न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)
Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda
विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा
.२४८ न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ गुण-
न च पटविनाशेऽपि तन्त्वन्तरसंयोगात् परिमाणाधिक्यं न
स्यादिति वाच्यम् । तत्रापि वेमाद्यभिघातेनासमवायिकारणत-
न्तुसंयोगनाशात् पटनाशस्यावश्यकत्वात् ।
शंका-दोचार तन्तुओंके निकलनेसे पटके विनाश होनेपरभी उस पटमें यदि तन्तु
अन्तरका संयोग होय तो वही पट अधिक परिमाणवाला होजाताहै, वह नहीं हुआ
चाहिये. समाधान-ऐसे स्थलमेंभी वेमादिके अभिघाताख्य संयोगसे पटका अस-
मवायिकारण जो परस्पर तन्तुद्वयसंयोग उसका नाशः होताहै; इसलिये पटका
विनाशभी अवश्यही मानना चाहिये.
किंच तन्त्वन्तरस्य तत्पटावयवत्वे पूर्वं तत्पट एव न स्यात्,
तन्त्वन्तररूपकारणाभावात् । तन्त्वन्तरस्यावयवत्वाभावे च
न तेन परिमाणाधिक्यं संयुक्तद्रव्यान्तरवत् ।
भाषा-( किञ्च ) तन्तुअन्तरभी यदि उसी पूर्वपटके अवयवही मान लिये जांय
तो उन तन्तुओंके सम्बन्धसे पहले वह पटही नहीं होना चाहिये; क्योंकि स्वस-
म्बन्धसे प्रथम तन्तुअन्तररूप कारण विद्यमानही नहीं है और यदि तन्तुअन्तरको
उस पटका ( अवयव ) समवायिकारणही नहीं मानें तो उनसे पटपरिमाणके अधिक
होनेकी संयुक्तद्रव्यकी तरह शंकाही नहीं होसकती अर्थात् जैसे घटपटादिके परस्पर
संयोगसे घटके या पटके परिमाणको अधिक कोई नहीं मानता किन्तु संयुक्तमात्र
व्यवहार करतेहैं वैसेही तन्तुअन्तरके सम्बन्धसे प्रथम पटमेंभी समझना चाहिये.
तस्मात्तत्र तंत्वन्तरसंयोगे सति पूर्वं पटनाशस्ततः पटान्तरोत्प-
त्तिरित्यवश्यं स्वीकार्यम् । अवयविनः प्रत्यभिज्ञानं तु साजात्येन
दीपकलिकादिवत् !
भाषा-इसलिये ऐसे स्थलमें यही सिद्धान्त अवश्य मानना उचित है कि, तन्तु
अन्तरके संयोग होनेसे उस पूर्वपटका विनाश हुआहै और नूतन पटान्तरकी उत्पत्ति
हुई है. एवं “ स एवायं पटः ” इत्यादि प्रत्यभिज्ञाज्ञानका निर्वाह दीपशिखाकी तरह
सजातीयके अवगाहन करनेवाला समझना चाहिये अर्थात् जैसे क्षण२ में बदलती हुई
दीपशिखामें “ यह वही दीपशिखाप्रज्वलित है” इत्याकारक साजात्यावलम्बी प्रत्यय
लोकमें सर्वानुभवसिद्ध है; वैसेही प्रकृतमेंभी जानना चाहिये.
परिच्छेदः ५ ] भाषाटीकासमेता. २४९ ]
न च पूर्वतन्तव एव तन्तवन्तरसहकारात् पूर्वपटे सत्येव पटान्तर-
मारभन्तामिति वाच्यम् । मूर्तयोः समानदेशताविरोधात् । ए-
कदा नानाद्रव्यस्य तत्रोपलम्भस्य बाधितत्वाच्च। पूर्वद्रव्यस्य प्र-
तिबन्धकस्य विनाशे द्रव्यान्तरोत्पत्तिरित्यस्यावश्यमभ्युपेयत्वात्।
शंका-प्रथम तन्तुही यदि औरतन्तुओंकी सहकारतासे पहले पटके रहनेपरभी
दूसरे पटको उत्पन्न करें तो क्या दोष है?समाधान-दो मूर्तद्रव्य समान एक देशमें
नहीं रहसकते अर्थात् मूर्तद्रव्य देशका प्रतिरोधक होता है, इसलिये दो मूर्त एक
देशमें नहीं रह सकते और ऐसे स्थलमें एकही वार नानाद्रव्यकी उपलब्धिभी नहीं
होती अर्थात् एकही पटादि पदार्थ एकही कालमें दोतरहका कभी किसी पुरुषको
दिखाई नहीं दिया इसलिये उत्तरद्रव्यकी उत्पत्तिमें प्रतिबन्धकरूप पूर्वद्रव्यके विनाश
होनेसे द्रव्यान्तरकी उत्पत्ति होतीहै; इस वार्ताको अवश्य मानना चाहिये.
पृथक्तं निरूपयति, संख्यावदिति-
भाषा-एवं 'संख्यावत्' इत्यादि ग्रन्थसे पृथक्तका निरूपण करतेहैं-
संख्यावत्तु पृथक्तं स्यात्पृथक्प्रत्ययकारणम् ॥११३॥
भाषा-पृथक्प्रत्ययका कारणीभूत पृथक्तगुणभी संख्याकी तरहही जानना
चाहिये ॥ ११३ ॥
पृथक्प्रत्ययासाधारणं कारणं पृथक्तम् । तन्नित्यतादिकं संख्या-
वत् । तथाहि।नित्येष्वेकत्वं नित्यमनित्येष्वनित्यम् । अनित्य-
मेकत्वं त्वाश्रयद्वितीयक्षणे चोत्पद्यते आश्रयनाशान्नश्यति।तथै-
कपृथक्तमपि । द्वित्वादिवच्च द्विपृथक्तादिकमपीत्यर्थः ॥११३॥
भाषा-अर्थात् "अयं अस्मात् पृथक्" इत्याकारक प्रत्ययका असाधारण कारण
'पृथक्त'है उसके नित्य अनित्य होनेका विचार संख्याकी तरह जानना चाहिये.(तथाहि)
अर्थात् जैसे नित्यपदार्थोंमें एकत्व नित्य है और अनित्योंमें अनित्य है और वह
अनित्य एकत्व अपने आश्रयमें स्वाश्रयकी उत्पत्तिसे दूसरे क्षणमें उत्पन्न होता है,
एवं स्वाश्रयनाशहीसे नाश होताहै, वैसेही पृथक्तकोभी जानना चाहिये. एवं पूर्वोक्त
द्वित्वादिकोंकी तरह द्विपृथक्तादिकोंका उत्पत्तिविनाशभी जानलेना चाहिये अर्थात्
अपेक्षाबुद्धिरूप निमित्तकारणसे इनकी उत्पत्ति है तथा अपेक्षाबुद्धि आदिके विनाशसे
इनका विनाश है ॥ ११३ ॥
२०
२५० न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ गुण-
ननु 'अयमस्मात् पृथग्' इत्यादावन्योन्याभावो भासते तत्कथं
पृथक्त्वं गुणान्तरं स्वीक्रियते, नचास्तु पृथक्त्वं, न त्वन्योन्याभाव
इति वाच्यम्,रूपं न घट इति प्रतीत्यनापत्तेः । न हि रूपे घटा-
वधिकं पृथक्त्वं गुणान्तरमस्ति, न वा घटे घटावधिकं पृथक्त्वम-
स्ति येन परम्परासम्बन्धः कल्प्य इत्यत आह, अन्योन्याभावत
इति-
शंका-“ अयमस्मात् पृथक् ” इत्यादि प्रतीतिमें अन्योन्याभावका भान होताहै;
इसलिये इस प्रतीतिसे पृथक्त्वको गुणान्तर मानना योग्य नहीं और यदि कहो कि-
पृथक्त्वके गुणान्तर माननेसे सर्वत्र निर्वाह हो सकताहै इसलिये अन्योन्याभाव मान-
नेकी आवश्यकताही नहीं तो यहभी ठीक नहीं; क्योंकि यदि अन्योन्याभावप्रतीति
सिद्ध न होंय तो “ रूपं न घटः ” यह प्रतीति नहीं हुई चाहिये. भाव यह कि-इस
प्रतीतिकी निर्वाह पृथक्त्वसे नहीं होसकता; क्योंकि रूपमें घटात्मक अवधिको लेकर
कोई पृथक्त्वनामक गुणान्तर नहीं है और घटमें स्वात्मक अवधिको लेकरभी पृथक्त्व
नहीं रहता जिससे ‘ सामानाधिकरण्य ’ रूप परंपरासम्बन्धकी कल्पनासे उक्त प्रती-
तिका निर्वाह किया जाय इसी भावको लेकर मूलकार ‘ अन्योन्य ’ इत्यादि अग्रिम
ग्रन्थको कहतेहैं-
अन्योन्याभावतो नास्य चरितार्थत्वमिष्यते ॥
अस्मात्पृथगिदं नेति प्रतीतिर्हि विलक्षणा॥११४॥
समाधान-इस पृथक्त्वात्मकगुणकी अन्योन्याभावसे चरितार्थता नहीं होती;
क्योंकि “अयमस्मात् पृथक्” इससे “इदमिदं न” यह प्रतीति विलक्षण है ॥ ११४॥
विलक्षणेति । ननु शब्दवैलक्षण्यमेव न त्वर्थवैलक्षण्यमिति चेत् ।
न । विनाऽर्थभेदं घटात् पृथगितिवत् 'घटो न पटः' इत्यत्रापि
पञ्चमी स्यात् । तस्मात् यदर्थकयोगे पञ्चमी सोऽर्थो नञर्थाऽन्यो
न्याभावतो भिन्नो गुणान्तरं कल्प्यत इति ॥ ११४॥
शंका-इन दोनों प्रतीतियोंमें परस्पर केवल शब्दमात्रकी विलक्षणता है किन्तु
अर्थभेद नहीं है. समाधान-यदि अर्थभेद न होय तो जैसे “ घटात् पृथक् ” इस
प्रयोगमें पञ्चमीविभक्ति हुईहै,वैसे ‘घटो न पटः’ इस प्रयोगमेंभी पञ्चमी होनी चाहिये.
