नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)
Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary
महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा
४४६ नाट्यशास्त्र
अभिनेय में नाट्यधर्मी हो गया है। लीलाप्रधान एवं मनोहर अंगहारों की
प्रमुखता वाले अभिनय से युक्त नाट्य की लक्षणानुसारिता भी नाट्यधर्मी
है। जहाँ पुरुष अपने ( सहज ) रूप में न रह कर स्त्रीभाव का आश्रय
ले ले तो भी नाट्यधर्मी हो जाता है। यहाँ 'भवेत्' क्रिया के द्वारा
ग्रन्थकार ने संभावना में लिङ् का प्रयोग किया है जो समयनिष्ठता को
दर्शाता है। यह सम्भावना रञ्जन के तथा कथावस्तु के लिये भी उपयोगी
रहना चाहिए।
७४. आसन्नवचन के अश्रवण तथा दूसरों के अश्रूयमाण का श्रवण आदि
केवल यहाँ धर्मतः सम्भव है तथा सौन्दर्याधायक भी होते हैं। अनुक्त को
आकाशभाषित के रूप में केवल अभिनेता मात्र श्रवण करता है।
७५. नाट्यधर्मी की इसी बहुलता तथा व्यापक क्षेत्र को अनेक उदाहरणों
तथा विवरणों से दिखलाने के लिये यह विस्तार दिया गया है। शैल आदि
पदार्थों का आवश्यकतानुसार अभिनेता जो प्रयोग करते हैं यह प्रयोग भी
'नाट्यधर्मी' होता है !
७८. 'नृत्यतेऽवगम्यते' में नृत्त सदृश 'विशाखागति' का प्रयोग सूचित
किया गया है। यहाँ ललित अर्थात् आवेष्टितादि करण से गृहीत वर्तना तथा
उत्क्षिप्त पद से चतुस्तालादि के द्वारा काल-विभाग भी सूचित होता है ।
८१. नाट्यधर्मी के व्यापकत्व को दिखला कर उपसंहार में कहते हैं—
'नाट्यधर्मी' इत्यादि । नाट्यधर्मी में जो गति है उसमें हेतु है अंग अर्थात् गीत,
आतोद्य आदि तथा अभिनय । यहाँ अङ्गाभिनय पद में समाहार द्वन्द्व के
कारण एकवचन का प्रयोग हुआ है। राग = सामाजिक की प्रीति ।
८२-८३. अध्यायार्थ का उपसंहार करते हैं—'एवम्' इत्यादि से । यहाँ
दो धर्मियों के रहने से यद्यपि द्विवचन होना चाहिये फिर भी 'धर्मी' पद में
एकवचन के प्रयोग के द्वारा अभिनय में नाट्यधर्मी की प्रमुखता को दिखलाया
गया है, क्योंकि लोकधर्मी इसी में समाविष्ट ( हो सकता ) है। युक्तयः =
प्रवृत्तियाँ । अवशिष्ट अभिनय को सात्विक भावों के अभिनय तथा सामान्य-
भिनय के प्रसंग में आगे कहा जायगा । (ना० शा० भाग ३, :अध्याय २४ में)
अब जो 'वाक्य' बचा तथा जो तत्वतः धर्मी भी है उसके स्वरूप का अगले
अध्याय में निरूपण किया जायगा इस कथन से यहाँ आङ्गिक अभिनय का
उपसंहार करते हुए अध्याय समाप्ति को ( भी ) किया गया है।
पञ्चदश अध्याय
(वाचिकाभिनय)
१. आङ्गिक अभिनय के अनन्तर वाचिक का विशेष निरूपण आवश्यक
है क्योंकि आङ्गिक के विषय को प्रस्तुत करने या समर्पण में आधारभूत यही
वाचिक अभिनय होता है। वागभिनय—यहाँ 'वाचामभिनयः' से षष्ठी तत्पुरुष
समास है ही नहीं किन्तु 'वागेवाभिनयः' विग्रह से कर्मधारय समास ही है।
क्योंकि वाणी ही अभिनय है अर्थात् रंगस्थल पर अभिनेता जो संवादादि
बोलता है वही अभिनय। षष्ठ अध्याय में जिसका नाम मात्र उल्लेख हुआ
था अब यहाँ उसी का स्वरूप विशेषतः प्रस्तुत करना है। अतः यहाँ लक्षणत्वेन
अभिधान के कारण इसी का प्राधान्य समझना चाहिए।
२. वाचिक के लक्षण में कारण बतलाने के लिये कहते हैं—'वाचि'
इत्यादि से। क्योंकि वाणी नाट्यप्रयोग के अभिनय की तनु = आधारभूमि
है। सकल प्रयोगों की आधार, गाने बजाने के लिये अनुग्राहक तथा स्वयं
अभिनय स्वरूपा वाणी ही होती है। इसलिये जब वाणी से अभिनय होता
है, तब ये अङ्गादि भी (वाक् सहित होकर) अपने-अपने अर्थ को व्यक्त
करते हैं।
३. वाणी उपयोगिनी होकर विश्व की कारण है इसे 'वाङ्मयानि'
इत्यादि से भी कहते हैं। यह वाणी 'चतुर्थगोपाय' अर्थात् चौथे भाग में
(पुरुषार्थ) के रहने वाले मोक्ष की उपायभूता होती है। इस तथ्य का भी
संकेतित मिलता है। वाङ्निष्ठानि—अर्थात् फलरूपा वाणी में जिसकी
निष्ठा अवस्थान है। इस प्रकार वाणी ही संसार की अवभासिका है
तथा सभी की कारण है और वही निर्वाहिका (भी) है। 'वाणी ही
सम्पूर्ण भूत है' (वाग् वै विश्वा भुवनानि) इस श्रुति के अनुसार वाणी
ही समग्र जगत् का कारण है क्योंकि विश्व शब्द का विवर्त है तथा यह वाणी
ही अर्थ के रूप में विवर्तित होती है। इसी तथ्य को भर्तृहरि ने वाक्यपदीय के
ब्रह्मकाण्ड में विस्तार से दिया है। (इसके उद्धरणात्मक अंश १।१२१, १२४
तथा १२६ को पाद टिप्पणी में देखना चाहिये। द्र० ना० शा०, भाग २ पृष्ठ
२०१)। यह सर्वाकार है इसी कारण इतिवृत्त को नाट्य का शरीर भी
आगे कहा जायगा (द्र० ना० शा० अध्याय २१।१) क्योंकि इतिवृत्त भी
वाङ्मय (रूप वाला) होता है।
४४८ नाट्यशास्त्र
४. इस वाचिक के अंग ( विभिन्न ) शास्त्रों में प्रसिद्ध नामाख्यातादि हैं
जिनका अगली कारिका से शिक्षार्थ विवरण आरम्भ करते हैं—'नामाख्या-
तादि' । यह शास्त्र योग अर्थों के द्वारा तथा शब्दरूपसौन्दर्य से होता है,
जिसके विभाग युक्त ( अंग ) हैं ये ही नामादि । नाम—जैसे 'मदनरिपु'
शब्द यह संज्ञावाचक है किन्तु शृंगार के प्रसंग में इसका प्रयोग वर्ज्य है ।
क्योंकि जो मदन का रिपु हो शृङ्गारी कैसे होगा । इस प्रकार व्यावहारिक
दृष्टि से यहाँ अनौचित्य है। नाम की तरह आख्यात-( क्रिया ) का भी
