न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)
Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda
विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा
३०२ न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ गुण-
सेभी सन्ध्यावन्दनादिका फल प्रतीत होताहै. एवं “ पितृगण हमारे पर प्रेम रक्खें
इस मनोरथसे पुरुष पितृगणके उद्देश्यसे प्रतिदिन श्रद्धापूर्वक दान किया करे ”
इत्यादिअर्थकवचनबोधित पितृप्रीतिरूपही पितृश्राद्धादि नित्यकर्मका फल है.
न च पितृप्रीतिः कथं फलं व्यधिकरणत्वादिति वाच्यम् । गया-
श्राद्धादाविवोद्देश्यत्वसम्बन्धेनैव फलजनकत्वस्य क्वचित्कल्प-
नात् अतएवोक्तं शास्त्रदर्शितफलमनुष्ठानकर्तरीत्युत्सर्ग इति ।
शंका-क्रियाका फल नियमसे क्रियाके कर्ताहीको हुआ करता है.एवं पितृश्राद्ध-
का पितृप्रेमहीरूप फल नहीं बन सकता क्योंकि क्रियाके साथ उसका सामानाधिकरण
नहीं है अर्थात् श्राद्धक्रियाका कर्ता चैत्र और प्रीतिरूप फल उसके पितृगणमें मानना
अनुभवविरुद्ध है. समाधान-गयाश्राद्धकी तरह कई स्थलोंमें उद्देश्यतासम्बन्धसेभी
फलकी कल्पना होसकती है इसलिये “ शास्त्रबोधित क्रियाका फल अनुष्ठानकर्ताहीको
होताहै ” इस प्रवादको मीमांसक लोगोंने ( उत्सर्ग ) प्रायो वाद माना है अर्थात्
अनुष्ठानकर्ताको तो होताही है, परन्तु जहां जिसके उद्देशसे क्रिया करी जावे वहां
उसकोभी फल अवश्य होताहै.
पितॄणां मुक्तत्वे तु स्वस्य स्वर्गफलम्,यावन्नित्यनैमित्तिकानुष्ठा-
नस्य सामान्यतः स्वर्गफलकल्पनात् । पण्डापूर्वार्थं प्रवृत्तिश्च न
सम्भवति । न हि तत्सुखदुःखाभाववत् स्वतः पुरुषार्थो न वा
तत्साधनं प्रत्यवायानुत्पत्तौ कथं प्रवृत्तिरिति चेत् ।
भाषा-और जिन पितृगणके निमित्त श्राद्धादिक्रिया करीहै यदि वे मुक्त होगए हों
तो उसक्रियाकाभी स्वर्गादिफल क्रियानुष्ठानकर्ताहीको होताहै,क्योंकि यावत् नित्यनै-
मित्तिकविहित अनुष्ठानको सामान्यरूपसे स्वर्गफलजनकता शास्त्रसिद्ध है और
फलविशेषानाधायक पण्डापूर्वके उद्देश्यसे तो पुरुषकी प्रवृत्ति नहीं होसकती, क्योंकि
पुरुषकी प्रवृत्तिका उद्देश्य सुख है या दुःखाभाव है या इन दोनोंके साधन हैं और
पण्डापूर्व स्वयं सुखरूप नहीं है तथा दुःखाभावरूप नहीं है तथा इन दोनोंका साध-
नभी नहीं है.शंका-आपने पूर्वनित्यकर्मका फल प्रत्यवायाभाव माना है वह प्रत्यवा-
याभावभी पण्डापूर्वकी तरह स्वयं सुख नहीं, दुःखाभाव नहीं और इन दोनोंका साध-
नभी नहीं तो उसके उद्देश्यसे सन्ध्यावन्दनादि नित्यकर्ममें प्रवृत्तिका कैसे सम्भव
होसकताहै?
इत्थम् । यथा हि नित्ये कृते प्रत्यवायाभावस्तिष्ठति तदभावे
तदभावः । एवं प्रत्यवायाभावस्य सत्त्वे दुःखप्रागभावसत्त्वं तद-
परिच्छेदः ५ ] भाषाटीकासमेता. ३०३
भावे तद्भाव इति योगक्षेमसाधारणकारणताया दुःखप्रागभावं
प्रत्यपि सुवचत्वात् । एवमेव प्रायश्चित्तस्यापि दुःखप्रागभाव-
हेतुत्वमिति ।
समाधान-( इत्थम् ) जैसे सन्ध्यावन्दनादि नित्यकर्म करनेवाले पुरुषमें
प्रत्यवायका अभाव रहता है और न करनेवालेमें (तद्भाव) अर्थात् प्रत्यवायाभावका
अभाव प्रत्यवाय रहेगा वैसेही प्रत्यवायाभावकी दुःखप्रागभावके साथ व्याप्ति है अर्थात्
नित्यकर्मद्वारा जिस पुरुषमें प्रत्यवायाभाव रहेगा उसीमें दुःखप्रागभावभी रहेगा और
जिसमें प्रत्यवायाभाव नहीं रहेगा उसमें (तद्भाव) अर्थात् दुःखप्रागभावभी नहीं रहेगा
किन्तु दुःखप्रागभावाभाव अर्थात् दुःखी रहेगा इस रीतिसे योगक्षेम साधारण प्रवृ-
त्तिकारणता दुःखप्रागभावमेंभी बनसकती है एवं प्रायश्चित्तकर्मकोभी योगक्षेम साधार-
णही दुःखप्रागभाव हेतुता है अर्थात् प्रायश्चित्तात्मक कर्म करणप्रवृत्तिमें उद्देश्य
विधया दुःखप्रागभावही कारण है.
ननु न कलञ्जं भक्षयेदित्यत्र विध्यर्थे कथं नञर्थान्वयः, इष्टसाध-
नत्वाभावस्य कृतिसाध्यत्वाभावस्य च बोधयितुमशक्यत्वाद्वि-
ति चेत् । न ।
शंका—“ न कलञ्जं भक्षयेत् ” इत्यादि विधिवाक्योंमें विध्यर्थ नञर्थका परस्पर
कैसे अन्वय होताहै? क्योंकि आपने पूर्व इष्टसाधनत्वादि विध्यर्थ मानाहै और नञ्का
अभावरूप अर्थ स्पष्टही है. एवं विध्यर्थके साथ यदि नञर्थका अन्वय होय तो “ न
कलञ्जं” इत्यादि वाक्यसे 'कलञ्जभक्षणं पुरुषेष्टसाधनत्वाभाववत् कृतिसाध्यात्वाभावञ्च'
यही बोध होगा सो इसका होना सम्भव नहीं क्योंकि ' कलञ्ज ' नाम शुष्कमांस
विशेषका है उसके भक्षणमें “ कलञ्जभक्षणमिष्टसाधनत्वाभाववत्कृतिसाध्यत्वाभाव-
वच्च ” इत्याकारक बोध बाधित है किन्तु पुरुषको साधारणरूपेण उभयप्रकारक
बोधकलञ्ज भक्षणमें रहताही है इसलिये विध्यर्थके साथ अन्वित हुआ नञर्थ इष्टसाध-
नत्वाभावके तथा कृतिसाध्यत्वाभावके बोधनमें समर्थ नहीं होसकता.
१ अप्राप्तकी प्राप्तिका नाम 'योग' है और प्राप्तके संरक्षणका नाम ' क्षेम ' है. प्रत्यवाया-
भाव स्वतः पुरुषार्थ नहीं,पुरुषार्थसाधनभी नहीं; इसलिये उसमें प्रवृत्तिकारणता प्राप्त न थी परन्तु
दुःखप्रागभावके साथ उसकी व्याप्ति बनाकर उसमें युक्तिसे प्रवृत्तिकारणता प्राप्त करी यही
'योग' है.एवं इष्टसाधनताज्ञानको प्रवृत्तिकारणता सिद्धही थी परन्तु प्रभाकरके कुतर्क जालोंकों
निरासकर उसका संरक्षण किया यही ' क्षेम ' है, इस रीतिसे योगक्षेम साधारण सिद्ध हुई
प्रवृत्तिकारणता दुःखप्रागभावमेंभी सुवच बनसकती है.
