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सर्वकोश
न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda

विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा

DevanagariHindipublished350 पृष्ठ

पृष्ठ 337, कुल 350 में से

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पृष्ठ 337

परिच्छेदः ५ ] भाषाटीकासमेता. ३१३
संस्कारभेदो वेगोऽथ स्थितिस्थापकभावने ॥
मूर्तमात्रे तु वेगः स्यात्कर्मजो वेगजः क्वचित् ॥१५८॥
भाषा-वेग, स्थितिस्थापक, तथा भावनाख्यभेदसे संस्कार तीन प्रकारका है.
उनमें वेगाख्य संस्कार तो मूर्तपदार्थमात्रमें रहताहै; वह वेगाख्य संस्कार किसी
स्थलमें क्रियासे उत्पन्न होताहै और किसी स्थलमें वेगसे उत्पन्न होताहै ॥ १५८ ॥
संस्कारेति । वेगस्थितिस्थापकभावनाभेदात् संस्कारस्त्रिविध
इत्यर्थः । मूर्तमात्र इति । कर्मजवेगजभेदाद्वेगो द्विविध इत्यर्थः ।
शरीरादौ हि नोदनजनितेन कर्मणा वेगो जन्यते, तेन च पूर्वकर्म,
नाशस्तत उत्तरकर्म । एवमग्रेऽपि ।
भाषा--वेग, स्थितिस्थापक, तथा भावना इन भेदसे संस्कार तीन प्रकारके हैं. (मूर्त
मात्रे इति ) कर्मजन्य तथा वेगजन्य इस भेदसे वेगाख्यसंस्कार फिर दोप्रकारका है.
बाणादिकोंमें नोदनसे उत्पन्न हुई क्रियासे वेग उत्पन्न होताहै. ( तेनच ) उस वेगसे
पूर्व क्रियाका नाश होता है उस पूर्वकर्मनाशके अनन्तर फिर उत्तर क्रिया होती है.
ऐसेही आगे २ जबतक बाणादिका उत्तरसंयोग न होय तबतक पूर्व २ कर्मका नाश-
क वेगहीको समझना चाहिये. भाव यह कि-कर्मका नाशक उत्तरसंयोग तो उसका-
लमें हैही नहीं; इसलिये पूर्व पूर्व कर्मनाशकता वेगहीमें कल्पना करी जातीहै ऐसेही
उत्तर २ कर्मसेभी पूर्व २ वेगका नाश होता है उस पूर्व वेगनाशके अनन्तर
वेगान्तरकी उत्पत्ति होती है. यही ‘ एवमग्रेपि ’ इस ग्रन्थका तात्पर्य है-ऐसे स्थल
में कर्मका कोई नाशकान्तर तो हैही नहीं.
विना च वेगं कर्मणः कर्मप्रतिबन्धकत्वात् पूर्वकर्मनाश उत्तरकर्मो-
त्पत्तिश्च न स्यात् । यत्र वेगवता कपालेन जनिते घटे वेगो
जन्यते स वेगजो वेगः ॥ १५८ ॥
भाषा-इसलिये वेगसे बिना अर्थात् यदि वेगको नाशक न मानें तो पूर्व कर्म
का नाश नहीं होना चाहिये और उत्तरकर्मकी उत्पत्तिभी नहीं हुई चाहिये; क्योंकि
पूर्वकर्म उत्तरकर्म उत्पत्तिका प्रतिबन्धक है. एवं जहां वेगवाले कपालादिसे उत्पन्न
हुए घटादिमें वेग उत्पन्न हुआहै वह वेगज वेग है ॥ १५८ ॥
स्थितिस्थापकसंस्कारः क्षितौ केचित्चतुर्ष्वपि ॥
अतीन्द्रियोऽसौविज्ञेयः क्वचित्स्पन्देऽपिकारणम् १५९
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