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न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda

विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा

DevanagariHindipublished350 पृष्ठ

परिच्छेदः ४ ] भाषाटीकासमेता. २०७
येन पदेन विना यत्पदस्यानन्वयानुभावकत्वं तेन पदेन सह तस्या-
कांक्षेत्यर्थः। क्रियापदं विना कारकपदं नान्वयबोधं जनयतीति
तेन तस्याकांक्षा।
भाषा-अर्थात् जिस 'क्रियादि' पदसे विना जिस 'कर्मादिकारक' पदका
अन्वयबोध नहीं होसकता उस क्रियापदके साथ उस 'कारक' पदकी आकांक्षा है.
क्रियापदसे विना केवल 'कारक' पद अन्वय बोधका जनक नहीं होता. इसलिये
'क्रिया'पदके साथ 'कारक' पदकी आकांक्षा है.
वस्तुतस्तु क्रियाकारकपदानां सन्निधानमासत्त्या चरितार्थम्।
परंतु घटकर्मताबोधं प्रति घटपदोत्तरद्वितीयाकांक्षाज्ञानं कार-
णम्, तेन घटः कर्मत्वमानयनं कृतिरित्यादौ न शाब्दबोधः।
भाषा-और वास्तवसे तो क्रियाकारकादिपदोंकी अव्यवधानरूपसे सन्निधि .
अंशका लाभ पूर्वोक्त आसत्तिसेही होचुका है. इसलिये क्रियाकारक पदोंकी
आकांक्षाका पृथक् वर्णन करना उचित नहीं है (परन्तु) तथापि प्रत्ययमें प्रकृति
उत्तरत्वरूप आकांक्षाज्ञान आसत्तिसे पृथक्रूपेण शाब्दबोधमें कारण है; इसलिये
आकांक्षा ज्ञानभी पृथक् कारण है. जैसे घटनिष्ठ कर्मताबोधके प्रति 'घट' पदके
अव्यवहित उत्तर (अमादि) द्वितीयाविभक्तिरूप आकांक्षाका ज्ञान शाब्दबोधमें कारण
है एवं 'घटः कर्मत्वं आनयनं कृतिः' इत्यादि विपरीत वाक्यस्थलोंमें “घटमा-
नय” इत्यादि साकांक्षवाक्यके सदृश शाब्दबोध नहीं होसकता.
'अयमेति पुत्रो राज्ञः पुरुषोऽपसार्यताम्'इत्यादौ तु पुत्रेण सह
राजपदस्य तात्पर्यग्रहात्तेनैवं सहान्वयबोधः। पुरुषेण सह ता-
त्पर्यग्रहे तु तेन सहान्वयबोधः स्यादेव।
भाषा-एवं“अयमेति पुत्रो राज्ञः पुरुषोऽपसार्यताम्” इत्यादि उभयाकांक्षावाक्य
स्थलमें वक्ताके तात्पर्यज्ञानानुरोधसे शाब्दबोध होता है. भाव यह कि-यहां
'राज'पद उत्तरसम्बन्धविशेषकी बोधिका षष्ठीविभक्ति राजपदार्थका पुत्र तथा पुरुष
दोनोंमें अन्वयबोधन करतीहै. यदि पुत्रके साथ अन्वयमें वक्ताका तात्पर्य होय तो
वाक्यार्थ यह होगा कि-'यह राजाका पुत्र आताहै, आगेसे जनसमुदायको कनारे
करो' और यदि पुरुषके साथ अन्वयमें वक्ताका तात्पर्य होय तो वाक्यार्थ यह होगा
कि-राजाका पुरुष आताहै आगेसे अपने पुत्रको कनारे करो. एवं 'पुत्र'पदके साथ

२०८ न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ शब्द-
‘ राज ’ पदका तात्पर्यग्रह होनेसे पुत्रके साथही अन्वयबोध होताहै और पुरुषके
साथ तात्पर्यग्रह होनेसे पुरुषके साथही अन्वयबोध होताहै-इति ।
तात्पर्यं निर्वक्ति, वक्तुरिच्छेति-
भाषा-‘ वक्तुरिच्छा ’ इत्यादि ग्रंथसे तात्पर्यार्थ कहते हैं-
-वक्तुरिच्छा तु तात्पर्यं परिकीर्तितम् ॥८४॥
भाषा-वक्ताने श्रोताके प्रति यादृश वाक्यार्थबोधनकी इच्छासे वाक्योच्चारण
कियाहै उस इच्छाका नाम तात्पर्य है ॥ ८४ ॥
यदि तात्पर्यज्ञानं कारणं न स्यात्तदा ‘सैन्धवमानय’ इत्यादौ
क्वचिदश्वस्य क्वचिल्लवणस्य बोधो न स्यात् । न च तात्पर्यग्रा-
हकप्रकरणादीनामेव शाब्दबोधे कारणत्वमस्त्विति वाच्यम्,
तेषामननुगमात् ।
भाषा-शाब्दबोधमें यदि वक्ताका तात्पर्यज्ञान कारण न होय तो “सैन्धवमा-
नय” इत्यादि वाक्योंसे कहीं यात्राप्रसंगमें ‘अश्व’ का तथा कहीं भोजनादिप्रसंगमें
‘लवण’ का बोध होताहै, वह नहीं हुआ चाहिये. शंका-वक्तृतात्पर्यके ग्राहक जो
प्रकरणादि यदि उनहीको शाब्दबोधके प्रति कारण मानकर निर्वाह होसके तो
पृथक् तात्पर्य माननेकी क्या आवश्यकता है? समाधान-प्रकरणादिकोंका एक-
रूपसे अनुगम होना कठिन है.
तात्पर्यज्ञानजनकत्वेन तेषामनुगमे तु तात्पर्यज्ञानमेव लाघवा-
त्कारणमस्तु । इत्थं च वेदस्थलेऽपि तात्पर्यज्ञानार्थमीश्वरः
कल्प्यते ।
शंका-वह सभी स्वस्वस्थलमें तात्पर्यज्ञानके जनक हैं इसलिये ‘ तात्पर्यज्ञान-
जनकत्वेन’ उन सबका अनुगम होसकताहै. समाधान-ऐसे गुरुभूत अनुगमसे तो
तात्पर्यज्ञानहीमें कारणता माननेमें लाघव है. ( इत्थञ्च ) ऐसेही वेदवाक्योंमेंभी
तात्पर्यज्ञानके लिये ईश्वरकी कल्पना होसकतीहै.
न च तत्राध्यापकतात्पर्यज्ञानं कारणमिति वाच्यम् । सर्गादाव-
ध्यापकाभावात् । न च प्रलय एव नास्तीति कुतः सर्गादिरिति
वाच्यम् । प्रलयस्यागमप्रतिपाद्यत्वात् ।