वैचित्र्याधान की स्थिति में ही प्रयोग इष्ट है। यथा कुमारसम्भव में—
'स्मरसि स्मर मेखलागुणैरुत गोत्रस्खलितेषु बन्धनम्' (कु० ४।८) ।
यहाँ 'स्मरसि' पद वैचित्र्य का आधायक है। उपसर्ग भी प्रकृत अर्थ
से योग रखे तो प्रयोज्य होता है अन्यथा होने पर नहीं। यथा—'अस्त्रैस्ता-
वन्मुहुरुपचितैर्दृष्टिरालुप्यते मे' ( मेघदूत ३०।४२ ) यहाँ 'उपचितैः' में 'उप'
उपसर्ग के कारण अर्थाधिक्य द्योतित होता है। इसी प्रकार उपसर्ग पद से ही
कर्मप्रवचनीय का भी उपलक्षण समझना चाहिए। निपात का उदाहरण—
'ह हा हा देवि धीरा भव' इत्यादि पद्य जहाँ 'ह हा' हा' से तीव्र खेद की
अभिव्यक्ति को साधा गया है। तद्धित का उदाहरण है रघुवंश का पद्य
'शात्रवञ्च पपुर्यशः' (४।४२) यहाँ अण् प्रत्यय से ग्रासी कृत या गुणीकृत
यश को ग्रहण करना व्यक्त किया गया है। समास का उदाहरण है—
'मध्ये गङ्गायमुनम् अनु' यहाँ समास के कारण एकार्थीभावगत वैशिष्ट
दिखलाया गया है। सन्धि का उदाहरण है—'भवतोया' यहाँ भवतो + या
सन्धि है जिसकी एकपद सी प्रतीति होती है। विभक्ति सुप् तथा तिङ् हैं
जिनसे कारक शक्ति और लिङ्ग आदि का उपग्रह उपलक्षित होता है।
यथा—'पाण्डिम्नि मग्नं वपुः' (विद्ध० भ० २।२१) इसमें शरीर को
मज्जनक्रिया का कर्त्ता बतलाया है तथा उस कर्तृत्व के अधीन शरीर
पाण्डुत्व का आधार हो गया है यह द्योतन अतीव रंजनकारी है। क्रिया का
उदाहरण है—'ग्रस्तं कुलान्तं जगत्' यहाँ ग्रस्तं पद का उपन्यास है न कि भुक्तं
का । यद्यपि ग्रसति पद से भक्षण मात्र परिभाषित किया है तथापि यह
ग्रास्तातिशय है कुलान्त के विषय में। इस प्रकार कविता के वाचक शब्द को—
जो काव्यरूप होते हैं—विभक्त करके यहाँ इस प्रकार दिखलाया गया है।
३७. छन्द नियत अक्षरों वाला होता है जिसमें अक्षरों (या मात्राओं)
का नियम रहता है (अर्थात् गुरु, लघु आदि का नियम होता हैं) इसके
परिशिष्ट : टिप्पणी, अध्याय १५ ४४९
विपरीत चूर्णपद होता है जहाँ अक्षर एवं संख्या का नियम नहीं हो । अर्थ की
अर्थात् शृंगार या वीरादि उनकी अपेक्षा से जहाँ अक्षर निबद्ध हों, यह
पाठ्य होता है, अतः गद्य कहलाता है ।
३८. यति = विराम तथा छेद = यति के द्वारा किये गये पद विभाग
इनसे युक्त । प्रमाणनियतात्मकम्-पाद की संख्या के प्रमाण के अनुसार
जिसका स्वरूप नियत = निबद्ध है ऐसा पद 'निबद्धपद' कहलाता है ।
३६. छन्द का लक्षण आरम्भ करने के लिये उसके स्वरूप को बतलाते
हैं--'एवम्' इत्यादि से । वर्ण गुरुत्व से एवं लघुत्व से युक्त विशिष्ट वर्णरूप
जो चार पादों से युक्त हो-पद्य है । यह पद्य पादों से निर्मित होता है । गद्य
तथा पद्य दोनों ही निगदनीय अर्थात् उच्चारणीय होते हैं तथापि गद्य ही इस
नाम से व्यवहार में प्रचलित है ।
४३-४६. एक अक्षर से आरम्भ कर २६ अक्षरों तक के पाद वाले
उक्ता से उत्कृति तक 'छन्द होते हैं । जिनके चारों पाद तुल्य लक्षण वाले हो वे
'सम' कहलाते हैं तथा जो प्रथम एवं तृतीय या द्वितीय एवं चतुर्थ पादो में
सम हों वे 'अर्धसम' तथा चारों पादों में अतुल्य लक्षण वाले पाद हों तो उन्हे
'विषम' छन्द कहते हैं ।
५०. ये छन्द हैं तथा इनके ये आगे भेद हैं । प्रश्न-इनके ये भेद कैसे हो
जाते हैं ? उत्तर-प्रस्तार में जो योग-युक्ति है उससे भेद बनते हैं जिसे आगे
बतलाया जाएगा ।
५१. यद्यपि एकाक्षर से आरम्भ होने वाले पादों के छन्द होते हैं किन्तु
भरतमुनि ने उन्हें छोड़ कर छः अक्षरों वाले पाद छन्दः से ही विवरण आरम्भ
किया है तथा प्रस्तरभेद भी दिये हैं । इसका कारण है काव्यों में तथा शास्त्र
ग्रन्थों में इन्हीं छन्दों की प्रयोग बहुलता तथा प्रयोग योग्यता रहना । दूसरा
कारण है इनके लक्ष्य में प्रयोग या उदाहरण की विरलता, फिर भी शास्त्रज्ञान
की पूर्णता के लिये निरुपयोगी भी इन प्रकारों का अध्ययन वेद की तरह किया
जाना उचित है ।
५२. 'वृत्तानि' इत्यादि के द्वारा भरत मुनि संख्या आदि को स्वकण्ठ से
पढ़ते है ।
● नाट्यशास्त्र में पद्य १०१ के पश्चात् प्राप्त अधिक एवं प्रक्षिप्त पद्यों को
मूल तथा हिन्दी व्याख्या सहित यहाँ दिया जा रहा है । सौकर्य के लिये इनमें
क्रम संख्या लगाई गयी है जो अन्य संस्करणों में भी ( मिलती ) हैं ।
२६ ना० शा० द्वि०
४५० नाट्यशास्त्र
१एतेषां छन्दसां भूयः प्रस्तारविधिसंश्रयम् ।
लक्षणं सम्प्रवक्ष्यामि २नष्टमुद्दिष्टमेव च ॥ [ १ ]
प्रस्तारोऽक्षरनिर्दिष्टो मात्रोक्तश्च ३तथैवहि ।
द्विकौ ग्लाविति वर्णोक्तौ मिश्रौ चेत्यपि ४मात्रिकौ ॥ [ २ ]
५गुरोरधस्तादाद्यस्य प्रस्तारे लघु विन्यसेत् ।
अग्रतस्तु सम्प्रदेया गुरुवः पृष्ठतस्तथा ॥ [ ३ ]
अब मैं इन्हीं छन्दों की प्रस्तारविधि का अनुसरण कर नष्ट और उद्दिष्ट
के लक्षणों को बतलाता हूँ । [ १ ]
प्रस्तार दो प्रकार का ( से ) होता है ( एक ) अक्षरों के निर्देश से होने
वाला ( वर्णिक प्रस्तार ) तथा ( दो ) मात्राओं से उक्त ( या मात्रिक
प्रस्तार ) । इसका उदाहरण है-वर्णों की संख्या आदि के नियम से जो द्वित्व
संख्या के परिमाण वाले ( द्विकौ ) गुरु तथा लघु ( ग्लौ ) हैं वे मात्रिक हैं