| ३०४ | न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- | [ गुण- |
|---|
तत्र बाधादिष्टसाधनत्वं कृतिसाध्यत्वं च न विध्यर्थः, किंतु बल-
वदनिष्टाननुबन्धित्वमात्रं तदभावश्च नञा बोध्यते । अथवा बल-
वदनिष्टाननुबन्धित्वविशिष्टेष्टसाधनत्वे सति कृतिसाध्यत्वं विध्य-
र्थः तदभावश्च नञा बोध्यमानो विशिष्टाभावो विशेष्यवति विशे-
षणाभावे विश्राम्यति ।
समाधान—ऐसे स्थलमें यह अर्थ बाधित है इसलिये ऐसे स्थलमें इष्टसाधनत्व
या कृतिसाध्यत्व विध्यर्थ नहीं है किन्तु ऐसे स्थलमें केवल बलवदनिष्टाननुबन्धित्व
मात्रही विध्यर्थ है उस बलवदनिष्टाननुबन्धित्वका अभाव नञसे बोधित होताहै. भाव
यह कि—इष्टसाधनत्व कृतिसाध्यत्व तथा बलवदनिष्टाननुबन्धित्व इस भेदसे विध्यर्थके
तीन अंश है उनमें विधिद्वारा किसीस्थलमें किसी अंशका बोध होताहै और किसी
स्थलमें किसीका, एवं जहां जिस अंशका
यजेत ' इस विधिवाक्यमें ' श्येन ' नाम कर्मविशेषका है. 'अभिचरन्' नाम शत्रुमर-
णकी कामना करतेहुएका है. समुदितार्थ यह हुआ कि-शत्रुमरणकी कामना करता
हुआ श्येननामक कर्मसे यजन करे, एवं ऐसे स्थलमें विध्यर्थका बलवदनिष्टाननुबन्धि-
त्वरूप विशेषण नहीं है; क्योंकि ' श्येन' नामक कर्मको शत्रुमारणानुकूल व्यापारात्मक
होनेसे हिंसारूपता है और हिंसा नरकका साधन होती है और यदि कहो कि विधिविहित
हिंसा दोषकर नहीं होती क्योंकि हिंसाका निषेधक “ माहिंस्यात् सर्वाभूतानि ” यह
सामान्य वाक्य है. इसलिये विशेषविधिवाक्यविहित यज्ञीय हिंसाको छोड़कर प्रवृत्त
होता है तो यह कथनभी युक्त नहीं क्योंकि “ अभिचारमहीनं च त्रिभिः कृच्छ्रैर्व्य-
पोहति ” इत्यादिशास्त्रसे ( अभिचार ) मारणादिक्रियाके प्रायश्चित्तका उपदेश है.
अर्थात् यदि यह क्रिया पापजनका न होय तो इसके उद्देश्यसे प्रायश्चित्तका विधानभी
नहीं हुआ चाहिये और यदि कहो कि साक्षात् परम्परासाधारण मारणानुकूलव्यापार
मात्रका नाम यदि ' हिंसा ' होये तो (खङ्ग) तलवार बनानेवालेको तथा कूप लगवा
नेवालेकोभी हिंसाका दोष लगना चाहिये; क्योंकि तलवारसेभी परम्परा कई जीव
मारे जातेंहैं और कूपमेंभी कई जीव मरजातेहैं. एवं यदि कोई भोजनकरणकालमें
गलेमें अन्न रुक जानेसे मरजाय तो उसको आत्महत्याका पाप लगना चाहिये; इस-
लिये साक्षात् परम्परासाधारण मारणानुकूल व्यापारमात्रका नाम 'हिंसा' नहीं, किन्तु
केवल साक्षात् मारणानुकूलव्यापारका नाम'हिंसा' है और श्येनकर्म साक्षात् मारणा-
नुकूलव्यापार नहीं है इसलिये “ मा हिंस्यात् ” इत्यादि निषेधका अविषय होनेसे
बलवदनिष्टका अननुबन्धि है तो यह कथनभी युक्त नहीं; क्योंकि मरणोद्देश्यकत्वरूप
धर्मकोभी क्रियाकी विशेषणता है अर्थात् शत्रुमरणोद्देशेन विधान किया ' श्येन ' नामक
कर्म हिंसारूपही है और यदि कहो कि मरणोद्देश्यका क्रियही यदि हिंसारूप
होय तो जहां मृगादिके उद्देशसे बाण चलाया लगा ब्राह्मणको तो उसके मरनेका
प्रायश्चित नहीं हुआ चाहिये क्योंकि ऐसे स्थलमें ब्राह्मणहिंसारूप क्रियामें ब्राह्मणेद्दे-
श्यकत्वधर्म नहीं है तो यह कथनभी युक्त नहीं क्योंकि ऐसे स्थलमें अज्ञानकृत ब्राह्म-
णवधका तत्तद् वचनविशेषोंद्वारा प्रायश्चित्त ऋषिलोगोंने विधान किया है और ज्ञान-
कृत ब्राह्मणवधका तो “ कामतो ब्राह्मणवधे निष्कृतिर्न विधीयते ” इत्यादि मनुवा-
क्यसे प्रायश्चित्तही नहींहै. भाव यह कि-मरणोद्देश्यकत्वरूप विशेषण हिंसारूपा क्रिया-
में देना व्यर्थ नहीं है.
श्येनवारणायादृष्टाद्वारकत्वेन विशेषणात् । अतएव काशीम-
रणार्थं कृतशिवपूजादेरपि न च हिंसात्वम् ।
१ शिरः कपाली ध्वजवान् भिक्षाशी कर्म वेदयन् ॥ ब्रह्महा द्वादशाब्दानि मितभुक् शुद्धिमा-
प्नुयात् ॥ २४३ ॥ इति याज्ञवल्क्यः ।
३०६ न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ गुण-
समाधान-‘श्येन’ नामक कर्ममें हिंसात्वधर्मके वारणार्थ हम अदृष्टाद्वारकत्वेन
विशेषण देतेहैं अर्थात् ‘अदृष्टाद्वारकं यद्वैरिमरणानुकूलं कर्म तद्हिंसा’ और श्येनकर्म
तो अदृष्टद्वारा शत्रुनाशक है, इसलिये हिंसा नहीं है अदृष्टाद्वारक शत्रुमरणानुकूल
क्रियाहीका नाम हिंसा है. (अतएव) इसीलिये जिस पुरुषने काशीमरणके उद्देश्यसे
शंकरार्चनादि क्रिया करीहै उस क्रियाकोभी हिंसात्व नहींहै.
न च साक्षान्मरणजनकस्यैव हि हिंसात्वं श्येनस्तु न तथा किंतु
तज्जन्यापूर्वमिति वाच्यम्। खड्गाघातेन ब्राह्मणे व्रणपाकपरम्प-
रया मृते हिंसात्वानापत्तेः।
शंका-अदृष्टाद्वारक मरणजनकत्वकी अपेक्षा साक्षात् मरणजनकत्वरूप
क्रियामें विशेषण देनेमें लाघव है अर्थात् साक्षात् मरणजनिका क्रियाका
नाम ‘हिंसा’ है. ऐसे कथनसे शंकरार्चनादि क्रियाका तथा श्येनादिक्रियाकाभी वारण
होसकता है क्योंकि श्येन शंकरार्चनादि क्रिया साक्षात् मरणजनिका नहीं है किन्तु
स्वजन्य अदृष्टद्वारा है. समाधान-साक्षात् मरणजनिका क्रियाका नाम ‘हिंसा’ नहीं
कहसकते, क्योंकि यदि ऐसा होय तो जहां प्रथम अल्प खड्गपरिहारसे ब्राह्मणको
व्रण हुआहै पीछे उसी व्रणपाकद्वारा उस ब्राह्मणका मरण हुआ. वहां वह मरणरूपा
क्रिया हिंसात्मिका नहीं हुई चाहिये; परन्तु उस क्रियाका हिंसात्मक होना अनुभव
सिद्ध है, इसलिये ऐसी हिंसाके संग्रहार्थ तथा श्येनादि क्रियाके वारणार्थ अदृष्टाद्वारक
मरणजनिका क्रियाहीका नाम ‘हिंसा’ कहना उचित है.
