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सर्वकोश
न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda

विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा

DevanagariHindipublished350 पृष्ठ

पृष्ठ 342, कुल 350 में से

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पृष्ठ 342

३१८ न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- गुण-
ननु ध्वंसोऽपि न व्यापारोऽस्तु, न च निर्व्यापारस्य चिरध्वस्त-
स्य कथं कारणत्वमिति वाच्यम्, अनन्यथासिद्धनियतपूर्ववर्ति-
त्वस्य तत्रापि सत्त्वात्, अव्यवहितपूर्ववर्तित्वं हि चक्षुःसंयोगा-
देः कारणत्वे न तु सर्वत्र कार्यकालवृत्तित्वमिव समवायिकार-
णस्य कारणत्व इत्यत आह, कर्मनाशेति ।
शंका-यदि ऐसाहै तो ध्वंसकोभी व्यापार मत मानो; एवं कारणके मध्यमें कहींभी
व्यापार माननेकी आवश्यकता नहींहै. यदि कहो कि-निर्व्यापार चिरविनष्ट यागादि
क्रियासे स्वर्गादिकारणता कैसे होगी ? तो कारणता नाम 'अनन्यथासिद्धत्वे
सति कार्यनियतपूर्ववर्तित्व ' मात्रका है; सो ऐसी कारणता यागादिमेंभी
विद्यमान है. अव्यवहित पूर्ववर्तित्वरूप धर्म चक्षुःसंयोगादिगत कारणताका घटक है
अर्थात् यदि रूपादि साक्षात्कारके प्रति चक्षुःसंयोगादिको कारणता कहनी होय तो
ऐसे स्थलमें अव्यवहित पूर्ववर्तित्वका निवेश करना उचित है. सर्वत्र उसका कुछ उप-
योग नहीं; जैसे समवायिकारणगत कारणताका कार्यकालवृत्तित्वघटक है, सर्वत्र नहीं.
समाधान-इसका उत्तर ' कर्मनाशा ' इत्यादि ग्रन्थसे मूलकार स्वयं देतेहैं.
यदि ह्यपूर्वं न स्यात्तदा कर्मनाशाजलस्पर्शादिना नाश्यत्वं ध-
र्मस्य न स्यात् । न हि तेन यागादिनाशः प्रतिबन्धो वा कर्तुं-
शक्यते, तस्य पूर्वमेव वृत्तत्वादिति भावः ।
भाषा-यदि यागादिजन्य धर्मात्मक अपूर्व न होय तो कर्मनाशाजलस्पर्शादिसे उसका
नाशभी नहीं हुआचाहिये, परन्तु नाश होना तो शास्त्रसिद्धहै और कर्मनाशाजलके स्प-
र्शादिसे यागादिका नाश वा उसका प्रतिबन्ध तो कहही नहीं सकते;क्योंकि यागादिका
कर्मनाशा जलस्पर्शसे पूर्ववृत्तित्व है अर्थात् यागक्रिया बहुतकाल प्रथम होचुकी है;
इसलिये भिन्नकालीन पदार्थोंका परस्पर प्रतिबध्यप्रतिबन्धकभाव या नाश्यनाशक-
भाव कहना उचित नहीं.
एतेन देवताप्रीतिरेव फलमित्यपास्तम् । गङ्गास्नानादौ सर्वत्र
देवताप्रीतेरसम्भवात् देवतायाश्चेतनत्वेऽपि तत्प्रीतेरनुद्देश्य-
त्वात्, प्रीतेः सुखस्वरूपत्वेन विष्णुप्रत्यादौ तदसम्भवात् ।
जन्यसुखादेस्तत्राभावात् तेन, विष्णुप्रीतिजन्यत्वेन पराभिमत-
स्वर्गादिरेव विष्णुप्रीतिशब्देन लक्ष्यते ॥ १६१ ॥ १६२ ॥