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न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda

विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा

DevanagariHindipublished350 पृष्ठ

पृष्ठ 283, कुल 350 में से

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पृष्ठ 283

परिच्छेदः ५ ] भाषाटीकासमेता. २५९
संशयं लक्षयति, स संशय इति-
भाषा-एवं ' स संशयो ' इत्यादि मूलग्रंथसे संशयका लक्षण दिखलाते हैं-
स संशयो मतिर्या स्यादेकत्राभावभावयोः ॥
भाषा-( एकत्र ) एक धर्मीमें विरुद्धभावाभाव धर्मावगाही ज्ञानका नाम
' संशयज्ञान ' है.
एकधर्मिकविरुद्धभावाभावप्रकारकं ज्ञानं संशय इत्यर्थः ।
भाषा-अर्थात् एक धर्मिविषयक विरुद्धभावाभावप्रकारक ज्ञानका नाम 'संशय'
है. उदाहरण ' किंस्वित् ' इत्यादि मूल है.
साधारणादिधर्मस्य ज्ञानं संशयकारणम् ॥ १३० ॥
भाषा-साधारणादि धर्मका ज्ञान संशयमें कारणीभूत है ॥१३०॥
साधारणेति । उभयसाधारणो यो धर्मस्तज्ज्ञानं संशयकारणम् ।
यथोच्चैस्तरत्वं स्थाणुपुरुषसाधारणं ज्ञात्वा 'अयं स्थाणुर्न वा'
इति सन्दिग्धे । एवमसाधारणधर्मज्ञानमपि कारणम् । यथा श-
ब्दत्वं नित्यानित्यव्यावृत्तं शब्दे गृहीत्वा शब्दो नित्यो न वेति
सन्दिग्धे ।
भाषा-अर्थात् उभयपदार्थ साधारण जो कोई एक धर्म उस धर्मका ज्ञान
संशयका कारण है; जैसे ऊँचापना स्थाणु तथा पुरुष इन दोनोंमें एक जैसा है, उस
ऊँचेपनेको मन्दअन्धकारमें दूरसे देखकर " अयं स्थाणुर्न वा ' इत्याकारक पुरुषकों
सन्देह होताहै. ऐसेही असाधारण धर्मका ज्ञानभी संशयका कारण है; जैसे शब्दत्वध-
र्मकी गगनादि नित्य पदार्थोंसे तथा घटपटादि अनित्य पदार्थोंसे व्यावृत्ति ग्रहण
पूर्वक केवल शब्दमात्र वृत्तित्ता ग्रहण करकेभी " शब्दो नित्यो न वा " इत्या-
कारक पुरुषको सन्देह उत्पन्न होता है.
विप्रतिपत्तिस्तु 'शब्दो नित्यो न वा' इत्यादिशब्दात्मिका न संशय-
कारणम्। शब्दव्याप्तिज्ञानादीनां निश्चयमात्रजनकत्वस्वाभाव्यात्
किंतु तत्र शब्देन कोटिद्वयज्ञानं जन्यते, संशयस्तु मानस एवेति ।
भाषा-यहां यदि कोई कहे कि-' शब्दो नित्यो न वा ' इत्याकारक
वादियोंका ( विप्रतिपत्ति ) विवादही संशयमें कारण है तो यह ठीक नहीं. क्योंकि
'शब्दो नित्यो न वा ' इत्याकारक वादियोंका विवाद शब्दात्मक है और शाब्दज्ञान-