केचित्तु श्येनस्य हिंसा फलं न तु मरणम्, तेन श्येनजन्यखड्गाघा-
तादिरूपा हिंसाऽभिचारपदार्थस्तस्य च पापजनकत्वमतः श्येन-
स्य वैधत्वात् पापाजनकत्वेऽप्यग्रिमपापं प्रतिसन्धाय सन्तो न
प्रवर्तन्त इत्याहुः।
भाषा-और कई एक विद्वान् लोग तो यह कहतेहैं कि-‘श्येन’ नामक कर्मका
साक्षात् शत्रुमरणफलक व्यापारही फल है अर्थात् श्येनकर्म अपने कर्ताके शत्रुपर
खड्गाघातादि करवा देताहै. एवं खड्गाघातादि मात्र श्येनक्रियाका फल है किन्तु
शत्रुमरणरूप फल नहीं है. इसलिये श्येनक्रियाजन्य खड्गाघातादिरूपा हिंसाहीका
नाम ‘अभिचार’ है और उसी खड्गाघातादिरूप अभिचार पदार्थको पापजनकता है
अर्थात् श्येनक्रियाको साक्षात् पापजनकता नहींहै. एवं श्येनक्रियाको विधिविहित
होनेसे यद्यपि साक्षात् पापजनकता नहींहै तथापि परम्परा उत्पन्न होनेवाले
भाविपापको चिन्तन कर सत्पुरुष श्येनादिक्रिया करनेमेंभी प्रवृत्त नहीं होते.
परिच्छेदः ५ ] भाषाटीकासमेता. ३०७
आचार्यास्तु आप्ताभिप्रायो विध्यर्थः'पाकं कुर्याः' इत्यादावाज्ञा-
दिरूपेच्छावाचित्ववल्लिङ्मात्रस्येच्छावाचित्वं लाघवात् । एवं
च 'स्वर्गकामो यजेत'इत्यादौ यागः स्वर्गकामकृतिसाध्यतया-
ऽऽप्तेष्ट इत्यर्थः।
भाषा-आर उदयनाचार्य तो आप्तवक्ताके अभिप्रायको विध्यर्थ मानतेहैं; जैसे
"पाकं कुर्याः" इत्यादि वाक्यमें लिङ्को आज्ञादिरूप इच्छावाचकत्व है, वैसेही
लाघवसे सर्वत्र लिङ्मात्रको इच्छावाचकत्व है. एवं " स्वर्गकामो यजेत " इत्यादि
स्थलमें याग स्वर्गकी कामनावाले पुरुषकी कृतिसाध्यतारूपेण आप्तवक्ताकी इच्छाका
विषय है ऐसा वाक्यार्थबोध होता है.
ततश्चाप्तेष्टत्वेनेष्टसाधनत्वादिकमनुमाय प्रवर्तते । कलञ्जभक्ष-
णादौ तदभावान्न प्रवर्तते ।
भाषा-( ततश्च ) उस बोधानन्तर अधिकारी पुरुषकी आप्त इच्छा विषयत्वरूप
हेतुसे स्वेष्टसाधनताके अनुमानद्वारा यागादि क्रियामें प्रवृत्ति होती है अर्थात् विधि-
वाक्यार्थबोधसे पीछे अधिकारी पुरुष "यागो मम स्वर्गकामस्य बलवदनिष्टाननुबन्धीष्ट-
साधनं मत्कृतिसाध्यतया आप्तेनेष्यमाणत्वात् मन्मात्रकृतिसाध्यतयेष्यमाणमद्भोज-
नवत् " इत्याकारक अनुमानद्वारा यागादिक्रियामें प्रवृत्त होताहै.एवं कलञ्जादिके
भक्षणमें अधिकारी पुरुषको आप्त इष्टत्वाभावप्रयुक्त स्वेष्टसाधनत्वज्ञानकाभी अभाव है
अर्थात् ऐसे स्थलमें ' नञ् ' से निषिध्यमाण आप्ताभिप्रायरूप विध्यर्थ अधिकारीको
स्वेष्टसाधनताका अनुमापकभी नहीं होता.
यस्तु वेदे पौरुषेयत्वं नाभ्युपैति तं प्रति विधिरैव तावद्दर्भ इव
श्रुतिकुमार्याः पुंयोगे मानम् ।
शंका-वेदगत लिङादिद्वारा किसकी इच्छाका बोध होगा ? क्योंकि वह अपौ-
रुषेय वाक्य है,उसका आद्यवक्ता कोई नहीं है.समाधान-जो पुरुष वेदको पौरुषेय
अर्थात् पुरुषप्रणीत नहीं मानता है"तंमति तावत्कुमार्य्याः पुंयोगे गर्भ इव श्रुतिकुमार्य्या
पुंयोगे विधिरेव मानम्-अर्थात् जैसे कुमारीकन्याको गर्भवती देखकर उसके पुरुषसंसर्गका
अनुमान होता है वैसेही वेदवचनोंको विधिगर्भित देखकर पुरुषसंसर्गका अनुमान है.
भाव यह कि-वक्तासे भिन्न इच्छाके बोधनमें विधिका सामर्थ्यही नहीं है इसलिये
विधिवाक्यही वेदोच्चारक ईश्वरमें प्रमाणरूप है.
प्रा?
- Wait, no, look at the letter between
वाandप्रा: - Wait, is it
द्? - Wait! Look at
दwith virama:द्? - Wait, let's look at
द्inवाद्प्रा: - Actually, look closely:
भ्रमादिसंभवा- thenद्- wait, is there aद्? - Ah, look:
वाfollowed byदwith viramaद्and thenप्रामाण्यं? - Wait, why would it be
द्प्रामाण्यं? "भ्रमादिसंभवात् प्रामाण्यं स्यात्"?? NO! - "भ्रमादिसंभवात् अप्रामाण्यं स्यात्" -> if it's authored by a person, since errors are possible, it would be unauthoritative (apramanya).
- In sandhi:
भ्रमादिसंभवात्+अप्रामाण्यं=भ्रमादिसंभवादप्रामाण्यं. - Wait, is that a
दorद्प्रा? - Let's look at the letter:
दfollowed byपwith्रandा=प्रा? - Wait, why is there a `प
परिच्छेदः ५ ] भाषाटीकासमेता. ३०९
वेदको अप्रामाण्यापत्ति होगी. समाधान-वेदप्रोक्ता पुरुष ईश्वर नित्यसर्वज्ञ है
इसलिये निर्दोष है, एवं नित्य सर्वज्ञ पुरुषप्रणीत होनेसे वेदभी निर्दोष है; सिवाय
ईश्वरके और कोई सर्वज्ञ नहींहै. ( अतएव ) इसीलिये कपिलादि ऋषियोंकोभी
वेदके कर्त्ता मानना उचित नहीं; क्योंकि विना ईश्वरके पुरुषान्तरमें भ्रमादिका
सम्भव होसकताहै.
किंच वर्णानामेवानित्यत्वस्य वक्ष्यमाणत्वात् सुतरां तत्सन्दर्भ-
स्य वेदस्यानित्यत्वमिति संक्षेपः ॥ १५० ॥
भाषा-(किञ्च)आगे कथनीय युक्तिसे हमने अकारादि वर्णोंहीको अनित्य सिद्ध
करनाहै तो वर्णसन्दर्भ अर्थात् वर्णगत आनुपूर्वी विशेषरूप वेदभी स्वयं अनित्य सिद्ध
हागे. ( इति संक्षेपः) यह संक्षेपसे विध्यर्थका प्रतिपादन कियाहै ॥ १५०॥
उपादानस्येति । उपादानस्यं समवायिकारणस्याध्यक्षं प्रत्यक्षं
च प्रवृत्तौ कारणमिति ।
भाषा-उपादानका अर्थात् समवायिकारणका साक्षात्कार प्रवृत्तिमें कारण है.
निवृत्तिस्तु भवेद्द्वेषाद्दिष्टसाधनताधियः ॥ १५१ ॥
भाषा-द्वेषविषय दुःखादि साधनताविषयक ज्ञानसे होनेवाले द्वेषसे पुरुषकी
निवृत्ति होती है ॥ १५१ ॥
निवृत्तिरिति । द्विष्टसाधनताज्ञानस्य दुःखसाधनविषयकनिवृत्तिं
प्रति जनकत्वमन्वयव्यतिरेकादवधारितमिति भावः ॥ १५१ ॥
भाषा-भाव यह कि ( द्विष्ट ) द्वेषविषय दुःखादि साधनताज्ञानको दुःखसाधन
विषयक निवृत्तिके प्रति जनकता अन्वयव्यतिरेकसे निश्चित है ॥ १५१ ॥
यत्नो जीवनयोनिस्तु सर्वदाऽतीन्द्रियो भवेत् ॥
शरीरे प्राणसञ्चारे कारणं स प्रकीर्तितः ॥१५२॥
भाषा-जीवनयोनि अर्थात् जीवके जीवनका कारणीभूत यत्न सर्वदा अतीन्द्रिय
है, और वही शरीरके भीतर प्राणसंचारमें कारण है ॥ १५२ ॥
यत्न इति । जीवनयोनियत्नो यावज्जीवनमनुवर्तते,स चातीन्द्रिय-
स्तत्र प्रमाणमाह।शरीर इति।प्राणसञ्चारो ह्यधिकश्वासादिः प्रयत्न-
साध्यः।इत्थं च प्राणसञ्चारस्य सर्वस्य यत्नसाध्यत्वानुमानात्प्रत्य-
क्षप्रयत्नबाधाच्चातीन्द्रिययत्नसिद्धिः,स एव जीवनयोनिः प्रयत्नः १५२
३१० न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ गुण-
भाषा-जीवनेके कारणीभूत प्रयत्नका अनुवर्तन जबतक जीव जीता रहे तबतक
होता रहता है, वह प्रयत्न अतीन्द्रिय है. उसमें'शरीरे'इत्यादि मूलसे प्रमाण कहतेहैं.