भाव यह कि-यदि ‘ नञ् ’ तथा ‘पृथक्’ अव्यय इन दोनोंका एकही अर्थ होय तौ
: तृतीयः स्यात्–
Line 19: भाषा–अप्राप्त द्रव्योंके परस्पर ( प्राप्ति ) मिलापका नाम ‘ संयोग ’है; वह
Line 20: संयोग तीन प्रकारका है. उनमें प्रथम अन्यतर क्रियासे उत्पन्न होताहै ॥ ११५ ॥
Line 21: दूसरा उभयक्रियासे उत्पन्न होताहै और तीसरा संयोगसे संयोग उत्पन्न होताहै.
Line 22: इनमें प्रथम पर्वत पक्षी आदिकोंका संयोग है अर्थात् पर्वत अचल है, केवल पक्षीआ-
Line 23: दिकी क्रियासे पर्वतमें संयोग होताहै ॥ ११६ ॥ एवं परस्पर ( मेष ) मेढेआदिका
Line 24: ( सन्निपात ) टक्कर लगनारूप दूसरा संयोग है अर्थात् ऐसा संयोग उभयत्र क्रिया
Line 25: हो तो होताहै. एवं कपालवृक्षके संयोगसे होनेवाला घटवृक्षका संयोग ॥ ११७ ॥
Line 26: तीसरा संयोग है.
Line 27: सन्निपातः संयोगः । द्वितीय उभयकर्मजः ॥ ११६ ॥ ११७॥
Line 28: तृतीय इति, संयोगज इत्यर्थः । तृतीयः स्यादिति च पूर्वेणान्वितम् ।
Let's check line 27:
सन्निपातः संयोगः । द्वितीय उभयकर्मजः ॥ ११६ ॥ ११७॥
Wait, does
२५२ न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ गुण-
भाषा-मूलमें 'सन्निपात' यह शब्द संयोगका वाचक है. एवं द्वितीयशब्द
उभयक्रियाजन्य संयोगपर है ॥ ११५ ॥ ११६ ॥ ११७ ॥ (तृतीय इति) अर्थात्
संयोगसे उत्पन्न होनेवाला संयोग मूलघटित 'तृतीयः स्यात्' इस भागका पूर्वके
पदोंके साथ अन्वय है.
-कर्मजोऽपि द्विधैव परिकीर्तितः ॥
अभिघातो नोदनं च शब्दहेतुरिहादिमः॥ ११८ ॥
शब्दाहेतुर्द्वितीयः स्यात्-
भाषा-वह क्रियाजन्य संयोग फिर दो प्रकारका है. एक अभिघाताख्य संयोग
है; और दूसरा नोदनाख्य है. जिस संयोगके होनेसे शब्द होय वह अभिघाताख्य
संयोग है ॥ ११८ ॥ एवं जिसके होनेसे शब्द न होय वह नोदनाख्य संयोग है.
आदिमोऽभिघातः ॥ ११८ ॥ द्वितीयो नोदनाख्यः संयोग इति ।
भाषा-मूलमें 'आदिम' शब्दसे अभिघाताख्य संयोगका ग्रहण है ॥ ११८ ॥
तथा 'द्वितीय' शब्दसे नोदनाख्यसंयोगका ग्रहण है.
विभक्तप्रत्ययासाधारणं कारणं विभागं निरूपयति, विभाग इति-
भाषा-एवं 'विभाग' इत्यादि ग्रन्थसे विभक्तप्रत्ययके असाधारण कारणीभूत
विभागका निरूपण करतेहैं-
-विभागोपि त्रिधा भवेत् ॥
एककर्मोद्भवस्त्वाद्यो द्वयकर्मोद्भवोऽपरः॥ ११९ ॥
विभागजस्तृतीयः स्यात्तृतीयोऽपि द्विधा भवेत् ॥
हेतुमात्रविभागोत्थो हेत्वहेतुविभागजः ॥ १२० ॥
भाषा-एवं संयोगकी तरह विभागभी तीन प्रकारका है. उनमें प्रथम एककी
क्रियासे उत्पन्न होताहै; दूसरा दोनोंकी क्रियासे उत्पन्न होताहै ॥११९॥ और तीसरा
विभागसे विभाग उत्पन्न होताहै. वह तीसरा फिर दोप्रकारका है. पहला केवल
कारणमात्रके विभागसे उत्पन्न होताहै और दूसरा कारणाकारण उभयके विभागसे
उत्पन्न होताहै ॥ १२० ॥
एककर्मेति । उदाहरणं तु श्येनशैलविभागादिकं पूर्ववद्बोध्यम् ॥
॥ ११९ ॥ तृतीयो विभागजः कारणमात्रविभागजन्यः कारणा-
कारणविभागजन्यश्चेति । आद्यस्तावत्-यत्र कपाले कर्म ततः
परिच्छेदः ५ ] भाषाटीकासमेता. २५३
कपालद्वयविभागस्ततो घटारम्भकसंयोगनाशस्ततो घटना-
शस्ततस्तेनैव कपालविभागेन स्वकर्मणः कपालस्याकाशवि-
भागो जन्यते, तत आकाशसंयोगनाशः, तत उत्तरदेशसंयोग-
स्ततः कर्मनाश इति ।
भाषा-तीनों प्रकारके विभागके उदाहरणभी पीछे लिखे तीनों प्रकारके संयोगकी
तरहही जानने चाहिये अर्थात् श्येन शैलादिका विभाग अन्यतरक्रियाजन्य है
तथा मेषद्वयका विभाग उभयक्रियाजन्य है और तीसरा विभागजविभाग दोप्रकारका
है. एक कारणमात्र विभागजन्य है, दूसरा कारणाकारणविभागजन्य है; उनमें प्रथमका
उदाहरण जैसे पहले कपालमें क्रिया हुई उस क्रियासे कपालद्वयका विभाग हुआ,
उस विभागसे पीछे घटके आरम्भक कपालद्वयके संयोगका विनाश हुआ पीछे
घटका नाश हुआ, उससे पीछे उसी कपालद्वयविभागसे पूर्वोक्त क्रियायुक्त कपाल-
का आकाशके साथ विभाग उत्पन्न होता है; उससे पीछे आकाशसंयोगका विनाश
होता है, उससे पीछे कपालका उत्तर देशके साथ संयोग होता है. उससे पीछे
कपालगत क्रियाका विनाश होता है-इति ।
न च तेन कर्मणैव कथं देशान्तरविभागो न जन्यत इति वा-
च्यम् । एकस्य कर्मण आरम्भकसंयोगप्रतिद्वन्द्विविभागजनक-
त्वस्यानारम्भकसंयोगप्रतिद्वन्द्विविभागजनकत्वस्य च विरोधात् ।
शंका-उस कपालद्वयविभागजनक प्रथमक्रियाहीसे यदि ( देशान्तर ) कपाला-
काशादि विभागभी मान लियाजाय तो हानि क्या है? अर्थात् वह प्रथमक्रियाही
कपालाकाशादि देशान्तर विभागकोभी उत्पन्न क्यों नहीं करती? उसके लिये जुदा
कपालद्वयविभागमें कारणता कल्पनेकी कौन आवश्यकता है. समाधान-एक
क्रियामें ( आरम्भकसंयोग ) कपालद्वय संयोगादिविरोधि विभागजनकता तथा
( अनारम्भकसंयोग ) कपालाकाशसंयोगादि विरोधिविभागजनकता नहीं रहती
क्योंकि इन दोनों धर्मोंका परस्पर विरोध है.