परिच्छेदः ४ ] भाषाटीकासमेता. २०९
शंका-वेदवाक्योंमें अध्यापक गुरुहीका तात्पर्यज्ञान शाब्दबोधमें कारण मान
लिया जाय तो हानि क्या है? समाधान-प्रथमसृष्टीके आद्यकालमें अध्यापक
कोई नहीं होता, वहां ईश्वरहीका तात्पर्य मानना उचित है. शंका-प्रपञ्चके प्रलय
होनेके पीछे सर्गके आद्यकालका सम्भव होसकताहै, परन्तु प्रलयही तो नहीं होता;
फिर सर्गका आद्यकालका कैसे होसकता है? समाधान-प्रलयका होना "नाहो न
रात्रिर्न नभो न भूमिर्नासीत्तमो ज्योतिरभून्न चान्यत्-अर्थात् एकप्रकाशरूप (ज्योतिः)
चेतनके सिवाय दिन रात्रि आकाश भूमि इत्यादि और कुछभी न होताभया "
इत्यादि शास्त्रवचनंस सिद्ध है.
इत्थंच शुकवाक्येऽपीश्वरीयतात्पर्यज्ञानं कारणम्, विसंवादि-
शुकवाक्ये तु शिक्षयितुरेव तात्पर्यस्य ज्ञानं कारणम् ।
भाषा-( इत्थञ्च ) इस रीतिसे शाब्दबोधमात्रके प्रति तात्पर्यज्ञानको कारण
होनेसे ( शुक ) तोते मैनादिके वचनोंमेंभी ईश्वरहीके तात्पर्यज्ञानको कारण मानना
उचित है अर्थात् तोते मैनाके उच्चारण किये श्लोकोंसे पुरुषको शाब्दबोध होताहै
परन्तु उनका तात्पर्य कुछ नहीं होता; इसलिये ऐसे वाक्यस्थलोंमें भगवत्तात्पर्यकी
कल्पना करके कार्यकारणभावके सहचारका निर्वाह करना उचित है; परन्तु जहां
शुकादिने ( विसंवादि ) निष्फल प्रवृत्तिजनक मिथ्यावाक्य उच्चारण कियाहै वहां
उसको सिखलानेवाले पुरुषका तात्पर्यज्ञानशाब्दबोधमें कारण जानना चाहिये.
अन्ये तु नानार्थादौ क्वचिदेव तात्पर्यज्ञानं कारणम्, तथा च
शुकवाक्ये विनैव तात्पर्यज्ञानं शाब्दबोधः। वेदे त्वनादिमीमां-
सापरिशोधिततर्कैरेवार्थावधारणमित्याहुः॥ ८४॥
इति श्रीविश्वनाथपञ्चाननभट्टाचार्यविरचितायां सिद्धान्त-
मुक्तावल्यां शब्दखण्डम् ॥ ४ ॥
भाषा-( अन्येतु ) और कईएक विद्वान्लोग यह कहतेहैं कि-तात्पर्यज्ञानको
हरएक स्थलमें कारणता नहींहै, किन्तु किसी नानार्थक " सैन्धवमानय " इत्यादि
वाक्यविशेषहीमें होसकतीहै. ( तथाच ) एवं शुकवाक्यसे वक्तृतात्पर्यज्ञानसे विनाभी
शाब्दबोध होनेमें बाधा नहींहै और वेदवाक्योंमेंभी ईश्वरका तात्पर्य माननेका कुछ
काम नहीं, किन्तु ( अनादि ) गुरुपरम्परापरिग्राप्त (मीमांसा) लाघवज्ञानात्मक तर्ककी
सहकारिताहीसे अर्थका निश्चय होसकताहै-इति ॥८४॥
इति श्रीगोविन्दसिंहसाधुकृते आर्यभाषाविभूषितन्यायमुक्तावली-
प्रकाशे शब्दपरिच्छेदः ॥ ४ ॥

२१० न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ स्मृति-
अथ स्मृतिप्रक्रिया ।
पूर्वमनुभवस्मरणभेदाद्बुद्धैर्द्वैविध्यमुक्तम् । तत्रानुभवप्रकारा द-
र्शिताः, सुगमतया स्मरणं न दर्शितम्-
भाषा-पूर्व "बुद्धिस्तु द्विविधा मता" इत्यादि मूलसे अनुभव तथा स्मरण
भेदसे बुद्धि दो प्रकारकी कही.उसमें अनुभवकी रीति तो प्रत्यक्ष अनुमिति उपमिति
तथा शाब्द भेदसे चार प्रकारकी कहचुके. शेष रहा स्मरणका प्रकार सो वह सुगम
है इसलिये पूर्व नहीं दिखलाया किन्तु अवसरसंगतिसे अब कहतेहैं--
तत्र हि पूर्वानुभवः कारणम् । अत्र केचित् । अनुभवत्वेन न
कारणत्वं किंतु ज्ञानत्वेनैव । अन्यथा सकृदनुभूतस्थले स्मर-
णानन्तरं स्मरणं न स्यात् समानप्रकारकस्मरणेन पूर्वसंस्कार-
स्य विनष्टत्वात् । मन्मते तु तेनैव स्मरणेन संस्कारान्तरद्वारा
स्मरणान्तरं जन्यत इत्याहुः ।
भाषा-उस स्मरणात्मक ज्ञानमें पूर्वानुभव कारण है अर्थात् जो वस्तु पूर्व अनु-
भूत होय उसीका स्मरण होसकताहै औरका नहीं.(अत्र केचित्) परन्तु यहां कई एक
विद्वानलोग ऐसा कहतेहैं कि-स्मरणके प्रति अनुभवत्वेन रूपेण अनुभवको कारणता
नहीं किन्तु ज्ञानत्वरूप सामान्यधर्मसे कारणता माननीही उचित है. (अन्यथा)यदि
ज्ञानत्वरूप सामान्यधर्मसे कारणता न स्वीकार करीजाय तो एकवार देखी हुई वस्तुका
स्मरणसे उत्तर फिर स्मरण नहीं हुआ चाहिये; क्योंकि अनुभूत वस्तुके अनुभवका
तथा उस अनुभवसे उत्पन्न हुए संस्कारोंका समानप्रकारक स्मरणसे नाश होचुकाहै
अर्थात् यादृश वस्तुविषयक अनुभवजन्य संस्कार थे, उद्बोधक समवधानसे तादृश
वस्तुविषयक स्मरण जननानन्तर स्वयं शान्त होचुकेंगे तो स्मरणानन्तर स्मरण नहीं
होनाचाहिये, परन्तु होता तो है; क्योंकि बहुतसे ऐसे प्रिय पदार्थ हैं जिनके एकवार
अवलोकनसे इस जीवको वे अनेकवार (स्मरण) याद आतेहैं और मेरे मतमें तो
यह दोष नहीं, क्योंकि मैं तो ज्ञानत्वेन रूपेण ज्ञानको कारणता मानता हूं. प्रथमसं-
स्कारोंसे जो स्मरण हुआहै वहभी एक ज्ञानही है, उस स्मरणसे फिर संस्कारोंकी
उत्पत्ति, संस्कारोंसे फिर स्मरण; ऐसे अनेकवार स्मरण होसकताहै.
तन्न । यत्र समूहालम्बनोत्तरं घटपटादीनां क्रमेण स्मरणमजनिष्ट,
सकलविषयकस्मरणं तु नाभूत्, तत्र फलस्य संस्कारनाशकत्वा-
भावात् कालस्य रोगस्य चरमफलस्य वा संस्कारनाशकत्वं वा-
च्यम् । तथाच न क्रमिकस्मरणानुपपत्तिः ।

मक्रिया ] भाषाटीकासमेता २११
भाषा-( तन्न ) यह मन्तव्य समीचीन नहीं है; क्योंकि जिस स्थलमें पहले
“ घटपटमठाश्च” इत्याकारक समूहालम्बनात्मक अनुभव हुआहै और पीछे उद्बोधक
समवधानसे घटपटादिका क्रमसे स्मरण हुआहै किन्तु समूहालम्बनात्मक स्मरण नहीं
हुआ ऐसे स्थलमें समानप्रकारक स्मरणरूप फलको संस्कारनाशकता नहींहै. इस-
लिये हरएक फलको संस्कारनाशकता माननी उचित नहीं, किन्तु दीर्घकालको या
दर्घिरोगको या ( चरम ) अंतिम फलको संस्कारनाशकता माननी उचित है. एवं
जहां स्मरणउत्तर वारंवार फिर स्मरण होता है वहां जिसके अनन्तर स्मरणान्तर
नहीं होना उस अन्तिमस्मरणकोही संस्कारनाशकता माननी उचित है; ऐसे माननेसे
स्मरणउत्तर वारंवार स्मरणकी अनुपपत्ति नहीं है.
न च पुनः पुनः स्मरणाद्दृढतरसंस्कारानुपपत्तिरितिवाच्यम् ।
झटित्युद्बोधकसमवधानस्य दाढर्यपदार्थत्वात् ।
शंका-एकही संस्कारोंसे पुनःपुनः स्मरण हुए उन संस्कारोंमें दृढतरता नहीं
रहेगी अर्थात् फिर २ स्मरणरूप कार्यके जननसे वे संस्कार शिथिल पड़जायेंगे.
समा०-सादृश्यज्ञान एकान्तचिन्तनादि उद्बोधककी निर्विलम्ब सन्निधिही संस्कारोंमें
दृढतरता है अर्थात् जिस पदार्थके संस्कार चित्तमें जमे हैं उसके जैसा पदार्थान्तर
देखनेसे या उसको एकान्तमें फिर २ चिन्तन करनेसे उसके संस्कार पक्के होजातेहैं.
न च विनिगमनाविरहादेव ज्ञानत्वेनापि जनकत्वं स्यादिति
वाच्यम् । विशेषधर्मेण व्यभिचाराज्ञाने सामान्यधर्मेणान्यथासि-
द्धत्वात् ।
शंका-आपने स्मृतित्त्वावच्छिन्नके प्रति अनुभवत्वेन कारणता मानी और हम
ज्ञानत्वेन मानतेहैं. इनमें ( विनिगमना ) एक पक्षके कहनेवाली युक्तिके ( विरहात् )
न होनेसे यदि ज्ञानत्वेनभी जनकता मान लीजाय तो हानि क्याहै? समा०-यदि
विशेषधर्मसे कार्यकारणभावका व्यभिचार ज्ञात न होय तो सामान्यधर्मसे कार्यकार-
णभावकी कल्पना करनी निरर्थक है. यहां अनुभवत्वविशेष धर्म है,क्योंकि वह प्रत्य-
क्षादि चारहीमें रहताहै और ज्ञानत्व सामान्यधर्म है; क्योंकि वह भ्रम स्मरणादि
सभी ज्ञानोंमें रहताहै.
कथमन्यथा दण्डस्य भ्रमिद्वारा द्रव्यत्वेन रूपेण न कारणत्वम् ।
भाषा-(कथमन्यथा) यदि सामान्यधर्मेणही कारणता स्वीकृत होय तो घटादि
कार्यके प्रति दण्डको भ्रमीद्वारा द्रव्यत्वेनभी कारणता मान लेनी चाहिये भाव यह
कि-यद्यपि दण्डमें दण्डत्व तथा द्रव्यत्व दो धर्म समानियतवृत्ति विद्यमान हैं, इस-