प्रथमं गुरुभिर्वर्णैर्लघुभिरत्तवसानजम् ।
वृत्तन्तु सर्वच्छन्दस्सु६ प्रस्तारविधिरेव तु ॥ [ ४ ]
गुर्वधस्ताल्लघु न्यस्य तथा द्विद्वि यथोदितम् ।
न्यस्येत् प्रस्तारमार्गोऽयमक्षरोक्तस्तु नित्यशः ॥ [ ५ ]
मात्रासंख्या विनिर्दिष्टो गणो मात्राविकल्पितः ।
मिश्रौ ग्लाविति विज्ञेयौ पृथक् लक्ष्यविभागतः७ ॥ [ ६ ]
८मात्रागणो गुरुश्चैव ९लघुनी चैव लक्षिते१० ।
आर्याणां तु११ चतुर्मात्रा प्रस्तारः परिकल्पितः ॥ [ ७ ]
( अर्थात् मात्राओं की गणना में उपयुक्त हैं । ) ये ही एक दूसरे को मिला कर
अधिकृत हो तो मिश्र हो जाते हैं । [ २ ]
प्रस्तार के उपाय की स्थिति इस प्रकार है कि प्रस्तार के समय आद्य गुरु
के नीचे लघु का विन्यास करे फिर उसके आगे गुरु रखे इसके नीचे लघु रख
कर आगे और पीछे गुरु रखे । इन अक्षरों तथा मात्राओं के प्रस्तार में प्रथम
१. एवं तु—क० । २. नष्टोद्दिष्टं तथैव च—क० । ३. समानोक्तं
तथैव च—क., समात्रोक्तस्तथैव च—क ( ड ) । ४. मातृका—क० ।
५. इमौ श्लोकौ न दृश्येते—क० पुस्तके ।
६. छन्दस्य—क० । ७. विभागशः—क० । ८. मात्रे द्वे गुरु विज्ञेयं
लघ्वेका तु प्रकीर्तिता—क ( भ० )। ९. लघुनीति च—क० ( प. ) ।
१०. विलक्षितैः—क० ( पं० ) । ११. स चतुमत्रि प्रस्तारे गण इष्यते—क० ।
परिशिष्ट : टिप्पणी, अध्याय १५ ४५१
भेद सर्व गुरु का और अवसानज अर्थात् अन्तिम भेद सर्वलघु का हो
जाता है। यही सभी छन्दों की अक्षरों से होने वाली प्रस्तार-विधि है
आशय यही कि प्रथम भेद सर्व गुरु का होगा तथा गुरु एवं लघु के
विन्यास का क्रम तब तक आगे करता चले जब तक सर्व लघु का पाद न बन
जाए। [ ३-५ ]
मात्रिक छन्दों में मात्राओं की संख्या के अनुसार गण का निर्देश रहता
है। अतः इसमें मात्राओं की कल्पना करके अलग-अलग लक्ष्यों के विभागों
से 'द्विकौ ग्लौ एवं मिश्रौ ग्लौ' सूत्र का उपयोग करे। क्योंकि मात्रा गण
एक गुरु या दो मात्रा और दो लघु या दो मात्राओं से लक्षित होता है।
आर्याओं में प्रस्तार चार मात्रा का होता है। [ ६-७ ]
१गीतकप्रभृतीनान्तु पञ्चमात्रो२ गणः स्मृतः ।
वैतालीयं पुरस्कृत्य षण्मात्राश्चास्तथैव च ॥ [ ८ ]
३त्र्यक्षरास्तु त्रिका ज्ञेया लघुगुर्वक्षरान्विताः४ ।
मात्रागणविभागस्तु गुरुलघ्वक्षराश्रयः ॥ [ ९ ]
५अन्त्याद् द्विगुणिताद् रूपाद् ६द्विद्विरेकं गुरोर्हरेत्७ ।
द्विगुणांश्च लघोः कृत्वा संख्यां पिण्डेन ८योजयेत् ॥ [ १० ]
आद्यं सर्वगुरु ज्ञेयं वृत्तन्तु समसंज्ञितम्९ ।
१०कोशे तु सर्वलध्वन्त्यं मिश्ररूपाणि सर्वतः ॥ [ ११ ]
वृत्तानां तु समानानां संख्यां संयोज्य तावतीम् ।
राशूनामर्धविषमां समासादभिनिर्दिशेत्११ ॥ [ १२ ]
गीति आदि में प्रस्तार पांच मात्राओं का होता है और वैतालीय आदि
छन्द में छः मात्राओं का होता है। लघु एवं गुरु अक्षरों से युक्त तीन-तीन
अक्षरों के वर्ग को 'त्रिक्' समझना चाहिये। [ यह त्रिकादि व्यवस्था छब्बीस
अक्षरों तक के पाद वाले वर्णिक छन्दों में रखी जाती है ] इसी प्रकार गुरु एवं
लघु अक्षरों के आधार पर मात्रिक छन्दों का ( भी ) गणविभाग होता
है। [ ८-६ ]
१. गीतिका—क ( भ० )। २. पञ्चमात्रस्तथेष्यते—क० । ३. त्र्यक्षरस्तु-
क ( न० )। ४. राश्रयाः—क ( न० ), । ५. आद्यात्—क ( भ० )।
६. ऊर्ध्व—क ( उ ), । ७. भवेत्—क० ( ड ), । ८. निर्दिशेत्—
क०। ९. संश्रितम्—क ( ङ ), । १०. कोशं—क० । ११. समासादपि
निर्दिशेत्—क ( भ० ), समासादिति निदिशेत्—क ( ड )।
४५२ नाट्यशास्त्र
संख्या को द्विगुणित करे तथा द्विगुणित करने के पश्चात् उस संख्या के
अन्तिम द्विगुणित रूप वाले गुरु से एक निकाल दे। इसके पश्चात् लघुस्थ
द्विगुणित संख्या को पिण्ड रूप में (महायोग के रूप में) एकत्र कर जोड़
दें। [यही उद्दिष्ट क्रिया है।] [१०]
सम संख्या के सम संज्ञक वृत्त को आदि पाद को सर्व गुरु से युक्त और
अन्तिम को सर्व लघु वाला समझना चाहिए। कोश अर्थात् मध्यवर्ती सभी
पादों में मिश्र रूप रहता है अर्थात् सर्वादि और सर्वान्त पादों के मध्यवर्ती
पादों में गुरु लघु मिश्रित रूप में होते हैं। [११]
समान (संख्या वाले) वृत्तों की समास अर्थात् जोड़ी गयी संख्या को
उतने प्रकार से जोड़ लें। इसी तरह समान जोड़ी हुई संख्याओं में अर्धविषम
संख्या वाले छन्दों में एक राशि को घटा कर बतलावे। [१२]
एकादिकां तथा संख्यां छन्दसो विनिवेश्य तु¹।
यावत् पूर्णन्तु पूर्णेन पूरयेदुत्तरं² गणम् ॥ [१३]
³समानां विषमाणां च संगुणय्य तथा स्फुटम्⁴।
राश्युनामभिजानीयाद्विषमाणां ५ समासतः ॥ [१४]
एवं ६कृत्वा तु सर्वेषां परेषां पूर्वपूरणम्⁷।
⁸क्रमान्नैधनमेकैकं ⁹प्रतिलोमं विसर्जयेत् ॥ [१५]
सर्वेषां छन्दसामेवं¹⁰ लध्वक्षरविनिश्चयम्।
जानीत समवृत्तानां ¹¹संख्यां सङ्क्षेपतस्तथा ॥ [१६]
संख्या के ज्ञान के उपाय को दिखलाते हुए कहते हैं कि—छन्द की
एकादिक संख्या का क्रमशः निवेश कर के जब तक पूरा नहीं हो तब तक पूर्व
पूर्व गण से उत्तरवर्ती (उत्तर) गण को पूर्ण करे। [१३]
इस प्रकार सम एवं विषम मात्राओं की संख्या को स्पष्ट रूप से गुणन
कर समास अर्थात् जोड़ लगाने के पश्चात् विषम वृत्तों की राशि को घटा दे
१. च—क०। २. तावतोऽन्तरं—क (च०)। ३. समार्ध—क.