अन्यथा विकसत् कमलकुड्मलभङ्गप्रसङ्गात् ।
भाषा-( अन्यथा ) यदि आरम्भकसंयोगविरोधि विभागजनक क्रियाको तथा
अनारम्भकसंयोगविरोधि विभागजनक क्रियाको एकही मानें तो विकसत्कमलके
कुड्मलका भङ्ग होजाना चाहिये अर्थात् खिलते हुए कमलकी डोड़ी टूट जानी
चाहिये. यहां भाव यह है कि-खिलतेहुए कमलमें अग्रावच्छेदेन अनारम्भक संयोगके
विरोधिविभागकी जनका क्रिया है, उसी क्रियासे यदि मूलावच्छेदेन आरम्भकसंयो-
२५४ न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ गुण-
गविरोधिविभागभी मान लिया जाय तो उस विभागसे कमलके आरम्भकसंयोगके
नाश होनेके पश्चात् कमलका विनाशभी हुआ चाहिये परन्तु ऐसा होता देखनेमें
नहीं आता.
तस्माद्यदीदमनारम्भकसंयोगप्रतिद्वन्द्विविभागं जनयेत्, तदा
आरम्भकसंयोगप्रतिद्वन्द्विविभागं न जनयेत् ।
भाषा-इसलिये आरम्भकसंयोगविरोधि विभागजनक क्रियाको तथा अनारम्भ-
कसंयोगविरोधि विभागजनक क्रियाको एक मानना उचित नहीं है;किन्तु यही मानना
उचित है कि-क्रिया जिस कालमें अनारम्भकसंयोगविरोधि विभागको उत्पन्न करती है
उस कालमें आरम्भक संयोगके विरोधिविभागको नहीं उत्पन्न करती.
न च कारणविभागेनैव द्रव्यनाशात्पूर्वं कुतो देशान्तरविभागो
न जन्यत इति वाच्यम्। आरम्भकसंयोगप्रतिद्वन्द्विविभागवतो
ऽवयवस्य सति द्रव्ये देशान्तरविभागसम्भवात् ॥ १ ॥
शंका-कारणविभागहीसे अर्थात् कपालद्वयविभागादिहीसे घटादि द्रव्यनाशसे
पहले देशान्तरविभागभी क्यों नहीं उत्पन्न होता ? यदि होता है तो "ततो घटनाशः,
ततस्तैनैक कपालविभागेन सकर्मणः कपालस्याकाशविभागो जन्यते" यह पूर्वकथन
आपका असङ्गत होगा. समाधान-कपालद्वय विभागादिसे घटादिद्रव्यनाशके पहलें
देशान्तर विभाग उत्पन्न नहीं होसकता; क्योंकि आरम्भकसंयोगके ( प्रतिद्वंद्वि )
विरोधिविभागवाले कपालादि अवयवका ( सति द्रव्ये ) द्रव्यनाशके बिना देशान्तरकें
साथ विभाग होना असम्भव है १ ।
द्वितीयस्तावत् । यत्र हस्तक्रियया हस्ततरुविभागस्ततः शरी-
रेडपि विभक्तप्रत्ययो भवति तत्र च शरीरतरुविभागे हस्तक्रिया
न कारणं व्यधिकरणत्वात्,शरीरे तु क्रिया नास्त्येव,अवयविका
र्मणो यावदवयवकर्मनियतत्वात् । अतस्तत्र कारणाकारणवि-
भागेन कार्याकार्यविभागो जन्यत इति । २ ।
भाषा-एवं द्वितीयका उदाहरण जैसे जहां(हस्त)हाथमें क्रिया होनेसे हाथ वृक्षका
विभाग हुआहै. पश्चात् उसीसे शरीरमेंभी विभक्त (प्रत्यय) प्रतीति होतीहै, वहां शरीर
वृक्षके विभागमें हस्तक्रियाको कारणता नहीं है क्योंकि इन दोनोंका परस्पर एक
अधिकरण नहीं है और कार्यकारणभाव नियमसे समानाधिकरण पदार्थोंहीका होताहै-
परिच्छेदः ५ ] भाषाटीकासमेता. २५५
शरीरवृक्षके विभागके प्रति शरीरक्रियाको कारणता कहें तो वहभी ठीक नहीं क्योंकि
शरीरमें क्रिया हुईही नहीं. भाव यह कि-अवयवीके यावत् अवयवोंमें क्रिया होनेसे
अवयवीमें क्रिया मानी जातीहै, अन्यथा नहीं; इसलिये ऐसे स्थलमें कारणाकारणके
विभागसे कार्याकार्यविभागका उत्पन्न होनाही मानने योग्य है अर्थात् हस्तवृक्षके
विभागहीसे शरीरवृक्षका विभाग उत्पन्न हुआ मानना चाहिये. हस्तवृक्षके विभाग
होनेहीसे शरीरमेंभी विभक्तप्रत्यय होताहै ॥ ३ ॥
अत एव विभागो गुणन्तरम् । अन्यथा शरीरे विभक्तप्रत्ययो न
स्यात्। अतः संयोगनाशेन विभागो नान्यथासिद्धो भवति ॥ १२० ॥
भाषा-इसीलिये विभागभी गुणान्तर है, किन्तु संयोगनाशरूप नहीं है. (अन्यथा)
यदि गुणान्तर न मानें किन्तु संयोग नाशरूपही मानें तो शरीरमें विभक्तप्रत्यय नहीं
होना चाहिये इसलिये संयोगनाशसे विभाग अन्यथा सिद्ध नहीं है ॥ १२० ॥
परापरव्यवहारनिमित्ते परत्वापरत्वे निरूपयति, परत्वं चेति--
भाषा-एवं ' परत्वं ' इत्यादि ग्रन्थसे परापर व्यवहारके निमित्त कारणीभूत
परत्व तथा अपरत्वका निरूपण करतेहैं-
परत्वं चापरत्वं च द्विविधं परिकीर्तितम् ॥
दैशिकं कालिकं चेति मूर्त्त एव तु दैशिकम्॥१२१॥
परत्वं मूर्त्तसंयोगभूयस्त्वज्ञानतो भवेत् ॥
अपरत्वं तदल्पत्वबुद्धितः स्यादितीरितम् ॥१२२॥
भाषा-दैशिक कालिक भेदसे परत्व तथा अपरत्व दोप्रकारका कहा है. उनमेंसे
दैशिक परत्वापरत्व तो मूर्त्तपदार्थहीमें रहते हैं ॥ १२१ ॥ अधिकमूर्त्तसंयोगज्ञा-
नसे परत्व उत्पन्न होताहै. एवं उससे ( अल्प ) न्यून मूर्त्तसंयोगज्ञानसे अपरत्व
उत्पन्न होताहै ॥ १२२ ॥
दैशिकमिति । दैशिकपरत्वं बहुतरमूर्त्तसंयोगान्तरितत्वज्ञानादु-
त्पद्यते । एवं तदल्पीयस्त्वज्ञानादपरत्वमुत्पद्यते । अत्रावधि-
त्वार्थं पञ्चम्यपेक्षा । यथा पाटलिपुत्रात् काशीमपेक्ष्य प्रयागः
परः, पाटलिपुत्रात् कुरुक्षेत्रमपेक्ष्य प्रयागोऽपर इति ॥ १२१॥ १२२॥
भाषा--अनेक मूर्त्तपदार्थोंके परस्पर संयोगसंयोगान्तरज्ञानसे दैशिकपरत्व उत्पन्न
होताहै . एवं परत्वउत्पादक संयोगसंयोगान्तरकी अपेक्षा न्यूनसंयोगसंयोगान्तेक
३५६ न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ गुण-
ज्ञानसे अपरत्व उत्पन्न होताहै. यहां अवधिज्ञानार्थ पञ्चमीविभक्तिकी अपेक्षा है; जैसे
( पाटलिपुत्रात् ) “पटनाकी अवधि मानकर काशीकी अपेक्षा प्रयाग परे है अर्थात्
पटनेमें स्थित पुरुषको काशीकी अपेक्षा प्रयाग दूर है. एवं पटनेहीमें स्थित पुरुषको
कुरुक्षेत्रकी अपेक्षा प्रयाग अपर है अर्थात् समीप है.” इत्याकारक व्यवहारके असा-
धारण निमित्तभूत मूर्तपदार्थोंमें परत्वापरत्व ये दो धर्म रहते हैं ॥ १२१ ॥ १२२ ॥
तयोरसमवायी तु दिक्संयोगस्तदाश्रये ॥
भाषा-उन दैशिक परत्वापरत्वोंका असमवायिकारण दैशिक परत्वापरत्व
आश्रयके साथ दिशाका संयोगरूपही है.
