न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)
Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda
विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा
पृष्ठ 345, कुल 350 में से
संदर्भ में पढ़ेंपरिच्छेदः ५ ] भाषाटीकासमेता. ३२१
ननु तत्त्वज्ञाननस्ताह शरीरावस्थानं सुखदुःखादि च न स्यात्।
ज्ञानेन सर्वेषां कर्मणां नाशादिति चेत् । न । प्रारब्धेतरकर्म-
णामेव नाशात् । तत्तच्छरीरभोगजनकं हि यत्कर्म तत्प्रार-
ब्धम् । तदभिप्रायमेवं नाभुक्तमिति वचनमिति ।
शंका-यदि ऐसा है तो आत्मज्ञानी पुरुषके शरीरकी स्थिति तथा उसको सुखदुःखा-
दिका अनुभव नहीं हुआ चाहिये;क्योंकि शरीरावस्थानादिके कारणीभूत कर्मोंका सर्व
रूपसे नाश होचुका है. समाधान-प्रारब्धकर्मोंसे अन्यकर्मोंहीका आत्मज्ञानादिद्वारा
नाश होताहै, तत्तन्नरदेवा दिशरीरावच्छेदेन भोगके जनक कर्मविशेषका नाम 'प्रारब्ध-
कर्म' है. उसी प्रारब्धकर्मके अभिप्रायसेही 'नाभुक्तं' इत्यादि स्मृतिवचन है-इति
शब्दं निरूपयति, शब्दो ध्वनिश्चेति-
भाषा-'शब्दो ध्वनिश्च' इत्यादिग्रन्थसे मूलकार शब्दका निरूपण करतेहैं-
शब्दो ध्वनिश्च वर्णश्च मृदङ्गादिभवो ध्वनिः॥१६४॥
कण्ठसंयोगादिजन्या वर्णास्त कादयो मताः ॥
सर्वः शब्दो नभोवृत्तिः-
भाषा-ध्वन्यात्मक तथा वर्णात्मक भेदसे शब्द दोप्रकारका है. मृदङ्गादिसे
उत्पन्न हुएका नाम 'ध्वन्यात्मक' शब्द है ॥ १६४॥कण्ठतालवादि संयोगसे उत्पन्न
हुएका नाम 'वर्णात्मक'शब्दहै. वह वर्ण'क' 'ख' आदिभेदसे अनेक हैं; सम्पूर्णशब्द
समवायसम्बन्धसे आकाशमें रहतेहैं.
नभोवृत्तिराकाशसमवेतः।
भाषा-मूलगत 'नभोवृत्ति' शब्दका विवरणही आकाशसमवेत है.
दूरस्थशब्दस्याग्रहणादाह, श्रोत्र इति-
भाषा-दूरदेशमें उत्पन्न हुए शब्दका ग्रहण नहीं होसकता; इसलिये'श्रोत्र'इत्यादि
ग्रन्थसे मूलकार उसकी रीति कहतेहैं-
-श्रोत्रोत्पन्नस्तु गृह्यते ॥ १६५ ॥
भाषा-वह मृदङ्गाद्यवच्छेदेन उत्पन्न हुआ शब्द श्रोत्रदेशमें उत्पन्न हुआ ग्रहण
होताहै ॥ १६५ ॥
ननु मृदङ्गाद्यवच्छेदेनोत्पन्ने शब्दे श्रोत्रे कथमुत्पत्तिरत आह,
वीचीति-
शंका-मृदङ्गादिदेशमें उत्पन्न हुआ शब्द श्रोत्रदेशमें कैसे उत्पन्न होगा?
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