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न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda

विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा

DevanagariHindipublished350 पृष्ठ

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पृष्ठ 336

३१२ न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ गुण-
भाषा-मूलमें 'वह्नि' पद तेज मात्रका वाचक है; एवं तेजसंयोगजन्यका
नाम नैमित्तिकद्रवत्व सिद्ध हुआ. वह नैमित्तिकद्रवत्व स्वर्णादिरूप तेजमें और
घृतलाक्षादि पृथिवीमें रहता है. वह द्रवत्व स्यन्दनरूपाक्रियामें असमवायिकारण है.
और संग्रहमें अर्थात् सक्तुआदिके परस्पर मिलापविशेषमें वह द्रवत्व निमित्तकारण
है; परन्तु सक्तु आदिके मिलापमें निमित्ततास्नेहसहित द्रवत्वको जाननी चाहिये.
एवं द्रुतस्वर्णादिका संग्रह न हुआ अर्थात् द्रुतस्वर्णादिमें द्रवत्वके होनेसे उसमें
चूर्णादिके पिण्डीभावकी आपत्ति नहीं हुई; क्योंकि स्वर्णादिमें स्नेहसहित द्रवत्व
नहींहै ॥ १५६ ॥
स्नेहं निरूपयति, स्नेहो जल इति-
भाषा-एवं 'स्नेहः' इत्यादि ग्रन्थसे मूलकार स्नेहका निरूपण करतेहैं-
स्नेहो जले स नित्योऽणावनित्योऽवयविन्यसौ ॥
तैलान्तरे तत्प्रकर्षाद्दहनस्यानुकूलता ॥ १५७ ॥
भाषा-स्नेहगुण केवल जलमात्रमें रहताहै और जलीयपरमाणुओंमें वह नित्य
है; अन्यत्र द्व्यणुकादिकोंमें अनित्य है. तैलके बीचमें उसकी प्रकर्षतासे दहनकी
अनुकूलता है ॥१५७ ॥
जलइति, जल एवेत्यर्थः। असौ स्नेहः । ननु पृथिव्यामपि तैले स्नेह
उपलभ्यते न चासौ जलीयस्तथासति दहनप्रातिकूल्यं स्यादत
आह । तैलान्तर इति। तत्प्रकर्षात्स्नेहप्रकर्षात् तैल उपलभ्यमा-
नः स्नेहोऽपि जलीय एव, तस्य प्रकृष्टत्वादग्नेरानुकूल्यम्, अप-
कृष्टस्नेहं हि जलं वह्निं नाशयतीति भावः ॥ १५७ ॥
भाषा-स्नेह जलहीमें रहताहै. 'असौ' पदसे स्नेहका ग्रहण है. शंका-तैलरूपा
पृथिवीमेंभी स्नेह प्रतीत होताहै परन्तु वह स्नेह जलका नहींहै, क्योंकि यदि जलका
होय तो अग्निका विरोधी हुआ चाहिये? समाधान-इसका उत्तर 'तैलान्तरे'इत्यादि
ग्रन्थसे मूलकार स्वयं देतेहैं. मूलमें 'तत्प्रकर्ष' शब्दसे स्नेहप्रकर्षका ग्रहण है. तेलमें
प्रतीत होनेवाला स्नेहभी जलहीका है उसको प्रकृष्ट होनेसे अर्थात् अति उत्कट
होनेसे अग्निकी अनुकूलता है. भाव यह कि-अपकृष्ट स्नेहवाला जलही अग्निका
नाशक है, तैल नहीं ॥ १५७ ॥
संस्कारं निरूपयति, संस्कारेति-
भाषा-एवं 'संस्कारभेद'इत्यादि ग्रन्थसे मूलकार संस्कारोंका निरूपण करते हैं-