(न०); तात्त्वार्थविषमाणां तु—क (भ०)। ४. संख्यां कृत्वा तु तावतीम्-
क (न०); संख्यां संयोज्य तावतीम्—क (ढ०)। ५. मभिजानीत—क
(न०), मभिजानीते—क (ढ)। ६. कुर्यात् तु सर्वेषां—क (ड),।
७. पूर्व पूर्वस्य पूरणम्—क (ड),। ८. नैधनादेकमेकं तु—क०। ९. प्रति-
लोम्यक्रियात्मकम्—क०। १०. छन्दसां न्यस्य—क०। ११. व्याससङ्क्षे-
पतस्तथा—क (भ०); संख्या चाङ्गं समासतः—क०।
छित्त्वाऽर्धेन:
It has 'ध' with 'े' and repha 'र्'.
Now compare that with line 10:
In line 10, the letter has 'थ' or 'ध'?
Wait, look at footnote 1: "१. वृत्तार्धं—क०;" -> वृत्तार्धं has 'र्ध'.
In line 10, let's look at the letter: it has an open top? 'थ' has a closed loop and breaks the headline (shirorekha).
In line 10, does the shirorekha break over that letter?
Yes, it does! Wait, both 'थ' and 'ध' break the shirorekha in Devanagari!
Wait, but is it 'र्धे' or 'र्थे'?
Let's check if it's 'चात्यर्धे' or 'चात्यर्थे':
In many Sanskrit texts, we see "चात्यर्धे" or "चात्यर्थे".
Wait, look at the letter itself: it's round at the bottom, like 'ध'. 'थ' curves down to the line then goes right to the vertical stem. 'ध' has two rounded bellies!
Look at line 10: it has two rounded bellies! That is a 'ध'!
And does it have a repha? Yes, there's a curve attached to the e-matra: 'र्धे'.
So it is `चात्यर्धे
षोडश अध्याय
(वृत्तविधान)
१. जैसा कि पिछले अध्याय में बतलाया है कि—'अक्षराणि निवेशयेत्'
इत्यादि। उसी अक्षर-निवेश को श्रव्यता के लिये रसायन बनाने के उद्देश्य
से छन्दों के विभाग को दिखलाने का उपक्रम करते हैं—'छन्दाँस्येवम्'
इत्यादि के द्वारा। इन छन्दों से (जिन्हें पूर्व अध्याय में दिखलाया था)
बने हुए वृत्तों का—जिनका नाट्य में प्रयोग अभीष्ट है—लक्षण बतलाता हूँ।
ये वृत्त कौन है? जिनमें गुरु तथा लघु के नियम के कारण श्रव्यता का
आधान हों ऐसे वृत्तों को। 'वृत्त' पद में अधिकरण में 'क्त' प्रत्यय हुआ है।
[अतः जो सुनने या सुनाने के योग्य हों वे 'वृत्त' होते हैं]
२. अब छः अक्षरों वाले छन्द से आरम्भ कर २६ अक्षरों वाले उत्कृति
पर्यन्त छन्दों का (जो प्रयोग योग्य हों। इस तथ्य को पिछले अध्याय में
दिखलाया जा चुका है अतः अब उसी) का उपक्रम करते हैं। 'गायत्र' =
गायत्र्या एव गायत्रम्। यहाँ 'तेन निर्वृत्तम्' से अण् प्रत्यय किया गया है।
अतः गायत्री से जो सम्पन्न है वह गायत्र है। इस अध्याय में भरतमुनि ने
त्रिक (या तीन गुरु लघु) के अनुसारी कुछ छन्दों के लक्षण कहे हैं तथा
अन्य आचार्यों ने गण के आधार पर लक्षण कहे थे। अतः यहाँ दोनों ही प्रकार
का पाठ विचारार्थ के लिया गया है। (जब कि अर्थ उनका एक ही है)।
[यहाँ यह ध्यान देने योग्य है कि पिङ्गलाचार्य के पूर्व छन्दो लक्षण गुरु,
लघु की गणना के निर्देश पर प्रचलित था, गणों के आधार पर नहीं।
इस प्रकार यहाँ दोनों ही रूप में प्राप्त लक्षण हमारे द्वारा भी पाठान्तर
आदि के साथ संगृहीत कर लिये गये हैं]
१५. सिंहलेखं वृत्तम् = सिंह के नखों से कुरेदने के समान घट रही है
या सिंहलेख वृत्त (छन्द) सी हो गयी है।
२६. मयूरसारणी—मयूरीभिः सारी गतिविशेषो यस्यास्तादृशी। यद्वा
मयूरवद् सारो व्याकोचमस्याः ॥
अर्थात् मयूरी के सदृश गति या मयूर के समान विकसित या फैला
हुआ स्वरूप जिसका रहे ऐसा छन्द।
परिशिष्ट : टिप्पणी, अध्याय १६ ४५५
२८. दोधकवृत्तम् — दोधकेन मन्दं मन्दं गीयमानं वृत्तम् दोधकवृत्तम् ।
अर्थात् दूध दुहने की तरह मन्द मन्द जो गाया जाए ऐसा छन्द ।
३४. उपेन्द्रवज्रा — उपेन्द्र का वज्र जिसमें उपमान हो वह । यहाँ मत्वर्थीय
अच् प्रत्यय कर उपेन्द्रवज्रम् पद बना । उपेन्द्रवज्रम् में उपमित समास
है । (नायिका के स्मित एवं कान्ति से) इन्द्रधनुष सदृश वर्णों का
वैचित्र्य (सम्मिश्रण भी) जहाँ हो ऐसी । इन्द्रधनुष में (भी) वर्णों का
वैचित्र्य है तथा नायिका में (स्वयं के) वर्ण की विचित्रता है ही ।
४३. तोटकवृत्तम् = तोटक = छेदक का वृत्त चेष्टित तथा तोटक नामक
वृत्त (छन्द) ।
७४. नान्दीमुखी — नान्दी पाठ के समय बजाए जाने वाले दन्दुभि वाद्य
की तरह जिसका (विस्तीर्ण या बकवासी) मुख हो ऐसी ।।
१२०. यहाँ 'नानावृत्त-समुद्भूवाः' कहने का उद्देश्य (आशय) यह है
कि समवृत्त छन्द के पद्यों के लक्षण की पृथक् पाद में पृथक् कर समता या
विषमता का विद्वान् स्वयं 'ऊह' या तर्कना करें ।
१२१. दो सम = प्रथम और तृतीय तथा द्वितीय और चतुर्थ ये दो पाद
सम रहें । प्रथम द्वितीय तथा तृतीय चतुर्थ ये दोनों पाद विषम रहे । यहाँ द्वौ
पद वीप्सागर्भ है अर्थात् दो दो बार कहना इष्ट है ।
१२३. सिद्धम् = अर्थात् लक्षित या जिसका लक्षण किया गया है ।
सार्वपादिकम् = सम्पूर्ण पाद में यह लक्षण रहना चाहिए । छेद = पादों का
विभाग या यति ।
१३७. सगुर्वन्तः = गुरु जिसके अन्त में रहे ऐसा गण अर्थात् सगण
तथा सर्वलघु अर्थात् नगण या त्रिक के अन्त स्थित गुरु वर्ण । प्रथम अक्षर