लिये द्रव्यत्वेनभी कारणताका मानना अनुचित नहीं तथापि ऐसा किसी विद्वान्‌को
सम्मत नहीं. भाव यही कि-विशेषधर्मके होतसन्ते सामान्यधर्मसे कारणता कोई
नहीं मानता.
न चान्तरालिकस्मरणानां संस्कारनाशकत्वसंशयाद्व्यभिचारसं-
शय इति वाच्यम् । अनन्तसंस्कारतन्नाशकल्पनापेक्षया लाघवे-
न चरमस्मरणस्यैव संस्कारनाशकत्वकल्पनेन व्यभिचारसंश-
याभावात् ॥ ८४ ॥ ॥ इति स्मृतिप्रक्रिया ॥
शंका-अन्तिमस्मरणसे पहले बीचमें होनेवाले स्मरणोंसेभी संस्कारनाशकी शंका
हो सकतीहै. एवं मध्यपातिस्मरणोंसे संस्कारनाशके सन्देह होनेसे स्मृतित्वावच्छिन्नके
प्रति अनुभवत्वेन कार्यकारणभावके व्यभिचारकाभी सन्देह होसकताहै. समा०-अनेक
संस्कार और उनके नाशकी कल्पना करनेसे लाघवसे अन्तिमस्मरणहीको संस्कार
नांशकता कल्पना करनी उचित है. एवं कार्यकारणभावके व्यभिचारका सन्देहभी
नहीं होता-इति ॥ ८४ ॥ ॥ इति स्मृतिप्रक्रिया ॥
अथ मनोनिरूपणम् ।
इदानीं क्रमप्राप्तं मनो निरूपयति, साक्षात्कार इति-
भाषा-अब मूलकार निरूपणक्रमसे प्राप्त मनका ‘साक्षात्कारे’ इत्यादि ग्रन्थसे
निरूपण करतेहैं-
साक्षात्कारे सुखादीनां करणं मन उच्यते ।
भाषा-सुखदुःखादिके साक्षात् करनेमें (करण) साधनको मन कहतेहैं.
एतेन मनसि प्रमाणं दर्शितम् । तथाहि । सुखसाक्षात्कारः
सकरणको जन्यसाक्षात्कारत्वाच्चाक्षुषवदित्यनुमानेन मनसः
करणत्वसिद्धिः ।
भाषा-इस मूलग्रन्थसे मनमें अनुमानप्रमाण दिखलाया है. (तथाहि) सुखा-
दिका साक्षात्कारजन्य साक्षात्कार है; इसलिये अवश्य किसी एक (करण) साधनसे
जन्य है; जैसे घटादिका साक्षात्कार जन्यसाक्षात्कार है और नेत्रादि उसके कारणभी
प्रसिद्ध हैं इत्याकारक अनुमान प्रमाणसे सुखादिके करणात्मक मनकी सिद्धि होती है.
न चैवं दुःखादिसाक्षात्काराणामपि कारणान्तराणि स्युरिति वा-
च्यम् । लाघवादेकस्यैव तादृशसकलसाक्षात्कारकरणतया सि-

निरूपणम् ] भाषाटीकासमेता. २१३
च्छेः। एवं दुःखादीनामसमवायिकारणसंयोगाश्रयतया मनःसि-
द्धिर्बोद्धव्या।
शंका-ऐसेही दुःखादिके साक्षात्कारके लिये कारणान्तर मानने पड़ेंगे. समा-
धान-लाघवसे एक मनहीमें तादृश सभीके साक्षात्कारके प्रति कारणता सिद्ध हो
सकतीहै. इसलिये पृथक् २ माननी अनुचित है. ऐसेही सुखादिका असमवायिकारण
जो संयोग उस संयोगाश्रयत्वेनभी मनकी सिद्धि होसकतीहै. यहां अनुमान ऐसा
करना कि-"सुखदुःखाद्यसमवायिकारणं संयोगः प्रतियोगित्वेन क्वचिदाश्रितः मुख्य-
सम्बन्धत्वात्, समवायवत्" इस अनुमानसेभी मनकी सिद्धि होसकतीहैं.
मनसोऽणुत्वे प्रमाणमाह, अयौगपद्यादिति-
भाषा-'अयौगपद्यात्' इत्यादि ग्रन्थसे मूलकार मनके अणुत्वमें प्रमाण कहतेहैं-
अयौगपद्याज्ज्ञानानां तस्याणुत्वमिहेष्यते ॥ ८५ ॥
भाषा-एककालमें अनेक ज्ञानोंके न होनेसे मनमें अणुपनेका निश्चय होताहै ८५।
ज्ञानानां चाक्षुषरासनादीनां यौगपद्यमेककालोत्पत्तिर्नास्तीत्य-
नुभवसिद्धम्। तत्र नानेन्द्रियाणां सत्यपि विषयसन्निकर्षे यत्सम्ब-
न्धादेकेन्द्रियेण ज्ञानमुत्पद्यते यदसम्बन्धाच्च परैर्ज्ञानं नोत्पद्यते
तन्मनः, तन्मनसो विभुत्वे चासन्निधानं न सम्भवतीति न विभु
मनः।
भाषा-चाक्षुषरासनादि ज्ञानोंकी एककालावच्छेदेन उत्पत्ति नहीं होती यह वार्ता
अनुभवसिद्ध है. वहां नेत्रादि नानेन्द्रियोंका अपने २ विषयके साथ सम्बन्ध हुएभी
जिसके सम्बन्धसे एक इन्द्रियसे ज्ञान उत्पन्न होताहै और जिसके न सम्बन्ध होनेसे
और इन्द्रियोंसे ज्ञान उत्पन्न नहीं होता, वह मन है. (तत्) वह असन्निधान मनके
विभु माननेसे नहीं बनसकता, इसलिये मन विभु नहीं है.
न च तदानीमदृष्टविशेषोद्बोधकविलम्बादेव तज्ज्ञानविलम्ब इ-
ति वाच्यम्। तथा सति चक्षुरादीनामप्यकल्पनापत्तेः।
शंका-जिस किसी नेत्रादि विशेषइन्द्रियसे ज्ञान उत्पन्न हुआहै वहां उस ज्ञानके
जनक अदृष्टसहकारी हैं और जिन शेष घ्राणादि इन्द्रियोंसे ज्ञान उत्पन्न नहीं हुआहै
वहां उस कालमें उन ज्ञानोंके उत्पादक अदृष्टविशेष उद्बोधकके विलम्बसेही ज्ञान
उत्पत्तिमें विलम्ब समझना चाहिये. समाधान-(तथा सति) दृष्टसामग्रीके होत
संतेभी यदि अदृष्ट विलम्बसे कार्यका विलम्ब अङ्गीकार होय तो चक्षुःआदि इन्द्रि-

