन्धेन यद्वत्ता तेन सम्बन्धेन तद्वद्विशे-
ष्यकत्वं तेन सम्बन्धेन तत्प्रकारकत्वं वाच्यम्, तेन कपालादौ
संयोगादिना घटादिज्ञाने नातिव्याप्तिः ।
भाषा-(इदं तु बोध्यम्) इतना यहां औरभी जानना चाहिये कि-जिस वस्तुकों
जिस सम्बन्धसे यद्धर्मवत्ता है उसमें उसीसम्बन्धसे तद्वद्विशेष्यकत्व तथा उसी सम्ब-
न्धसे तत्प्रकारकत्व समझना चाहिये. एतादृश निवेशसे “संयोगेन घटवन्तौ कपालौ”
इत्यादि भ्रमज्ञानमें प्रमालक्षणकी अतिव्याप्ति नहीं होसकती.
एवं सति निर्विकल्पकं प्रमा न स्यात् तस्य सप्रकारकत्वाभा-
वादत आह, न प्रमेति-
शंका--ऐसे स्वीकार करनेसे निर्विकल्पक ज्ञान प्रमा नहीं होसकता; क्योंकि वह
किञ्चित्प्रकारक नहीं है. समाधान-इसका उत्तर मूलकार स्वयं कहते हैं-
-न प्रमा नापि भ्रमः स्यान्निर्विकल्पकम् ॥ १३५ ॥
प्रकारतादिशून्यं हि सम्बन्धानवगाहि तत् ॥
भाषा-निर्विकल्पक ज्ञानको प्रमारूप या भ्रमरूप नहीं कहसकते ॥ १३५ ॥
क्योंकि उसका स्वरूपासम्बन्धानवगाहि तथा विशेष्यताप्रकारतासे रहित है.
ननु वृक्षे कपिसंयोगज्ञानं भ्रमः स्यात् प्रमा च स्यादिति चेत् ।
नाप्रतियोगिव्यधिकरणसंयोगाभाववति संयोगज्ञानस्य भ्रमत्वात् ।
शंका-आपके कथनानुसार “वृक्षः कपिसंयोगी” इत्याकारक ज्ञानको भ्रम-
रूपभी होना चाहिये तथा प्रमारूपभी होना चाहिये; क्योंकि वृक्षमें शाखावच्छेदेन
कपिसंयोग हैभी, तथा मूलावच्छेदेन नहींभी है. समाधान--कपिरूप प्रतियोगीके
व्यधिकरण कपिसंयोगाभाव वालेमें यदि कपिसंयोगका ज्ञान होय तो वह ज्ञान
भ्रमरूप होसकताहै; अन्यथा नहीं.
न च वृक्षे कपिसंयोगाभावावच्छेदेन संयोगज्ञानं भ्रमो न स्यात्,
तत्र संयोगाभावस्य प्रतियोगिसमानाधिकरणत्वादिति वाच्यम् !