न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)
Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda
विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा
पृष्ठ 341, कुल 350 में से
संदर्भ में पढ़ेंपरिच्छेदः ६ ] भाषाटीकासमेता. ३१७
ष्टतया निर्व्यापारतया च कालान्तरभाविस्वर्गजनकत्वं न स्या-
त् । तदुक्तमाचार्यैः । “ चिरध्वस्तं फलायालं न कर्मातिशयं
विना ” इति ।
भाषा-स्वर्गादि यावत् सुखोंका तथा स्वर्गके साधनीभूत शरीरादिका कारण एक
धर्मही है; उस धर्ममें “ यागादिकं धर्मादिव्यापारवत् वेदबोधितस्वर्गसाधनत्वात् ”
इत्यादि अनुमानप्रमाणप्रदर्शनार्थ मूलकार ‘ यागादि ’ इस ग्रन्थको कहते हैं अर्थात्
यागादिके व्यापाररूपसेही धर्मकी कल्पना होसकतीहै; अन्यथा मध्यमें व्यापाररू-
पेण धर्मस्वीकार न किया जाय तो चिरकाल विनष्ट हुए यागादि विना व्यापारके
कालान्तरमें होनेवाले स्वर्गके जनक कदापि नहीं होसकेंगे, इसी वार्त्ताको उदयना-
चार्यजीनेभी कहाहै कि-“चिरकाल विनष्ट हुआ कर्म विना अपूर्वसे फलजननमें समर्थ
नहीं होता”-इति ।
ननु यागध्वंस एव व्यापारः स्यात्, न च प्रतियोगिध्वंसयोरेकत्रा-
जनकत्वम्, सर्वत्र तथात्वे मानाभावात्, न च तन्मते फलानन्त्यं,
मन्मते चरमफलस्यापूर्वनाशकत्वान्न तथात्वमिति वाच्यम्, का-
लविशेषस्य सहकारित्वादित्यत आह । गङ्गास्नानेति । गङ्गास्ना-
नस्य हि स्वर्गजनकत्वेऽनन्तानां जलसंयोगध्वंसानां व्यापारत्व-
मपेक्ष्यैकमपूर्व कल्प्यते लाघवादिति भावः ।
शंका-मध्यमें धर्मको व्यापार माननेकी अपेक्षा यागके ध्वंसहीको व्यापार
मानलिया जाय तो हानि क्या है ? यदि कहो कि-‘प्रतियोगिको तथा प्रतियोगिके
ध्वंसको एकत्र जनकता अप्रसिद्ध है’ तो यह कथनभी युक्त नहीं क्योंकि सर्वत्र
( तथात्वे ) प्रतियोगि तथा प्रतियोगिके ध्वंसको एकत्र जनकत्वाभावमें कोई प्रमाण
नहीं है और यदि कहो कि-‘यागध्वंसको व्यापार माननेवालेको फल आनन्त्य मानना
होगा’ यह अनुचित है और धर्मको व्यापार माननेवालेको तो फलानन्त्यरूप
दोष नहींहै; क्योंकि उसने अन्तिम फलको धर्मरूप अपूर्वका नाशक मानाहै तो यह
कथनभी युक्त नहीं; क्योंकि कालविशेषको फलविशेषमें सहकारी मानकर फलान-
न्त्यरूप दोषका वारण होसकताहै ? समा०-इसका उत्तर ‘ गंगास्नान ’ इत्यादि
ग्रन्थसे मूलकार स्वयं देतेहैं. भाव यह कि-ध्वंसको व्यापार माननेवालेको गंगास्ना-
नको स्वर्गजनकता माननेमें मध्यमें अनन्तजलसंयोगोंकी ध्वंसको व्यापार मानना
होगा, उनकी अपेक्षा मध्यमें अपूर्वकी कल्पना करनेमें अतिलाघव है.