तयोर्दैशिकपरत्वापरत्वयोः । असमवायी असमवायिकारणम् ।
तदाश्रये दैशिकपरत्वापरत्वाश्रये ।
भाषा-मूलनिष्ठ ‘तयोः’ इस पदसे दैशिक परत्वापरत्त्वका ग्रहण है. एवं
‘असमवायी’ पदसे असमवायिकारणका ग्रहण है. ‘तदाश्रये’ इस पदसे दैशिक
परत्वापरत्वके आश्रय अर्थात् पूर्वोक्तरीतिसे जिन प्रयागादि स्थलोंमें दैशिक परत्वाप-
रत्व उत्पन्न होताहै उसका ग्रहण है.
दिवाकरपरिस्पन्दभूयस्त्वज्ञानतो भवेत् ॥ १२३॥
परत्वमपरत्वं तु तदीयाल्पत्वबुद्धितः ॥
भाषा-एवं सूर्यक्रियाके भूयस्त्वज्ञानसे कालिकपरत्व उत्पन्न होताहै ॥ १२३ ॥
तथा सूर्यक्रियाके अल्पीयस्त्वज्ञानसे कालिकअपरत्व उत्पन्न होताहै.
दिवाकरेति । अत्र परत्वमपरत्वं च कालिकं ग्राह्यम् । यस्य
सूर्यपरिस्पन्दापेक्षया यस्य सूर्यपरिस्पन्दोऽधिकः स ज्येष्ठः, यस्य
न्यूनः स कनिष्ठः । कालिकपरत्वापरत्वे जन्यद्रव्य एव ।
भाषा-( अत्र ) इस प्रकरणमें ‘परत्व’ तथा ‘अपरत्व’ कालिक जानना
चाहिये. ( यस्य ) जिस पीछे उत्पन्न हुए पदार्थके साथ सूर्यक्रियाकी अपेक्षासे
( यस्य ) जिस प्रथम उत्पन्न हुए पदार्थसे सूर्य्यकी क्रिया अधिक सम्बन्ध रखतीहै
वह पदार्थ ज्येष्ठ है अर्थात् अधिक आयुवाला है. एवं जिससे जिसमें न्यून सम्बन्ध
रखतीहै वह उससे कनिष्ठ है अर्थात् कम आयुःवाला है यह कालिक परत्वापरत्व
व्यवहार केवल जन्यद्रव्यहीमें होताहै, औरपदार्थोंमें नहीं होता.
अत्र त्वसमवायी स्यात्संयोगः कालपिण्डयोः १२४॥
परिच्छेदः ५ ] भाषाटीकासमेता, २५७
अत्र कालिकपरत्वापरत्वयोः ॥ १२४ ॥
भाषा-( अत्र ) इस कालिक परत्वापरत्वमें काल ( पिण्ड ) जन्यद्रव्यके संयो-
गको असमवायिकारणता है ॥ १२४ ॥
अपेक्षाबुद्धिनाशेन नाशस्तेषां निरूपितः ॥
तेषां कालिकदैशिकपरत्वापरत्वानाम् ।
भाषा-उन कालिक तथा दैशिक परत्वापरत्वोंका अपेक्षाबुद्धिके नाश होनेसे
नाश होताहै.
क्रमप्राप्तां बुद्धिं निरूपयितुमाह, । बुद्धेरिति-
भाषा-यहां ' बुद्धेः ' इत्यादि ग्रन्थसे क्रमप्राप्त बुद्धिका निरूपण करतेहैं-
बुद्धेः प्रकारः प्रागेव प्रायशो विनिरूपितः ॥ १२५ ॥
अथावशिष्टोऽप्यपरः प्रकारः परिदर्श्यते ॥
अप्रमा च प्रमा चेति ज्ञानं द्विविधमिष्यते ॥१२६॥
भाषा-बुद्धिका प्रकार तो हम बहुलरूपसे पीछे आत्मनिरूपणहीमें कह चुकेहैं
॥ १२५ ॥ परन्तु उसमें जितना कुछ थोड़ासा ( अविशिष्ट ) बाकी है वह यहांभी
दिखलातेहैं. अप्रमा तथा प्रमाभेदसे ज्ञान दोप्रकारका होताहै ॥ १२६ ॥
अप्रमां निरूपयति, तच्छून्य इति-
भाषा-यहां ' तच्छून्ये ' इत्यादि मूलग्रन्थसे अप्रमाज्ञानका निरूपण करतेहैं-
तच्छून्ये तन्मतिर्या स्यादप्रमा सा निरूपिता ॥
तत्प्रपञ्चो विपर्यासः संशयोऽपि प्रकीर्तितः ॥१२७॥
भाषा-( तत् ) रजतत्वादिधर्माभाववाली शुक्तिमें जो ( तन्मतिः ) "रजतत्ववद्
रजतं " इत्याकारक बुद्धि, ऐसी बुद्धिका नाम 'अप्रमा' है. विपर्यय तथा संशय
आत्मकज्ञान उसी अप्रमाआत्मक बुद्धिहीका प्रपञ्च समझना चाहिये ॥ १२७ ॥
तदभाववति तत्प्रकारकं ज्ञानं भ्रम इत्यर्थः । तत्प्रपञ्चो
ऽप्रमाप्रपञ्चः ॥ १२५ ॥ १२६ ॥ १२७ ॥
भाषा-अर्थात् तद्धर्माभाववालेमें जो तद्धर्मप्रकारक ज्ञान उस ज्ञानका नाम 'भ्रम'
है. मूलगत 'तत्प्रपञ्चः' इस पदसे अप्रमाज्ञानका प्रपञ्च समझना चाहिये ॥ १२७ ॥
आद्यो देहेष्वात्मबुद्धिः शङ्खादौ पीततामतिः ॥
२५८ न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ गुण-
भवेन्निश्चयरूपा या-
आद्य इति, विपर्यास इत्यर्थः ।
भाषा-देहमें आत्मबुद्धि, तथा शंखमें पीतबुद्धि, शुक्तिमें रजतबुद्धि, इत्यादि
यदि निश्चयरूपा होय तो उस बुद्धिका नाम 'विपर्ययज्ञान' है.
शरीरादौ यदात्मत्वप्रकारकं ज्ञानं गौरोऽहमित्याकारकमेवं श-
ङ्खादौ 'पीतः शङ्खः' इत्याकारकं यज्ज्ञानं निश्चयरूपं तद्भ्रम इति ।
भाषा-शरीरादिमें जो "गौरोऽहं, श्यामोऽहं" इत्याकारक आत्मत्वप्रकारक
ज्ञान तथा शंखादिमें जो "पीतः शंखः" इत्याकारक पीतत्वप्रकारक ज्ञान यह
यदि निश्चयरूप होय तो उसका नाम 'भ्रम' है-इति ।
-संशयोऽथ प्रदर्श्यते ॥ १२८॥
किंस्विन्नरो वा स्थाणुर्वेत्यादिबुद्धिस्तु संशयः ॥
भाषा-अब संशयात्मक ज्ञानका आकार दिखलातेहैं कि-॥ १२८ ॥ क्या यह
पुरुष है कि स्थाणु है? इत्यादि ज्ञानका नाम 'संशय' है.
