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सर्वकोश
न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda

विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा

DevanagariHindipublished350 पृष्ठ

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पृष्ठ 289

परिच्छेदः ५ ] भाषाटीकामेता. २६५
तत्र संयोगाभावावच्छेदेन संयोगज्ञानस्य भ्रमत्वात् । लक्ष्यस्या-
ननुगमाल्लक्षणाननुगमेऽपि न क्षतिः ।
शंका-जहां वृक्षहीमें कपिसंयोगाभावावच्छेदेन कपिसंयोगज्ञान हुआहै वहां उस
ज्ञानको भ्रमात्मक नहीं हुआ चाहिये; क्योंकि वहां संयोगाभावप्रतियोगि व्यधिकरण
नहीं है,किन्तु प्रतियोगिसमानाधिकरणही है. समाधान-ऐसे स्थलमें संयोगाभाव-
च्छेदेन संयोगज्ञानभी भ्रमरूपही है. शंका-एवं प्रमालक्षणका अननुगम हुआ ?
समा०-लक्ष्यस्थलोंके अननुगम अर्थात् विचित्र भिन्न २ होनेसे लक्षणाननुगम
अर्थात् लक्षण अनेकरूप माननेमेंभी हानि नहीं-इति ।
प्रमात्वं न स्वतो ग्राह्यं संशयानुपपत्तितः ॥ १३६ ॥
भाषा-प्रमाज्ञानमें प्रमात्वधर्म स्वतो ग्रहण नहीं होता यदि ऐसा होय तो संशय
ज्ञान कहींभी नहीं हुआ चाहिये ॥ १३६ ॥
प्रमात्वमिति । मीमांसका हि प्रमात्वं स्वतो ग्राह्यमिति वदन्ति,
तत्र गुरूणां मते ज्ञानस्य स्वप्रकाशरूपत्वात् तज्ज्ञानप्रामाण्यं
तेनैव गृह्यत इति ॥ १ ॥ भट्टानां मते ज्ञानमतीन्द्रियं ज्ञानज-
न्यज्ञातता प्रत्यक्षा तया च ज्ञानमनुमीयते ॥२॥ मुरारिमिश्राणां
मतेऽनुव्यवसायेन ज्ञानं गृह्यते । सर्वेषामपि मते तज्ज्ञानवि-
षयकज्ञानेन तज्ज्ञानप्रामाण्यं गृह्यते ॥ ३ ॥
भाषा-मीमांसकलोग ज्ञानमें प्रमात्वधर्मका स्वतः ग्रहण मानतेहैं. उनमें (गुरु )
प्रभाकरके मतमें ज्ञानस्वप्रकाशरूप है अर्थात् जैसे वस्त्वन्तरको विषय करताहै वैसेही
अपने आपकोभी करताहै. एवं जैसे वह स्वनिष्ठज्ञानत्वादि धर्मोंको स्वयं ग्रहण
करताहै वैसेही स्वनिष्ठ प्रमात्वधर्मकोभी स्वयं ग्रहण करताहै १ । और कुमारलभ-
ट्टके मतमें ज्ञान अतीन्द्रियपदार्थ है किन्तु ज्ञानसे उत्पन्न हुई विषयनिष्ठ ज्ञातता
प्रत्यक्षरूपा है. उस ज्ञातताद्वारा ज्ञानका तथा उसके प्रमात्वका अनुमान होताहै,
उस अनुमानका प्रकार यह है कि.-इयं घटनिष्ठ ज्ञातता घटविशेष्यकघटत्वप्रकारक
ज्ञानजन्या घटवृत्तिघटत्वप्रकारकज्ञाततात्वात् या यद्वृत्तियत्प्रकारिका ज्ञातता सा तद्वि-
शेष्यकतत्प्रकारकज्ञानसाध्या यथा पटे पटत्वप्रकारिका ज्ञातता इति २ । एवं
मुरारिमिश्रके मतमें प्रथमव्यवसायात्मक ज्ञाननिष्ठ यावत् धर्मोंका द्वितीय ( अनुव्य-
वसाय ) ज्ञानविषयक ज्ञानसे ग्रहण होताहै ३ । एवं औरभी सब वादियोंके मतमें
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