अधिक श्वास प्रश्वासादि प्राणसंचार प्रयत्नसाध्य अनुभवसिद्ध है . ( इत्थञ्च ) एवं
दृष्टान्तसिद्ध हुआ तो “ यावत् प्राणिशरीराभ्यन्तरप्राणसञ्चारः भोक्तृप्रयत्नजन्यः
धावनादिप्रयत्नोत्कर्षेण श्वासक्रियोत्कर्षदर्शनात् मदीययत्नोत्कर्षसाध्यमच्छासक्रियो-
त्कर्षवत् ” इत्यादि अनुमानसे यावत् प्राणसंचारमें यत्न साध्यत्वसिद्ध हुआ तो
प्रत्यक्षयत्नके बाधित होनेसे अतीन्द्रययत्नकी सिद्धिहुई वही प्रयत्न जीवनका कारणीभूतहै.
गुरुत्वं निरूपयति, अतीन्द्रियमिति-
भाषा-एवं 'अतीन्द्रिय' इत्यादि ग्रन्थसे मूलकार गुरुत्वका निरूपण करतेहैं-
अतीन्द्रियं गुरुत्वं स्यात्पृथिव्यादिद्वये तु तत् ॥
अनित्ये तदनित्यं स्यान्नित्ये नित्यमुदाहृतम् १५३
तदेवासमवायि स्यात्पतनाख्ये तु कर्मणि ॥
भाषा-(गुरुत्व) अर्थात् भारीपन अतीन्द्रय है, पृथिवी जल दोनोंमें रहताहै.घटादि
अनित्योंमें वह गुरुत्व अनित्य है और परमाणुओंमें नित्य है ॥ १५३ ॥ वही गुरुत्व
आद्यपतनरूप क्रियामें असमवायिकारण है.
अनित्येति,अनित्येद्व्यणुकादौ तद्गुरुत्वमनित्यं नित्ये परमाणौ नित्यं,
गुरुत्वमित्यनुवर्तते। तद् गुरुत्वम्।असमवायि असमवायिकारणम् ।
पतनाख्ये इति आद्यपतन इत्यर्थः।
भाषा-अर्थात् अनित्यद्व्यणुकादिकोंमें वह गुरुत्व अनित्य है और नित्य परमा-
णुओंमें वह नित्य है ' नित्येनित्यं'इस मूलमें गुरुत्वपदकी अनुवृत्ति करलेनी. 'तत्'
पदसे गुरुत्वका ग्रहण है. ' असमवायि ' पदसे असमवायिकारणका ग्रहण है. एवं
' पतन ' पदसे आद्यपतनका ग्रहण है.
द्रवत्वं निरूपयति, सांसिद्धिकमिति-
भाषा-एवं ' सांसिद्धिक ' इत्यादि ग्रन्थसे मूलकार द्रवत्वका निरूपण करतेहैं-
सांसिद्धिकं द्रवत्वं स्यान्नैमित्तिकमथापरम् ॥१५४॥
भाषा-एक सांसिद्धिक अर्थात् स्वाभाविक द्रवत्व है और दूसरा नैमित्तिक
है ॥ १५४ ॥
परिच्छेदः ५ ] भाषाटीकासमेता. ३११
द्रवत्वं द्विविधं सांसिद्धिकं नैमित्तिकं च ॥ १५४ ॥
भाषा-वह द्रवत्व सांसिद्धिक तथा नैमित्तिक भेदसे दो प्रकारका है.
सांसिद्धिकं तु सलिले द्वितीयं क्षितितेजसोः ॥
परमाणौ जले नित्यमन्यत्रानित्यमिष्यते ॥ १५५ ॥
द्वितीयंनैमित्तिकम् ।
भाषा-उनमें स्वाभाविक तो जलहीमें है और नैमित्तिक पृथिवी तथा तेज-
दोनोंमें है. वह द्रवत्व केवल जलके परमाणुओंमें तो नित्य है और अन्यत्र सर्वत्र
अनित्य है ॥ १५५ ॥
परमाणविति।जलपरमाणौ द्रवत्वं नित्यमित्यर्थः।अन्यत्रपृथिवी
परमाण्वादौ जलद्व्यणुकादौ च द्रवत्वमनित्यं कुत्रचित्तेजसि
कुत्रचित्पृथिव्यां च नैमित्तिकं द्रवत्वम् ॥ १५५ ॥
भाषा-उसमें जलीय परमाणुओंमें द्रवत्व नित्य है और अन्यत्र पार्थिवपरमाणु
आदिकोंमें तथा जलीय द्व्यणुकादिकोंमें वह द्रवत्व अनित्य है. कहीं स्वर्णादि तेजमें
और कहीं घृतलाक्षादि पृथिवीमें वह द्रवत्व नैमित्तिक है ॥ १५५ ॥
तत्र को वा नैमित्तिकार्थस्तद्दर्शयति । नैमित्तिकमिति-
भाषा-वहां 'नैमित्तिक' शब्दका अर्थ क्या है उसीको 'नैमित्तिक' इत्यादि-
मूलसे दिखलातेहैं-
नैमित्तिकं वह्नियोगात्तपनीयघृतादिषु ॥
द्रवत्वं स्यन्दने हेतुर्निमित्तं संग्रहे तु तत् ॥ १५६ ॥
भाषा-नैमित्तिक द्रवत्व अग्निसंयोगसे तपेहुए घृतादिकोंमें प्रतीत होताहै. वह
द्रवत्व स्यन्दनमें हेतु है अर्थात् असमवायिकारण है और चूर्णादिके पिण्डीभावमें
(तत्) वही द्रवत्व निमित्त कारण है ॥ १५६ ॥
वह्नीतिपदं तेजोऽर्थकम् । तथा च तेजःसंयोगजन्यं नैमित्तिकं
द्रवत्वम्।तच्च सुवर्णादिरूपे तेजसि घृतजतुप्रभृतिपृथिव्यां च वर्तत
इत्यर्थः । द्रवत्वं स्यन्दन इति । असमवायिकारणमित्यर्थः।संग्रहे
सक्तुकादिसंयोगविशेषे । तेन तद्द्रवत्वं स्नेहसहितमिति बोद्ध-
व्यम् । तेन द्रुतसुवर्णादीनां न संग्रहः ॥ १५६ ॥
३१२ न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ गुण-
भाषा-मूलमें 'वह्नि' पद तेज मात्रका वाचक है; एवं तेजसंयोगजन्यका
नाम नैमित्तिकद्रवत्व सिद्ध हुआ. वह नैमित्तिकद्रवत्व स्वर्णादिरूप तेजमें और
घृतलाक्षादि पृथिवीमें रहता है. वह द्रवत्व स्यन्दनरूपाक्रियामें असमवायिकारण है.
और संग्रहमें अर्थात् सक्तुआदिके परस्पर मिलापविशेषमें वह द्रवत्व निमित्तकारण
है; परन्तु सक्तु आदिके मिलापमें निमित्ततास्नेहसहित द्रवत्वको जाननी चाहिये.
