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न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda

विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा

DevanagariHindipublished350 पृष्ठ

पृष्ठ 339, कुल 350 में से

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पृष्ठ 339

परिच्छेदः ५ ] भाषाटीकासमेता । ३१५
ननु स्मरणं प्रत्युपेक्षाऽन्यनिश्चयत्वेन हेतुत्वं तेनोपेक्षादिस्थले न
स्मरणमित्थं च संस्कारं प्रति ज्ञानत्वेनैव हेतुताऽस्त्विति चेत् ।
न । विनिगमनाविरहेण संस्कारं प्रत्यप्युपेक्षाऽन्यनिश्चयत्वेन हेतु-
तायाः सिद्धत्वात् ।
शंका-स्मरणात्मक ज्ञानके प्रति उपेक्षाऽन्य निश्चयत्वेन हेतुता है इसीलिये
उपेक्षात्मकज्ञानस्थलमें स्मरणात्मक ज्ञान नहीं होता. ( इत्थञ्च ) इस रीतिसे स्मृति
ज्ञानके प्रति उपेक्षानात्मक निश्चयत्वेन कारणता सिद्ध हुई तो संस्कारके प्रति
ज्ञानत्वरूप साधारण धर्मसेभी कारणता मान लीजाय तो हानि क्या है ?
समाधान--विनिगमनाविरहसे अर्थात् एकत्र पक्षपातिनी युक्तिके अभावसे
संस्कारोंके प्रतिभी उपेक्षानात्मक निश्चयत्वेन कारणता स्वयं सिद्ध है इसलिये
ज्ञानत्वेन कारणता माननी उचित नहीं;
किंचोपेक्षास्थले संस्कारकल्पनाया गुरुत्वात् संस्कारं प्रति
चोपेक्षान्यत्त्वेन हेतुतायाः सिद्धत्वात् ॥ १६० ॥
भाषा-(किञ्च) वस्तुतः विचार किया जाय तो संस्कारोंके प्रतिही उपेक्षाऽन्य-
निश्चयत्वेन कारणता माननेमें विनिगमक प्रतीत होता है; क्योंकि यदि ऐसा नहीं
माना जाय तो उपेक्षात्मक ज्ञानस्थलमें संस्कारोंकी एक अधिक गुरुभूत कल्पना
करनी होगी और संस्कारोंके प्रति तो उपेक्षाऽन्यनिश्चयत्वेन हेतुता अन्वयव्यतिरेकसे
सिद्धही है ॥ १६० ॥
तत्र प्रमाणं दर्शयति । स्मरण इति-
भाषा-'स्मरणे' इत्यादि ग्रन्थसे मूलकार ( तत्र ) संस्कारमें प्रमाण दिखलातेहैं--
स्मरणे प्रत्यभिज्ञायामप्यसौ हेतुरुच्यते ॥
भाषा-स्मरणात्मक ज्ञानमें तथा प्रत्यभिज्ञात्मक ज्ञानमें यह संस्कार कारणीभूत है.
असौ संस्कारः। यतः स्मरणं प्रत्यभिज्ञानं च जनयत्यतः संस्कारः
कल्प्यते । विना व्यापारं पूर्वानुभवस्य स्मरणादिजननासा-
मर्थ्यात्, स्वस्वव्यापारान्यतराभावे कारणत्वासम्भवात् ।
भाषा-मूलगत 'असौ' पदसे संस्कारोंका ग्रहण है पूर्व दृष्टवस्तुविषयक अनुभव
कालान्तरमें उसी वस्तुके स्मरणका तथा प्रत्यभिज्ञानका जनक होता है; इसलिये
मध्यमें व्यापाररूपसे संस्कारोंकी कल्पना होतीहै संस्कारात्मकव्यापारसे विना पूर्वा-