के पश्चाद्वर्ती चतुर्थ अक्षर से आगे वाला या पूर्व में लघु यकार भी इष्ट
नहीं होता अर्थात् इनका प्रयोग नहीं रहना चाहिए ।
१४४. हतशोभानि = काव्यों में प्रयुक्त नहीं होते, व्यर्थ या शोभाहीन
होने के कारण । अर्थात् पाठ्य काव्यों में गीत का प्रयोग नहीं होता ।
१४५. गीतों में पक्षमानता का अभाव होता है तथा वृत्तों में श्रव्यता
की अपेक्षा नहीं होती । गीत में केवल लय एवं तालों की योजना के लिये
अर्थ-साम्य का विधान होता है, अतएव गीतों में मात्रा एवं वर्णों के नियम
का आश्रय या अनुसरण किया जाता है । अतः गीतों में ही ऐसे वृत्तों की
योजना की जाए तो पाठ्य के उपयुक्त 'वृत्त' न हों ।
४५६ नाट्यशास्त्र
१७७. मात्रावृत्तों की संख्या ज्ञान के लिये बतलाते हैं—'सर्वेषमित्यादि
से । विकल्प के द्वारा पूर्व में जो संख्याभेद किया था उसका उत्तरवर्ती
संख्या के साथ गुणन करने पर जो पिण्डीभूत संख्या हो उसे दिखलाये ।
इनमें समसंख्या के पांच और विषम के चार भेद होते हैं । षष्ठ के दो
तथा द्वितीयार्ध में एक भेद, अष्टम में भी एक ही भेद होगा । इस प्रकार
यहाँ पूर्व अङ्क से उत्तर अङ्क का गुणन करे तथा उससे अन्य अंक का तो इस
प्रकार सोलह भेद हो जाते हैं । जैसे चार का पांच से गुणन करने पर २०
तथा बीस को चार से गुणन करने पर (२० × ४ = ८०) अस्सी होते हैं ।
फिर अस्सी में चार का गुणा करने पर (८० × ४ = ३२०) तीन सौ बीस
हो जाते हैं इसी प्रकार आगे भी ये बढ़कर ३२ लाख ८ हजार २० कुल हो
जाते है इसका संकलन निम्न श्लोक में इस प्रकार है:—
"आर्या शतसहस्राणि ज्ञेया ह्येकान्नविंशतिः ।"
अष्टौ सहस्राणि तथा विशतिश्च प्रमाणतः ॥
१७६. 'काव्यबन्धाः' इत्यादि के द्वारा वृत्तों का उपसंहार करते हुए
अग्रिम अध्याय गत लक्षण, गुण आदि का संकेत किया गया है । यहाँ काव्य
को एक निर्माण वस्तु दिखाया कर यह दिखलाया गया है कि यदि प्रासाद का
निर्माण करना हो तो प्रथम उसमें भूमि की अपेक्षा होगी इसी प्रकार काव्य
के निर्माण में आधारभूत छन्दों की (भूमि की तरह) विधि होती है । यह
काव्य में आधार होने से भित्ति स्थानीय माना जाता है, तब इस भित्ति पर
लक्षणादि की योजना एवं गुणादि का निवेश चित्र कर्म तथा पच्चीकारी
के समान होता है । इसके बाद इस काव्य प्रासाद में झरोखों के समान
दशरूपक का विभाग, प्रयोग के निरूपण के तुल्य काकु, स्वर आदि वाचिक
का स्वरूप कहा जा रहा है । इस वाचिक अभिनय के क्रम में वृत्तों का
विधान यहाँ दिखलाया गया । यद्यपि रूपक निर्माण की वेला में परिपक्व
प्रज्ञा के सहृदय को क्रम प्रतिभास नहीं होता फिर भी अपोद्धार वृद्धि से
उसकी कल्पना की जाती है । प्रबन्धनिर्माण के समय युक्त या उचित
अभ्यास की सम्पत्ति अर्थात् अभिनय के लिये आधार तैयार करना । इसी
को 'क्रम' कहा गया है। इस क्रम का उल्लंघन कर नाटकादि का निर्माण
करने पर बड़ी हानि या प्रमाद या स्वाच्छन्द्य हो जाता है—क्योंकि सभी
रूपक रचयिता जन कालिदास की तरह नहीं होते । इसके अतिरिक्त
इनका प्रतिभा के अंगभूत ज्ञानातिशय को भी पूर्वजन्म में किये गये
परिशिष्ट : टिप्पणी, अध्याय १६ ४५७
अभ्यास से उत्पन्न संस्कार पाटव से ही उत्पन्न समझना चाहिए। आचार्य ने
कहा भी है कि—
महाकवीनां पदवीमुपात्तामारुरुक्षताम्।
नासंस्मृत्य पदस्पर्शन्सम्पत्सोपानपद्धतिः ॥
“काव्य निर्माण से उपात्त महाकवियों की पदवी पर आरोहण करने
की भावना रखने वाले व्यक्ति जब तक पदों का स्पर्श नहीं करेंगे तब
तक 'सोपानपद्धति' पर आरोहण का क्रम सम्भव कैसे होगा या सम्पन्न नहीं
होगा।”
सप्तदश अध्याय
(काव्यलक्षणादि)
१-५. पूर्व अध्याय में छत्तीस लक्षणों से युक्त 'काव्य रचना' की बात
(अध्याय समाप्ति के साथ) कही गयी थी। यहाँ यह प्रश्न है कि गुण,
अलंकार तथा रीति का काव्य में आधान प्रसिद्ध है, किन्तु काव्य में 'लक्षण'
भी होते हैं यह (अति) प्रसिद्ध नहीं। व्यवहारों से तो 'पुरुष' को लक्षण,
गुण एवं अलंकारों से सम्पन्न होना उपयुक्त माना गया है परन्तु पुरुष की
तरह काव्य में लक्षणादि का व्यवहार समुचित नहीं हो सकता। क्योंकि
पुरुष शरीरधारी होता है, अतः शुभाशुभ लक्षण शरीर में होते हैं तथा
अलंकारों से उसकी शोभा बढ़ती है। किन्तु काव्य के निर्माण या अनुभूति
के समय लक्षण की गणना नहीं की जाती। दण्डी ने भी (इसी कारण)
काव्य की शोभा संवर्धक धर्मों को 'अलङ्कार' कहा है तथा गुणों के मध्य
प्रसाद आदि को बतलाते हुए यह सूचित किया कि गुण एवं अलङ्कारों का
विभाग करना कठिन ही है। इसके उत्तर में यही कहा जा सकता है कि
गुण चिन्मय आत्मरूप होकर शृङ्गारादि रसों में अवस्थित होने के कारण
शृङ्गार में उन्हें लक्षित करना पड़ता है। जो पद काव्य के शब्द एवं अर्थ
गत शरीर में पृथक् सिद्ध हो वही लक्षण है। प्रकृत में अलंकारों से युक्त
काव्य भी लक्षणों के बिना शोभित नहीं होता। इस प्रकार यह स्पष्ट है
कि गुण, अलंकार तथा लक्षण में भेद निश्चित है। इस भेद का प्रतिपादन
विश्लेषणात्मक पद्धति से न्यस्त प्रक्रिया के द्वारा किया है जिससे कवि प्रतिभा
में भासमान वस्तु भाषा में प्रकट की जाती है तथा उसका काव्य के पाठक