२१४ न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ मनोनिरूपणम् ]
योंकी कल्पनाकीभी क्या आवश्यकता है ? अर्थात् एक अदृष्टकी कल्पनाहीसे निर्वाह
होय सकताहै.
न च दीर्घशष्कुलीभक्षणादौ नानावधानभाजां च कथमेकदा ना-
नेन्द्रियज्ञानमिति वाच्यम्। मनसोऽतिलाघवात् त्वरया नानेन्द्रि-
यसम्बन्धानानाज्ञानोत्पत्तेः । उत्पलशतपत्रभेदादिवद्यौगपद्यप्र-
त्ययस्य तु भ्रान्तत्वात् ।
शंका-दीर्घ ( शष्कुली ) जलेबी आदिके भक्षणसे तथा नाना ( अवधान )
प्रतीतिभाजि पुरुषोंको कैसे एकही कालमें अनेक इन्द्रियजन्य ज्ञान होताहै? भाव
यह कि-गरम २ दीर्घ जलेबी आदिके भक्षणमें उसके मधुर रसका तथा गन्धका
तथा कोमल उष्णस्पर्श आदिका एकही कालमें पुरुषको भान होता है. एवं एकही
कालमें ज्ञानसम्बन्धि अनेक कार्य करनेवाले पुरुषभी इस संसारमें बहुत हैं. यदि मन
अणु होय तो यह सब नहीं होना चाहिये. समा०-मन अत्यन्त लघु तथा वेगशाली
है. इसलिये बहुत शीघ्र नाना इन्द्रियोंके साथ सम्बन्ध होकर नाना ज्ञानोंकी उत्पत्ति
होतीहै. कमलशतपत्रभेदनकी तरह ज्ञानोंमेंभी यौगपद्यप्रत्यय भ्रमरूपही समझना
चाहिये अर्थात् जैसे कमलके शतपत्रको नीचे ऊपर रखकर सूचीसे भेदन करें तो
सूचीभेदन क्रमसेही होगा परन्तु अतिशीघ्र होनेसे प्रतीत ऐसे होताहै कि, एकही
कालमें हुआ ऐसेही ज्ञानोंमेंभी अत्यन्ताव्यवहित कालोत्पत्तिकत्वरूप दोषसे यौगपद्य
उत्पत्ति प्रतीत होती है, वस्तुतः नहींहै.
न च मनसः सङ्कोचविकाशशालित्वादुभयोपपत्तिरस्त्विति वा-
च्यम् । नानावयवतन्नाशादिकल्पने गौरवाल्लाघवात्रिरवयवस्या-
णुरूपस्यैव मनसः कल्पनात् । इति संक्षेपः ॥ ८५ ॥
॥ इति द्रव्यपदार्थव्याख्या समाप्ता ॥
शंका-मनको संकोचविकाशस्वभाववाला मानलिया जाय तो एक तथा नाना
उभय तरहके ज्ञानकी उपपत्ति होसकतीहै अर्थात् संकोचावस्थामें मनका एकही
इन्द्रियके साथ सम्बन्ध होताहै इसलिये एकही ज्ञानका उत्पादक है और विकाशाव-
स्थामें नाना इन्द्रियोंके साथ सम्बन्ध होताहै इसलिये एकही कालमें नानाज्ञानका
उत्पादक है. समा०-मनके नाना अवयव तथा उनके संकोच विकाश या ध्वंस
प्रागभावादि माननेमें अतिगौरव है इसलिये लाघवसे निरवयव अणुरूप मनकी कल्प-
नाही साध्वी है. यह संक्षेपसे मनका निरूपण है ॥ ८५ ॥
॥ इति द्रव्यनिरूपणम् ॥

श्रीः।
अथ गुणपरिच्छेदः ५.
भाषाकारकृतमंगलाचरणम्।
यं शरण्यं समाश्रित्य मादृशा निर्गुणा नराः ॥
सम्भवन्ति गुणागाराः सेव्योऽसौ नानको गुरुः ॥ १ ॥
द्रव्यं निरूप्य गुणं निरूपयति, अथेत्यादिना-
भाषा-द्रव्यपदार्थका निरूपण करके अवसरसंगतिके अभिप्रायसे ग्रन्थकार 'अथ'
इत्यादि ग्रन्थसे गुणोंका निरूपण करतेहैं-
अथ द्रव्याश्रिता ज्ञेया निर्गुणा निष्क्रिया गुणाः ॥
भाषा--सदाही द्रव्यके आश्रित रहनेवाले गुणक्रियाशून्योंका नाम 'गुण' है.
गुणत्वजातौ किं मानमिति चेत्, इदम् । द्रव्यकर्मभिन्ने सामा-
न्यवति या कारणता सा किञ्चिद्धर्मावच्छिन्ना निरवच्छिन्नकारण-
ताया असम्भवात्, नहि रूपत्वादिकं सत्ता वा तत्रावच्छेदिका
न्यूनातिरिक्तदेशवृत्तित्वात् । अतश्चतुर्विंशत्यनुगतं किंचिद्वाच्यं
तदेव गुणत्वमिति सिद्धम् ।
भाषा-यदि कोई पूछे कि-गुणत्वजातिमें क्या प्रमाण है? तो उसको ( इदम् )
यह कहना चाहिये कि-द्रव्यकर्मसे भिन्न सामान्यवालेमें जो कारणताहै वह कारणता
होनेसे अवश्य किंचित् धर्मावच्छिन्ना है. जैसे घटनिष्ठ कार्यतानिरूपित दण्डगतकार-
णता दण्डत्वधर्मावच्छिन्ना है. ऐसेही निरवच्छिन्न कारणताका कहींभी सम्भव नहीं है.
रूप रसादिमें रहनेवाले रूपत्व रसत्वादि धर्म या द्रव्य गुण कर्म तीनोंमें रहनेवाला
सत्तारूप धर्म यावत् गुणनिष्ठ कारणताका अवच्छेदक नहीं होसकता; क्योंकि रूप-
त्वादि धर्म न्यूनदेशवृत्ति हैं और सत्ता अधिक देशवृत्ति है और अवच्छेदक नियमसे-
अन्यूनानतिरिक्तवृत्ति धर्मही होताहै. इसलिये चौबीस गुणोंमें अनुगत कोई एक धर्म
अवश्य कहना चाहिये. वही ' गुणत्व ' इस नामसे प्रसिद्ध होसकताहै.
द्रव्याश्रिता इति । यद्यपि द्रव्याश्रितत्वं न लक्षणं कर्मादावति-
व्याप्तेस्तथापि द्रव्यत्वव्यापकतावच्छेदकसत्तान्यजातिमत्त्वं त-

२१६ न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ गुण-
दर्थः भवति हि गुणत्वं द्रव्यत्वव्यापकतावच्छेदकं तद्वत्ता च
गुणानामिति ।
भाषा-( द्रव्याश्रिता इति ) यद्यपि मूलोक्त 'द्रव्याश्रितत्व' इतनामात्र लक्षण
नहीं बनसकता क्योंकि द्रव्याश्रयता गुणोंकी तरह कर्मोंमेंभी है, एवं गुणोंका लक्षण
कर्मोंमें अतिव्याप्त होगा; तथापि द्रव्यत्वनिरूपित जो गुणोंनिष्ठ व्यापकता तादृश
व्यापकताकी अवच्छेदक जो सत्तासे भिन्न 'गुणत्व' रूपा जाति तादृश जातिमत्त्व
गुणोंमें सिद्ध है यही 'द्रव्याश्रिता' इत्यादि मूलका अर्थ है. द्रव्यत्वनिरूपित
व्यापकताका अवच्छेदक गुणत्वरूप धर्म होसकताहै और तादृश गुणत्वरूप धर्मवत्ता
गुणोंमेंभी आसकतीहै.
कर्मत्वं द्रव्यत्वं वा न द्रव्यत्वव्यापकतावच्छेदकं गगनादौ द्रव्य-
कर्मणोरभावात् । द्रव्यत्वत्वं सामान्यत्वादिकं च न जातिरिति
तद्व्युदासः ।
भाषा-द्रव्यत्व या कर्मत्वरूप धर्म द्रव्यत्वनिरूपित व्यापकताके अवच्छेदक
नहीं होसकते; क्योंकि यदि हरएक द्रव्यमें द्रव्य रहे या कर्म रहे तो द्रव्यत्वनिरू-
पित व्यापकता उस द्रव्य या कर्ममें आवे तो उनमें रहनेवाले द्रव्यत्व या कर्मत्वरूप
धर्मभी उस व्यापकताके अवच्छेदक बने परन्तु यह वार्ता तो है नहीं; क्योंकि
आकाशादि पांचमें कोई द्रव्यान्तर समवायसम्बन्धसे नहीं रहता, एवं आकाशादि
चारमें कर्मभी नहीं रहता इसलिये द्रव्यत्व या कर्मत्वरूप धर्म द्रव्यत्वनिरूपित
व्यापकताके अवच्छेदक नहीं होसकते; द्रव्यत्वमें रहनेवाला द्रव्यत्वत्वरूप धर्म
और सामान्यमें रहनेवाला सामान्यत्वरूप धर्म जातिरूप नहींहै किन्तु उपाधिरूप है;
इसलिये लक्षणमें 'जाति' पदके निवेशसे इन दोनोंका वारण समझना चाहिये.
निर्गुणा इति । यद्यपि निर्गुणत्वं कर्मादावपि । तथापि सामान्य-
वत्त्वे सति कर्मान्यत्वे च सति निर्गुणत्वं बोध्यम्।जात्यादीनां न
सामान्यवत्त्वं,कर्मणो न कर्मान्यत्वं, द्रव्यस्य न निर्गुणत्वमिति
तत्र नातिव्याप्तिः ।
भाषा-( निर्गुणा इति ) यद्यपि गुणशून्यता कर्मादिकोंमेंभी है, इसलिये गुणल-
क्षणकी कर्मादिमें अतिव्याप्ति होगी तथापि सामान्यवाला हो और कर्मसे भिन्न
होकर जो निर्गुण हो वह गुण जानना चाहिये, सामान्यविशेषादि सामान्यवाले नहीं

