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न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda

विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा

DevanagariHindipublished350 पृष्ठ

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पृष्ठ 334

३१० न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ गुण-
भाषा-जीवनेके कारणीभूत प्रयत्नका अनुवर्तन जबतक जीव जीता रहे तबतक
होता रहता है, वह प्रयत्न अतीन्द्रिय है. उसमें'शरीरे'इत्यादि मूलसे प्रमाण कहतेहैं.
अधिक श्वास प्रश्वासादि प्राणसंचार प्रयत्नसाध्य अनुभवसिद्ध है . ( इत्थञ्च ) एवं
दृष्टान्तसिद्ध हुआ तो “ यावत् प्राणिशरीराभ्यन्तरप्राणसञ्चारः भोक्तृप्रयत्नजन्यः
धावनादिप्रयत्नोत्कर्षेण श्वासक्रियोत्कर्षदर्शनात् मदीययत्नोत्कर्षसाध्यमच्छासक्रियो-
त्कर्षवत् ” इत्यादि अनुमानसे यावत् प्राणसंचारमें यत्न साध्यत्वसिद्ध हुआ तो
प्रत्यक्षयत्नके बाधित होनेसे अतीन्द्रययत्नकी सिद्धिहुई वही प्रयत्न जीवनका कारणीभूतहै.
गुरुत्वं निरूपयति, अतीन्द्रियमिति-
भाषा-एवं 'अतीन्द्रिय' इत्यादि ग्रन्थसे मूलकार गुरुत्वका निरूपण करतेहैं-
अतीन्द्रियं गुरुत्वं स्यात्पृथिव्यादिद्वये तु तत् ॥
अनित्ये तदनित्यं स्यान्नित्ये नित्यमुदाहृतम् १५३
तदेवासमवायि स्यात्पतनाख्ये तु कर्मणि ॥
भाषा-(गुरुत्व) अर्थात् भारीपन अतीन्द्रय है, पृथिवी जल दोनोंमें रहताहै.घटादि
अनित्योंमें वह गुरुत्व अनित्य है और परमाणुओंमें नित्य है ॥ १५३ ॥ वही गुरुत्व
आद्यपतनरूप क्रियामें असमवायिकारण है.
अनित्येति,अनित्येद्व्यणुकादौ तद्गुरुत्वमनित्यं नित्ये परमाणौ नित्यं,
गुरुत्वमित्यनुवर्तते। तद् गुरुत्वम्।असमवायि असमवायिकारणम् ।
पतनाख्ये इति आद्यपतन इत्यर्थः।
भाषा-अर्थात् अनित्यद्व्यणुकादिकोंमें वह गुरुत्व अनित्य है और नित्य परमा-
णुओंमें वह नित्य है ' नित्येनित्यं'इस मूलमें गुरुत्वपदकी अनुवृत्ति करलेनी. 'तत्'
पदसे गुरुत्वका ग्रहण है. ' असमवायि ' पदसे असमवायिकारणका ग्रहण है. एवं
' पतन ' पदसे आद्यपतनका ग्रहण है.
द्रवत्वं निरूपयति, सांसिद्धिकमिति-
भाषा-एवं ' सांसिद्धिक ' इत्यादि ग्रन्थसे मूलकार द्रवत्वका निरूपण करतेहैं-
सांसिद्धिकं द्रवत्वं स्यान्नैमित्तिकमथापरम् ॥१५४॥
भाषा-एक सांसिद्धिक अर्थात् स्वाभाविक द्रवत्व है और दूसरा नैमित्तिक
है ॥ १५४ ॥