किंस्विदिति वितर्के।
भाषा-मूलगत 'किंस्वित्' यह पद वितर्कका बोधक है तथा 'स्थाणुः' यह पद
शाखाच्छिन्नवृक्षका बोधक है. भाव यह कि-'एकस्मिन् धर्मिणि विरुद्धनानाधर्मावगाहि
ज्ञान' का नाम 'संशय' है. उदाहरण इसका 'किंस्वित्' इत्यादि ग्रन्थसे
मूलहीमें है.
निश्चयस्य लक्षणमाह, तद्भावेति-
भाषा-एवं 'तदभाव' इत्यादि ग्रन्थसे प्रमात्मक निश्चयज्ञानका लक्षण कहतेहैं-
तदभावाप्रकाराधीस्तत्प्रकारा तु निश्चयः ॥ १२९ ॥
भाषा-जो धर्म जिसमें नहीं रहता वह उसमें न भासे किन्तु जो धर्म जिस
वस्तुमें विद्यमान है तद्धर्मप्रकारक ज्ञानही होय तो उसका नाम 'निश्चय' अर्थात्
'प्रमाज्ञान' है ॥१२९॥
तदभावाप्रकारकत्वे सति तत्प्रकारकं ज्ञानं निश्चयः॥१२८॥१२९॥
भाषा-अर्थात् शुक्तित्वादि धर्माभावाप्रकारकत्वे सति जो शुक्तित्वप्रकारक
शुक्तिविशेष्यक 'शुक्तिरियं' इत्यादि ज्ञान, उसका नाम 'निश्चय' है; इस लक्षणमें प्रथम
सप्तम्यन्त विशेषण संशयमें अतिव्याप्तिवारणार्थ जानना चाहिये ॥१२८॥१२९॥
परिच्छेदः ५ ] भाषाटीकासमेता. २५९
संशयं लक्षयति, स संशय इति-
भाषा-एवं ' स संशयो ' इत्यादि मूलग्रंथसे संशयका लक्षण दिखलाते हैं-
स संशयो मतिर्या स्यादेकत्राभावभावयोः ॥
भाषा-( एकत्र ) एक धर्मीमें विरुद्धभावाभाव धर्मावगाही ज्ञानका नाम
' संशयज्ञान ' है.
एकधर्मिकविरुद्धभावाभावप्रकारकं ज्ञानं संशय इत्यर्थः ।
भाषा-अर्थात् एक धर्मिविषयक विरुद्धभावाभावप्रकारक ज्ञानका नाम 'संशय'
है. उदाहरण ' किंस्वित् ' इत्यादि मूल है.
साधारणादिधर्मस्य ज्ञानं संशयकारणम् ॥ १३० ॥
भाषा-साधारणादि धर्मका ज्ञान संशयमें कारणीभूत है ॥१३०॥
साधारणेति । उभयसाधारणो यो धर्मस्तज्ज्ञानं संशयकारणम् ।
यथोच्चैस्तरत्वं स्थाणुपुरुषसाधारणं ज्ञात्वा 'अयं स्थाणुर्न वा'
इति सन्दिग्धे । एवमसाधारणधर्मज्ञानमपि कारणम् । यथा श-
ब्दत्वं नित्यानित्यव्यावृत्तं शब्दे गृहीत्वा शब्दो नित्यो न वेति
सन्दिग्धे ।
भाषा-अर्थात् उभयपदार्थ साधारण जो कोई एक धर्म उस धर्मका ज्ञान
संशयका कारण है; जैसे ऊँचापना स्थाणु तथा पुरुष इन दोनोंमें एक जैसा है, उस
ऊँचेपनेको मन्दअन्धकारमें दूरसे देखकर " अयं स्थाणुर्न वा ' इत्याकारक पुरुषकों
सन्देह होताहै. ऐसेही असाधारण धर्मका ज्ञानभी संशयका कारण है; जैसे शब्दत्वध-
र्मकी गगनादि नित्य पदार्थोंसे तथा घटपटादि अनित्य पदार्थोंसे व्यावृत्ति ग्रहण
पूर्वक केवल शब्दमात्र वृत्तित्ता ग्रहण करकेभी " शब्दो नित्यो न वा " इत्या-
कारक पुरुषको सन्देह उत्पन्न होता है.
विप्रतिपत्तिस्तु 'शब्दो नित्यो न वा' इत्यादिशब्दात्मिका न संशय-
कारणम्। शब्दव्याप्तिज्ञानादीनां निश्चयमात्रजनकत्वस्वाभाव्यात्
किंतु तत्र शब्देन कोटिद्वयज्ञानं जन्यते, संशयस्तु मानस एवेति ।
भाषा-यहां यदि कोई कहे कि-' शब्दो नित्यो न वा ' इत्याकारक
वादियोंका ( विप्रतिपत्ति ) विवादही संशयमें कारण है तो यह ठीक नहीं. क्योंकि
'शब्दो नित्यो न वा ' इत्याकारक वादियोंका विवाद शब्दात्मक है और शाब्दज्ञान-
२६० न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ गुण-
में तथा व्याप्तिज्ञानमें स्वभावसे निश्चयमात्र जनकता रहती है किन्तु संशयकारणता
नहीं रहती; ( किन्तु ) परन्तु इतना भेद है कि-ऐसे स्थलमें शब्दसे समरूपेण
कोटिद्वयावगाही ज्ञान उत्पन्न होता है; तदनन्तर वहांही मानसिक संशय ज्ञान उत्पन्न
होता है.
एवं ज्ञाने प्रामाण्यसंशयाद्विषयसंशय इति ।
भाषा-एवं ( ज्ञाने ) इदं जलं इत्यादिज्ञानमें ( प्रामाण्यसंशयात् ) “ इदं
जलत्वप्रकारकं ज्ञानं प्रमा न वा ” इत्यादि प्रामाण्यसंशयसे ( विषय ) “ इदं जलं
न वा ” इत्यादि संशयभी उत्पन्न होता है.
एवं व्याप्यसंशयादपि व्यापकसंशय इत्यादिकं बोध्यम् । किंतु
संशये धर्मिज्ञानं धर्मीन्द्रियसन्निकर्षो वा कारणमिति ॥१३०॥
भाषा-एवं धूमादि व्याप्यमें “ पर्वतो धूमवान्न वा ” इत्याकारक सन्देह
होनेसे वह्निआदि व्यापकमेंभी “ पर्वतो वह्निमान्न वा ” इत्याकारक सन्देह होताहै
इत्यादि औरभी जान लेने; परन्तु संशयमें धर्मीका ज्ञान या धर्मीके साथ इन्द्रियका
सम्बन्ध नियमसे कारणीभूत है ॥ १३० ॥
दोषोऽप्रमाया जनकः प्रमायास्तु गुणो भवेत् ।
भाषा-अप्रमात्मक ज्ञानका उत्पादक दोष है तथा प्रमात्मक ज्ञानका
उत्पादक गुण है.
दोष इति । अप्रमां प्रति दोषः कारणं, प्रमां प्रति गुणः कारणम्।
तत्रापि पित्तादिरूपा दोषा अननुगतास्तेषां कारणत्वमन्वयव्य-
तिरेकाभ्यामेव सिद्धम् । गुणस्य प्रमाजनकत्वं त्वनुमानात्सि-
द्धम् । यथा प्रमा ज्ञानसाधारणकारणभिन्नकारणजन्या जन्यज्ञा-
नत्वादप्रमावत् ।
भाषा-अर्थात् अप्रमाज्ञानके प्रति दोषको कारणता है तथा प्रमाज्ञानके
प्रति गुणको कारणता है; उनमेंभी पित्तादिरूप अनेक दोष अननुगत हैं अर्थात् कहीं
कोई रहता है, कहीं कोई रहता है; उन दोषोंको अप्रमाज्ञानके प्रति कारणता अन्व-
यव्यतिरेकद्वारा सिद्ध है अर्थात् कोई एक दोष विद्यमान होय तो अप्रमाज्ञान उत्पन्न
होता है, न होय तो नहीं होता और गुणको प्रमात्मक ज्ञान जनकता तो अनुमान
द्वारा सिद्ध है; ( यथा ) जैसे अप्रमाज्ञानकी तरह जन्यज्ञान होनेसे प्रमाज्ञानभी
परिच्छेदः ५ ] भाषाटीकासमेता. २६१
अवश्यज्ञानसामान्यकारणसे भिन्न किसी एक कारणसे जन्य है, ऐसा अनुमान कर
सकते हैं. वह ज्ञान सामान्यकारणसे भिन्न कारण गुणही होसकताहै.