परिच्छेदः ५ ] भाषाटीकासमेता. २१७
हैं. इसलिये उनका वारण हुआ और कर्म कर्मसे भिन्न नहीं है, इसलिये उसकाभी
वारण हुआ और द्रव्य निर्गुण नहीं है इसलिये उसकाभी वारण हुआ.
निष्क्रियेति स्वरूपकथनं , न तु लक्षणं गगनादावतिव्याप्तेः ।
भाषा-मूलमें 'निष्क्रियाः' यह गुणोंका लक्षण नहीं है किन्तु स्वरूपमात्रका कथनहै.
आकाशादिकोंमें अतिव्याप्ति दोषसे दुष्ट होनेसे इसको लक्षण मानना उचितभी नहीं.
रूपं रसः स्पर्शगन्धौ परत्वमपरत्वकम् ॥ ८६ ॥
द्रवो गुरुत्वं स्नेहश्च वेगो मूर्त्तगुणा अमी ॥
भाषा-रूप, रस, स्पर्श, गन्ध, परत्व, अपरत्व, ॥८६ ॥ द्रवत्व, गुरुत्व, स्नेह, तथा
वेग, ये दश गुण मूर्त्तद्रव्यहीमें रहतेहै.
मूर्त्तगुणा इति । अत्र वेगेन स्थितिस्थापकोऽप्युपलक्षणीयः ।
अमूर्तेषु न वर्तन्त इत्यर्थः । लक्षणं तु तावदन्यान्यत्वमे-
वमग्रे ऽपि ।
भाषा-यहां वेगाख्य संस्कारसे स्थितिस्थापक संस्कारकाभी ग्रहण जानलेना
अर्थात् वहभी मूर्त्तद्रव्यहीमें रहताहै; यह सब अमूर्त्तद्रव्यमें कदापि नहीं रहते. इन
सबका अनुगत एकलक्षण ( तावत् ) एतद्भिन्न भिन्नत्वरूपही जानना चाहिये
अर्थात् इनसे भिन्न प्रपञ्चमात्रका भेद इन दशहींमें रहेगा ऐसेही आगेभी ऐसेही
लक्षण समझलेने.
धर्माधर्मौ भावना च शब्दो बुद्ध्यादयोऽपि च ॥८७॥
एतेऽमूर्तगुणाः सर्वे विद्वद्भिः परिकीर्तिताः ॥
अमूर्तगुणा इति । मूर्तेषु न वर्तन्त इत्यर्थः ।
भाषा-धर्म, अधर्म, भावनाख्य संस्कार, शब्द, बुद्धि, सुख, दुःख, इच्छा, द्वेष,
और प्रयत्न ॥ ८७ ॥ ये दश गुण अमूर्त द्रव्यहीमें रहतेहैं. ऐसे विद्वान् लोगोंका
निश्चयपूर्वक कथन है अर्थात् ये मूर्त्तद्रव्योंमें कदापि नहीं रहते-इति ।
संख्यादयो विभागान्ता उभयेषां गुणा मताः ॥८८॥
उभयेषामिति । मूर्तामूर्तगुणा इत्यर्थः ॥ ८८ ॥
भाषा-संख्या, परिमाण, पृथक्त्व, संयोग, तथा विभाग, ये पांच गुण मूर्त तथा
अमूर्त दोनों तरहके द्रव्योंमें रहतेहैं ॥ ८८ ॥
१८

२१८ न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ गुण--
संयोगश्च विभागश्च संख्या द्वित्वादिकास्तथा ॥
द्विपृथक्त्वादयस्तद्वदेतेऽनेकाश्रिता गुणाः ॥ ८९ ॥
भाषा-संयोग, विभाग, द्वित्वादिसंख्या, द्विपृथक्त्व, त्रिपृथक्त्व, आदि चार गुण
सर्वदा अनेकाश्रितही रहतेहैं ॥ ८९ ॥
अनेकाश्रिता इति । संयोगविभागद्वित्वादीनि द्विवृत्तीनि, त्रित्व-
चतुष्टादिकं त्रिचतुरादिवृत्तीति बोध्यम् ॥ ८९ ॥
भाषा-यहां अनेक पद एकसे भिन्नमात्रका बोधक है, एवं संयोग विभाग द्वित्वादि
दो द्रव्योंमें रहते हैं और त्रित्व चतुष्टादि तीनों चारोंमें रहते हैं, ऐसे जानना चाहिये ८९
अतः शेषा गुणाः सर्वे मता एकैकवृत्तयः ॥
भाषा-इन चारसे (शेष) बाकी सभी गुण एक २ द्रव्यमें नियमसे रहते हैं.
अतः शेषा इति । रूपरसगन्धस्पर्शैकत्वपरिमाणैकपृथक्त्वपर-
त्वापरत्वबुद्धिसुखदुःखेच्छाद्वेषप्रयत्नगुरुत्वद्रवत्वस्नेहसंस्कारा-
दृष्टशब्दा इत्यर्थः ।
भाषा-अर्थात् रूप, रस, गन्ध, स्पर्श, एकत्व, परिमाण, एकपृथक्त्व, परत्व,
अपरत्व, बुद्धि, सुख, दुःख, इच्छा, द्वेष, प्रयत्न, गुरुत्व, द्रवत्व, स्नेह, संस्कार,
धर्म, अधर्म, तथा शब्द ये २२ गुण एक एकही द्रव्यमें रहते हैं.
बुद्ध्यादिषट्कं स्पर्शान्ताः स्नेहः सांसिद्धिको द्रवः ९०
अदृष्टभावनाशब्दा अमी वैशेषिका गुणाः ॥
भाषा-बुद्धि आदि छः, तथा रूपादि स्पर्शान्त चार, एवं स्नेह तथा सांसि-
द्धिक द्रवत्व ॥९०॥ अदृष्ट भावनाख्य संस्कार तथा शब्द ये सब १६ विशेष गुण
कहलाते हैं.
बुद्ध्यादीति । बुद्धिसुखदुःखेच्छाद्वेषप्रयत्ना इत्यर्थः । स्पर्शा-
न्ता रूपरसगन्धस्पर्शा इत्यर्थः । द्रवो द्रवत्वम् ॥ ९० ॥
भाषा-बुद्धि, सुख, दुःख,इच्छा, द्वेष, प्रयत्न ये षट् बुद्ध्यादि हैं; रूप रस गन्ध
स्पर्श ये चार स्पर्शान्त हैं; 'द्रव' नाम द्रवणरूपा क्रियाकाभी है, उसके वारणार्थ
'द्रव्यत्व' यह विवरण किया है. यह निःसन्देह गुणविशेषका वाचक है ॥ ९० ॥