एवं द्रुतस्वर्णादिका संग्रह न हुआ अर्थात् द्रुतस्वर्णादिमें द्रवत्वके होनेसे उसमें
चूर्णादिके पिण्डीभावकी आपत्ति नहीं हुई; क्योंकि स्वर्णादिमें स्नेहसहित द्रवत्व
नहींहै ॥ १५६ ॥
स्नेहं निरूपयति, स्नेहो जल इति-
भाषा-एवं 'स्नेहः' इत्यादि ग्रन्थसे मूलकार स्नेहका निरूपण करतेहैं-
स्नेहो जले स नित्योऽणावनित्योऽवयविन्यसौ ॥
तैलान्तरे तत्प्रकर्षाद्दहनस्यानुकूलता ॥ १५७ ॥
भाषा-स्नेहगुण केवल जलमात्रमें रहताहै और जलीयपरमाणुओंमें वह नित्य
है; अन्यत्र द्व्यणुकादिकोंमें अनित्य है. तैलके बीचमें उसकी प्रकर्षतासे दहनकी
अनुकूलता है ॥१५७ ॥
जलइति, जल एवेत्यर्थः। असौ स्नेहः । ननु पृथिव्यामपि तैले स्नेह
उपलभ्यते न चासौ जलीयस्तथासति दहनप्रातिकूल्यं स्यादत
आह । तैलान्तर इति। तत्प्रकर्षात्स्नेहप्रकर्षात् तैल उपलभ्यमा-
नः स्नेहोऽपि जलीय एव, तस्य प्रकृष्टत्वादग्नेरानुकूल्यम्, अप-
कृष्टस्नेहं हि जलं वह्निं नाशयतीति भावः ॥ १५७ ॥
भाषा-स्नेह जलहीमें रहताहै. 'असौ' पदसे स्नेहका ग्रहण है. शंका-तैलरूपा
पृथिवीमेंभी स्नेह प्रतीत होताहै परन्तु वह स्नेह जलका नहींहै, क्योंकि यदि जलका
होय तो अग्निका विरोधी हुआ चाहिये? समाधान-इसका उत्तर 'तैलान्तरे'इत्यादि
ग्रन्थसे मूलकार स्वयं देतेहैं. मूलमें 'तत्प्रकर्ष' शब्दसे स्नेहप्रकर्षका ग्रहण है. तेलमें
प्रतीत होनेवाला स्नेहभी जलहीका है उसको प्रकृष्ट होनेसे अर्थात् अति उत्कट
होनेसे अग्निकी अनुकूलता है. भाव यह कि-अपकृष्ट स्नेहवाला जलही अग्निका
नाशक है, तैल नहीं ॥ १५७ ॥
संस्कारं निरूपयति, संस्कारेति-
भाषा-एवं 'संस्कारभेद'इत्यादि ग्रन्थसे मूलकार संस्कारोंका निरूपण करते हैं-
परिच्छेदः ५ ] भाषाटीकासमेता. ३१३
संस्कारभेदो वेगोऽथ स्थितिस्थापकभावने ॥
मूर्तमात्रे तु वेगः स्यात्कर्मजो वेगजः क्वचित् ॥१५८॥
भाषा-वेग, स्थितिस्थापक, तथा भावनाख्यभेदसे संस्कार तीन प्रकारका है.
उनमें वेगाख्य संस्कार तो मूर्तपदार्थमात्रमें रहताहै; वह वेगाख्य संस्कार किसी
स्थलमें क्रियासे उत्पन्न होताहै और किसी स्थलमें वेगसे उत्पन्न होताहै ॥ १५८ ॥
संस्कारेति । वेगस्थितिस्थापकभावनाभेदात् संस्कारस्त्रिविध
इत्यर्थः । मूर्तमात्र इति । कर्मजवेगजभेदाद्वेगो द्विविध इत्यर्थः ।
शरीरादौ हि नोदनजनितेन कर्मणा वेगो जन्यते, तेन च पूर्वकर्म,
नाशस्तत उत्तरकर्म । एवमग्रेऽपि ।
भाषा--वेग, स्थितिस्थापक, तथा भावना इन भेदसे संस्कार तीन प्रकारके हैं. (मूर्त
मात्रे इति ) कर्मजन्य तथा वेगजन्य इस भेदसे वेगाख्यसंस्कार फिर दोप्रकारका है.
बाणादिकोंमें नोदनसे उत्पन्न हुई क्रियासे वेग उत्पन्न होताहै. ( तेनच ) उस वेगसे
पूर्व क्रियाका नाश होता है उस पूर्वकर्मनाशके अनन्तर फिर उत्तर क्रिया होती है.
ऐसेही आगे २ जबतक बाणादिका उत्तरसंयोग न होय तबतक पूर्व २ कर्मका नाश-
क वेगहीको समझना चाहिये. भाव यह कि-कर्मका नाशक उत्तरसंयोग तो उसका-
लमें हैही नहीं; इसलिये पूर्व पूर्व कर्मनाशकता वेगहीमें कल्पना करी जातीहै ऐसेही
उत्तर २ कर्मसेभी पूर्व २ वेगका नाश होता है उस पूर्व वेगनाशके अनन्तर
वेगान्तरकी उत्पत्ति होती है. यही ‘ एवमग्रेपि ’ इस ग्रन्थका तात्पर्य है-ऐसे स्थल
में कर्मका कोई नाशकान्तर तो हैही नहीं.
विना च वेगं कर्मणः कर्मप्रतिबन्धकत्वात् पूर्वकर्मनाश उत्तरकर्मो-
त्पत्तिश्च न स्यात् । यत्र वेगवता कपालेन जनिते घटे वेगो
जन्यते स वेगजो वेगः ॥ १५८ ॥
भाषा-इसलिये वेगसे बिना अर्थात् यदि वेगको नाशक न मानें तो पूर्व कर्म
का नाश नहीं होना चाहिये और उत्तरकर्मकी उत्पत्तिभी नहीं हुई चाहिये; क्योंकि
पूर्वकर्म उत्तरकर्म उत्पत्तिका प्रतिबन्धक है. एवं जहां वेगवाले कपालादिसे उत्पन्न
हुए घटादिमें वेग उत्पन्न हुआहै वह वेगज वेग है ॥ १५८ ॥
स्थितिस्थापकसंस्कारः क्षितौ केचित्चतुर्ष्वपि ॥
अतीन्द्रियोऽसौविज्ञेयः क्वचित्स्पन्देऽपिकारणम् १५९
२५
३१४ न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ गुण-
भाषा-स्थितिस्थापकाख्य संस्कार केवल पृथिवीहीमें रहता है; परन्तु कई
लोग इसको पृथिवीआदि चारोंमें मानतेहैं. वह स्थितिस्थापकाख्य संस्कार सर्वथा
अतीन्द्रय है और किसी २ स्थलमें स्पन्दरूप क्रियाकाभी कारण है ॥ १५९ ॥
स्थितिस्थापकेति । आकृष्टशाखादीनां परित्यागे पुनर्गमनस्य
स्थितिस्थापकसाध्यत्वात् । केचिदिति । चतुर्षु क्षित्यादिषु
स्थितिस्थापकं केचिन्मन्यन्ते तदप्रमाणमिति भावः । असौ
स्थितिस्थापकः । क्वचिदाकृष्टशाखादौ ॥ १५९ ॥
भाषा-वृक्षकी शाखादिको खैंचकर छोड़ दिया जाय तो उसका फिर पूर्ववत्
अवस्थान होजाता है वह आकृष्टशाखादिका प्रथमवत् अवस्थान स्थितिस्थापक-
संस्कारजन्य है. उस स्थितिस्थापक संस्कारको कई लोग पृथिवीआदि चारोंमें
रहनेवाला मानतेहैं; परन्तु ऐसा मानना उनका सर्वथा अप्रमाणक है मूलगत
' असौ ' पदसे स्थितिस्थापकसंस्कारका ग्रहण है और ' क्वचित् ' पदसे आकृष्ट-
शाखादिका ग्रहण है ॥ १५९ ॥
भावनाख्यस्तु संस्कारो जीववृत्तिरतीन्द्रियः ।
उपेक्षानात्मकस्तस्य निश्चयः कारणं भवेत् ॥१६०॥
भाषा-एवं भावनाख्यसंस्कार प्राणीमात्रमें रहता है और अतीन्द्रिय है
अर्थात् उसका किसी इन्द्रियद्वारा ग्रहण नहीं होता. उपेक्षाअनात्मक निश्चय
अर्थात् वस्तुविषयक दृढ बोध ( तस्य ) उस संस्कारका कारणीभूत है ॥ १६०॥
भावनाख्य इति । तस्य संस्कारस्य । उपेक्षात्मकज्ञानात् सं-
स्कारानुत्पत्तेरुपेक्षानात्मकइत्युक्तम् । तत्संशयात् संस्कारानु-
त्पत्तेर्निश्चय इत्युक्तम् । तेनोपेक्षान्यनिश्चयत्वेन संस्कारं प्रति
हेतुतेति भावः ।
भाषा-तस्य-इस मूलगतपदसे संस्कारोंका ग्रहण है. वस्तुविषयक ' उपेक्षात्मक '
ज्ञानसे अर्थात् वस्तुको दत्तचित्त होकर न ग्रहण करनेसे संस्कार उत्पन्न नहीं होता;
इसलिये मूलमें ' उपेक्षानात्मक ' यह निश्चयका विशेषण कहा है. ( तत् ) उपे-
क्षानात्मक संशयसेभी संस्कार उत्पन्न नहीं होता इसलिये संशयसाधारणज्ञानको
त्यागकर मूलमें ' निश्चय ' पदका निवेश किया है. एवं उपेक्षात्मक ज्ञानसे अन्य
जो निश्चयात्मक ज्ञान तादृश ज्ञानत्वेन संस्कारोंके प्रति कारणता है.
