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न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda

विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा

DevanagariHindipublished350 पृष्ठ

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पृष्ठ 335

परिच्छेदः ५ ] भाषाटीकासमेता. ३११
द्रवत्वं द्विविधं सांसिद्धिकं नैमित्तिकं च ॥ १५४ ॥
भाषा-वह द्रवत्व सांसिद्धिक तथा नैमित्तिक भेदसे दो प्रकारका है.
सांसिद्धिकं तु सलिले द्वितीयं क्षितितेजसोः ॥
परमाणौ जले नित्यमन्यत्रानित्यमिष्यते ॥ १५५ ॥
द्वितीयंनैमित्तिकम् ।
भाषा-उनमें स्वाभाविक तो जलहीमें है और नैमित्तिक पृथिवी तथा तेज-
दोनोंमें है. वह द्रवत्व केवल जलके परमाणुओंमें तो नित्य है और अन्यत्र सर्वत्र
अनित्य है ॥ १५५ ॥
परमाणविति।जलपरमाणौ द्रवत्वं नित्यमित्यर्थः।अन्यत्रपृथिवी
परमाण्वादौ जलद्व्यणुकादौ च द्रवत्वमनित्यं कुत्रचित्तेजसि
कुत्रचित्पृथिव्यां च नैमित्तिकं द्रवत्वम् ॥ १५५ ॥
भाषा-उसमें जलीय परमाणुओंमें द्रवत्व नित्य है और अन्यत्र पार्थिवपरमाणु
आदिकोंमें तथा जलीय द्व्यणुकादिकोंमें वह द्रवत्व अनित्य है. कहीं स्वर्णादि तेजमें
और कहीं घृतलाक्षादि पृथिवीमें वह द्रवत्व नैमित्तिक है ॥ १५५ ॥
तत्र को वा नैमित्तिकार्थस्तद्दर्शयति । नैमित्तिकमिति-
भाषा-वहां 'नैमित्तिक' शब्दका अर्थ क्या है उसीको 'नैमित्तिक' इत्यादि-
मूलसे दिखलातेहैं-
नैमित्तिकं वह्नियोगात्तपनीयघृतादिषु ॥
द्रवत्वं स्यन्दने हेतुर्निमित्तं संग्रहे तु तत् ॥ १५६ ॥
भाषा-नैमित्तिक द्रवत्व अग्निसंयोगसे तपेहुए घृतादिकोंमें प्रतीत होताहै. वह
द्रवत्व स्यन्दनमें हेतु है अर्थात् असमवायिकारण है और चूर्णादिके पिण्डीभावमें
(तत्) वही द्रवत्व निमित्त कारण है ॥ १५६ ॥
वह्नीतिपदं तेजोऽर्थकम् । तथा च तेजःसंयोगजन्यं नैमित्तिकं
द्रवत्वम्।तच्च सुवर्णादिरूपे तेजसि घृतजतुप्रभृतिपृथिव्यां च वर्तत
इत्यर्थः । द्रवत्वं स्यन्दन इति । असमवायिकारणमित्यर्थः।संग्रहे
सक्तुकादिसंयोगविशेषे । तेन तद्द्रवत्वं स्नेहसहितमिति बोद्ध-
व्यम् । तेन द्रुतसुवर्णादीनां न संग्रहः ॥ १५६ ॥