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न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda

विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा

DevanagariHindipublished350 पृष्ठ

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पृष्ठ 338

३१४ न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ गुण-
भाषा-स्थितिस्थापकाख्य संस्कार केवल पृथिवीहीमें रहता है; परन्तु कई
लोग इसको पृथिवीआदि चारोंमें मानतेहैं. वह स्थितिस्थापकाख्य संस्कार सर्वथा
अतीन्द्रय है और किसी २ स्थलमें स्पन्दरूप क्रियाकाभी कारण है ॥ १५९ ॥
स्थितिस्थापकेति । आकृष्टशाखादीनां परित्यागे पुनर्गमनस्य
स्थितिस्थापकसाध्यत्वात् । केचिदिति । चतुर्षु क्षित्यादिषु
स्थितिस्थापकं केचिन्मन्यन्ते तदप्रमाणमिति भावः । असौ
स्थितिस्थापकः । क्वचिदाकृष्टशाखादौ ॥ १५९ ॥
भाषा-वृक्षकी शाखादिको खैंचकर छोड़ दिया जाय तो उसका फिर पूर्ववत्
अवस्थान होजाता है वह आकृष्टशाखादिका प्रथमवत् अवस्थान स्थितिस्थापक-
संस्कारजन्य है. उस स्थितिस्थापक संस्कारको कई लोग पृथिवीआदि चारोंमें
रहनेवाला मानतेहैं; परन्तु ऐसा मानना उनका सर्वथा अप्रमाणक है मूलगत
' असौ ' पदसे स्थितिस्थापकसंस्कारका ग्रहण है और ' क्वचित् ' पदसे आकृष्ट-
शाखादिका ग्रहण है ॥ १५९ ॥
भावनाख्यस्तु संस्कारो जीववृत्तिरतीन्द्रियः ।
उपेक्षानात्मकस्तस्य निश्चयः कारणं भवेत् ॥१६०॥
भाषा-एवं भावनाख्यसंस्कार प्राणीमात्रमें रहता है और अतीन्द्रिय है
अर्थात् उसका किसी इन्द्रियद्वारा ग्रहण नहीं होता. उपेक्षाअनात्मक निश्चय
अर्थात् वस्तुविषयक दृढ बोध ( तस्य ) उस संस्कारका कारणीभूत है ॥ १६०॥
भावनाख्य इति । तस्य संस्कारस्य । उपेक्षात्मकज्ञानात् सं-
स्कारानुत्पत्तेरुपेक्षानात्मकइत्युक्तम् । तत्संशयात् संस्कारानु-
त्पत्तेर्निश्चय इत्युक्तम् । तेनोपेक्षान्यनिश्चयत्वेन संस्कारं प्रति
हेतुतेति भावः ।
भाषा-तस्य-इस मूलगतपदसे संस्कारोंका ग्रहण है. वस्तुविषयक ' उपेक्षात्मक '
ज्ञानसे अर्थात् वस्तुको दत्तचित्त होकर न ग्रहण करनेसे संस्कार उत्पन्न नहीं होता;
इसलिये मूलमें ' उपेक्षानात्मक ' यह निश्चयका विशेषण कहा है. ( तत् ) उपे-
क्षानात्मक संशयसेभी संस्कार उत्पन्न नहीं होता इसलिये संशयसाधारणज्ञानको
त्यागकर मूलमें ' निश्चय ' पदका निवेश किया है. एवं उपेक्षात्मक ज्ञानसे अन्य
जो निश्चयात्मक ज्ञान तादृश ज्ञानत्वेन संस्कारोंके प्रति कारणता है.