या सहृदय दर्शक को बोध होता है। परन्तु लक्षण एवं अलंकारों में भेद के
प्रतिपादन का उद्देश्य काव्यरचना एवं काव्यगत रस के आस्वादन को
सर्वगम्य या सरल बनाना है।
लक्षण वह अर्थ है जो कविव्यापार की प्रकटीकरण प्रक्रिया से ऐसे
विलक्षण आनन्दप्रद रूप में परिवर्तित कर दिया जाता है कि वही अर्थ
अपने सामान्य रूप से भिन्न ज्ञात होकर (अपने) विलक्षणरूप में रस का
विधायक अंश बन रसानुभव को उत्पन्न करने में सहायक होता है। लक्षण ही
रसात्मक काव्य को अरसात्मक काव्य से पृथक् या भिन्न बनाता है।
परिशिष्ट : टिप्पणी, अध्याय १७ ४५९
इसे इस प्रकार समझें कि- गुण तथा अलंकार दोनों ही शब्दार्थ से
सम्बद्ध होते हैं परन्तु लक्षण पूर्णतः कवि व्यापार से संलग्न होता है, क्योंकि
कवि के प्रयत्न से (ही) काव्य में शब्दार्थगत वैचित्र्य का आधान होता है।
यह जिस प्रयत्न से होता है वह समग्र प्रयत्न 'लक्षण' ही है। इसी के कारण
काव्य कविकर्म कहा जाता है। आचार्य अभिनवगुप्त ने इसे एक उदाहरण
देकर समझाया कि 'पुष्टता' शरीर का गुण है परन्तु जब यही सुन्दरी के
स्तनों में रहे तो वह स्तन का लक्षण बन जाता है और वही कटि में रहे तो
सुन्दरी का कुलक्षण बन जाता है। इसी तरह एक प्रकार से कही जाने वाली
वस्तु उसी क्रम में रसोचित विभाव के रूप में प्रकट हुई तो वह 'लक्षण' है।
इसी कारण गुण एवं अलंकार ऐसे लक्षण से स्वतः भिन्न हो जाते हैं।
इसी प्रकार कवि व्यापार के बल से लौकिक वस्तु का भी काव्य में
अलौकिक स्वभाव में प्रकट होना 'लक्षण' कहलाता है। इसीलिये लक्षणों के
आश्रयण के बिना काव्य में अलङ्कारों को स्थान नहीं मिल सकता। इस
प्रकार अर्थालंकारों के बीजभूत एवं कथा शरीर में विचित्रता (को) प्रदान करने
वाले वक्रोक्ति-रूप सम्पन्न समस्त चमत्कारों का 'लक्षण' शब्द से व्यवहार किया
जाता है। लक्षण गुण एवं अलङ्कारों की अपेक्षा न रख कर स्वयं अपनी ही
महिमा से प्रोद्भासित होते हैं तथा महापुरुष के शरीर में विद्यमान पद्मादि
रेखाओं से सुलक्षण की तरह काव्य में सौन्दर्य का आधान करते हैं। रत्नखचित
आभरण से जैसे नायकादि का सौन्दर्य शोभित नहीं होता वही स्थिति अलंकारों
के बिना की है कि जिससे काव्य की सौन्दर्य शोभा हो सके। गुण भी धैर्यादि
की प्रवृत्ति से द्योतित होकर शोभित होता है। इसी प्रकार (गुण भी) काव्य
गत शब्द तथा अर्थ की रचना के आश्रय में स्थित रहता है। परन्तु जैसे
लक्षणहीन पुरुष सुन्दर शब्द से अभिहित नहीं होते, ठीक उसी तरह प्रौढ़काव्य
अपने कथा शरीर, गुण एवं अलङ्कारों से प्रोज्वक होकर भी नीरसता की स्थिति
में प्राप्त होकर अभिधान के योग्य नहीं होता है (इसका कारण है लक्षण का
न होना)। कथाशरीर से मण्डित (दृश्य) काव्य में लक्षणों का सम्पादन
अवश्य किया जाता है (अल्प प्रसार के कारण) मुक्तकादि खण्डकाव्यों में नहीं।
इसीलिये भरत मुनि ने मुक्तकादि से भेद दिखलाने के लिये ही 'काव्यवन्धास्तु
कर्तव्या' (१६।१७६) कहा भी है। यद्यपि लक्षण असंख्येय हो सकते हैं
किन्तु चमत्कार विशेष से गरिष्ट छत्तीस लक्षणों को ही भरत ने निदर्शित किया
है। मुनि के शिष्य कोहलादि आचार्यों ने जिन अन्य बातों को अतिरिक्त रूप
में कहा भी था उनमें से कुछ अतिरिक्त लक्षण के रूप में प्रसिद्ध हो गये तथा
४६० नाट्यशास्त्र :
काल प्रवाह से (कारण) भरत के ग्रन्थ में ही पाठान्तर के रूप में प्रविष्ट या
समायोजित कर दिये गये। ऐसे सभी लक्षणों का यथा स्थान विवरणादि यहाँ
प्रकाशित किया जा रहा है।
६. भूषण :—जहाँ भरतोक्त उपमा आदि अलंकारों तथा श्लेष आदि
गुणों से कथा-शरीर की रचना समुल्लसित होती हो-वह 'भूषण' है। यहाँ
'चित्रार्थैः' पद के द्वारा-विभावादि रूप सामग्री के प्रत्यायक होने के कारण
उसके उद्योतक अर्थ विशेषों के द्वारा या वक्रोक्ति से कथा शरीर का समुल्लास
किया जाना-सूचित किया गया है। यथा—
रत्नावली नाटिका में प्रथमाङ्क में यौगन्धरायण का निम्न वचन—
'विश्रान्त विग्रह-कथो रतिमाङ्गनस्य चित्ते वसन् प्रियवसन्तक एव साक्षात् ।
पर्युत्सुको निजमहोत्सवदर्शनाय वत्सेश्वरः कुसुमचाप इवाभ्युपैति ॥ (र० १।८)
[ जिसकी शासन पद्धति में विग्रह की बात नहीं होती, जिन पर प्रजाजन
का अनुराग है, जो सब के चित्त में बसते हैं, जिन्हें वसन्तक अति प्रिय है वही
यह वत्सराज उदयन साक्षात् अशरीरी मदन होकर साथ में रति को लिये
हुए प्रजाजन के चित्त में निवास करने वाले मदन सा महोत्सव को देखने के
लिये यहाँ आ रहा है । ]
यह भूषण की ही अतिशयिता है जिसमें सामान्य बात से काव्य का
पार्थक्य स्पष्टतः दिखलाई देता है। अतः जहाँ गुण एवं अलङ्कारों के द्वारा
कथारूप वक्रोक्ति अतिशयित हो जाती या की जाती हो वहाँ 'भूषण' समझना
चाहिए यह स्पष्ट है।
७. अक्षरसङ्घात :—यहाँ विविध श्लेषमयी उक्तियों से या अक्षरों के
विपर्यासादि से उक्ति प्रत्युक्ति में विचित्रता आये तो 'अक्षर-संघात' है। जैसे
उभयाभिसारिका में—
विट :—भगवति, वैशिकाचलोऽहमभिवादये ।
परिव्राजिका—न वैशिकाचलेन प्रयोजनं न च वैशेषिकाचलेन ।
विट :—अस्यैतत् कारणम् ?