परिच्छेदः ५ ] भाषाटीकासमेता । ३१५
ननु स्मरणं प्रत्युपेक्षाऽन्यनिश्चयत्वेन हेतुत्वं तेनोपेक्षादिस्थले न
स्मरणमित्थं च संस्कारं प्रति ज्ञानत्वेनैव हेतुताऽस्त्विति चेत् ।
न । विनिगमनाविरहेण संस्कारं प्रत्यप्युपेक्षाऽन्यनिश्चयत्वेन हेतु-
तायाः सिद्धत्वात् ।
शंका-स्मरणात्मक ज्ञानके प्रति उपेक्षाऽन्य निश्चयत्वेन हेतुता है इसीलिये
उपेक्षात्मकज्ञानस्थलमें स्मरणात्मक ज्ञान नहीं होता. ( इत्थञ्च ) इस रीतिसे स्मृति
ज्ञानके प्रति उपेक्षानात्मक निश्चयत्वेन कारणता सिद्ध हुई तो संस्कारके प्रति
ज्ञानत्वरूप साधारण धर्मसेभी कारणता मान लीजाय तो हानि क्या है ?
समाधान--विनिगमनाविरहसे अर्थात् एकत्र पक्षपातिनी युक्तिके अभावसे
संस्कारोंके प्रतिभी उपेक्षानात्मक निश्चयत्वेन कारणता स्वयं सिद्ध है इसलिये
ज्ञानत्वेन कारणता माननी उचित नहीं;
किंचोपेक्षास्थले संस्कारकल्पनाया गुरुत्वात् संस्कारं प्रति
चोपेक्षान्यत्त्वेन हेतुतायाः सिद्धत्वात् ॥ १६० ॥
भाषा-(किञ्च) वस्तुतः विचार किया जाय तो संस्कारोंके प्रतिही उपेक्षाऽन्य-
निश्चयत्वेन कारणता माननेमें विनिगमक प्रतीत होता है; क्योंकि यदि ऐसा नहीं
माना जाय तो उपेक्षात्मक ज्ञानस्थलमें संस्कारोंकी एक अधिक गुरुभूत कल्पना
करनी होगी और संस्कारोंके प्रति तो उपेक्षाऽन्यनिश्चयत्वेन हेतुता अन्वयव्यतिरेकसे
सिद्धही है ॥ १६० ॥
तत्र प्रमाणं दर्शयति । स्मरण इति-
भाषा-'स्मरणे' इत्यादि ग्रन्थसे मूलकार ( तत्र ) संस्कारमें प्रमाण दिखलातेहैं--
स्मरणे प्रत्यभिज्ञायामप्यसौ हेतुरुच्यते ॥
भाषा-स्मरणात्मक ज्ञानमें तथा प्रत्यभिज्ञात्मक ज्ञानमें यह संस्कार कारणीभूत है.
असौ संस्कारः। यतः स्मरणं प्रत्यभिज्ञानं च जनयत्यतः संस्कारः
कल्प्यते । विना व्यापारं पूर्वानुभवस्य स्मरणादिजननासा-
मर्थ्यात्, स्वस्वव्यापारान्यतराभावे कारणत्वासम्भवात् ।
भाषा-मूलगत 'असौ' पदसे संस्कारोंका ग्रहण है पूर्व दृष्टवस्तुविषयक अनुभव
कालान्तरमें उसी वस्तुके स्मरणका तथा प्रत्यभिज्ञानका जनक होता है; इसलिये
मध्यमें व्यापाररूपसे संस्कारोंकी कल्पना होतीहै संस्कारात्मकव्यापारसे विना पूर्वा-
३१६ न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ गुण-
नुभवको स्मरणादिज्ञान जननमें सामर्थ्य नहींहै; क्योंकि कार्योत्पत्तिसे अव्यवहित
पूर्वक्षणमें ( स्व ) कारण ( स्वव्यापार ) कारणव्यापार अन्यतरके न होनेसे कारणमें
कारणत्व धर्मका होनाही असम्भव है. भाव यह कि-कार्याव्यवहितपूर्वक्षणवृत्ति कारण
कारणव्यापारान्यतरत्वहीका नाम ' कारणतापदार्थ 'है.
नच प्रत्यभिज्ञां प्रति तत्तत्संस्कारस्य हेतुत्वे प्रत्यभिज्ञायाः सं-
स्कारजन्यत्वेन स्मृतित्वापत्तिरिति वाच्यम्, अप्रयोजकत्वात् ।
परे त्वनुद्बुद्धसंस्कारात् प्रत्यभिज्ञानुदयादुद्बुद्धसंस्कारस्य हे-
तुत्वापेक्षया तत्तत्स्मरणस्यैव प्रत्यभिज्ञां प्रति हेतुत्वं कल्प्यत
इत्याहुः ।
शंका-संस्कारजन्य स्मृत्यात्मक ज्ञान होता है एवं तत्तदनुभवजन्य संस्कारोंको
यदि प्रत्यभिज्ञात्मक ज्ञानके प्रतिभी कारणता है तो संस्कारजन्यत्वेन प्रत्यभिज्ञात्मक
ज्ञानकोभी स्मृतिरूपही होना चाहिये समाधान-यह कथन आपका अप्रयोजक है
अर्थात् संस्कारजन्यत्वका स्मृतित्वके साथ अन्वयव्यतिरेक कहनेके लिये आपके पास
कोई अनुकूलतर्क नहीं है; ( परंतु ) और चिन्तामणिकार तो यह कहतेहैं कि-अनुद्बु-
द्ध संस्कारोंसे प्रत्यभिज्ञात्मक ज्ञानका उदय होना दुर्घट है; इसलिये उद्बुद्धसंस्कारोंही
को हेतुता कहनी होगी. एवं उद्बुद्ध संस्कारोंमें हेतुता माननेकी अपेक्षा तत्तद्वस्तु
विषयक स्मरणहीको प्रत्यभिज्ञात्मक ज्ञानके प्रति हेतुता कल्पना करनेमें लाघव है.