न च दोषाभाव एव कारणमस्त्विति वाच्यम्। 'पीतः शङ्खः' इति
ज्ञानस्थलेऽपि पित्तरूपदोषसत्त्वाच्छङ्खप्रमानुत्पत्तिप्रसङ्गात्। वि-
निगमनाविरहादनन्तदोषाभावस्य कारणत्वमपेक्ष्य गुणकारण-
ताया न्याय्यत्वाच्च।
शंका-प्रमाज्ञानके प्रति दोषाभावकोही कारणता मानलें तो हानि क्याहै? समा-
धान- "पीतः शंखः" इत्याकारक ज्ञानस्थलमेंभी पीतरूप दोष विद्यमान है ऐसे
स्थलमें शंखत्वप्रकारक शंखविशेष्यक ज्ञान प्रमात्मक नहीं हुआ चाहिये; क्योंकि
यहां आपके सिद्धान्तानुसार दोषाभावरूप कारण विद्यमान नहीं है और विनिगमना-
विरहसे अर्थात् एकत्र पक्षपातिनीयुक्तिके न होनेसे अनन्तदोषाभावोंको कारणता
माननेकी अपेक्षा केवल गुणमें कारणता माननीही उचित है.
न च गुणसत्त्वेऽपि पित्तेन प्रतिबन्धाच्छङ्के न श्वैत्यज्ञानमतः
पित्तादिदोषाभावानां कारणत्वमवश्यं वाच्यम्,तथा च किं गुण-
स्य हेतुत्वकल्पनयेति वाच्यम् । तथाऽप्यन्वयव्यतिरेकाभ्यां
गुणस्यापि हेतुत्वसिद्धेः।
शंका-प्रमाज्ञानोत्पादक गुणके विद्यमान होनेसेभी पीतरूप दोषको प्रतिबन्धक
होनेसे शंखमें श्वेतताका ज्ञान नहीं होता, इसलिये पित्तादि दोषाभावोंकोभी कारणता
अवश्य माननी चाहिये. एवं यदि दोषाभावमें अवश्य कारणता कॢप्त है तो गुणोंमें
कारणता पृथक् कल्पना करनेसे क्या लाभहै? समाधान-तथापि अन्वयव्यतिरेकद्वारा
गुणोंमेंभी कारणता सिद्ध है. भाव यह कि-पित्तादि दोषाभावस्थलमेंभी विशेषणवद्विशे-
ष्यके साथ इन्द्रियसन्निकर्परूप गुणके न रहनेसे शंखमें 'पीतः' इत्याकारक ज्ञान प्रमा
नहीं होसकता; इसलिये दोषाभावसे गुण अन्यथासिद्ध नहीं होसकता.
एवं 'भ्रमं प्रति गुणाभावः कारणम्' इत्यस्यापि सुवचत्वाच्च ।
भाषा-(एवं) यदि अन्वयव्यतिरेक होनेसेभी गुणोंको अन्यथासिद्ध मानों तो
भ्रमज्ञानके प्रतिभी गुणाभावहीको कारणता होनी चाहिये तथा दोषको अन्यथासिद्ध
मानना चाहिये यह कथनभी सुवच होसकताहै.
तत्र दोषाः के इत्याकांक्षायामाह, पित्तेति-
२६२ न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ गुण-
भाषा-इस प्रसङ्गमें दोष कौन हैं ? ऐसी आकांक्षाको लेकर ‘ पित्त ’ इत्यादि
मूलग्रन्थसे दोषोंका निरूपण करतेहैं—
पित्तदूरत्वादिरूपो दोषो नानाविधो मतः ॥१३१॥
भाषा-पित्तदूरत्वादिरूप दोष इस प्रकरणमें अनेक प्रकारके हैं ॥ १३१ ॥
क्वचित्पीतादिभ्रमे पित्तं दोषः, क्वचिच्चन्द्रादेः स्वल्पपरिमाणभ्रमे
दूरत्वं दोषः, क्वचिच्च वंशोरगभ्रमे मण्डूकवसाञ्जनमित्येवंरूपा-
दोषा अननुगता एव भ्रान्तिजनका इत्यर्थः ॥ १३१ ॥
भाषा-कहीं “ पीतः शंखः ” इत्यादिज्ञानस्थलमें पित्तरूप दोष है और कहीं
“ वितस्तिपरिमाणकश्चन्द्रः” इत्यादि ज्ञानस्थलमें दूरत्वरूप दोष है, एवं कहीं ( वंश )
बांसकी यष्टीमें सर्पभ्रमापादक मण्डूकवसाञ्जनरूप दोष है; इत्यादि अनेक प्रकारके
अननुगत दोष भ्रान्तिज्ञानके जनक हैं ॥ १३१ ॥
अथ के गुणा इत्याकांक्षायां प्रत्यक्षादौ क्रमशोगुणान् दर्शयति,
प्रत्यक्षेति—
भाषा-एवं इस प्रसङ्गमें गुण कौन हैं ? ऐसी आकांक्षाको लेकर ‘ प्रत्यक्षे ’
इत्यादि मूलसे प्रत्यक्षादि ज्ञानोंमें यथाक्रमानुसारेण ग्रन्थकार गुणोंको दिखलाता है—
प्रत्यक्षे तु विशेष्येण विशेषणवता समम् ॥
सन्निकर्षो गुणस्तु स्यादथ त्वनुमितौ पुनः॥१३२॥
पक्षे साध्यविशिष्टे तु परामर्शो गुणो भवेत् ॥
शक्ये सादृश्यबुद्धिस्तु भवेडुपमितौ गुणः ॥१३३॥
शाब्दबोधे योग्यतायास्तात्पर्यस्याथ वा प्रमा ॥
गुणः स्यात्—
भाषा-विशेषणविशिष्ट विशेष्यके साथ जो नेत्रादि इन्द्रियोंका सन्निकर्ष वह
प्रत्यक्षात्मक ज्ञानका जनक गुण है ॥ १३२ ॥ एवं साध्यविशिष्ट पक्षमें पूर्वोक्त
परामर्शामक ज्ञान अनुमितिज्ञानका जनक गुण है, गवयादि शक्यमें जो “ गोसदृशो
गवयपदवाच्यः” इत्याकारक सादृश्यबुद्धि, वह उपमितिज्ञानका जनक गुण है॥१३३॥
प्रत्यक्षे विशेषणवद्विशेष्यसन्निकर्षो गुणः, अनुमितौ साध्यवति
साध्यव्याप्यवैशिष्ट्यज्ञानं गुण इति । एवमग्रेऽप्यूह्यम् ॥१३३॥
परिच्छेदः ५ ] भाषाटीकासमेता. २६३
भाषा-एवं पूर्वोक्त योग्यताका या वक्ताके तात्पर्यका प्रमात्मकज्ञान शाब्दबोधमें
गुण है. प्रत्यक्षज्ञानमें विशेषणवद्विशेष्यसन्निकर्षही गुणरूप है. एवं अनुमितिज्ञानमें
साध्यवालेमें जो साध्यव्याप्य वैशिष्ट्यज्ञान अर्थात् “ वन्हिव्याप्यधूमवानयं पर्वतः ”
इत्यादि परामर्शात्मक ज्ञान वही गुणरूप है. ऐसेही आगेभी जानलेना अर्थात् उपमिति
ज्ञानमें शक्यमें सादृश्यबुद्धिही गुणरूप है. एवं शाब्दबोधमें योग्यताज्ञान या तात्पर्यका
यथार्थज्ञानही गुणरूप है--इतिं ।
प्रमां निरूपयति, भ्रमभिन्नमिति-
भाषा-एवं ' भ्रमभिन्न ' इत्यादि ग्रन्थसे मूलकार प्रमाका निरूपण करते हैं-
-भ्रमभिन्नं तु ज्ञानमत्रोच्यते प्रमा ॥ १३४ ॥
भाषा-इस प्रकरणमें भ्रमभिन्नज्ञानकी प्रमा संज्ञा है ॥ १३४ ॥
ननु यत्र शुक्तिरजतयोः 'इमे रजते' इति ज्ञानं जातं तत्र रजतांशे
ऽपि प्रमा न स्यात् तज्ज्ञानस्य भ्रमभिन्नत्वाभावादत आह,
अथवेति-
शंका-जहां शुक्ति तथा रजत उभयमें “ इमे रजते ” इत्याकारक ज्ञान हुआ है
वहां इस ज्ञानको रजतांशमेंभी प्रमात्व नहीं हुआ चाहिये. क्योंकि यह ज्ञान भ्रम
भिन्न नहीं है किन्तु शुक्त्यंशमें भ्रमरूपही है. समाधान-इसका उत्तर 'अथवा'
इत्यादि ग्रन्थसे मूलकार स्वयं कहते हैं-
अथवा तत्प्रकारं यज्ज्ञानं तद्वद्विशेष्यकम् ॥
तत्प्रमा-
भाषा-अथवा तत्प्रकारक तद्वद्विशेष्यक ज्ञानका नाम 'प्रमाज्ञान' है.
