सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda

विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा

DevanagariHindipublished350 पृष्ठ

पृष्ठ 340, कुल 350 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 340

३१६ न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ गुण-
नुभवको स्मरणादिज्ञान जननमें सामर्थ्य नहींहै; क्योंकि कार्योत्पत्तिसे अव्यवहित
पूर्वक्षणमें ( स्व ) कारण ( स्वव्यापार ) कारणव्यापार अन्यतरके न होनेसे कारणमें
कारणत्व धर्मका होनाही असम्भव है. भाव यह कि-कार्याव्यवहितपूर्वक्षणवृत्ति कारण
कारणव्यापारान्यतरत्वहीका नाम ' कारणतापदार्थ 'है.
नच प्रत्यभिज्ञां प्रति तत्तत्संस्कारस्य हेतुत्वे प्रत्यभिज्ञायाः सं-
स्कारजन्यत्वेन स्मृतित्वापत्तिरिति वाच्यम्, अप्रयोजकत्वात् ।
परे त्वनुद्बुद्धसंस्कारात् प्रत्यभिज्ञानुदयादुद्बुद्धसंस्कारस्य हे-
तुत्वापेक्षया तत्तत्स्मरणस्यैव प्रत्यभिज्ञां प्रति हेतुत्वं कल्प्यत
इत्याहुः ।
शंका-संस्कारजन्य स्मृत्यात्मक ज्ञान होता है एवं तत्तदनुभवजन्य संस्कारोंको
यदि प्रत्यभिज्ञात्मक ज्ञानके प्रतिभी कारणता है तो संस्कारजन्यत्वेन प्रत्यभिज्ञात्मक
ज्ञानकोभी स्मृतिरूपही होना चाहिये समाधान-यह कथन आपका अप्रयोजक है
अर्थात् संस्कारजन्यत्वका स्मृतित्वके साथ अन्वयव्यतिरेक कहनेके लिये आपके पास
कोई अनुकूलतर्क नहीं है; ( परंतु ) और चिन्तामणिकार तो यह कहतेहैं कि-अनुद्बु-
द्ध संस्कारोंसे प्रत्यभिज्ञात्मक ज्ञानका उदय होना दुर्घट है; इसलिये उद्बुद्धसंस्कारोंही
को हेतुता कहनी होगी. एवं उद्बुद्ध संस्कारोंमें हेतुता माननेकी अपेक्षा तत्तद्वस्तु
विषयक स्मरणहीको प्रत्यभिज्ञात्मक ज्ञानके प्रति हेतुता कल्पना करनेमें लाघव है.
अदृष्टं निरूपयति, धर्माधर्माविति-
भाषा- 'धर्माधर्म' इत्यादि ग्रन्थसे मूलकार अदृष्टका निरूपण करते हैं-
धर्माधर्मावदृष्टं स्याद्धर्मः स्वर्गादिसाधनम्॥१६१॥
गङ्गास्नानादियागादिव्यापारः स तु कीर्तितः ॥
कर्मनाशाजलस्पर्शादिना नाश्यस्त्वसौ मतः॥१६२॥
भाषा-धर्म अधर्म दोनोंका नाम ' अदृष्ट ' है. उनमें स्वर्गादिके साधनका नाम
' धर्म ' है ॥ १६१ ॥ वह धर्म :गङ्गास्नानादिका तथा यागादिका व्यापाररूप
कहा है. 'कर्मनाशा'नामक नदीके जलस्पर्शादिसे उस धर्मका नाश मानाहै॥१६२॥
स्वर्गादिसकलसुखानां स्वर्गसाधनीभूतशरीरादीनां च साधनं
धर्म इत्यर्थः । तत्र प्रमाणं दर्शयितुमाह । यागादीति । यागादि-
व्यापारतया हि धर्मः कल्प्यते । अन्यथा यागादीनां चिरविन-