न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)
Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda
विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा
पृष्ठ 239, कुल 350 में से
संदर्भ में पढ़ेंश्रीः।
अथ गुणपरिच्छेदः ५.
भाषाकारकृतमंगलाचरणम्।
यं शरण्यं समाश्रित्य मादृशा निर्गुणा नराः ॥
सम्भवन्ति गुणागाराः सेव्योऽसौ नानको गुरुः ॥ १ ॥
द्रव्यं निरूप्य गुणं निरूपयति, अथेत्यादिना-
भाषा-द्रव्यपदार्थका निरूपण करके अवसरसंगतिके अभिप्रायसे ग्रन्थकार 'अथ'
इत्यादि ग्रन्थसे गुणोंका निरूपण करतेहैं-
अथ द्रव्याश्रिता ज्ञेया निर्गुणा निष्क्रिया गुणाः ॥
भाषा--सदाही द्रव्यके आश्रित रहनेवाले गुणक्रियाशून्योंका नाम 'गुण' है.
गुणत्वजातौ किं मानमिति चेत्, इदम् । द्रव्यकर्मभिन्ने सामा-
न्यवति या कारणता सा किञ्चिद्धर्मावच्छिन्ना निरवच्छिन्नकारण-
ताया असम्भवात्, नहि रूपत्वादिकं सत्ता वा तत्रावच्छेदिका
न्यूनातिरिक्तदेशवृत्तित्वात् । अतश्चतुर्विंशत्यनुगतं किंचिद्वाच्यं
तदेव गुणत्वमिति सिद्धम् ।
भाषा-यदि कोई पूछे कि-गुणत्वजातिमें क्या प्रमाण है? तो उसको ( इदम् )
यह कहना चाहिये कि-द्रव्यकर्मसे भिन्न सामान्यवालेमें जो कारणताहै वह कारणता
होनेसे अवश्य किंचित् धर्मावच्छिन्ना है. जैसे घटनिष्ठ कार्यतानिरूपित दण्डगतकार-
णता दण्डत्वधर्मावच्छिन्ना है. ऐसेही निरवच्छिन्न कारणताका कहींभी सम्भव नहीं है.
रूप रसादिमें रहनेवाले रूपत्व रसत्वादि धर्म या द्रव्य गुण कर्म तीनोंमें रहनेवाला
सत्तारूप धर्म यावत् गुणनिष्ठ कारणताका अवच्छेदक नहीं होसकता; क्योंकि रूप-
त्वादि धर्म न्यूनदेशवृत्ति हैं और सत्ता अधिक देशवृत्ति है और अवच्छेदक नियमसे-
अन्यूनानतिरिक्तवृत्ति धर्मही होताहै. इसलिये चौबीस गुणोंमें अनुगत कोई एक धर्म
अवश्य कहना चाहिये. वही ' गुणत्व ' इस नामसे प्रसिद्ध होसकताहै.
द्रव्याश्रिता इति । यद्यपि द्रव्याश्रितत्वं न लक्षणं कर्मादावति-
व्याप्तेस्तथापि द्रव्यत्वव्यापकतावच्छेदकसत्तान्यजातिमत्त्वं त-