परिच्छेदः ५ ] भाषाटीकासमेता. २१९
वैशेषिका इति । विशेषा एव वैशेषिकाः, स्वार्थे ठक्, विशेषगु-
णा इत्यर्थः ।
भाषा-( वैशेषिका इति ) 'विशेष' तथा 'वैशेषिक' ये दोनों एकार्थबोधक शब्द
हैं. केवल “ विनयादिभ्यष्ठक् ५।४।३४ ” इस सूत्रसे किये ' ठक् '
प्रत्ययकृत शब्द स्वरूप मात्रका भेद है, अर्थका नहीं. “द्रव्यविभाजकोपाधिद्वय-
समानाधिकरणावृत्ति द्रव्यकर्मावृत्ति जातिमत्त्वं विशेषगुणत्वम् ” यह विशेषगुण-
मात्रका अनुगत एक लक्षण है; अर्थात् द्रव्यकी विभाजक उपाधिद्वय कोईएक
पृथिवीत्व जलत्वादि उन दोनोंके समानाधिकरण पृथिवी जलादि उभयमें न रहने-
वाली तथा द्रव्यकर्म उभयमेंभी न रहनेवाली जो बुद्ध्यादि कतिपय गुणोंमें रहने
वाली जाति, तादृश जातिमत्त्व पूर्वोक्त सभी विशेष गुणोंमें अनुगत है-इति ।
संख्यादिरपरत्वान्तो द्रवोऽसांसिद्धिकस्तथा॥९१॥
गुरुत्ववेगौ सामान्यगुणा एते प्रकीर्तिताः ॥
भाषा-संख्यासे आदिलेकर अपरत्व पर्यन्त सात और नैमित्तिक द्रवत्व ॥९१॥
गुरुत्व तथा वेगाख्यसंस्कार ये दश सामान्यगुण कहलाते हैं.
सङ्ख्यादिरिति । सङ्ख्यापरिमाणपृथक्त्वसंयोगविभागपरत्वापर-
त्वानीत्यर्थः । ॥ ९१ ॥
भाषा-संख्या, परिमाण, पृथक्त्व, संयोग, विभाग, परत्व, तथा अपरत्व ये सात
संख्यादि हैं ॥ ९१ ॥
संख्यादिरपरत्वान्तो द्रवत्वं स्नेह एव च ॥ ९२ ॥
एते तु द्वीन्द्रियग्राह्याः-
द्वीन्द्रियेति । चक्षुषा त्वचापि ग्रहणयोग्यत्वात् ।
भाषा-संख्यासे आदि लेकर अपरत्व पर्यन्त सात और द्रवत्व तथा स्नेह ॥९२॥
ये नव गुण नेत्र तथा त्वग् इन दोनों इन्द्रियोंसे ग्रहण होसकते हैं.
-अथ स्पर्शान्तशब्दकाः ॥
बाह्यैकैकेन्द्रियग्राह्याः-
बाह्येति । रूपादीनां चक्षुरादिग्राह्यत्वात् ।

३२० न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ गुण-
भाषा-और रूपसे आदि लेकर चार तथा शब्द ये पांचों गुण नेत्रादि
बाह्यपांचों इन्द्रियोंसे ग्रहण होतेहैं अर्थात् चक्षुः, श्रोत्र, रसना, घ्राण, तथा त्वक् इन
पांचों बाह्य एक एक इन्द्रियसे यथाक्रम रूप शब्द रस गन्ध तथा स्पर्श ये पांच गुण
ग्रहण होतेहैं.
-गुरुत्वादृष्टभावनाः ॥ ९३ ॥
अतीन्द्रिया विभूनां तु ये स्युर्वैशेषिका गुणाः ॥
अकारणगुणोत्पन्ना एते तु परिकीर्तिताः ॥ ९४ ॥
भाषा-गुरुत्व अदृष्ट अर्थात् धर्माधर्म तथा भावनाख्य संस्कार ये चार गुण
किसी इन्द्रियसे ग्रहण नहीं होते अर्थात् इन चारोंका केवल अनुमानद्वारा लाभ
होता है. और आकाशादि विभु द्रव्योंके जो शब्दादि विशेष गुणहैं वे सब अकारण
गुण उत्पन्न हैं अर्थात् जैसे रूपादि कारणगुणोत्पन्न हैं वैसे ये नहीं हैं ॥ ९३ ॥ ९४ ॥
विभूनामिति। बुद्धिसुखदुःखेच्छाद्वेषप्रयत्नधर्माधर्मभावना शब्दा
इत्यर्थः । अकारणेति। कारणगुणेन कार्ये ये गुणा उत्पद्यंते ते
कारणगुणपूर्वका रूपादयो वक्ष्यन्ते, बुद्ध्यादयस्तु न तादृशा
आत्मादेः कारणाभावात् ॥ ९३ ॥ ९४ ॥
भाषा-भाव यह कि-“कारणगुणपूर्वकः कार्यगुणो दृष्टः २० अ० २ आह्नि १”
यह कणादमुनिका सिद्धान्त है; परन्तु यह विभुंके विशेषगुणोंमें नहीं घटता अर्थात्
जैसे रूपादि 'स्वाश्रय समवायिसमवेतगुणजन्यत्व' सम्बन्धसे अपने कारणके गुणो-
से उत्पन्न होतेहैं; वैसे बुद्धि, सुख, दुःख, इच्छा, द्वेष, प्रयत्न, धर्म, अधर्म,
भावना तथा शब्द ये .दश कारणगुणसे उत्पन्न नहीं हैं.
कपालादि कारणगुणसे जो घटादिकार्यमें रूपादि गुण उत्पन्न होतेहैं वही कारणगु-
णपूर्वक कहलातेहैं. उनको हम आगे कहेंगे. बुद्धि आदि तो वैसे नहींहैं; क्योंकि
आत्माका तथा आकाशका कोई कारण नहीं है ॥ ९३ ॥ ९४ ॥
अपाकजास्तु स्पर्शान्ता द्रवत्वं च तथाविधम् ॥
स्नेहवेगगुरुत्वैकपृथक्त्वपरिमाणकम् ॥ ९५ ॥
स्थितिस्थापक इत्येते स्युः कारणगुणोद्भवाः ॥
भाषा-अपाकज अर्थात् अग्निसंयोगसे न उत्पन्न होनेवाले रूप, रस, गन्ध,
तथा स्पर्श एवं अपाकज द्रवत्व, स्नेह, वेगाख्य संस्कार, गुरुत्व एकपृथक्त्व,

परिच्छेदः ५ ] भाषाटीकासमेता. २२१
परिमाण ॥ ९५ ॥ तथा स्थिति, स्थापकाख्य संस्कार ये सब ११ गुण कारण
गुणोंसे उत्पन्न होते हैं.
अपाकजास्त्विति । पाकजरूपादीनां कारणगुणपूर्वकत्वाभावाद-
पाकजा इत्युक्तम् । तथाविधमपाकजम् ॥ ९५॥ कारणगुणोद्भवा
इति । तथैकत्वमपि बोध्यम् ।
भाषा-पाकज रूपादिकोंकी उत्पत्ति कारणगुणपूर्वक नहीं है; इसलिये 'अपा-
कज' यह कहा है. मूलगत 'तथाविधम्' इसकाभी 'अपाकज' ही अर्थ है; वैसेही
एकत्वकोभी कारणगुणपूर्वकही जानना चाहिये.
संयोगश्च विभागश्च वेगश्चैते तु कर्मजाः ॥ ९६ ॥
भाषा-संयोग विभाग और वेगाख्य संस्कार ये तीन गुण कर्मसे उत्पन्न
होतेंहैं ॥ ९६ ॥
कर्मजा इति । यद्यपि कर्मजत्वं न साधर्म्यं घटादावतिव्याप्तेः,
संयोगजसंयोगेऽव्याप्तेश्च । तथापि कर्मजवृत्तिगुणत्वव्याप्यजाति-
मत्त्वं बोध्यम्, एवमन्यत्राप्यूह्यम् ॥ ९६ ॥
भाषा-यद्यपि चक्रभ्रमणादि कर्मजन्यत्व घटादिकोंमेंभी है. उनमें इन संयोगादि
तीनके लक्षणकी अतिव्याप्ति होगी. एवं हस्त पुस्तकादिसंयोगसे उत्पन्न होनेवाले
काय पुस्तकादि संयोगजसंयोगमें इस लक्षणकी अव्याप्ति होगी; क्योंकि 'संयोगज-
संयोग' यह कर्मजन्य नहीं है किन्तु संयोगजन्य है तथापि (कर्मसे उत्पन्न होनेवा-
लोंमें रहनेवाली जो गुणत्वकी व्याप्य संयोगत्वादिरूपा जाति तादृशजातिमत्ता) इन
तीनके सिवाय और कहीं नहीं है ऐसेही और स्थलोंमेंभी ऐसेही जातिघटित लक्षण
करके निर्वाह करना उचित है. ॥ ९६॥
स्पर्शान्तपरिमाणैकपृथक्त्वं स्नेहशब्दके ॥
भवेदसमवायित्वं,-
भाषा-रूप, रस, गन्ध, स्पर्श, परिमाण, एकत्व, पृथक्त्व, स्नेह, और शब्द, इन
नवोंमें गुणान्तरोंके प्रति नियमसे असमवायि कारणताही रहती है.
स्पर्शान्तेति । स्पर्शोऽत्रानुष्णो ग्राह्यः । एकपृथक्त्वेत्यत्र त्वप्र-
त्ययस्य प्रत्येकमन्वयादेकत्वं पृथक्त्वं च ग्राह्यम् । पृथकपदेन
चैकपृथक्त्वं विवक्षितम् ।