परिव्राजिका—षट्पदार्थबहिष्कृतैः सह सम्भाषणमस्मद्गुरुभिनिरुद्धम् ।
[ विट—भगवति मैं वैशिकाचल आपका अभिवादन करता हूँ।
परिव्राजिका—मुझे न वैशिकाचल से कुछ काम है न वैशेषिकाचल से ।
विट—इसका कारण ।
परिव्राजिका—छः पदार्थों का बहिष्कार करने वालों से संभाषण न
करना हमारे गुरुजी ने बतलाया है । ] इत्यादि ।
परिशिष्ट : टिप्पणी, अध्याय १७ ४६१
अथवा—“अभिज्ञानशाकुन्तल” के सप्तमांक में-‘शकुन्तलावण्यं पश्य’
में ‘शकुन्तला’ पद से शकुन्त के लावण्य तथा शकुन्तला को सूचित करना ।
८. शोभा :—जहाँ सिद्ध प्रयोजनों से असिद्ध का चमत्कारी अर्थ निर्णय
करता या सूचना देता है और वह भी शुभ संघटना, श्लेष, वक्रोक्ति या ध्वनि
की महिमा द्वारा तो वह ‘शोभा’ होती है । कई लोक-स्वभाव के प्रकटन को
‘शोभा’ बतलाते हैं । अन्य जन युवक एवं युवतियों के सहज मनोभावों का
प्रकटन ‘शोभा’ मानते हैं । यह अर्थ प्रधान वस्तु में परम शोभा प्राप्त करती
है । जैसे रत्नावली के प्रथम अंक में यौगन्धरायण—‘द्वीपादन्यस्मादित्यादि’
( २ ० १ । ६ ) के बाद कहता है कि—
प्रारब्धेऽस्मिन् स्वामिनो वृद्धिहेतौ
दैवेनेत्थं दत्तहस्तावलम्बे ।
सिद्धे भ्रान्तिर्नास्ति सत्यं तथापि
स्वेच्छाचारी भीत एवास्मि भर्तुः ॥ ( रत्ना ० १ । ७ )
[ स्वामी के अभ्युदयार्थ जो कार्यारम्भ किया गया है उसी में भाग्य के
द्वारा इस प्रकार सहारा दे दिया है कि अब उसकी सिद्धि में सन्देह नहीं रहा
है, परन्तु फिर भी यह सभी मैंने अपने ही मन से किया इसलिये अपने स्वामी
से भयभीत मैं अवश्य हूँ । ]
कथाशरीर की संघटना रूप शोभा के आधार पर ही यहाँ मधुरता की
प्रसक्ति है ।
६. उदाहरण:—जहाँ दूसरों के ( शत्रु आदि जन के ) परम रहस्य
पूर्ण या दुर्भेद्य अर्थ को तुल्यार्थक वाक्य से दूसरों के लिये निपुण जन प्रकाशित
कर दें तो—‘उदाहरण’ है । जैसे देवीचन्द्रगुप्त नाटक में प्रावेशिकी ध्रुवा से
संशयाकुल चित्त वाले चन्द्रगुप्त के प्रवेश सूचक अर्थ को द्योतित करना ।
जैसे—
एसो सिअकर-वित्थर-पणासिआसेसवेरितिमिरोहो ।
णिअविहवरोणचन्दो गअणगिहं लंघिऊँ विसई ॥—
एषः शीतकरविस्तरप्रणाशिताशेषवैरितिमिरौघः ।
निजविभववरश्चन्द्रो गगनगृहं लङ्घितुं विशति ॥
[ यह चन्द्र अपने शीतल करों के फैलाव से समग्र शत्रुभूत अन्धकार को
नष्ट करते हुए अपने ही आकाश रूप गृह को पार करने की इच्छा के लिये
वहाँ प्रवेश कर रहा है । ]
४६२ नाट्यशास्त्र
१०. हेतु :— जो वचन फल को सिद्ध करने का सामर्थ्य लिये हो,
जिसमें शब्द एवं अर्थ परिमित रहे तथा जो विचित्र शैली में कहे जाएँ तो—
'हेतु'। जैसे तापसवत्सराज के षष्ठ अंक में मरण का निश्चय करने वाली
वासवदत्ता को समझाने के लिये यौगन्धरायण का यह कथनः—
आसृष्टेः प्रतिपार्थिवं युवतयो जाताः मनोवल्लभाः
मग्नास्ते व्यसनार्णवे च बहवस्ताभिः सहैवेश्वराः ।
देव्या यत्तु कृतं तदाविकलतामुत्सृज्य लोकोत्तरं
तस्यैषा कृपणोचितेन विधिना किं ग्लानिरुत्पद्यते ॥
[ जब से इस सृष्टि का आरम्भ हुआ है तभी से प्रत्येक राजा को उसकी
मनोनुकूल युवतियाँ प्रिय होती रही है । ये प्रेयसियाँ घोर शङ्का में निमग्न
रही और उनके समर्थ एवं ईश्वर पति भी इसी में डूब गये । किन्तु महादेवी
ने जो उस समय ( भी ) विकलता को छोड़ कर लोकोत्तर कार्य कर
डाला उसके विषय में अब यह दीनता से ग्लानि क्यों उत्पन्न हो रही है । ]
यहाँ देवी ने जो किया वह इष्टार्थ साधक है तथा उससे शीघ्र ही आप
स्वयं शुभफल का अनुभव करेंगी।" इत्यादि में हेतु है ।
११. संशय :—वाक्य के पूर्णतः समाप्त न होने से साध्यविषय के स्वरूप
या अवस्था में सन्दिग्धता आना 'संशय' है। इसका अर्थ एवं काम प्रधान
रूपकों में निपुणता के साथ प्रयोग रखा जाता है। जैसे—कुन्दमाला के षष्ठ
अंक में रामायण कथा के वाचक लव तथा कुश कहते हैं:—
सीतां निर्जनसंम्पाते चण्डश्वापदसङ्कुले ।
परित्यज्य महारण्ये लक्ष्मणोऽपि न्यवर्तत ॥
ततः प्राणैः परित्यक्ता निराशा जनकात्मजा ।
( इति तूष्णीं भवतः )
अप्रियाख्यानभीतेन कविना संहृता कथा ॥
किमितः कल्याणमावेदयति । एवं तावदनुयोक्ष्ये । ( इति पृच्छतः )
[ निर्जन तथा भयंकर हिंसक प्राणियों से व्याप्त महारण्य में सीता का
परित्याग कर ( जल्द ) लक्ष्मण जी वापस चले गये तब प्राणों से भी प्रिय एवं
प्रियजन के द्वारा छोड़ी गयी निराश सीता ने—
( इतना कहकर चुप हो जाते हैं )
( तब राम और लक्ष्मण कहते हैं कि )— सम्भव है अप्रिय सत्य के
कहने से डर कर कवि ने यहीं कथा का उपसंहार कर डाला हो । ]
यहाँ संशय है। संशयालङ्कार का चमत्कार संशय नामक इस लक्षण
से भिन्न होता है।
१२. दृष्टान्त :-धर्म के अविरोध से सभी जन के मन का आकर्षक
ऐसा वचन जो सकारण तथा निदर्शन युक्त हो 'दृष्टान्त' कहलाता है। जैसे
'धूर्तविट' में 'स्त्रीषु प्रसङ्गो न कर्तव्यः इस विषय में भाव का क्या मत है ?