तद्वद्विशेष्यकं तत्प्रकारकं ज्ञानं प्रमेत्यर्थः ।
भाषा-अर्थात् घटत्ववद्विशेष्यक घटत्वप्रकारक ज्ञानका नाम 'प्रमाज्ञान' है. ऐसेही
वस्तुमात्रके ज्ञानमें जानना चाहिये.
अथैवं स्मृतेरपि प्रमात्वं स्यात्ततः किमिति चेत्तथा सति तत्कर-
णस्यापि प्रमाणान्तरत्वं स्यादिति चेत् । नायथार्थानुभवकरणत्व
स्यैव प्रमाणत्वेन विवक्षणात् ।
शंका-इस लक्षणसे स्मृतिज्ञानकोभी प्रमात्व हुआचाहिये; क्योंकि स्मृतिभी
तद्वद्विशेष्यक तत्प्रकारकाही होतीहै. समाधान-यदि मानभी लें तो हानि क्या है ?
२६४ न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ गुण-
शंका-ऐसे माननेसे स्मृतिके कारणीभूत अनुभवको या संस्कारकोभी प्रमाणान्तर मानना
होगा. समाधान-'प्रमाण' नाम तौ हमको यथार्थ अनुभवके करणहीका विवक्षित है.
स्मृतिज्ञान यथार्थ अनुभव नहींहै. इसलिये उसके कारणको प्रमाणभी नहीं कहसकते.
इदं तु बोध्यम् । येन सम्बन्धेन यद्वत्ता तेन सम्बन्धेन तद्वद्विशे-
ष्यकत्वं तेन सम्बन्धेन तत्प्रकारकत्वं वाच्यम्, तेन कपालादौ
संयोगादिना घटादिज्ञाने नातिव्याप्तिः ।
भाषा-(इदं तु बोध्यम्) इतना यहां औरभी जानना चाहिये कि-जिस वस्तुकों
जिस सम्बन्धसे यद्धर्मवत्ता है उसमें उसीसम्बन्धसे तद्वद्विशेष्यकत्व तथा उसी सम्ब-
न्धसे तत्प्रकारकत्व समझना चाहिये. एतादृश निवेशसे “संयोगेन घटवन्तौ कपालौ”
इत्यादि भ्रमज्ञानमें प्रमालक्षणकी अतिव्याप्ति नहीं होसकती.
एवं सति निर्विकल्पकं प्रमा न स्यात् तस्य सप्रकारकत्वाभा-
वादत आह, न प्रमेति-
शंका--ऐसे स्वीकार करनेसे निर्विकल्पक ज्ञान प्रमा नहीं होसकता; क्योंकि वह
किञ्चित्प्रकारक नहीं है. समाधान-इसका उत्तर मूलकार स्वयं कहते हैं-
-न प्रमा नापि भ्रमः स्यान्निर्विकल्पकम् ॥ १३५ ॥
प्रकारतादिशून्यं हि सम्बन्धानवगाहि तत् ॥
भाषा-निर्विकल्पक ज्ञानको प्रमारूप या भ्रमरूप नहीं कहसकते ॥ १३५ ॥
क्योंकि उसका स्वरूपासम्बन्धानवगाहि तथा विशेष्यताप्रकारतासे रहित है.
ननु वृक्षे कपिसंयोगज्ञानं भ्रमः स्यात् प्रमा च स्यादिति चेत् ।
नाप्रतियोगिव्यधिकरणसंयोगाभाववति संयोगज्ञानस्य भ्रमत्वात् ।
शंका-आपके कथनानुसार “वृक्षः कपिसंयोगी” इत्याकारक ज्ञानको भ्रम-
रूपभी होना चाहिये तथा प्रमारूपभी होना चाहिये; क्योंकि वृक्षमें शाखावच्छेदेन
कपिसंयोग हैभी, तथा मूलावच्छेदेन नहींभी है. समाधान--कपिरूप प्रतियोगीके
व्यधिकरण कपिसंयोगाभाव वालेमें यदि कपिसंयोगका ज्ञान होय तो वह ज्ञान
भ्रमरूप होसकताहै; अन्यथा नहीं.
न च वृक्षे कपिसंयोगाभावावच्छेदेन संयोगज्ञानं भ्रमो न स्यात्,
तत्र संयोगाभावस्य प्रतियोगिसमानाधिकरणत्वादिति वाच्यम् !
परिच्छेदः ५ ] भाषाटीकामेता. २६५
तत्र संयोगाभावावच्छेदेन संयोगज्ञानस्य भ्रमत्वात् । लक्ष्यस्या-
ननुगमाल्लक्षणाननुगमेऽपि न क्षतिः ।
शंका-जहां वृक्षहीमें कपिसंयोगाभावावच्छेदेन कपिसंयोगज्ञान हुआहै वहां उस
ज्ञानको भ्रमात्मक नहीं हुआ चाहिये; क्योंकि वहां संयोगाभावप्रतियोगि व्यधिकरण
नहीं है,किन्तु प्रतियोगिसमानाधिकरणही है. समाधान-ऐसे स्थलमें संयोगाभाव-
च्छेदेन संयोगज्ञानभी भ्रमरूपही है. शंका-एवं प्रमालक्षणका अननुगम हुआ ?
समा०-लक्ष्यस्थलोंके अननुगम अर्थात् विचित्र भिन्न २ होनेसे लक्षणाननुगम
अर्थात् लक्षण अनेकरूप माननेमेंभी हानि नहीं-इति ।
प्रमात्वं न स्वतो ग्राह्यं संशयानुपपत्तितः ॥ १३६ ॥
भाषा-प्रमाज्ञानमें प्रमात्वधर्म स्वतो ग्रहण नहीं होता यदि ऐसा होय तो संशय
ज्ञान कहींभी नहीं हुआ चाहिये ॥ १३६ ॥
प्रमात्वमिति । मीमांसका हि प्रमात्वं स्वतो ग्राह्यमिति वदन्ति,
तत्र गुरूणां मते ज्ञानस्य स्वप्रकाशरूपत्वात् तज्ज्ञानप्रामाण्यं
तेनैव गृह्यत इति ॥ १ ॥ भट्टानां मते ज्ञानमतीन्द्रियं ज्ञानज-
न्यज्ञातता प्रत्यक्षा तया च ज्ञानमनुमीयते ॥२॥ मुरारिमिश्राणां
मतेऽनुव्यवसायेन ज्ञानं गृह्यते । सर्वेषामपि मते तज्ज्ञानवि-
षयकज्ञानेन तज्ज्ञानप्रामाण्यं गृह्यते ॥ ३ ॥
भाषा-मीमांसकलोग ज्ञानमें प्रमात्वधर्मका स्वतः ग्रहण मानतेहैं. उनमें (गुरु )
प्रभाकरके मतमें ज्ञानस्वप्रकाशरूप है अर्थात् जैसे वस्त्वन्तरको विषय करताहै वैसेही
अपने आपकोभी करताहै. एवं जैसे वह स्वनिष्ठज्ञानत्वादि धर्मोंको स्वयं ग्रहण
करताहै वैसेही स्वनिष्ठ प्रमात्वधर्मकोभी स्वयं ग्रहण करताहै १ । और कुमारलभ-
ट्टके मतमें ज्ञान अतीन्द्रियपदार्थ है किन्तु ज्ञानसे उत्पन्न हुई विषयनिष्ठ ज्ञातता
प्रत्यक्षरूपा है. उस ज्ञातताद्वारा ज्ञानका तथा उसके प्रमात्वका अनुमान होताहै,
उस अनुमानका प्रकार यह है कि.-इयं घटनिष्ठ ज्ञातता घटविशेष्यकघटत्वप्रकारक
ज्ञानजन्या घटवृत्तिघटत्वप्रकारकज्ञाततात्वात् या यद्वृत्तियत्प्रकारिका ज्ञातता सा तद्वि-
शेष्यकतत्प्रकारकज्ञानसाध्या यथा पटे पटत्वप्रकारिका ज्ञातता इति २ । एवं
मुरारिमिश्रके मतमें प्रथमव्यवसायात्मक ज्ञाननिष्ठ यावत् धर्मोंका द्वितीय ( अनुव्य-
वसाय ) ज्ञानविषयक ज्ञानसे ग्रहण होताहै ३ । एवं औरभी सब वादियोंके मतमें
२१
२६६ न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ गुण-
( तत् ) उसी अनुव्यवसायात्मक ज्ञानविषयक ज्ञानसे ( तत् ) उस व्यवसायात्मक
ज्ञानका प्रमात्व ग्रहण होताहै.