२२२ न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ गुण-
भाषा-‘स्पर्श’ शब्दसे यहां अनुष्णस्पर्शका ग्रहण करना. एवं मूलमें पठित
( एकपृथक्त्व ) यहां ‘त्व’ प्रत्ययका दोनोंके साथ सम्बन्ध करके ( एकत्व ) तथा
'पृथक्त्व’ ऐसे जान लेना. यहां प्रकृतमें ‘पृथक्त्व’ पदसे केवल एकपृथक्त्व वांछित है.
भवेदसमवायित्वमिति । घटादिरूपरसगन्धस्पर्शाः कपालादि-
रूपरसगन्धस्पर्शोभ्यो भवन्ति । एवं कपालादिपरिमाणादीनां घ-
टादिपरिमाणाद्यसमवायिकारणत्वम् । एवं शब्दस्यापि द्विती-
यशब्दं प्रत्यसमवायिकारणत्वम् । एवं स्थितिस्थापकैकपृथक्त्व-
योरपि बोध्यम् ।
भाषा-( भवेदसमवायित्वमिति ) घटादिके रूप रस गन्ध तथा स्पर्श कपाला-
दिकोंके रूप रस गन्ध तथा स्पर्शसे यथाक्रम उत्पन्न होतेहैं. ऐसेही कपालादिगत
परिमाणादिकोभी घटादिगत परिमाणादिके प्रति असमवायिकारणता है. ऐसेही
शब्दकोभी स्वाव्यवहितोत्तर उत्पन्न द्वितीयशब्दके प्रति असमवायिकारणता है. ऐसेही
स्थितिस्थापकाख्य संस्कारोंको तथा एकपृथक्त्वकोभी जानलेना अर्थात् कारणगत
संस्कार तथा एकपृथक्त्व ( कटादि ) चटाईआदि कार्यगत संस्कारोंके तथा एकपृ-
थक्त्वके जनक हैं.
–अथ वैशेषिके गुणे ॥ ९७ ॥
आत्मनः स्यान्निमित्तत्वं–
भाषा-जीवात्माके ( बुद्धि ) ज्ञानादि विशेषगुणोंमें गुणान्तरोंके प्रति नियमसे
निमित्तकारणताही रहतीहै.
निमित्तत्वमिति । बुद्ध्यादीनामिच्छादिनिमित्तत्वादिति भावः ।
भाषा-जीवात्माके ज्ञानादि विशेषगुण पूर्वोक्त युक्तिके अनुरोधसे इच्छादि
विशेषगुणोंके प्रति निमित्तकारणही स्वीकार कियेहैं.
–उष्णस्पर्शगुरुत्वयोः ॥
वेगेऽपि च द्रवत्वे च संयोगादिद्वये तथा ॥९८॥
द्विधैव कारणत्वं स्यात्–
भाषा-उष्णस्पर्श, गुरुत्व, वेगाख्यसंस्कार, द्रवत्व, संयोग तथा विभाग इन
छःमें ॥ ९८ ॥ असमवायि तथा निमित्तभेदसे दोतरहकी कारणता रहती है.

परिच्छेदः ५ ] भाषाटीकासमेता, २२३
द्विधैवेति । असमवायिकारणत्वं निमित्तकारणत्वं च । तथाहि ।
उष्णस्पर्श उष्णस्पर्शस्यासमवायिकारणं पाकजे निमित्तम्, ।
गुरुत्वं गुरुत्वपतनयोरसमवायि प्रतिघाते निमित्तम्, वेगो
वेगस्पन्दयोरसमवाय्यभिघाते निमित्तम्, द्रवत्वं द्रवत्वस्पन्दन-
योरसमवायि संग्रहे निमित्तम्, भेरीदण्डसंयोगः शब्दे निमित्तम् ।
भेर्याकाशसंयोगेऽसमवायी, वंशदलद्वयविभागः शब्दे निमित्तं
वंशदलाकाशविभागेऽसमवायीति ।
भाषा-अर्थात् असमवायिकारणताभी रहतीहै और निमित्तकारणताभी रहती है.
(तथाहि) जैसे कपालादिगत उष्णस्पर्श घटादिगत उष्णस्पर्शका असमवायि-
कारण है, परन्तु घटादिगत पाकजरूपादिकोंके प्रति निमित्तकारणभी है. एवं
कारणगत गुरुत्व कार्यगत गुरुत्वके प्रति तथा आद्यपतनरूपा क्रियाके प्रति असमवायि-
कारण है; परन्तु (प्रतिघात) अभिघाताख्य संयोगके प्रति निमित्तकारणभी है. एवं वेगभी
स्वाव्यवहितोत्तर वेगान्तरके तथा स्पन्दरूपाक्रियाके प्रति असमवायिकारण है परंतु
बाणादिजन्य अभिघाताख्य संयोगके प्रति निमित्तकारणभीहै. एवं कारणगत द्रवत्वभी
कार्यगत द्रवत्वका तथा (स्पन्दन) ढलनरूपा क्रियाका असमवायिकारण है, परन्तु
(संग्रहे) चूर्णादिके पिण्डीभावमें निमित्तकारणभी है. ऐसेही भेरी दण्डका संयोग
शब्दमें निमित्तकारण है और भेरीआकाश संयोगके प्रति असमवायिकारण है. एवं
(वंश) बांसके दोनों दलोंका विभाग शब्दमें निमित्तकारण है और बांसदलके
आकाशसे विभागका असमवायिकारण है-इति ।
-अथ प्रादेशिको भवेत् ॥
वैशेषिको विभुगुणः संयोगादिद्वयं तथा ॥ ९९ ॥
प्रादेशिकोऽव्याप्यवृत्तिः ॥ ९७ ॥ ९८ ॥ ॥ ९९ ॥
भाषा-आकाशादि विभुद्रव्योंके शब्द ज्ञानादि विशेषगुण संयोग तथा विभाग ये
सब १२ गुण (प्रदेश) अव्याप्यवृत्ति हैं अर्थात् किञ्चिदवच्छेदेन रहते हैं ॥ ९९ ॥
यहांतक अनेकगुणोंके एक एक साधर्म्यका निरूपण किया अब इससे
आगे प्रत्येक गुणके साधर्म्यको कहतेहैं-
चक्षुर्ग्राह्यं भवेद्रूपं द्रव्यादेरुपलम्भकम् ॥
चक्षुषः सहकारि स्यात्-

२२४ न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ गुण-
भाषा-केवल (चक्षुः) नेत्रइन्द्रियसे जिसका ग्रहण हो उसका नाम 'रूप' है. वह
रूप द्रव्यादिकोंकी उपलब्धिमें नेत्रइन्द्रियका सहायकभी है.
चक्षुरिति । रूपत्वजातिस्तु प्रत्यक्षसिद्धा। रूपशब्दोल्लेखिनी प्र-
तीतिर्नास्तीति चेत् । मास्तु रूपशब्दप्रयोगस्तथापि नीलपीता-
दिष्वनुगतजातिविशेषोऽनुभवसिद्ध एव । रूपशब्दाप्रयोगेऽपि
'नीलो वर्णः पीतो वर्णः' इति वर्णशब्दोल्लेखिनीप्रतीतिरस्त्येव ।
एवं नीलत्वादिकमपि प्रत्यक्षसिद्धम् ।
भाषा-' रूपं रूपं' इस अनुगत प्रत्ययसे रूपत्वजाति तो प्रत्यक्ष प्रमाणहीसे
सिद्ध है. शंका-ऐसी वस्तु तो संसारमें कोई प्रतीत नहीं होती, जिसमें केवल 'रूप'
शब्दका प्रयोग किया जाय किन्तु नीलपीतादि व्यक्तियां प्रतीत होती हैं. समा०-
मत हो किसी पदार्थमें केवल 'रूप' शब्दका प्रयोग, तथापि नीलपीतादि अनेक व्यक्ति-
योंमें एक अनुगत जाति विशेष तो अनुभवसिद्ध है. एवं नीलपीतादिव्यक्तियोंमें मत
हो अनुगतरूपेण 'रूप' शब्दका प्रयोग; तथापि "नीलो वर्णः, पीतो वर्णः" इस अनुगत
प्रत्ययसे ' रूप ' शब्दपर्यायवाचि ' वर्ण ' शब्दका प्रयोग तो होताही है. एवं रूप-
त्वकी व्याप्य नीलत्वादि जातियांभी प्रत्यक्षही सिद्ध हैं.
न चैकैका एव नीलरूपादिव्यक्तय इत्येकव्यक्तिवृत्तित्वान्नील-
त्वादीर्न जातिरिति वाच्यम् । 'नीलो नष्टो रक्त उत्पन्न' इत्यादि-
प्रतीतेर्नीलादेरुत्पादविनाशशालितया नानात्वात् । अन्यथैकनी-
लनाशे जगदनीलमापद्येत ।
शंका-नीलपीतादि व्यक्ति तो संसारमात्रमें एक २ ही है; इसलिये उन एक२में
रहनेवाले नीलत्वपीतत्वादि धर्म जातिरूप नहीं होसकते. समाधान-आमनिक्षिप्त
घटादिमें " नीलो नष्टो रक्त उत्पन्नः " इत्यादि प्रतीति होती है. इस प्रतीतिसे नील
पीतादि व्यक्तियोंको उत्पादविनाशवाली होनेसे उनमें अनेकता सिद्ध होती है.
( अन्यथा ) यदि संसारमात्रमें एकही नीलव्यक्ति अङ्गीकार करें तो उसके नाश
होनेसे शेष संसार नीलवर्णरहित होजाना चाहिये.
नच नीलसमवायरक्तसमवाययोरेव विनाशोत्पादविषयकोऽसा-
वेष प्रत्यय इति वाच्यम् । प्रतीत्या समवायानुल्लेखात् ।