अदृष्टं निरूपयति, धर्माधर्माविति-
भाषा- 'धर्माधर्म' इत्यादि ग्रन्थसे मूलकार अदृष्टका निरूपण करते हैं-
धर्माधर्मावदृष्टं स्याद्धर्मः स्वर्गादिसाधनम्॥१६१॥
गङ्गास्नानादियागादिव्यापारः स तु कीर्तितः ॥
कर्मनाशाजलस्पर्शादिना नाश्यस्त्वसौ मतः॥१६२॥
भाषा-धर्म अधर्म दोनोंका नाम ' अदृष्ट ' है. उनमें स्वर्गादिके साधनका नाम
' धर्म ' है ॥ १६१ ॥ वह धर्म :गङ्गास्नानादिका तथा यागादिका व्यापाररूप
कहा है. 'कर्मनाशा'नामक नदीके जलस्पर्शादिसे उस धर्मका नाश मानाहै॥१६२॥
स्वर्गादिसकलसुखानां स्वर्गसाधनीभूतशरीरादीनां च साधनं
धर्म इत्यर्थः । तत्र प्रमाणं दर्शयितुमाह । यागादीति । यागादि-
व्यापारतया हि धर्मः कल्प्यते । अन्यथा यागादीनां चिरविन-
परिच्छेदः ६ ] भाषाटीकासमेता. ३१७
ष्टतया निर्व्यापारतया च कालान्तरभाविस्वर्गजनकत्वं न स्या-
त् । तदुक्तमाचार्यैः । “ चिरध्वस्तं फलायालं न कर्मातिशयं
विना ” इति ।
भाषा-स्वर्गादि यावत् सुखोंका तथा स्वर्गके साधनीभूत शरीरादिका कारण एक
धर्मही है; उस धर्ममें “ यागादिकं धर्मादिव्यापारवत् वेदबोधितस्वर्गसाधनत्वात् ”
इत्यादि अनुमानप्रमाणप्रदर्शनार्थ मूलकार ‘ यागादि ’ इस ग्रन्थको कहते हैं अर्थात्
यागादिके व्यापाररूपसेही धर्मकी कल्पना होसकतीहै; अन्यथा मध्यमें व्यापाररू-
पेण धर्मस्वीकार न किया जाय तो चिरकाल विनष्ट हुए यागादि विना व्यापारके
कालान्तरमें होनेवाले स्वर्गके जनक कदापि नहीं होसकेंगे, इसी वार्त्ताको उदयना-
चार्यजीनेभी कहाहै कि-“चिरकाल विनष्ट हुआ कर्म विना अपूर्वसे फलजननमें समर्थ
नहीं होता”-इति ।
ननु यागध्वंस एव व्यापारः स्यात्, न च प्रतियोगिध्वंसयोरेकत्रा-
जनकत्वम्, सर्वत्र तथात्वे मानाभावात्, न च तन्मते फलानन्त्यं,
मन्मते चरमफलस्यापूर्वनाशकत्वान्न तथात्वमिति वाच्यम्, का-
लविशेषस्य सहकारित्वादित्यत आह । गङ्गास्नानेति । गङ्गास्ना-
नस्य हि स्वर्गजनकत्वेऽनन्तानां जलसंयोगध्वंसानां व्यापारत्व-
मपेक्ष्यैकमपूर्व कल्प्यते लाघवादिति भावः ।
शंका-मध्यमें धर्मको व्यापार माननेकी अपेक्षा यागके ध्वंसहीको व्यापार
मानलिया जाय तो हानि क्या है ? यदि कहो कि-‘प्रतियोगिको तथा प्रतियोगिके
ध्वंसको एकत्र जनकता अप्रसिद्ध है’ तो यह कथनभी युक्त नहीं क्योंकि सर्वत्र
( तथात्वे ) प्रतियोगि तथा प्रतियोगिके ध्वंसको एकत्र जनकत्वाभावमें कोई प्रमाण
नहीं है और यदि कहो कि-‘यागध्वंसको व्यापार माननेवालेको फल आनन्त्य मानना
होगा’ यह अनुचित है और धर्मको व्यापार माननेवालेको तो फलानन्त्यरूप
दोष नहींहै; क्योंकि उसने अन्तिम फलको धर्मरूप अपूर्वका नाशक मानाहै तो यह
कथनभी युक्त नहीं; क्योंकि कालविशेषको फलविशेषमें सहकारी मानकर फलान-
न्त्यरूप दोषका वारण होसकताहै ? समा०-इसका उत्तर ‘ गंगास्नान ’ इत्यादि
ग्रन्थसे मूलकार स्वयं देतेहैं. भाव यह कि-ध्वंसको व्यापार माननेवालेको गंगास्ना-
नको स्वर्गजनकता माननेमें मध्यमें अनन्तजलसंयोगोंकी ध्वंसको व्यापार मानना
होगा, उनकी अपेक्षा मध्यमें अपूर्वकी कल्पना करनेमें अतिलाघव है.
३१८ न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- गुण-
ननु ध्वंसोऽपि न व्यापारोऽस्तु, न च निर्व्यापारस्य चिरध्वस्त-
स्य कथं कारणत्वमिति वाच्यम्, अनन्यथासिद्धनियतपूर्ववर्ति-
त्वस्य तत्रापि सत्त्वात्, अव्यवहितपूर्ववर्तित्वं हि चक्षुःसंयोगा-
देः कारणत्वे न तु सर्वत्र कार्यकालवृत्तित्वमिव समवायिकार-
णस्य कारणत्व इत्यत आह, कर्मनाशेति ।
शंका-यदि ऐसाहै तो ध्वंसकोभी व्यापार मत मानो; एवं कारणके मध्यमें कहींभी
व्यापार माननेकी आवश्यकता नहींहै. यदि कहो कि-निर्व्यापार चिरविनष्ट यागादि
क्रियासे स्वर्गादिकारणता कैसे होगी ? तो कारणता नाम 'अनन्यथासिद्धत्वे
सति कार्यनियतपूर्ववर्तित्व ' मात्रका है; सो ऐसी कारणता यागादिमेंभी
विद्यमान है. अव्यवहित पूर्ववर्तित्वरूप धर्म चक्षुःसंयोगादिगत कारणताका घटक है
अर्थात् यदि रूपादि साक्षात्कारके प्रति चक्षुःसंयोगादिको कारणता कहनी होय तो
ऐसे स्थलमें अव्यवहित पूर्ववर्तित्वका निवेश करना उचित है. सर्वत्र उसका कुछ उप-
योग नहीं; जैसे समवायिकारणगत कारणताका कार्यकालवृत्तित्वघटक है, सर्वत्र नहीं.
समाधान-इसका उत्तर ' कर्मनाशा ' इत्यादि ग्रन्थसे मूलकार स्वयं देतेहैं.
यदि ह्यपूर्वं न स्यात्तदा कर्मनाशाजलस्पर्शादिना नाश्यत्वं ध-
र्मस्य न स्यात् । न हि तेन यागादिनाशः प्रतिबन्धो वा कर्तुं-
शक्यते, तस्य पूर्वमेव वृत्तत्वादिति भावः ।
भाषा-यदि यागादिजन्य धर्मात्मक अपूर्व न होय तो कर्मनाशाजलस्पर्शादिसे उसका
नाशभी नहीं हुआचाहिये, परन्तु नाश होना तो शास्त्रसिद्धहै और कर्मनाशाजलके स्प-
र्शादिसे यागादिका नाश वा उसका प्रतिबन्ध तो कहही नहीं सकते;क्योंकि यागादिका
कर्मनाशा जलस्पर्शसे पूर्ववृत्तित्व है अर्थात् यागक्रिया बहुतकाल प्रथम होचुकी है;
इसलिये भिन्नकालीन पदार्थोंका परस्पर प्रतिबध्यप्रतिबन्धकभाव या नाश्यनाशक-
भाव कहना उचित नहीं.
एतेन देवताप्रीतिरेव फलमित्यपास्तम् । गङ्गास्नानादौ सर्वत्र
देवताप्रीतेरसम्भवात् देवतायाश्चेतनत्वेऽपि तत्प्रीतेरनुद्देश्य-
त्वात्, प्रीतेः सुखस्वरूपत्वेन विष्णुप्रत्यादौ तदसम्भवात् ।
जन्यसुखादेस्तत्राभावात् तेन, विष्णुप्रीतिजन्यत्वेन पराभिमत-
स्वर्गादिरेव विष्णुप्रीतिशब्देन लक्ष्यते ॥ १६१ ॥ १६२ ॥
परिच्छेदः ५ ] भाषाटीकासमेता. ३१९
भाषा-कई विद्वान्लोग यागादि शुभक्रियाका देवताप्रीतिरूपही फल मानतेहैं.
इस पूर्वकथनसे उसकाभी खण्डन किया; क्योंकि गंगास्नानादि सर्वत्र
शुभकार्योंमें देवताप्रीतिका होना असम्भव है. यद्यपि देवता चेतन है इसलिये प्रीति
होनेका सम्भव होसकता है तथापि यागस्नानादिक्रिया कर्त्ताका देवताप्रीति
उद्देश्य नहीं है और ‘ प्रीति ’ नाम सुखविशेषका है, सो विष्णुप्रीतिआदिकोंमें उसका
होना असम्भव है; क्योंकि विष्णुआदिको ईश्वररूप होनेसे उनमें जन्यसुखका अभाव
है; इसलिये ‘विष्णुप्रीति’ शब्दसे विष्णुप्रीतिजन्यत्वेन मीमांसकोंके अभिमत स्वर्गादि-
काही लक्षणया बोध होता है ॥ ६१ ॥ ६२ ॥
अधर्मो नरकादीनां हेतुर्निन्दितकर्मजः ॥
प्रायश्चित्तादिनाश्योऽसौ जीववृत्ती त्विमौ गुणौ १६३
भाषा-नरकादि दुःखके साधनका नाम ‘अधर्म’ है और निषिध्यकर्मोंसे उसकी
उत्पत्ति होती है. प्रायश्चित्तादि आचरणसे उसका नाश होता है. यह धर्माधर्मरूप
दोनों गुण केवल जीवमात्रमें रहतेहैं ॥ ६३ ॥
अधर्मो नरकादीनामिति । नरकादिसकलदुःखानां नारकी-
यशरीरादीनां च साधनमधर्म इत्यर्थः । तत्र प्रमाणमाह, प्राय-
श्चित्तेति । यदि ह्यधर्मो न स्यात्तदा प्रायश्चित्तादिना नाश्यत्वं
न स्यात्।नहि तेन ब्रह्महननादीनां नाशः प्रतिबन्धो वा विधातुं
शक्यते तस्य पूर्वमेव विनष्टत्वादिति भावः । जीवेति । ईश्वरस्य
धर्माधर्माभावादिति भावः ॥ १६३ ॥
भाषा-नरकमें होनेवाले सम्पूर्ण दुःखोंका तथा नारकीय शरीरादिकोंका कारणी-
भूत अधर्म है. ‘ प्रायश्चित्त ’ इत्यादि ग्रन्थसे मूलकार उसमें प्रमाण दिखलातेहैं.
