न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)
Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda
विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा
पृष्ठ 343, कुल 350 में से
संदर्भ में पढ़ेंपरिच्छेदः ५ ] भाषाटीकासमेता. ३१९
भाषा-कई विद्वान्लोग यागादि शुभक्रियाका देवताप्रीतिरूपही फल मानतेहैं.
इस पूर्वकथनसे उसकाभी खण्डन किया; क्योंकि गंगास्नानादि सर्वत्र
शुभकार्योंमें देवताप्रीतिका होना असम्भव है. यद्यपि देवता चेतन है इसलिये प्रीति
होनेका सम्भव होसकता है तथापि यागस्नानादिक्रिया कर्त्ताका देवताप्रीति
उद्देश्य नहीं है और ‘ प्रीति ’ नाम सुखविशेषका है, सो विष्णुप्रीतिआदिकोंमें उसका
होना असम्भव है; क्योंकि विष्णुआदिको ईश्वररूप होनेसे उनमें जन्यसुखका अभाव
है; इसलिये ‘विष्णुप्रीति’ शब्दसे विष्णुप्रीतिजन्यत्वेन मीमांसकोंके अभिमत स्वर्गादि-
काही लक्षणया बोध होता है ॥ ६१ ॥ ६२ ॥
अधर्मो नरकादीनां हेतुर्निन्दितकर्मजः ॥
प्रायश्चित्तादिनाश्योऽसौ जीववृत्ती त्विमौ गुणौ १६३
भाषा-नरकादि दुःखके साधनका नाम ‘अधर्म’ है और निषिध्यकर्मोंसे उसकी
उत्पत्ति होती है. प्रायश्चित्तादि आचरणसे उसका नाश होता है. यह धर्माधर्मरूप
दोनों गुण केवल जीवमात्रमें रहतेहैं ॥ ६३ ॥
अधर्मो नरकादीनामिति । नरकादिसकलदुःखानां नारकी-
यशरीरादीनां च साधनमधर्म इत्यर्थः । तत्र प्रमाणमाह, प्राय-
श्चित्तेति । यदि ह्यधर्मो न स्यात्तदा प्रायश्चित्तादिना नाश्यत्वं
न स्यात्।नहि तेन ब्रह्महननादीनां नाशः प्रतिबन्धो वा विधातुं
शक्यते तस्य पूर्वमेव विनष्टत्वादिति भावः । जीवेति । ईश्वरस्य
धर्माधर्माभावादिति भावः ॥ १६३ ॥
भाषा-नरकमें होनेवाले सम्पूर्ण दुःखोंका तथा नारकीय शरीरादिकोंका कारणी-
भूत अधर्म है. ‘ प्रायश्चित्त ’ इत्यादि ग्रन्थसे मूलकार उसमें प्रमाण दिखलातेहैं.
यदि अधर्म कुछ वस्तु न होय तो प्रायश्चित्तादिद्वारा उसके नाशका विधानभी नहीं
हुआ चाहिये. उस प्रायश्चित्तादिसे ब्राह्मणवधादिका नाश अथवा प्रतिबन्ध तो विधान
करही नहीं सकते; क्योंकि ‘ तस्य ’ उस ब्रह्महननादि कर्मका तो पूर्वही विनाश हो
चुका है. मूलगत ‘जीववृत्ति’यह पद कहनेका भाव यह है कि-ईश्वरमें धर्माधर्मादिका
सर्वथा अभाव है ॥ १६३ ॥
इमौ तु वासनाजन्यौ ज्ञानादपि विनश्यतः ॥
भाषा-यह धर्माधर्म दोनों वासनासे उत्पन्न होतेहैं और इन दोनोंका आत्मज्ञान
सेभी विनाश होता है.