परिच्छेदः ५ ] भाषाटीकासमेता. २२५
शंका-“नीलो नष्टो रक्त उत्पन्नः” यह प्रत्यय तो नीलके समवायके नाशको
तथा रक्तके समवायकी उत्पत्तिको अवगाहन करता है इसलिये इससे नीलपीतादि
व्यक्तियोंमें नानात्व मानना उचित नहीं. समाधान-प्रतीतिमें जिस पदार्थका
( उल्लेख ) भान हो वही उसके विषय होता है. एवं “नीलो नष्टः ” इत्यादि प्रतीतिमें
समवायका भान नहीं है; इसलिये इसको समवायावगाहनी प्रतीति मानना उचित
नहीं है.
न च 'स एवायं नीलः' इति प्रत्ययाल्लाघवाच्चैक्यमिति वाच्यम् ।
प्रत्यक्षस्य तज्जातीयविषयकत्वात्, सैवेयं गुर्जरीतिवत् । लाघवं
तु प्रत्यक्षबाधितम् ।
शंका-“स एवायं नीलः-अर्थात् यह वही नील व्यक्तिहै” इत्याकारक प्रत्ययके
बलसे तथा लाघवसे नीलपीतादि व्यक्ति एकही एक माननी चाहिये. समाधान-“स
एवायं नीलः” इत्याकारक प्रत्यक्ष ज्ञान तो “सैवेयं गुर्जरी”-अर्थात् यह वही गुजरात
देशमें होनेवाली औषधी है” इस ज्ञानकी तरह केवल साजात्यको अवगाहन करता है
अर्थात् व्यक्तिभेदमेंभी पुरुष कहताहै कि-मैनेभी वही औषधी खाई है, जो चैत्रने
खाईथी. एवं आपका लाघवसे संसारमात्रमें एक २ नीलपीतादि व्यक्तियोंका मानना
“नीलो नष्टो रक्त उत्पन्नः ” इत्यादि प्रत्यक्षज्ञानसे बाधित है.
अन्यथा घटादीनामप्यैक्यप्रसङ्गात्। उत्पादविनाशबुद्धेः समवा-
यालम्बनत्वापत्तेरिति । एतेन रसादिकमपि व्याख्यातम् ।
भाषा-( अन्यथा ) यदि केवल लाघवमात्रसेही नीलपीतादि व्यक्तियोंमें ऐक्य-
स्वीकार करो तो घटपटादि पदार्थोंमेंभी ऐक्यही मानना चाहिये. अर्थात् संसारमा-
त्रमें एकही घट तथा एकही पटको मानकर उत्पादविनाशबुद्धिको घटपटादिके
समवायको अवगाहन करनेवाली समझना चाहिये. ( एतेन ) इस पूर्वोक्त कथनसे
रसादिकोंमेंभी यही विचार समझ लेना अर्थात् रसादि व्यक्तियांभी संसारमें
अनेक हैं.
चक्षुर्ग्राह्यमिति । चक्षुर्ग्राह्यविशेषगुणत्वमित्यर्थः । एवमग्रेऽपि। द्र-
व्यादेरिति, उपलम्भकमुपलब्धिकारणम् । इदमेव विवृणोति ।
चक्षुष इति । द्रव्यगुणकर्मसामान्यानां चाक्षुषप्रत्यक्षं प्रत्युद्भूत-
रूपं कारणम् ।

२२६ न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ गुण-
भाषा-(चक्षुर्ग्राह्यमिति) नेत्रइन्द्रियसे ग्रहण होनेयोग्य विशेषगुणरूप है.
ऐसा विवरण करनेसे संख्यादिमें अतिव्याप्तिभी नहीं है. ऐसेही आगे रसादिके
विवरणमेंभी जानलेना. (द्रव्यादेरिति) 'उपम्भक' नाम उपलब्धिके कारणीभूतका
है. इसीका 'चक्षुषः' इत्यादि ग्रन्थसे विवरण करतेहैं. द्रव्य गुण कर्म तथा सामान्य
चाक्षुषप्रत्यक्षके प्रति उद्भूतरूपको कारणता है.
-शुक्लादिकमनेकधा ॥ १०० ॥
भाषा-वह रूप शुक्ल नीलपीतादिभेदसे अनेक प्रकारका है ॥ १०० ॥
शुक्लादीति । तच्च रूपं शुक्लनीलपीतरक्तकृष्णकर्बुरादिभेदाद्-
नेकप्रकारकं भवति । ननु कर्बुरं कथमतिरिक्तं रूपं भवति ।
इत्थम् । नीलपीताद्यवयवारब्धोऽवयवी न तावन्नीरूपोऽप्रत्यक्ष-
त्वप्रसङ्गात्, नापि व्याप्यवृत्तिनीलादिकमुत्पद्यते पीतावच्छेदे-
नापि नीलोपलब्धिप्रसङ्गात्, नाप्यव्याप्यवृत्तिनीलादिकमुत्पद्यते
व्याप्यवृत्तिजातीयगुणानामव्याप्यवृत्तित्वे विरोधात् । तस्मा-
न्नानाजातीयरूपैरवयविनि विजातीयं चित्रं रूपमारभ्यते । अत
एवैकं चित्रमित्यनुभवोऽपि, नानारूपकल्पने तु गौरवात् ।
भाषा-वहरूप शुक्ल नील पीत रक्त हरित कपिश कृष्ण कर्बुर आदि भेदसे अने-
कप्रकारका है. शंका-(कर्बुर) चित्ररूप अतिरिक्त माननेका कुछ काम नहीं
किन्तु नीलपीतादि गुणोंके समुदाचारका नामही चित्ररूप है. समाधान-इस
विचारसे अतिरिक्त मानना पड़ता है कि-नीलपीतादि अवयवोंसे उत्पन्न हुआ अव-
यवी नीरूपभी नहीं है; क्योंकि यदि नीरूप होय तो प्रत्यक्ष नहीं हुआ चाहिये
और चित्रावयवीगत नीलपीतादि (व्याप्यवृत्ति) सर्वावयवावच्छेदेन उत्पन्न हुए हैं,
यहभी नहीं कहसकते क्योंकि यदि ऐसा होय तो चित्रावयवीमें नीलावच्छेदेन
पीतकी या पीतावच्छेदेनभी नीलकी उपलब्धि हुई चाहिये और (अव्याप्यवृत्ति)
किंचिदवयवावच्छेदेन नीलादि उत्पन्न होते हैं, ऐसाभी नहीं कहसकते; क्योंकि
(व्याप्यवृत्ति) सर्वावयवावच्छेदेन स्वाभाविक उत्पन्न होनेवाले नीलपीतादि गुणोंको
(अव्याप्यवृत्ति) किञ्चिदवयवावच्छेदेन उत्पन्न हुए माननाभी उनके स्वभावसे
विरुद्ध है. (तस्मात्) इसलिये अवयवगत नीलपीतादि अनेक प्रकारके रूपोंसे चित्रा-
वयवीमें विलक्षण एक चित्ररूप उत्पन्न होताहै, यही मानना उचित है; इसीसे "एकं
चित्ररूपं" यह अनुभवभी प्रामाणिक है. 'चित्रं' इत्याकारक प्रतीतिके विषयमें अनेक-
रूपोंकी कल्पना करनेमें उपस्थितिकृत गौरवभी है.