यह पूछे जाने पर विट-भोः उपदेशमात्रं खल्वेतत् । तमहं न पश्यामि यः स्त्रीषु
प्रसङ्गं न गच्छेत् । श्रूयन्ते हि महेन्द्रादयोऽप्यहल्यासु विकृतिमापन्नाः' इत्यादि
कथन में दृष्टान्त है।
१३. प्राप्ति :-इसका उदाहरण कुन्दमाला के तृतीय अङ्क में बालुका
पर पद चिन्हों को देखकर लक्ष्मण ने राम के प्रति कहा—
विलासभोगेन परिश्रमेण वा स्वभावतो वा निभृतानि मन्थरम् ।
पदानि कस्याश्चिदिमानि सैकते प्रयान्ति तुल्यं कलहंसविभ्रमम् ॥
रामः (निर्वर्ण्य सहर्षम् ) किमुच्यते कस्याश्चिदिति । ननु वक्तव्यं
सीतायाः पदानीति । पश्य—
समानं संस्थानं निभृतललिता सैव रचना
तदेवैतद्रेखा कमलरचितं चारुतिलकम् ।
यथा चेयं दृष्ट्वा हरति हृदयं शोकविधुरं
तथा ह्यस्मिन् देव्या सपदि पदपङ्क्तिर्विनिहिता ॥
[—क्रीड़ा करते हुए, परिश्रम से भागते हुए या स्वभावतः मन्थरता से
बालुका में धंसे हुए ये किसी के पैर कलहंस के विभ्रम की शृङ्गार मयी
चेष्टाओं की समता कर रहे हैं।
राजा राम— ( ध्यान से देखकर प्रसन्न हो ) अरे ये किसी के पैर हैं
ऐसा क्यों कहते हो । अरे भैया, ये तो सीता के ही पैर हैं। देखो--पैरों का
विन्यास समानरूप वाला है, वही निभृत (विनीत ) एवं ललित रचना
है, यही वह रेखा है जिनसे तिलक एवं कमल बड़े ही सुन्दर रूप में बन गये
है। देखने पर यह पदपंक्ति शोक से विधुर विकल हृदय को आकृष्ट कर
रही है। जिससे प्रतीत होता है कि यहाँ ( सीता ) देवी ने अपने पैरों को
अभी तत्काल ही रखा है। ]
यहाँ प्राप्ति है ।
१४. अभिप्रायः - अभूतपूर्व अर्थात् अद्भुत या असत् अर्थ जो केवल
कल्पित है। अन्य आचार्य अभूतपूर्व पद का अर्थ आस्वाद्य पदार्थ में अपूर्वता
४६४ नाट्यशास्त्र
का अभिमान करते हैं परन्तु यह भावविलक्षणता से शून्य होने पर आचार्य
तौत के मत में अनुपयुक्त है। जैसे तापसवत्सराज के चतुर्थ अंक में साङ्कृत्या-
यनी यौगन्धरायण के उद्योग को देखकर सोच कर चर से कहती है—
दूरमुदीर्णे रिपौ वेषमकिञ्चित् करे च विजिगीषौ ।
भवता तु नयगुणशतैः सोऽयमसूत्रः पटः क्रियते ॥
[ शत्रु अपनी जबरदस्त शक्ति के साथ बडे जोर से उठ खड़ा हुआ है
विजिगिषु महाराज इस समय कुछ भी करने की स्थिति में नहीं है और आप
सैकड़ो नीतिरूपी उपायों से बिना सूत्र के ही अपना कपड़ा बुन रहे हैं । ]
१५. निदर्शन :—प्रसिद्धानां अर्थात् देवताओं का, परापेक्षा = साध्या-
कांक्षा से व्युदासार्थ = हटाने या दूर करने के लिये। जैसे:—उभयाभि-
सारिका में—
शान्ति याति शनैर्महोषधिवलादाशीविषाणां विषं
शक्यो मोचयितुं मदोत्कटकटादात्मा गजेन्द्राद्वने ।
ग्राहस्यापि मुखान्महार्णवजले मोक्षः कदाचिद् भवेद्
वेशस्त्रीवडवामुखानलगतो नैवोत्थितो दृश्यते ॥
[ औषधियों के प्रभाव से सर्पों का विष शान्त हो जाता है, अरण्य में
प्राप्त मदोन्मत्त हाथी से अपने आपको छुड़ाया जा सकता है, मदोत्कट
ग्राह से भी महासमुद्र में मोक्ष हो सकता है परन्तु वेशस्त्री रूप वडवा की
मुखाग्नि में पड़ा हुआ व्यक्ति कभी नहीं निकला और उसे किसी ने भी
आज तक उठते हुए नहीं देखा ! ]
इसी कारण इसका दृष्टान्त से स्वतः भेद हो जाता है।
१६. निरुक्तः —पूर्वोक्तार्थ = पूर्व में जो किसी बाह्य अर्थ का सम्बन्धी
कोई अर्थ कह दिया गया है उसकी प्रसिद्धि के लिये अनवद्य भाव का वाचक
जो शब्द कहा जाए वह निरुक्त है। अतः इससे अन्यथा करने पर अर्थ
निरर्थक हो ही जाएगा। जैसे वत्सराजचरित के प्रथम अंक में भरतरोहक
राजा से कहता है—
भरतरोहकः—प्रसह्य हरणे केवलं प्रमादिताख्यातिः ।
राजा—किमेतत् !
भरतरोहकः—सदोषेषु कार्येषु यदल्पदोषं तत् प्रारब्धव्यम् ।
वसुवर्मा—स्वामिन्, तत्राप्यहं वाच्यदोषं न पश्यामि । कुतः—
नीता बलात् प्रकृति भद्रतरा सुभद्रा यद्वासुभद्रभगिनी कपिकेतनेन ।
देवस्य तेन समभूद्वचनीयता किं तेजःप्रकाशयशसां यदुदन्तिनां वा ॥
परिशिष्ट : टिप्पणी, अध्याय १७ ४६५
शालं—साधु निरुक्तमभिहितं वसुवर्मणा ॥
[ भरतरोहक—बलात् हरण करने में प्रमादी होने की केवल ख्याति मात्र
होती है।
राजा—यह क्या कहते हो।
भरतरोहक—सदोष कार्य के रहने पर भी जिसमें दोष कम रहे ऐसे कार्य
का आरम्भ कर दिया जाता है।
वसुवर्मा—स्वामिन्, मैं तो इसमें कोई उल्लेखनीय दोष नहीं देख रहा
हूँ, क्योंकि स्वभावतः कल्याणमयी श्रीकृष्ण की बहिन सुभद्रा को बलात् अर्जुन
ने हरण कर लिया तो क्या इससे अर्जुन की निन्दा हुई या अपने तेज की
तरह चमकने वाले हाथियों की निन्दा हो गयी।
शालङ्कायन—अच्छा। वसुवर्मा ने तो यह वैदिक पदों का निरुक्त ही कह
डाला । ]
१७. सिद्धि :—प्रधानानाम् अर्थात् जो स्पृहणीय एवं अतर्कितोपनत या
काकतालीय न्याय से प्राप्त हो ऐसे प्रधान प्रयत्नों का कीर्तन 'सिद्धि' है।
जैसे—कौमुदीमहोत्सव के चतुर्थ अङ्क में मन्त्रगुप्त का वचन—
सङ्गतिश्चिरमचिन्तितपूर्वा निर्वृतप्रणयिनीमिथुनानाम् ।
आधिराज्यमधिरोहति तस्याः षोडशीमपि कलां न मघोनः ॥
[—जिसका पूर्व में चिन्तन नहीं किया था ऐसा इन (दोनों) का या हम
दोनों का यह मिलन है। युग्म या मिथुनों की संगति आनन्ददायी होती है
जिसकी सोलहवीं कला को इन्द्र का परमैश्वर्य भी प्राप्त नहीं कर सकता।]
१८. विशेषण :—जैसे तापसवत्सराज में तृतीय अङ्क में राजा विदूषक
से कहता है कि—
राजा—अयि मूढ,
वृत्तिर्मूलफलादिभिः क्षितितले शय्या जटा धारणं
वासो वल्कलमीदृशं कृतमिदं सामान्यमन्यैरपि ।
संवेगाभिभवे विगूढ़मनसा यन्नानुयाता प्रिया
तन्मिथ्या परिबोधितेन न कृतं स्नेहानुरूपं मया ॥
[ कन्दमूल फल आदि से वृत्ति या निर्वाह, भूमि पर शयन, जटाओं का
धारण तथा वल्कल का वस्त्र रूप में धारण, ऐसा आचरण तो सामान्य जन ने
भी किया है किन्तु संवेगों के दबाने में विमूढ़ मैंने जो प्रिया का अनुनय नहीं
किया यह मैंने अपने मिथ्या ज्ञान के कारण स्नेह के अनुरूप नहीं किया ।]
३० ना० शा० द्वि०