न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)
Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda
विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा
पृष्ठ 290, कुल 350 में से
संदर्भ में पढ़ें२६६ न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ गुण-
( तत् ) उसी अनुव्यवसायात्मक ज्ञानविषयक ज्ञानसे ( तत् ) उस व्यवसायात्मक
ज्ञानका प्रमात्व ग्रहण होताहै.
विषयनिरूप्यं हि ज्ञानमतो ज्ञानवित्तिवेद्यो विषयस्तन्मतं दूषय-
ति । न स्वतः ग्राह्यमिति ।
शंका-ज्ञानविषयक ज्ञान तो विषयानवगाही है अर्थात् केवलज्ञानहीको विषय
करताहै, उसके विषयको नहीं करता और प्रथम ज्ञानगत प्रमात्वधर्म विषयघटित है
इसलिये वह उसका विषय होना दुर्घट है. समाधान-ज्ञानका यह स्वभाव है
कि-यह विषयनिरूप्यही होताहै अर्थात् विषयविषयकही होताहै; ( अतो ) इसलिये
( ज्ञानवित्ति ) ज्ञानविषयक ज्ञानके घटादि विषयभी (वेद्य) विषय होसकतेहैं. भाव यह
कि-ज्ञानविषयक ज्ञान स्वविषयभूत ज्ञानके विषयको तथा स्वविषयभूत ज्ञानको तद्-
धर्मादिके सहित ग्रहण करता है. ये सब पूर्वोक्त वादियोंके सिद्धान्त हैं. इन सबका
“ प्रमात्वं न स्वतः ग्राह्यं ” इत्यादि ग्रन्थसे मूलकार खण्डन करतेहैं-
संशयेति । यदि ज्ञानस्य प्रामाण्यं स्वतः ग्राह्यं स्यात्तदाऽनभ्या-
सदशापन्नज्ञाने प्रामाण्यसंशयो न स्यात्, तत्र हि यदि ज्ञानं
ज्ञातं तदा तन्मते प्रामाण्यं ज्ञातमेवेति कथं संशयः। यदि तु ज्ञा-
नं न ज्ञातं तदा धर्मिज्ञानाभावात् कथं संशयः, तस्माज्ज्ञाने
प्रामाण्यमनुमेयम् ।
भाषा-( संशयेति ) यदि ज्ञानगत प्रमात्व धर्मका ( स्वतः ) अपने आपसे
ग्रहण होय तो अनभ्यासदशापन्न ज्ञानमें अर्थात् जिस ज्ञानके सजातीयज्ञानमें
कदापि प्रमात्व ग्रहण नहीं किया उसमें प्रमात्वका सन्देह नहीं हुआ चाहिये और
होता तो है परन्तु आपके सिद्धान्तसे उसका समर्थन दुर्घट है; क्योंकि आपके
सिद्धान्तसे वहां यदि ज्ञान ज्ञात है अर्थात् निश्चित है तो तन्निष्ठ प्रामाण्यभी ज्ञातही है.
उसमें संशयकी योग्यताही नहीं और यदि कहो कि, वहां ज्ञानही अज्ञात है तो
तौभी धर्मिज्ञानकेही न होनेसे संशयकी योग्यता नहीं है. भाव यह कि-धर्मिसामान्य-
ज्ञानानन्तरही धर्मसंशयका सम्भव होसकता है, अन्यथा नहीं; इसलिये ज्ञानमें प्रमा-
त्वधर्मका अनुमान करनाही उचित है.
तथाहि । इदं ज्ञानं प्रमा संवादिप्रवृत्तिजनकत्वात्, यन्नैवं तन्नैवं
यथाऽप्रमा। इदं पृथिवीत्वप्रकारकं ज्ञानं प्रमा गन्धवति पृथिवी-