विषयनिरूप्यं हि ज्ञानमतो ज्ञानवित्तिवेद्यो विषयस्तन्मतं दूषय-
ति । न स्वतः ग्राह्यमिति ।
शंका-ज्ञानविषयक ज्ञान तो विषयानवगाही है अर्थात् केवलज्ञानहीको विषय
करताहै, उसके विषयको नहीं करता और प्रथम ज्ञानगत प्रमात्वधर्म विषयघटित है
इसलिये वह उसका विषय होना दुर्घट है. समाधान-ज्ञानका यह स्वभाव है
कि-यह विषयनिरूप्यही होताहै अर्थात् विषयविषयकही होताहै; ( अतो ) इसलिये
( ज्ञानवित्ति ) ज्ञानविषयक ज्ञानके घटादि विषयभी (वेद्य) विषय होसकतेहैं. भाव यह
कि-ज्ञानविषयक ज्ञान स्वविषयभूत ज्ञानके विषयको तथा स्वविषयभूत ज्ञानको तद्-
धर्मादिके सहित ग्रहण करता है. ये सब पूर्वोक्त वादियोंके सिद्धान्त हैं. इन सबका
“ प्रमात्वं न स्वतः ग्राह्यं ” इत्यादि ग्रन्थसे मूलकार खण्डन करतेहैं-
संशयेति । यदि ज्ञानस्य प्रामाण्यं स्वतः ग्राह्यं स्यात्तदाऽनभ्या-
सदशापन्नज्ञाने प्रामाण्यसंशयो न स्यात्, तत्र हि यदि ज्ञानं
ज्ञातं तदा तन्मते प्रामाण्यं ज्ञातमेवेति कथं संशयः। यदि तु ज्ञा-
नं न ज्ञातं तदा धर्मिज्ञानाभावात् कथं संशयः, तस्माज्ज्ञाने
प्रामाण्यमनुमेयम् ।
भाषा-( संशयेति ) यदि ज्ञानगत प्रमात्व धर्मका ( स्वतः ) अपने आपसे
ग्रहण होय तो अनभ्यासदशापन्न ज्ञानमें अर्थात् जिस ज्ञानके सजातीयज्ञानमें
कदापि प्रमात्व ग्रहण नहीं किया उसमें प्रमात्वका सन्देह नहीं हुआ चाहिये और
होता तो है परन्तु आपके सिद्धान्तसे उसका समर्थन दुर्घट है; क्योंकि आपके
सिद्धान्तसे वहां यदि ज्ञान ज्ञात है अर्थात् निश्चित है तो तन्निष्ठ प्रामाण्यभी ज्ञातही है.
उसमें संशयकी योग्यताही नहीं और यदि कहो कि, वहां ज्ञानही अज्ञात है तो
तौभी धर्मिज्ञानकेही न होनेसे संशयकी योग्यता नहीं है. भाव यह कि-धर्मिसामान्य-
ज्ञानानन्तरही धर्मसंशयका सम्भव होसकता है, अन्यथा नहीं; इसलिये ज्ञानमें प्रमा-
त्वधर्मका अनुमान करनाही उचित है.
तथाहि । इदं ज्ञानं प्रमा संवादिप्रवृत्तिजनकत्वात्, यन्नैवं तन्नैवं
यथाऽप्रमा। इदं पृथिवीत्वप्रकारकं ज्ञानं प्रमा गन्धवति पृथिवी-
परिच्छेदः ५ ] भाषाटीकासमेता. २६७
त्वप्रकारकज्ञानत्वात् । एवमिदं जलत्वप्रकारकं ज्ञानं प्रमा स्नेह-
वति जलत्वप्रकारकज्ञानत्वात् ।
भाषा-( तथाहि ) वह अनुमान इस रीतिसे करना चाहिये कि-यह ज्ञान
( संवादि ) सफलप्रवृत्तिका जनक होनेसे प्रमारूप है. ( यन्नैवं ( जो सफल )
प्रवृत्तिका जनक नहीं होता ( तन्नैवं ) वह प्रमारूपभी नहीं होता; ( यथा ) जैसे
अप्रमाज्ञान सफलप्रवृत्तिजनकभी नहीं है इसलिये प्रमाभी नहीं है. ऐसेही प्रवृत्तिके
अजनक ज्ञाननिष्ठ प्रमात्वके ग्राहक अनुमानभी है; जैसे यह पृथिवीत्व प्रकारकज्ञान
गन्धवालेमें पृथिवीत्व प्रकारकज्ञान होनेसे प्रमारूप है.भाव यह कि-गन्ध केवल पृथि-
वीहीका व्याप्यधर्म ह एवं यदि उस गन्धवालेमें “ इयं पृथिवी ” इत्याकारक
पृथिवीत्वप्रकारक ज्ञान होगा तो वह अवश्य प्रमारूपही होगा. ऐसेही यह “ इदं
जलं ” इत्याकारक जलत्वप्रकारक जलविशेष्यक ज्ञानभी स्नेहवालेमें जलत्वप्रकारक
ज्ञान होनेसे प्रमारूप है.
न च हेतुज्ञानं कथं जातमिति वाच्यम्। पृथिवीत्वप्रकारकत्वस्य
स्वतो ग्राह्यत्वात्, तत्र गन्धग्रहेण गन्धवद्विशेष्यकत्वस्यापि
सुग्रहत्वात् । तत्प्रकारकत्वावच्छिन्नतद्विशेष्यकत्वं परं न गृह्यते
संशयानुरोधात् ।
शंका-इन स्थलोंमें पहले हेतुका ज्ञान कैसे होताहै? समा०-यहां पृथिवीत्वप्रकार-
कत्वका अर्थात् पृथिवीत्वप्रकारावगाही ज्ञाननिष्ठ धर्मका स्वतो ग्रहण होताहै; एवं
पृथिवीमें गन्धके ग्रहणसे गन्धवद्विशेष्यकत्वका अर्थात् गन्धवद्विशेष्यावगाहि ज्ञाननिष्ठ
धर्म्मकाभी स्वतोही ग्रहण होताहै किन्तु केवल संशयानुपपत्तिके अनुरोधसे पृथिवी-
त्वप्रकारकत्वावच्छिन्न पृथिवीत्त्ववद्विशेष्यकत्व धर्ममात्रका ग्रहण नहीं होता.
न च प्रमात्वस्य साध्यस्य प्रसिद्धिः कथमिति वाच्यम् । इदं
ज्ञानप्रमात्वस्य स्वतो ग्राह्यत्वात् ।
शंका-प्रमात्वात्मक साध्यकी प्रसिद्धि प्रथम कौन स्थलमें है और कैसे
होती है? समाधान-( इदन्ता ) ज्ञाननिष्ठ प्रमात्वधर्मका स्वतो ग्रहण होताहै. भाव
यह कि-इदन्ताज्ञानमें “इदमनिदं न वा” इत्याकारक सन्देह कभी किसीको नहीं होता
इसलिये यह स्वतो ग्राह्य है.
न च प्रकारभेदेन प्रामाण्यभेदाद्धटत्वप्रकारकत्वादेः कथं प्रसिद्धि-
रिति वाच्यम् । घटत्वप्रकारकत्वस्य स्वविशेष्यकत्वस्य च स्व-