यदि अधर्म कुछ वस्तु न होय तो प्रायश्चित्तादिद्वारा उसके नाशका विधानभी नहीं
हुआ चाहिये. उस प्रायश्चित्तादिसे ब्राह्मणवधादिका नाश अथवा प्रतिबन्ध तो विधान
करही नहीं सकते; क्योंकि ‘ तस्य ’ उस ब्रह्महननादि कर्मका तो पूर्वही विनाश हो
चुका है. मूलगत ‘जीववृत्ति’यह पद कहनेका भाव यह है कि-ईश्वरमें धर्माधर्मादिका
सर्वथा अभाव है ॥ १६३ ॥
इमौ तु वासनाजन्यौ ज्ञानादपि विनश्यतः ॥
भाषा-यह धर्माधर्म दोनों वासनासे उत्पन्न होतेहैं और इन दोनोंका आत्मज्ञान
सेभी विनाश होता है.
३२० न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ गुण-
इमौ धर्माधर्मौ । वासनेति । अतो ज्ञानिना कृते सुकृतदुष्कृतक-
र्मणी न फलायालमिति भावः । ज्ञानादपीति, अपिदिना भोग-
परिग्रहः ।
भाषा-मूलगत ' इमौ ' पदसे धर्माधर्मका ग्रहण है. ये दोनों वासनाजन्य हैं;
इसीलिये ज्ञानीपुरुषके किये पुण्यपापादि कर्मफल प्रदानके लिये समर्थ नहीं
होते, भाव यह कि-ज्ञानीपुरुषमें ज्ञानद्वारा वासनाका क्षय हुआ है, इसलिये
उसकी शुभाशुभरूपा क्रिया केवल प्रतीतिमात्र है,भोगोपयोगिनी नहीं है.“ज्ञानादपि”
यहां 'अपि' शब्दसे भोगका परिग्रहण करना.
ननु तत्त्वज्ञानस्य कथं धर्माधर्मनाशकत्वं“नाभुक्तं क्षीयते कर्म
कल्पकोटिशतैरपि ” इति वचनाविरोधात्, इत्थंच तत्त्वज्ञानिनां
झटिति कायव्यूहेन सकलकर्मणां भोगेन क्षय इति चेत् । न ।
तत्र भोगस्य वेदबोधितनाशकोपलक्षकत्वात् ।
शंका-“भोगे विना कर्मोंका शतकोटिकल्पोंसेभी क्षय होना असम्भव है” इत्यर्थक
स्मृतिवचनके साथ विरोध होनेसे तत्त्वज्ञानको धर्माधर्मनाशकता कैसे होसकती है?
अर्थात् नहीं होसकती इसलिये तत्त्वज्ञानी लोगोंको एककालावच्छेदेन शीघ्रही काय-
व्यूहसे अर्थात् यावत् कर्मभोगार्थ कायकदम्बके निर्माणसे सम्पूर्णकर्मोंका भोगहीसे
नाश मानना उचित है. “समाधान-” नाभुक्तं इत्यादि वाक्यगत ' भोग ' पद
वेदबोधित नाशकमात्रका उपलक्षक है अर्थात् जैसे भोगसे विना कर्मोंका क्षय नहीं
होता वैसेही आत्मज्ञानसे विना या प्रायश्चित्तादिसे विनाभी नहीं होता.
कथमन्यथा प्रायश्चित्तादिना कर्मणां नाशः।तदुक्तम् “ ज्ञानाग्निः
सर्वकर्माणि ” इत्यादिना । श्रूयते च “ क्षीयन्ते चास्य कर्माणि
तस्मिन् दृष्टे परावरे” इति ।
भाषा-अन्यथा यदि भोगपदको आत्मज्ञानादिका उपलक्षक नहीं मानों तो
प्रायश्चित्तादिसेभी कर्मोंका नाश नहीं हुआ चाहिये. ( तदुक्तं) इसी वार्ताको भगवान्-
ने अर्जुनकोभी कहा है कि-“ हे अर्जुन!जैसे दीप्त हुआ अग्नि काष्ठको सर्वरूपसे दग्ध
करता है वैसेही ज्ञानरूप अग्निभी यावत् कर्मको सर्वरूपसे दग्ध करता है.” श्रुतिमेंभी
कहा है कि-“ उस परावरपरमात्माके दर्शनमात्रसे इस अधिकारी पुरुषके कर्मोंका
क्षय होता है.
परिच्छेदः ५ ] भाषाटीकासमेता. ३२१
ननु तत्त्वज्ञाननस्ताह शरीरावस्थानं सुखदुःखादि च न स्यात्।
ज्ञानेन सर्वेषां कर्मणां नाशादिति चेत् । न । प्रारब्धेतरकर्म-
णामेव नाशात् । तत्तच्छरीरभोगजनकं हि यत्कर्म तत्प्रार-
ब्धम् । तदभिप्रायमेवं नाभुक्तमिति वचनमिति ।
शंका-यदि ऐसा है तो आत्मज्ञानी पुरुषके शरीरकी स्थिति तथा उसको सुखदुःखा-
दिका अनुभव नहीं हुआ चाहिये;क्योंकि शरीरावस्थानादिके कारणीभूत कर्मोंका सर्व
रूपसे नाश होचुका है. समाधान-प्रारब्धकर्मोंसे अन्यकर्मोंहीका आत्मज्ञानादिद्वारा
नाश होताहै, तत्तन्नरदेवा दिशरीरावच्छेदेन भोगके जनक कर्मविशेषका नाम 'प्रारब्ध-
कर्म' है. उसी प्रारब्धकर्मके अभिप्रायसेही 'नाभुक्तं' इत्यादि स्मृतिवचन है-इति
शब्दं निरूपयति, शब्दो ध्वनिश्चेति-
भाषा-'शब्दो ध्वनिश्च' इत्यादिग्रन्थसे मूलकार शब्दका निरूपण करतेहैं-
शब्दो ध्वनिश्च वर्णश्च मृदङ्गादिभवो ध्वनिः॥१६४॥
कण्ठसंयोगादिजन्या वर्णास्त कादयो मताः ॥
सर्वः शब्दो नभोवृत्तिः-
भाषा-ध्वन्यात्मक तथा वर्णात्मक भेदसे शब्द दोप्रकारका है. मृदङ्गादिसे
उत्पन्न हुएका नाम 'ध्वन्यात्मक' शब्द है ॥ १६४॥कण्ठतालवादि संयोगसे उत्पन्न
हुएका नाम 'वर्णात्मक'शब्दहै. वह वर्ण'क' 'ख' आदिभेदसे अनेक हैं; सम्पूर्णशब्द
समवायसम्बन्धसे आकाशमें रहतेहैं.
नभोवृत्तिराकाशसमवेतः।
भाषा-मूलगत 'नभोवृत्ति' शब्दका विवरणही आकाशसमवेत है.
दूरस्थशब्दस्याग्रहणादाह, श्रोत्र इति-
भाषा-दूरदेशमें उत्पन्न हुए शब्दका ग्रहण नहीं होसकता; इसलिये'श्रोत्र'इत्यादि
ग्रन्थसे मूलकार उसकी रीति कहतेहैं-
-श्रोत्रोत्पन्नस्तु गृह्यते ॥ १६५ ॥
भाषा-वह मृदङ्गाद्यवच्छेदेन उत्पन्न हुआ शब्द श्रोत्रदेशमें उत्पन्न हुआ ग्रहण
होताहै ॥ १६५ ॥
ननु मृदङ्गाद्यवच्छेदेनोत्पन्ने शब्दे श्रोत्रे कथमुत्पत्तिरत आह,
वीचीति-
शंका-मृदङ्गादिदेशमें उत्पन्न हुआ शब्द श्रोत्रदेशमें कैसे उत्पन्न होगा?
२६