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न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda

विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा

DevanagariHindipublished350 पृष्ठ

पृष्ठ 284, कुल 350 में से

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पृष्ठ 284

२६० न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ गुण-

में तथा व्याप्तिज्ञानमें स्वभावसे निश्चयमात्र जनकता रहती है किन्तु संशयकारणता
नहीं रहती; ( किन्तु ) परन्तु इतना भेद है कि-ऐसे स्थलमें शब्दसे समरूपेण
कोटिद्वयावगाही ज्ञान उत्पन्न होता है; तदनन्तर वहांही मानसिक संशय ज्ञान उत्पन्न
होता है.
एवं ज्ञाने प्रामाण्यसंशयाद्विषयसंशय इति ।
भाषा-एवं ( ज्ञाने ) इदं जलं इत्यादिज्ञानमें ( प्रामाण्यसंशयात् ) “ इदं
जलत्वप्रकारकं ज्ञानं प्रमा न वा ” इत्यादि प्रामाण्यसंशयसे ( विषय ) “ इदं जलं
न वा ” इत्यादि संशयभी उत्पन्न होता है.
एवं व्याप्यसंशयादपि व्यापकसंशय इत्यादिकं बोध्यम् । किंतु
संशये धर्मिज्ञानं धर्मीन्द्रियसन्निकर्षो वा कारणमिति ॥१३०॥
भाषा-एवं धूमादि व्याप्यमें “ पर्वतो धूमवान्न वा ” इत्याकारक सन्देह
होनेसे वह्निआदि व्यापकमेंभी “ पर्वतो वह्निमान्न वा ” इत्याकारक सन्देह होताहै
इत्यादि औरभी जान लेने; परन्तु संशयमें धर्मीका ज्ञान या धर्मीके साथ इन्द्रियका
सम्बन्ध नियमसे कारणीभूत है ॥ १३० ॥
दोषोऽप्रमाया जनकः प्रमायास्तु गुणो भवेत् ।
भाषा-अप्रमात्मक ज्ञानका उत्पादक दोष है तथा प्रमात्मक ज्ञानका
उत्पादक गुण है.
दोष इति । अप्रमां प्रति दोषः कारणं, प्रमां प्रति गुणः कारणम्।
तत्रापि पित्तादिरूपा दोषा अननुगतास्तेषां कारणत्वमन्वयव्य-
तिरेकाभ्यामेव सिद्धम् । गुणस्य प्रमाजनकत्वं त्वनुमानात्सि-
द्धम् । यथा प्रमा ज्ञानसाधारणकारणभिन्नकारणजन्या जन्यज्ञा-
नत्वादप्रमावत् ।
भाषा-अर्थात् अप्रमाज्ञानके प्रति दोषको कारणता है तथा प्रमाज्ञानके
प्रति गुणको कारणता है; उनमेंभी पित्तादिरूप अनेक दोष अननुगत हैं अर्थात् कहीं
कोई रहता है, कहीं कोई रहता है; उन दोषोंको अप्रमाज्ञानके प्रति कारणता अन्व-
यव्यतिरेकद्वारा सिद्ध है अर्थात् कोई एक दोष विद्यमान होय तो अप्रमाज्ञान उत्पन्न
होता है, न होय तो नहीं होता और गुणको प्रमात्मक ज्ञान जनकता तो अनुमान
द्वारा सिद्ध है; ( यथा ) जैसे अप्रमाज्ञानकी तरह जन्यज्ञान होनेसे प्रमाज्ञानभी